Loading...

पंडित चिम्मन लाल जी 'हनुमान जयंती कथा'

हेमांचल पर्वत के बीच में एक बण था बड़ा भारी ।
कश्यप से आद ले ऋषि मुनि तप करते थे तपधारी ॥ टेक ।

पदमासन सिंहासन कमलासन बैठे करते थे ध्यान
नाभि में विष्णु का ध्यान धरें ह्रदय में ब्रह्मा स्थान
त्रिपुटी में शिवजी का ध्यान धरें शिव ओम शिव ओम करें बखान
इन तीनों को एक समझता उनको होता ब्रह्म का ज्ञान
हनुमान जन्म की कहूं कथा जिस बिध जन्मे बलकारी 1॥

तप तेज निधान हो ऋषि कश्यप बैठे हो दिन दिन ध्यान सवाया
कोय भी ना जाण सकै प्रभु की बेथाह माया
इतने में बणखंड से आता हुया एक विशाल हाथी दर्शाया
ऐरावत के समान देखकर ऋषि मुनि सब घबराया
नहीं भागने पाया फूले पैर हुई लाचारी 2॥

देख ऋषि मुनियों को मारी कुंजर नै चिंघाड़
हाथी की किलकारी सेती गूंजन लागे पहाड़
सूंड उठा दौड़न लाग्या ऋषियों का करन बिगाड़
कहैं ऋषि मारैगा दे दुःख से कौन लिकाड़
ये उजाड़ बियाबान यहां कोय ना छत्री रणधारी 3॥

उसी बणखंड के अन्दर एक केशरी नाम का बंदर था बलवान
अंजना जिसकी नारी थी नित्य रखती धर्म का ध्यान
सुन ऋषियों का कोलाहल हुया केशरी को दुःख महान
कालरूप कुंजर देख्या कहै चिम्मन छन्द बखान
तुलसीकृत रामायण कही जो वही कथा विस्तारी 4॥

सुनकै कुंजर की चिंघाड़
केशरी पीसन लाग्या जाड़
भुजा उर जंघा ताड़
मारने जो ऋषियों को आया
आकै मोर्चा लाया ॥ टेक ।

आ गज का मार्ग घेरा
केशरी कर क्रोध बैन जब टेरा
तेरा तोड़ द्यूंगा सूंड
तूं सुन रै काले भूंड
पाड़ूं नखों से मूंड
क्यूं इतना गर्भाया 1॥

गज चल्या सूंड उठाकै
कूद केशरी नै पकड़ा जाकै
घुमाकै जमीन कै दरम्यान
मारा केशरी बलवान
गज के बिसर गये प्राण
यम घर पहूंचाया 2॥

केशरी का था उस बण में राज
सारे ऋषि मुनियों के काज
आवाज देन लगे तपधारी
धन्य धन्य केशरी बलकारी
तैं रक्षा करी हमारी
राम करै तेरे मन का चाया 3॥

केशरी नै शंख बजाये
धुन सुन देव स्वर्ग से आये
गाये केशरी के यशगान
तोहे धन्य धन्य बलवान
बचाये ऋषियों के प्रान
छंद कथ चिम्मन लाल गाया 4॥

उस केशरी बलवान नै
कर दिया गज का घात
मारने जो ऋषियों को आया ॥ टेक ।

लिये गज के दन्त उखार
ऋषि मुनि बोले बचन उचार
बलकार धन्य तेरे बल महान नै
तनै कर दिये ऋषि सनाथ
गज कर्मों का फल पाया 1॥

कश्यप ऋषि बर बर कहै बखान
केशरी मांग मांग वरदान
भगवान म्हारे वरदान नै
पूर्ण करैं दीनानाथ
मांग करैं तेरे मन का चाया 2॥

वचन म्हारा खाली ना जावैगा
केशरी मन चाह्या फल पावैगा
जो बचावैगा ऋषियों की ज्यान नै
हो ज्यागा जग में विख्यात
नाम का जागा यश गाया 3॥

सांगीत- कश्यप बैन सुन केशरी बोले उचार
ब्राह्मणों की रक्षा हेत जन्म दिया करतार
धर्म है ये मेरा थारी रक्षा करूं हरबार जी
वरदान देते हो तो दियो यही वरदान
थारी दया से मेरै पुत्र होवै बलवान
सुनकै वचन ऋषि तथास्तु बोले आन

दिया ज्ञान गुरु गुणवान नै
कर-कर सेवा दिनरात
चिम्मन संगीत वर पाया 4॥

अंजनी सिंगार बनाने लगी
गहनों वस्त्रों से अंग सजाने लगी ॥ टेक ।

बेणी फणीन्द के समान जी
मुख इंदु सम सजा महान जी
आशखा चम्पाकली को लजाने लगी 1॥

च्यार चतुर्पग पखेरू चार जी
चार फूल फल सोलह सिंगार जी
सोलहूं को सजा मुस्काने लगी 2॥

शीतल मंद सुगंध हवा आई
रम्भा से रूप में हुई अधिकाई
ऊठ गिरी शिखर पर जाने लगी 3॥

शिखर पहाड़ की सुशोभित हो गई
अंजनीरूप पवनदेव को मोह गई
कहै चिम्मन ध्यान डिगाने लगी 4॥

देख रूप अंजना का डिग ग्या पवनदेव का ध्यान
मानस तन धारण हो ग्या था ऋषियों का वरदान ॥ टेक ।

ऋषियों के वरदान बस हो लुभावना पड़ा
देवरूप धर गिरि शिखर पै आवना पड़ा
आन गिरि पै ऋषि वचनों को निभावना पड़ा
निज धर्म समझ कामदेव को ध्यावना पड़ा
पुगावना पड़ा वचन जो किया ऋषियों नै बखान 1॥

देख अचानक गैबकर्म हुया अंजनी कै संताप
लगी पूछने पवनदेव से कहो कौन हैं आप
क्रोधाग्नि अंजना कै जागी बदन रह्या था कांप
मेरा पतिव्रत धर्म बिगाड़ा द्यूंगी तुझे अब श्राप
चुपचाप हुई अंजना जब पवनदेव लागे करण बयान 2॥

ऋषिमंडल में पवनदेव नै ऋषियों का मान बढ़ाया
ऋषियों नै पवनदेव को आशीर्वाद सुनाया
कहा मांग लो वरदान होगा तेरे मन चाया
अंजना कै आगै जा ऋषियों नै सारा हाल बताया
पाया वरदान तेरे पति नै हमसे मेरै पुत्र हो मारुत समान 3॥

ऋषियों के श्राप से मर्यादा बिसरनी पड़ी
कामदेव के वश हो विपदा भरनी पड़ी
ऋषियों के वचनों में सुरता धरनी पड़ी
होते दीखे अनाथ जब सेवा करनी पड़ी
सुमरनी पड़ी माल चिम्मन सुध लेंगे भगवान 4॥

मारुत हुये अंतर्ध्यान जी
अंजना निज भवन पधारी ॥ टेक ।

गर्भ बीच आये हैं पवनपुत्र हनुमान
केशरी वनराज आये भवन पहूंचे आन
अंजना नै हाल सब पति आगै कह्या बखान
अंजना से हाल सुनकै ख़ुशी हुये वनराज
देव ऋषियों के वर से सिद्ध हुये मेरे काज
पवन के समान पुत्र होगा मोहे नहीं लाज
सब तजो मन की गिलान जी
तेरै जन्मै पुत्र बलकारी 1॥

गर्भाधान संस्कार केशरी करवाते हैं
करै हवन पुण्य दान मान ऋषियों का बढ़ाते हैं
नित्य क्रीड़ा करै ख़ुशी होवै मंगल गाते हैं
पवनदेव पूरा कर गये मैंने जो मांगा वरदान
शिव-शिव नाम रटते रहो दें सुन्दर सुवन भगवान
शंकर सुवन कहलाये शंकर सुवन हनुमान नित्य रटते शिव भगवान जी
केशरी अंजना प्यारी 2॥

एक दिनरात का गर्भ बेर समान दर्शाता
पांच दिन का गर्भ बुलबुला सा बन जाता
चौदह दिवस में धातु मांस प्रकट हो आता
बीस दिन का गर्भ मांसपिण्डी के आकार
दो महीने का गर्भ त्वचा को लेता है धार
तीसरे में मज्जा अस्थि बीसों उंगलियों का विस्तार
गर्भ में बनने लगे हनुमान जी
पालन करैं पिता महतारी 3॥

पांचवे महीने में हाथ पैरों के निशान
छठे में सब संधि मिल गई होने लगा बलवान
सातवें में घूमान लग्या बजरंगी गर्ब्ज दरम्यान
नौ तो मास बीत गये दसवां मास लगा आय
भगवन को राजी किया बारम्बार गुण गाय
प्रसूत के पवन चले स्थान भी दिया छुटवाय
जन्मे बजरंगी आन जी
कथा चिम्मन नै विस्तारी 4॥

कार्तिक बदी चतुर्दशी थी वार था मंगलवार
स्वाति नक्षत्र मेष लग्न में जन्मे पवन कुमार ॥ टेक ।

भारत भूमि पै जन्म लिया बजरंगी पवनकुमार
अंजना मात वनराज केशरी कै ख़ुशी हुई है अपार
गंगाजल से स्नान कराये किया जातक संस्कार
फल फूलों के रस की घूंटी दई है मुख में डार
मंगलाचार केशरी घर हों ऋषि मुनि रहे मन्त्र उचार 1॥

नामकरण संकार कराया ऋषि मुनियों नै आन
गुण कर्मों को देख ऋषियों नै धरा नाम हनुमान
मेवा फल खिलाने लगे बजरंगी लगे खान
एक दिन अंजना फल लेने गई थी वन कै दरम्यान
भान उदय हुया जान पका फल कूदे हैं बलकार 2॥

सूरज नै पकड़न खातर महाबीर नै हाथ फैलाया
मारा वज्र इन्द्र नै क्रोध बदन में छाया
लाग्या बज्र गिर गया धरण में कुछ देर मूर्छा खाया
बज्र के मारण का हाल पवनदेव सुन पाया
आया क्रोध में पवन गति के कर दिये बंद द्वार 3॥

पवन बंद होने से त्रिलोकी में दुख हुया भारी
एकत्र हो देव सब पहौंचे जहाँ थे त्रिपुरारी
पवनगति रुकने की कथा बतलाई सारी
बोले शिव घबराओ मत करैंगे रक्षा चक्रधारी
हितकारी सारे जग का चिम्मन राम नाम आधार 4॥

शिव ओम शिव ओम गाते सभी
चल पवनदेव पै आते सभी ॥ टेक ।

मारुत से आ बोले हैं जब
पवनगति क्यों करी बंद सब
त्रिलोकी में दुख उठाते सभी 1॥

देवों नै जब बैन उचारी
तेरे पुत्र का खोट बड़ा भारी
कसूर का दंड उठाते सभी 2॥

उछल पुत्र तेरा आकाश में ध्याया
रवि पकड़न हेत हाथ बढ़ाया
बदला जग में चुकाते सभी 3॥

रविप्रकाश बिन घोर अंधियारा
इस कारण बज्र इन्द्र नै मारा
रविप्रकाश को चाते सभी 4॥

हरिभजन में सुरत समो गये
भवनिधि से पार हो गये
चिम्मन गुरुचरण दबाते सभी 5॥

मारुत छोड़ दे पवनगति दुनिया दुख पा रही सारी
हो बेटा तेरा अजर अमर बजरंगी बलकारी ॥ टेक ।

ब्रह्मा कहै मेरी शक्ति से तेरा बेटा नहीं मरै
शिवशंकर कहै मेरा त्रिशूल ना इसकै घाव करै
इंद्र बोल्या मेरा बज्र इस तै सदा दूर टरै
अग्निदेव कहै मेरी आग में तेरा बेटा नहीं जरै
फिरै च्यारों तरफ चक्र मेरा न्यूं बोले चक्रधारी 1॥

वरुणदेव कहै नहीं डूबैगा चाहे हो कितना बेथाह नीर
सदा राम का रहै भक्त तेरा बजरंगी महाबीर
सारी दुनिया दुख पा रही तूं जल्दी दे छोड़ समीर
सदा सदा पास रखैंगे इसको श्रीराम रघुबीर
रणधीर बनै और बेथाह बल हो बनैगा जंग खिलारी 2॥

पवनदेव नै पवन छोड़ दई देवों से पाकर वरदान
मारुतसुत में बेथाह बल हुया जो कर गये देव बखान
बाली उमर में घूमन लग्या वन में बजरंगी बलवान
गिरि कन्द्रा तोड़न लाग्या पड़ें थी धरण पै आन
बलवान ऋषि मंडल में ध्याया जहां तपते थे तपधारी 3॥

ऋषियों के शाप के कारण भूल गया बल उनमान
राम नाम की भक्ति का बजरंग बली लाया ध्यान
नितप्रति करण लग्या मुख से राम नाम गुणगान
गुरु पितृ भगवान की सेवा का फल अमृत जान
शान हिरदे बसी चिम्मन कै रहै चरणों में बलिहारी 4॥