दोहा
जहांगीर माल के महल में, पहुंची नाण जाय ।
शेर कह पार्वती, जल्दी दई समझाय ॥
पार्वती तेरे भरतार की
चंद्रमा सी शान
शहर दिल्ली में आ रह्या हे ॥ टेक ।
प्रीत घणी जैसे चंद चकोर
माया ले रहा अशर्फी मोहोर
और घणी दिलदार की
करैगी तू ही पहचान
बास घर म्हारै पा रह्या हे 1।
प्यारी कोयल कैसी बोल
वो तै हीरा सै अनमोल
सितोल वैदिक प्यार की
जैसा तेरा ध्यान
भान सा रूप अति छा रहया हे 2॥
हे अपने पिता का बोल
पूरा करना होगा कोल
रोल तेरी तकरार की
दिल्ली के दरम्यान
नार नर सब बतला रह्या हे 3॥
जंगम:
सुन कै बयान, बोली बखान, अरी नाण, शौच को जाऊंगी
कहा पिता बोल, करूं पूरा कोल, मत मचा रोल, जब आऊंगी
है चतुर प्रवीण, दिल में यकीन, ले पासा तीन, मैं ध्याउंगी
यह सोच चली, जहांगीर लली, देहली की गली, नहीं आऊंगी
प्रीतम का प्यार, दिल में अपार, कह नाण द्वार, कब बिछाउंगी
हो रह्या ख्याल, जल्दी से चाल, सूरज का लाल, कब पाऊंगी
मार्ग दरम्यान, देह थी हैरान, सोया चादर तान, कै रतन कुमार
कर्मरेख अड़ी, नाण घर में बड़ी, ओर नजर पड़ी, पिया पै जिस बार
गहे चरण, लागी उचरण, पिया जागो प्रण, थारा हो गया पार
नहीं हुया होश, कुछ समझ दोष, होकै खामोश, बैठी चुपमार
देखा सूता पति, सो गई सती, कर्मों की गति, है बेसुम्मार
एक आया चोर, देख्या करकै गौर, भरी अशर्फी मोहोर, हो लिया सवार
खुड़का सुनकै निद्रा त्यागी
जाता ऊंट देखकै उचरन लागी
लुभागी बोली नार की
करया चिम्मन बंद पयान
ऊंट अपना ठहरा रह्या हे 4॥