नमन करुं गुरुदेव को, श्रद्धा से शीश झुकाय ।
चरण कमल रज हेत मैं, झोली दई फैलाय॥
इंसान चाहे कितना भी धन कमा ले या कोई बड़ा मुकाम हांसिल कर ले, एक निश्चित अवधि के पश्चात उसे यह एहसास अवश्य होता है कि ये सब मिथ्या है और वह कहीं न कहीं ईश्वर से सीधे या किसी माध्यम से जुड़ने का प्रयास करता है । चूंकि यह एहसास प्रत्येक व्यक्ति को उसके स्वभाव व जीवन शैली के आधार पर भौतिक इच्छाओं की तृप्ति होने की दशा में अलग अलग अवधि में होता है अत: उस अवधि का सही आंकलन आंकडों के आधार पर मुश्किल है । कवि शिरोमणि पंडित श्री महोर सिंह जी की अनमोल कविताओं के प्रति मेरा इतना झुकाव व जुड़ाव इसी अनुभूति का हिस्सा है । पंडितजी की कविताओं का पठन करने या उन्हे श्रवण करने में मुझे असीम आनंद और संतुष्टि मिलती है । यूं तो बचपन से ही मैं बाबा महोर सिंह जी की रचनाओं का श्रवण पठन करता आया हूं । इसी कडी में बचपन में मेरे पुज्य पिताश्री पंडित मंशाराम जी ने मेरे बार बार आग्रह करने पर सन 1992 में पंडित श्री महोर सिंह जी द्वारा काव्यबद्ध “कर्ण पर्व” इतिहास को अपने स्वर दिये थे । उस समय मेरी आयु मात्र 17 वर्ष थी । उस समय मैंने किसी तरह से ऑडिओ कैसेट रिकॉर्ड की थी जो आज डिजीटल रूप में पंडित महोर सिंह यूट्यूब चैनेल पर उपलब्ध हैं।
कवि शिरोमणि पंडित श्री महोर सिंह जी की कविताओं की एक अन्य विशेषता यह भी है कि इन्हे पढ़कर या सुनकर ऐसा आभास होता है कि मानो हम ईश्वर के बिल्कुल नजदीक हैं और सीधे अपनी अरदास प्रभु तक पहुंचा रहे हैं । पंडितजी की ब्रह्मज्ञान/भक्तिरस/संतवाणी के रूप में रचित कविताएं इसका सटीक प्रमाण हैं । इसके अलावा अपनी हर एक कविता/भजन के अंत में उन्होंने प्रभु का स्मरण किया है जिससे भगवान के प्रति उनकी आस्था अत्यधिक अगाध प्रतीत होती है ।
इन कविताओं के संग्रह, लिखने और टाईप करने तथा जन-जन तक पहुंचाने की विशेष प्रेरणा मुझे मेरी पत्नी श्रीमति मनफी देवी से मिली है क्योंकि उनकी रूचि इन कविताओं में मुझसे कहीं ज्यादा है । चूंकि मेरे पास मेरे पिताजी की आवाज में कुछ ऑडिओ रिकॉर्ड्स उपलब्ध थे अत: घर पर अक्सर वही बजते थे । जब भी मौका मिलता वो पंडित श्री महोर सिंह जी द्वारा रचित एवं मेरे पुज्य पिताजी श्री मनसा राम जी द्वारा गाई गई ‘नल दमयंती कथा, कर्ण पर्व’ व अन्य भजनों को सुनती रहती थी । नल दमयंती की कथा केवल आधी ही रिकार्डेड थी अतः उनकी प्रबल इच्छा हुई कि इस कथा को सम्पूर्ण पढना चाहिए । अतएव उन्होंने मुझसे इस कथा की हस्तलिपि की इच्छा जाहिर की । जिसके परिणाम स्वरूप न केवल नल दमयंती कथा अपितु करीब 7-8 साल की कड़ी मशक्कत के बाद मैं पंडितजी द्वारा रचित लगभग सभी कथाओं एवं भजनों का संग्रह कर पाया जो आज इस वेबसाईट पर उपलब्ध है, तथा उन्हे टाइप कर एक पुस्तक की शक्ल देने में कामयाब हुआ हूं । शायद ये मेरा सौभाग्य है कि बाबा महोर सिंह जी ने इस पावन कार्य के लिए मुझे चुना या मुझे ये अवसर दिया या यूं कहें कि मुझे इस लायक समझा और शक्ति प्रदान की कि मैं पंडितजी द्वारा रचित अमुल्य रचनाओं को सहेजने में सफल हुआ । इस दुर्लभ कार्य में मेरी बेटी कु. अंजली गौड़ ने भी विशेष योगदान दिया है एवं टाइपिंग में मेरी मदद करके इस कठिन कार्य को सरल बनाया ।
इन विशिष्ट भजनों को डीजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने में मेरी सहायता करने वाले व अपना बहुमुल्य योगदान देने वाले मेरे सखा व हरियाणवी साहित्य से प्रेम करने वाले, उन्हे आने वाली पीढियों के लिए सहेजकर रखने वाले तथा जन जन तक सुलभ कराने वाले श्री प्रवीण जी जिन्होने पंडित महोर सिंह ऐप बनाकर गूगल प्ले स्टोर पर अपलोड किया, का सादर अभिवादन करता हूं । साथ ही वेबसाईट बनाकर इन रचनाओं को कालजई बनाने के लिए मैं मेरे सुपुत्र तथा बाबा महोर सिंह जी के सड्पौत्र मास्टर अंकित गौड़ को शुभाशीष देता हूँ ।
आप सभी पाठकगण का सादर आभार व्यक्त करते हुये मैं अपनी सच्ची श्रद्धांजली मेरे परमपुज्य गुरुवर एवं परदादा जी पंडित श्री महोर सिंह जी के श्रीचरणों में समर्पित करता हूँ ।