धन हीन सुदामा
रहै दीन सुदामा
उज्जैन पुरी के पास
गाम छोटे से में करता वास ॥ टेक ।
सांदीपनी मुनी हुये पुरी अवंतिका माईं जी
बालपन में उनके पास करने गया पढ़ाई जी
चटसाल बीच हुई कृष्ण संग मित्रताई जी
चार वेद षट शास्त्र पढ़ गये दोनों भाई जी
यदुराई मेल
है कठिन खेल
बिन भक्ति अभ्यास 1॥
कृष्ण संग विद्यार्थी गये लकड़ी लेने वन मांय
सुदामा चटसाल बीच गया कुछ चबीना आय
सब के हक़ का सुदामा नै चबीना लिया खाय
पता लग्या सबको कृष्ण बोले मुख से सुनाय
लगे कहन हरी
सुदामा के करी
दरिद्री दई सबको त्रास 2॥
पढ़ते समय सुदामा कै कृष्णजी का लाग्या श्राप
वेदों का विद्वान ब्राह्मण दरिद्रता का संताप
टूटी झोंपड़ी में रहै भिक्षा मांगन जा नित आप
श्रापवश भीख भी ना मिली उदय होय गये पाप
दिन तीन हुये
भूखाधीन हुये
ऋषि ऋषियाणी तन नाश 3॥
धर्मपत्नी बोली पिया भूख नहीं सही जाती
कहै ऋषि करूं क्या दारिद्र फूकता है छाती
है कौन पाप पिया म्हारा मरैं भूखे दिन राती
हैं कर्मों के भोग प्यारी भोगते जग में दो साथी
एक करै आनंद
महोरसिंह छंद
कथा सुदामा का इतिहास 4॥