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पंडित चिम्मन लाल जी 'श्रीकृष्ण सुदामा कथा'

धन हीन सुदामा
रहै दीन सुदामा
उज्जैन पुरी के पास
गाम छोटे से में करता वास ॥ टेक ।

सांदीपनी मुनी हुये पुरी अवंतिका माईं जी
बालपन में उनके पास करने गया पढ़ाई जी
चटसाल बीच हुई कृष्ण संग मित्रताई जी
चार वेद षट शास्त्र पढ़ गये दोनों भाई जी
यदुराई मेल
है कठिन खेल
बिन भक्ति अभ्यास 1॥

कृष्ण संग विद्यार्थी गये लकड़ी लेने वन मांय
सुदामा चटसाल बीच गया कुछ चबीना आय
सब के हक़ का सुदामा नै चबीना लिया खाय
पता लग्या सबको कृष्ण बोले मुख से सुनाय
लगे कहन हरी
सुदामा के करी
दरिद्री दई सबको त्रास 2॥

पढ़ते समय सुदामा कै कृष्णजी का लाग्या श्राप
वेदों का विद्वान ब्राह्मण दरिद्रता का संताप
टूटी झोंपड़ी में रहै भिक्षा मांगन जा नित आप
श्रापवश भीख भी ना मिली उदय होय गये पाप
दिन तीन हुये
भूखाधीन हुये
ऋषि ऋषियाणी तन नाश 3॥

धर्मपत्नी बोली पिया भूख नहीं सही जाती
कहै ऋषि करूं क्या दारिद्र फूकता है छाती
है कौन पाप पिया म्हारा मरैं भूखे दिन राती
हैं कर्मों के भोग प्यारी भोगते जग में दो साथी
एक करै आनंद
महोरसिंह छंद
कथा सुदामा का इतिहास 4॥

सुशीला- दम्पत्ती बोली पिया कौन है तुम्हारा साथी
सुदामा- मेरे बालेपन का मीत प्रीत कृष्णजी से पाली जाती ॥ टेक ।

सुशीला- पिया कृष्ण तो साकार ब्रह्म अवतार कहाये हैं
सुदामा- बालेपन में गुरु पास हम सेती प्रेम बढाये हैं
सुशीला- पाये हैं पिया आपने यदुनाथ हिमाती
सुदामा- पुरी अवन्तका में रहा करते हम संग दिनराती 1॥

सुशीला- एक मीत तो महादुखी एक सर्वसुख को भोगै
सुदामा- प्यारी श्रीकृष्ण आनंदमय पति तेरा दुःख को भोगै
सुशीला- पिया मीत मीत की रुख को भोगै जावो थारे बालेपन का संगाती
सुदामा- खाली पल्लै जाते प्यारी शर्म मोहे आती 2॥

सुशीला - अन्न वस्त्र का टोटा हो रह्या पल्लै बाँधन नै के वस्तु ल्याऊं
सुदामा- कुछ भी बांध दिये प्यारी जा कृष्ण आगै तेरा नाम सुनाऊं
सुशीला - अभी कुछ ल्याऊँ जाऊं उठ दम्पती ध्याती
चावल मुट्ठी चार मांग च्यार घरों से ल्याती 3॥

पाटी चादर कै पल्लै वै चावल बांध लिये
भोजाई के प्रेम नै कृष्ण फंदे में फांद लिये
सांध लिये सही तीर शब्द का जो सतगुरु रसना बतलाती
काम क्रोध आशा तृष्णा चिम्मन खड़ी दूर पछताती 4॥

लई बगल में पाटी खोली
टूटी हाथ में लठोली
तन पै कपड़े झीरम झीर
भूख से थर थर करै शरीर
नंगे पैरीं शान चली भोली ॥ टेक ।

द्वारका में जादू छप्पन करोड़ सोचता
कृष्ण बिना कोई नहीं जानै हो रही संकोचता
मोचता कृष्ण दुख सारे
मगर मिलने मुश्किल प्यारे
भ्रमता में बुद्धि डोली 1॥

अव्वल तो सिंधु से मुश्किल पार होना
फिर बालेपन का मीत छप्पन किरोड़ में टोहना
खोना मुश्किल दुख हमारा
मैं हूं किस्मत का हारा
लक्ष्मी नै शान ल्हकोली 2॥

करता विचार आया सिंधु-तीर पै
केवटियों से कहै मोहे जाना यदुवीर पै
शरीर पै टोटे की निशानी
केवट हंस कै बोले बानी
कहो उतराई की क्या बोली 3॥

चावल मुट्ठी चार हैं मेरे पास में
द्यूं एक मुट्ठी तुमको ओर यदुवर विलास में
साल्हावास में गुरुद्वारा
सतगुरु महोर सिंह प्यारा
दई चिम्मन कर ज्ञान सिटोली 4॥

सिंधु पार कर गये सुदामा पुरी द्वारका नजर पड़ी
स्वर्ण का गढ़ कोट किला है दीवार लाल मणियों में जड़ी ॥ टेक ।

बारह योजन की बनी शोभा बाहर बगीचे फुलवारी
बागों में विश्राम भवन स्वर्ण की बैठक है न्यारी
खिल रहे फूल सुगन्धित भंवरे गुंजार करैं प्यारी
कोयल बोलै हरी डाल पै सैल कर रहे नरनारी
भिखारी सुदामा देख रहा सब रत्नजड़ित रहे बांध घड़ी
बेस बसन रत्नों से शुशोभित देव देवांगना नजर पड़ी 1॥

आगै बढ़ा स्वर्ण के कोट गढ़ कै चार बने दरवाजे
स्वर्ण बुर्जी दही सतगनी आयुध वीर खड़े साजे
स्वर्ण की सड़क बन रही हैं फिरैं विमान भाजे-भाजे
देखता सुनता जा नगरी में बाज रहे अनंद बाजे
लाजे सुदामा अपने भेष सैं सोचै कर्म की रेख अड़ी
कहै द्वारपालों से जांगा कृष्ण पै मेरी बालेपन की प्रीत बड़ी 2॥

गौपुर में चले जाओ वहां पावैंगे कृष्ण मुरारी
चल्या सुदामा देवरूप आवैं हैं नजर नरनारी
कोई बोलै कोई नहीं बोलै लख दुर्बल भेष भिखारी
मुश्किल मिलना घनश्याम सोचता बालेपन का यारी
जा निहारी शोभा गौपुर की चारों तरफ मणी माल लड़ी
प्रद्युम्न से राजकुमारों की न्यारी-न्यारी कोठड़ी 3॥

विश्वकर्मा नै इन्द्रपुरी से शोभा अधिक बनाई
जा रहा देखता विप्र सुदामा वासुदेव देवकी दर्शाई
उग्रसेन का भवन शुशोभित देख रहे ऋषिराई
अपना बाना देख देख घणी लाज विप्र नै आई
यदुराई जब मिलें महोरसिंह जा अभिमान और ममता हड़ी
चिम्मन कृष्ण मिलन की सुदामा कै लाग रही है तड़ाभड़ी 4॥

मेरे बालेपन का मीत कृष्ण किस तरह मिलै
बिना उदय हुए रवि फूल कभी नहीं खिलै ॥ टेक ।

गौपुर के भवन भवन में
जा देखता छन छन में
चकोर चंदा की लगन में
सुदामा सुरती श्रीकृष्ण में
तन में ना झाल झिलै 1॥

मुश्किल घर रैन बसेरा
टोटे नै ला लिया घेरा
अगर वापिस मार्ग जा हेरा
तो पूछैं नार कृष्ण का बेरा
मेरा जिगर वचनों से किलै 2॥

एक दो भवन और आगै चल
शायद कृष्णजी जां मिल
कोई बरजै नहीं भेष लख दुर्बल
मिलै कृष्ण दुख सब जां टल
दिल तिल तरह तिलै 3॥

गया अन्तःपुर के द्वार देख्या
कोट शशि उजियार
पलंग पै सोलह कला अवतार
चारों तरफ सोलह हजार
दरबार सत्य में चिम्मन जान लई सत्य मिलै 4॥

सुदामा देखे कृष्ण मुरार
पलंग पै रत्नों की बहार
हज्जार सोलह पलंग के चारों तरफ खड़ी ॥ टेक ।

साकार ब्रह्म लखे श्याम बिहारी
वेद सुरती सभ सखी निहारी
रुक्मण आद सभ आज्ञाकारी
पानदान कर में लिये प्यारी
उठारी कोय सुबरण का थाल
मेवा मिश्री मक्खन घाल
नंदलाल की थी सभ पै दृष्टि पड़ी 1॥

कोई छत्र कोई चंवर ढोल रही
कोई प्रभु से आकै बोल रही
थारा मित्र बतावै मैं समझ मखोल रही
एक खड़ा भिखारी काया डोल रही
तोल रही सुरता डटने वाली
भिखारी मित्र से कटने वाली
हटने वाली सुदामा की थी बुरी घड़ी 2॥

हंसी रुक्मणी और सतभामा
इसा कौण मित्र सोचै घनश्यामा
देखन लगी सभ कृष्ण की बामा
तेज पुंज रह्या देख सुदामा
जामा जरकस मोती लाल
मुकट पै शोभित श्री नंदलाल
माल बैजंती की गल में सोहै लड़ी 3॥

देख मित्र अति आनंद छाया
अन्तःपुर में हो निर्भय धाया
देख सुदामा श्रीकृष्ण हर्षाया
पलंग छोड़ दिया तन लहराया
गाया महोरसिंह गुरु छंद
श्री सतगुरुजी के पगबंद
मतिमंद चिम्मन नै ये कथा जड़ी 4॥

आयो री आयो मेरो बालापन को यार है
बहोत ज्यादा प्यार है
कहै कृष्ण मुरार है ॥ टेक ।

उठ चले निज पर्यंक तै
मिलने सुदामा रंक तै
भिखारी भयंक तै
धनी करने को विचार है 1॥

त्रिलोकी प्रकाश चले
त्याग रणवास चले
भक्तों का विश्वास चले
दुनिया का दातार है 2॥

देख रही प्यारी राणी
जा रहे सारंगपाणी
बालपन की प्रीत जानी
प्रेम उर धार है 3॥

चले दोनों भुजा उठाय
हिये से हिय मिलाय
गुरु महोरसिंह मिले आय
चिम्मन ताबेदार है 4॥

तन बांह घली
नहीं झाल झिली
बहै रहे नैन जलधार
मिले जब बालापन के यार ॥ टेक ।

बारंबार आपस में गले कै गला लगावैं जी
माला बैजंती में उलझी कुण्डल जटा सुहावैं जी
बहावैं नैन नीर
भीगे तन के चीर
करैं याद पिछला प्यार 1॥

पाटे वस्त्रों में पीताम्बर उलझा नाथ का
मिला घने दिनों में कहैं आज साथी मेरे साथ का
गात का ख़ुशी रूम रूम
सुदामा की ज़ूम
हुई मोती कै उणिहार 2॥

नहीं हटैं हटाये प्रेमसिंधु की बेथाह धार है
कृष्ण सुदामा सा हुया और किसी का ना प्यार है
यार है जिगरी
सच्ची डिगरी
सन्मुख हो रहे निहार 3॥

श्रीकृष्ण नै सुदामा के चरणों में धोक मारी
फिर पकड़ हाथ अन्तःपुर में चलने की करी त्यारी
प्यारी रुक्मण नै आन
महोरसिंह जान
कर गह लिया उबार 4॥

एक पकड़ा हाथ मुरारी
दूजा श्रीलक्ष्मी प्यारी
अन्तःपुर के दरम्यान
पलंग पै बैठा दिया है आन
भगवान नै भूखा भिखारी ॥ टेक ।

अन्तःपुर में करैं शोर एकदम सोलह हज्जार
एक भूखा भिखारी रंक पलंग पै बैठा दिया करतार
प्यार देख रुक्मण ध्याई
स्वर्ण कलसे में जल ल्याई
ऋषिराई चरण बलिहारी 1॥

रख नीचै स्वर्णथाल लक्ष्मी चरण धोवण लागी
लिया कृष्ण नै कलसा हाथ सुदामा की भक्ति जागी
कहैं अनुरागी भाग धन्य मेरा
सुदामा दर्शन आज हुया तेरा
धोवै चरण भक्त हितकारी 2॥

मल-मल चरण पखाल पीतांबर से साफ़ किये
जन हितकारी प्रभु नै तन अपने आप किये
मिलाप किये सन्मान बैठा कै
नये वस्त्र जेवर पहनाकै
शोभा करी रतनारी 3॥

मेवा मिश्री मक्खन संग जिमाये हैं पकवान
गौरस दूध मलाई का करै सुदामा पान
ज्ञान गुरु का प्यारा
किया चिम्मन नै दूर अँधियारा
हो रही सत्य उजियारी 4॥

बालापन के यार सुदामा
रहै याद हरबार सुदामा
म्हारा था घना प्यार सुदामा
कहां लगा दई बार सुदामा ॥ टेक ।

अवन्तपुरी में विद्या पाकै
मैं पहूंचा मथुरा में आकै कहो मित्र तुम कहां पै जाकै रहे अबतक दर्श छुपाकै बतलाकै विस्तार सुदामा
कहो दिलदार सुदामा 1॥

कहै सुदामा गदगद वानी
हो तुमसे न्यारा सारंगपानी
उज्जैन पास छोटी सी ढानी
दुख में बिता रहा जिंदगानी
जानी जिंदगी बेकार सुदामा
थारा लिया आधार सुदामा 2॥

गदगद वचन सुन कहैं यदुराई
कहो विवाह हुया है या नाईं
जो तुमरे घर में भोजाई
तो मेरे लिये क्या भेजा भाई
पहुंचाई का सार सुदामा
द्यो जो दई थारी नार सुदामा 3॥

बोलै नहीं सुदामा सकुचावै
चावल चद्दर बीच दबावै
कहैं कृष्ण क्यूं नहीं बतलावै
महोर सिंह हरी के गुण गावै
बजावै चिम्मन तार सुदामा
गुरुचरण बलिहार सुदामा 4॥

रुक्मण आदि प्यारी नारी सोलह हज्जार
आपस में बतला रही सारी करैं तकरार ॥ टेक ।

इस ब्राह्मण नै कौन पुण्य किया कौन जाप
त्रिलोकीनाथ बांथ भर-भर करैं मिलाप
संताप दुख का मारा अस्थि न्यारा तन मंझार
गडे होंगे बदन में जब मिले कृष्ण मुरार 1॥

लेते बर बर नाम जनूं रटैं भगवान को
धापत नहीं मुरार देखत देखत शान को
अज्ञान को दें ज्ञान करैं कंगले को साहूकार
धन्य इस ब्राह्मण की ब्राह्मणी हरि पूछ रहे समाचार 2॥

निज पर्यंक पै बैठा दिया धन्य इस ब्राह्मण के भाग
यदुराई मनमोहन कैसे बढ़ा रहे अनुराग
त्याग म्हारा प्रेम कर रहे इस ब्राह्मण से प्यार
भोजाई को सोगात मांग रहे कैसे बारंबार 3॥

देखैंगी क्या भेजी है भोजाई नै सोगात
कितने चाव भाव से मांगें त्रिभुवनपति नाथ
दिनरात महोरसिंह सत्य ब्रह्म विचार
अलख ज्योति लखा गये लखी चिम्मन ताबेदार 4॥

सार भोजी की भाई दिखाते क्यूं नहीं
जो भेजा मेरी भावज नै खिलाते क्यूं नहीं ॥ टेक ।

चद्दर खोस लई यदुराई
चावल बंध रहे उसके माईं
मेरे हाथ पै इनको टिकाते क्यूं नहीं 1॥

सुदामा चावल हाथ जचाये
यदुराई नै प्रेम से खाये
जल्दी-जल्दी ल्याते क्यूं नहीं 2॥

दूजी मुट्ठी और चबाई
सुख संपै दे गये यदुराई
कहैं बेगा बेगा चुवाते क्यूं नहीं 3॥

तीजी मुट्ठी और जचाई
श्री रुक्मण चलकर आई
थारी भोजी की सार हमको चखाते क्यूं नहीं 4॥

तीजी मुट्ठी नहीं खान दई
रुक्मण हाथ श्रीभगवान दई
चिम्मनलाल हरि के गुण गाते क्यूं नहीं 5॥