(गुरु वंदना - पं. चिम्मन लालजी )
पोहबदी दसमी पिता गुरु की याद दिलावै है
तीन साल गए बीत गुरु थारी याद दिलावै है ॥
इसी महीने तीन वर्ष पहले एक ऐसा दिन आया
जो हमको तो मनहूस लगा पर पिता का था वो मन चाह्या
लई समाधि स्वास खींच तज दई क्षणभंगुर काया
भेद किसी नै ना पाया बिधी मेल मिलावै है 1॥
थारा सिर से हाथ उठने तैं मैं परतंत्र पराधीन हुया
थी चौतरफा खुली मोख मेरी इब कूप नीर का मीन हुया
सत्संग गंग की लहर बिना मैं दुर्बल दीन विहीन हुया
मेरा मन इतना लवलीन हुया ना स्वपन भुलावै है 2॥
कब तक गुण गाऊं थारे रसना को शब्द उपलब्ध नहीं
जिन सुना शास्त्रार्थ मेलों में श्रोता क्या हुये स्तब्ध नहीं
कर सकूं टहल सेवा जिनकी ऐसा मेरा प्रारब्ध नहीं
मन देखा कभी क्षुब्ध नहीं हिया उझला आवै है 3॥
इस भ्रम रूपी संसार बीच गुरु भव से पार लंघावनिया
मोहमाया से विलग रहन की शिक्षा मोहे बतावनिया
रह शुभ कर्मों में ध्यान सदा गीता का ज्ञान सुनावनिया
इसा ना मनसा गावनिया गुरु आप बतावै है 4॥