हेमांचल पर्वत के बीच में एक बण था बड़ा भारी ।
कश्यप से आद ले ऋषि मुनि तप करते थे तपधारी ॥ टेक ।
पदमासन सिंहासन कमलासन बैठे करते थे ध्यान
नाभि में विष्णु का ध्यान धरें ह्रदय में ब्रह्मा स्थान
त्रिपुटी में शिवजी का ध्यान धरें शिव ओम शिव ओम करें बखान
इन तीनों को एक समझता उनको होता ब्रह्म का ज्ञान
हनुमान जन्म की कहूं कथा जिस बिध जन्मे बलकारी 1॥
तप तेज निधान हो ऋषि कश्यप बैठे हो दिन दिन ध्यान सवाया
कोय भी ना जाण सकै प्रभु की बेथाह माया
इतने में बणखंड से आता हुया एक विशाल हाथी दर्शाया
ऐरावत के समान देखकर ऋषि मुनि सब घबराया
नहीं भागने पाया फूले पैर हुई लाचारी 2॥
देख ऋषि मुनियों को मारी कुंजर नै चिंघाड़
हाथी की किलकारी सेती गूंजन लागे पहाड़
सूंड उठा दौड़न लाग्या ऋषियों का करन बिगाड़
कहैं ऋषि मारैगा दे दुःख से कौन लिकाड़
ये उजाड़ बियाबान यहां कोय ना छत्री रणधारी 3॥
उसी बणखंड के अन्दर एक केशरी नाम का बंदर था बलवान
अंजना जिसकी नारी थी नित्य रखती धर्म का ध्यान
सुन ऋषियों का कोलाहल हुया केशरी को दुःख महान
कालरूप कुंजर देख्या कहै चिम्मन छन्द बखान
तुलसीकृत रामायण कही जो वही कथा विस्तारी 4॥