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पंडित चिम्मन लाल जी धन्ना भक्त की कथा

दिसी बरुण गाम
कऊ जाट नाम
था मामूली जमीदार
वोह करता था कास्त की कार ॥ टेक ।

अन्न ब्रह्म पैदा करता गऊ सेवा में रहता लौ लीन
ब्राह्मण संतजनों का प्रेमी धर्म सनातन में प्रवीन
अनंत गुण हो अन्न ब्रह्म रटना रहती बोता जमीन
सुरत निरत के चलें नारीये मनवा हाली रास गुण तीन
सत का सांटा
जत जूवा डाटा
वृख कन्धों के आधार 1॥

ब्रह्मारूप धारण कर कऊ अन्न बोता खेत तमाम में
विष्णुरूप से पालन करता कसर ना रखता काम में
शंकररूप धर करता लावणी जणों शूरा लड़ें संग्राम में
काट अन्न पूरा करता था कऊ धाप निज धाम में
जिन जन का सीर
सत्य धर्मबीर
को हुई वंश बेल गुल्जार 2॥

कऊ के पुण्य प्रताप सेती जन्मा पुत्र हुई जै जैकार
ब्राह्मण याचक का छत्री पुत्रोत्सव में करै सत्कार
नामकरण संस्कार कराया धन्ना नाम द्विज रहे उचार
मातपिता सतधर्म का प्रेमी हो दर्शन दें इसको करतार
ज्योतिष का लेख
ऋषि मुनी देख
करने लागे विस्तार 3॥

आठ साल का हुया भक्त पिता माता कै मनभाया जी
देने स्यावहड़ी कऊ नै धन्ना प्रोहत घरां खंदाया जी
आ द्विज का सन्मान करा चरणों में शीश झुकाया जी
आशीर्वाद देकै ब्राह्मण नै आशिख वचन सुनाया जी
गुरु महोर सिंह
सत्संग गंग
चिम्मन का हुया सुधार 4॥

धन्ना के सत्कार सैं, हुई द्विज कै ख़ुशी अपार ।
धन्यवाद देने लगा, रह्या आशिखा उचार ॥

टेक – 2 सभ दुनिया का कल्यान
तू करता है मजदूर किसान
धन्य तेरा क्या कहना ॥ टेक ।

अन्न ब्रह्म पैदा करता है कर करकै मजदूरी तू
जलचर भूचर नभचर की भूख करै है पूरी तू
रजा रंक धनवान
कमाई खाते तेरी विद्वान
धन्य तेरा क्या कहना 1॥

लख चौरासी जीवाजून का त्रिगुणरूप पालनहारा
कीड़ी को कण हाथी को मण खुल्या अलख का भंडारा
प्यारा रूप महान
कर कमलो से दे रह्या दान
धन्य तेरा क्या कहना 2॥

शुरू काम के करने में पूर्ण रटना भगवान की
सुन टेर मेहेर करते विनती करुणा भरी जबान की
किसान की प्यारी बखान
करते वर्षा भगवान
धन्य तेरा क्या कहना 3॥

इतनी कह ब्राह्मण पूजा करने लग्या सालग्राम की
धन्ना नै ब्राह्मण घर पूजा देखी श्री घनश्याम की
काम की मनुवा बेईमान
कर गये महोर सिंह गिल्यान
धन्य तेरा क्या कहना 4॥

दोहा

धन्ना ब्राह्मण से कहै, प्रोहत जी महाराज ।
किसका पूजन कर रहे, करो सिद्ध मम काज ॥

टेक – 3 हे सालगराम नाम काम भक्तों के समारण हारे
हैं ये म्हारे राम जी ॥ टेक ।

इन्होंनै प्रहलाद की रक्षा करी
इच्छा ध्रुव भक्त की भरी
हरीदास त्रास खास भक्तों के सिधारण हारे
सर्वगुणों के धाम जी 1॥
डूबत गजराज उभारे
पापी अजामेल से तारे
प्यारे भगत जगत फकत सारे के विस्तारण हारे
अगणित इनके नाम जी 2॥

किया द्रोपता का चीर अनन्त
ध्यान धरें योगी बड़े-बड़े संत
महंत माली पाली डाली जड़ चेतन दुख टारण हारे
जग का मूल तमाम जी 3॥

दौड़
सुन वचन मना घना धन्ना जाट का
ख़ुशी हुया महिमा गोपाल की
हरिभक्ति प्रकाश
कर अभ्यास
हुया नाश भ्रम गांठ का
बाली उमर थी आठ साल की
कहै प्रेम धुनी सुनी मुनी अगम बाटका
लख सालगराम संभाल की
हुया धोज मोज रोज पूजन ठाठ का
कहूँ कहन लियो मान बाल की

सांगीत
धन्ना का ब्राह्मण नै शुद्ध भाव लिया जान
होयकै प्रसन्न दिया सालगराम पाषान
लेकर चल्या भक्त करै नदी तट पै स्नान
सालगराम मज्जन कर आया चलके मकान
तोड़- महान चन्दन छाप आप बण भ्रम बिसारण हारे
चिम्मन कर सतकाम जी 4॥

दोहा

धूप दीप बत्ती करी, नैवेद्य पकवान ।
बालभक्त बीनती करै, जीमो श्रीभगवान ॥

टेक – 4 बीनती उचार रहा
ल्या नैनों में जलधार रहा
धोक चरण में मार रहा
खानेवाला आया नांह ॥ टेक ।

हे सर्वव्यापक भगवान
कहलाते सर्वशक्तिमान
किसान की बड़ी कष्ट कमाई
क्यूं नहीं थारै मनभाई
या ब्राह्मण हाथ बिन जीमो नाईं
वो जिमाने वाला आया नांह 1॥

हो रागद्वेष से दूर
सर्वजग थारा नूर
भरपूर प्रेम प्यार
करुणा करै बारम्बार
बहा रहा नैनीं जलधार
इसा बहाने वाला आया नांह 2॥

आँख मसल कै रोवन लाग्या
अंसुवों से मुख धोवन लाग्या
होवण लाग्या दुखी महान
बने सालगराम बाल भगवान
जीम रहे बैठ पकवान
इसा जिमाने वाला आया नांह 3॥

मल मल अंखियां पपोलन लाग्या
लख बालरूप जय बोलन लाग्या
खोलन लाग्या भ्रम के ताले
सतगुरु ज्ञान की चाबी घुमाले
गुरु महोरसिंह की शिक्षा पा ले
इसै बताने वाला आया नांह 4॥

धन्ना भोग लगावै जी
बाल हरी जीमन आवैं जी
बढ़ावें प्रेम भक्त सैं निराला भगवान ॥ टेक ।

गऊ नाटगी हुई लाचारी मोटी
ल्यावै भोग में ल्हुखी रोटी
बाल ब्रह्म कहैं जगत कसोटी
प्रेमी ये दिक्कत जा ना ओटी
खोटी बात बनी क्या आन
कहने लगे बाल भगवान
ल्हुखी रोटी करै कंठ में छाला भगवान 1॥

गऊ नाटगी हुई लाचारी
के ल्या द्यूं साथ में श्याम बिहारी
बाल प्रभु कहैं रोटी थारी
ल्या दे मांग मोहे छाछ उधारी
प्यारी कहन पुगाऊं जी
डटो टुकेक अभी जाऊं जी
ल्याऊं मांग छाछ का प्याला भगवान 2॥

मांगी छाछ नित्य रोटी ल्याया
बालप्रभु कै भोग लगाया
कहैं भगवान थारा बहुत अन्न खाया
चहिये मोहे कोई काम बताया
चराया कर जा बियाबान
गऊ म्हारी जंगल कै दरम्यान
मान कहना चले बन ग्वाला भगवान 3॥

भक्त विवश प्रभु धेनु चरावै
और किसी कै नजर ना आवै
आ प्रोहत धन्ना सैं बतावैं
थारा सालगराम के काम बनावै
चरावै गऊ म्हारी जी
महोर सिंह तुम्हारी जी
हितकारी चिम्मन रटै नित माला भगवान जी 4॥

भगत बड़े और भगवद छोटे ये बात समझ में आई
किसी एक समय में देव ऋषि मुनियों नै सभा बनाई ॥ टेक ।

ब्रह्मा बोले मैं हूं बड़ा सकल जगत विस्तारा
विष्णु कहै मैं पालन करूं बड़ा होता पालनहारा
शिवजी कहैं थारा पाला पोसा सभ मैंने संहारा
शंकर की सुनकै वाणी पर्वत कैलाश गुंजारा
मैं हूं बड़ा भोले शंकर तैने मेरे ऊपर समाधी लाई 1॥

पर्वत की सुनकर वाणी पृथ्वी बोली वचन बखान
मैं तेरे को धारण कर रही बड़ी बताता सकल जहान
डुंड बैल कहै पृथ्वी सैं मेरा सींग तेरा स्थान
कुरुमराज कहै डुंड बैल से मेरी पीठ बनी तेरा ठान
जाण शेष की बिन भक्तों कै नहीं थाह और नै पाई 2॥

प्रोहत कहैं धन्ना सैं थारी सालगराम चरावैं धैन
रोज चरा चराकर ल्याता है न्यू बोले भक्त जी बैन
हमको भी दिखलाओ ग्वाल थारा ब्राहमण लाग्या कहैन
धन्ना कहै चलो दिखाऊं जो हरदम देता चैन
लैन लगा दोनूं चाले पकड़ी बणखंड की राई 3॥

जा जंगल में कहै दूर से खड़ा वो ग्वाल म्हारा
ब्राह्मण कहै पाली के बिना सूना लंगार है थारा
गोरी ढोली कै खड़ा बीच क्या त्योर भंग हुया सारा
चिम्मन ब्राह्मण चले देखने मिला ना मन का प्यारा
करै गुजारा सतगुरु नाम की दे रही काम कमाई 4॥

दोहा

गौवों में फिरै ढूंढता, मिले नहीं घनश्याम ।
धन्ना को आवाज दे, पाया ना सालगराम ॥

टेक – 7 मारा था आण चपेटा
ब्राह्मण नै प्रभु जब फेटा
द्विज करकै दर्शन
हो गया प्रसन्न
कहै धन्य-धन्य कऊ का बेटा ॥ टेक ।

भुजा पकड़कै धन्ना बोल्या डाट डाट कै
म्हारे घर का प्रोहत न्यारा पाट-पाट कै
जम घाट कै संताप
होंगे भोगने महापाप
जो गुरु प्रोहत जा मेटा 1॥

मोर मुकुट मकराकृत कुंडल गल वैजंती माल
शंख चक्र गदा पदम चतुर्भुज शुशोभित रूप विशाल
जाल भ्रम का ब्राह्मण खोवै
बामै अंग लक्ष्मी सोहै
माया का लग्या लपेटा 2॥

दर्शन कर द्विज जन्म मरण बंधन काट
दिसी वरुण नगरी की पकड़ चाल्या बाट
जाट कऊ कै मकान
कहै धन्य जिजमान
धन्य-धन्य तेरा बेटा जेठा 3॥

धन्यवाद दे ब्राह्मण आया चलकै मकान में
जीवन लग्या बिताने सत्य सनातन ध्यान में
चिम्मन गुरु ज्ञान में कसर ना
मूर्ख पै पड़ै असर ना
नुगरे सा और नहीं ढेठा 4॥

धन्य धन्ना उमर तेरी बाली
तनै पाली करा परमात्मा
हुया जवान बना जब हाली
बनमाली करा परमात्मा ॥ टेक ।

रामानन्द गुरु पै जाता
हृदय का सही खेत बनाता
मनुवा हाली हल को चलाता
सत्संग बीज नित की बिजवाता
लहराता खेत हरियाली
खुशहाली करा परमात्मा 1॥

मन परोपकार परमारथ भाया
मंगसिर का महीना आया
गेहूं बोवण खेत में ध्याया
संत जमात का दर्शन पाया
बढ़ाया मान आ प्रीत लगाली
फिर सवाली करा परमात्मा 2॥

कहने लाग्या धर्म पियारा
संतो क्या विचार है थारा
साधू भूखे कर भंडारा
एकदम सभ योगी ललकारा
म्हारा धर्म सोच परनाली
सत ख्याली करा परमात्मा 3॥

बीज ले आया बाज़ार में
बेच दिया संतों के प्यार में
ल्या सामान रख दिया भंडार में
चिम्मन गुरु मन परोपकार में
जमीदार में दया निराली
बलशाली करा परमात्मा 4॥

बोकै बीज संतों के पेट में आया चल खेत दरम्यान
धन्ना नै हल जोड़ दिया पाड़ोसी रहे देख किसान ॥ टेक ।

कंकर हूंस कै धन्ना नै अपने बीजोटे में घाली
ओरने ऊपर मुट्ठी टेकी सुमार लिये बनमाली
दई सिसकारी बैलों को वृख चाले चाल निराली
कंकर गेहूं बन-बन बूते कहीं धन-धन धन्ना हाली
सभी किसानीं अजमाली हाली तेरा सा नहीं जवान 1॥

परोपकार सम भूमि नहीं सुकरत सा नहीं बीज प्यारा
समझदार हाली थोड़े सही बीज ठिकानै जा डारा
धन्ना बीज काट में बोवै हंसें पाड़ोसी सारा
बो दिया खेत तमाम जाट नै अलख नाथ आधारा
करैं सभी जमीदारा पर धन्ना सा नहीं और नै ज्ञान 2॥

पाड़ोसी हाली जा कऊ सैं धन्ना की करण लगे शिकात
बीज बेचकै तेरा बेटा जिमा रहया था संत जमात
दोपहरे में गया खेत में कंकर हूंसे अपने हाथ
बो दिये खेत तमाम में उसनै फेर बुवा जाकै प्रभात
बुवेरे का चल्या जात पाड़ोसी कर रहे बखान 3॥

धन्ना हाली शाम हुई जब हल लेकै घर पर आया
बैल बांध दिये खोर के ऊपर हल भी उठा टिकाया
कऊ फिरै घर-घर में पूछता सभ नै जाट भरमाया
कंकर बो दिये खेत तमाम में चाहिये वो फेर बुवाया
चिम्मन आया चाल कऊ गुस्सा भरा बदन में आन 4॥

कहै क्रोध भरा
धन्ना के करा
इसा चाहिये ना था काम
हांसी कर रहे लोग तमाम ॥ टेक ।

पिता मेरे काम में कोय गलती ना या दुनिया न्यूंई हंसा करै सै
तनै बीज बेच कै करया भंडारा धन्ना घर ना बसा करै सै
पिता दया की बत्ती दान तेल फलै धर्म का दीपक चसा करै सै
मोडां का बहकाया दो दिन आगै पीछै नसा करै सै
हंसा करै सै भक्त
कऊ तन क्रोध जगत
धन्ना तू हो गया गुलाम 1॥

पिता सत्यधर्म की करूं गुलामी थारा गुलाम हूं सच्चा
बीज कै बदलै कंकर बोये के करी बेकूफ का बच्चा
पिता काम क्रोध आशा तृष्णा मानस तन को करती कच्चा
फिरै बहकाया मोडां का उनने भावैं सैं गलगच्चा
ले जचा पल में
दे धूवा अकल में
करै शंकर नै बदनाम 2॥

शंकर तो सर्वज्ञ ब्रह्म गुण अवगुण में रहते भरपूर
जाण गया मैं धन्ना म्हारे घर सैं तूं जागा जरुर
घर तो छोड़ पिता सबने हो जाना बाकी रहै नाम का नूर
मोडां की संगत सैं धन्ना बातों का हो रह्या सहूर
करा कूर पणा
तनै धन्ना घणा
सताये गौवों के जाम 3॥

पिता बैल पैर जमीदार का हो परमार्थ हेत देह धारै सै
सही काम करना चाहिये तेरी गलती सभी पुकारैं सैं
पिता जामणवासा देख लियो विनती कर जोड़ उचारै सै
गुरु महोर सिंह जा छठे दिवस धन्ना का खेत निहारै सै
टारै सै भ्रम
चिम्मन सत्कर्म
सुमरा कर सतनाम 4॥

परोपकार परमारथ जग में कोन्या जा खाली
धन्ना के खेत में सभ खेतों से ज्यादा हरियाली ॥ टेक ।

असली नकली झूठ साच ये सभ दो बात बणी
झूठ बिना ना चलै काम ना पाली सत्य कणी
जहरी नाग तो बहोत फिरैं कोय कोय भुजंग मणी
राम राम तो रटें सभी लगै किसै की सुरत घणी
अणी तो हल में सभी राखते धन्ना की अणी निराली
बोकै बीज संतों के पेट में खेत बीच अजमाली 1॥

सभ तै सुथरा जामणवासा पाड़ोसी रहे देख किसान
बोये कंकर धन्ना नै देख देख हो रहे हैरान
खेत देख पाड़ोसी चल चल कऊ जाट सैं बोलें आन
सभ खेतों से तेरे खेत में गेहूं सुथरे करैं बखान
बयान सुनकै कऊ जाट कै आँखों में भरगी लाली
कर क्रोध लग्या है कहन बैन क्यूं करो मस्करी ठाली 2॥

मिल्या नहीं कहीं बीज खेत बोये बिन रहग्या मेरा
कहैं पाड़ोसी इसा ना किसै कै जिसा जामणवासा तेरा
तुम तो कहो थे बीज बेचकै कंकर खेत बखेरा
बोवै था जब ये कंकर थे आज गीहूं दिखाई देरा
बेरा ना उस देवगति का किसबिध ख़ुशी हो बनमाली
देखन चाल्या खेत कऊ नै कांधे जेली ला ली 3॥

पाड़ोसियों के कहने सेती कऊ खेत में आया
सभ खेतों सैं सुथरा जामणवासा धन्ना का पाया
देख लहर गेहूं के खेत की कऊ जाट पछताया
ओरों के कहने सैं मनै नाहक भक्तपुत्र धमकाया
गाया पद गुरु महोरसिंह की चिम्मन शिक्षा पा ली
सतगुरु नामाधार सेती सुख सैं उमर बिता ली 4॥