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पंडित मंशाराम जी

(गुरु वंदना - पं. चिम्मन लालजी )
पोहबदी दसमी पिता गुरु की याद दिलावै है
तीन साल गए बीत गुरु थारी याद दिलावै है ॥

इसी महीने तीन वर्ष पहले एक ऐसा दिन आया
जो हमको तो मनहूस लगा पर पिता का था वो मन चाह्या
लई समाधि स्वास खींच तज दई क्षणभंगुर काया
भेद किसी नै ना पाया बिधी मेल मिलावै है 1॥

थारा सिर से हाथ उठने तैं मैं परतंत्र पराधीन हुया
थी चौतरफा खुली मोख मेरी इब कूप नीर का मीन हुया
सत्संग गंग की लहर बिना मैं दुर्बल दीन विहीन हुया
मेरा मन इतना लवलीन हुया ना स्वपन भुलावै है 2॥

कब तक गुण गाऊं थारे रसना को शब्द उपलब्ध नहीं
जिन सुना शास्त्रार्थ मेलों में श्रोता क्या हुये स्तब्ध नहीं
कर सकूं टहल सेवा जिनकी ऐसा मेरा प्रारब्ध नहीं
मन देखा कभी क्षुब्ध नहीं हिया उझला आवै है 3॥

इस भ्रम रूपी संसार बीच गुरु भव से पार लंघावनिया
मोहमाया से विलग रहन की शिक्षा मोहे बतावनिया
रह शुभ कर्मों में ध्यान सदा गीता का ज्ञान सुनावनिया
इसा ना मनसा गावनिया गुरु आप बतावै है 4॥

(गुरु वंदना - पं. चिम्मन लालजी )
ब्रह्मा विष्णु महेश शेष से भी थारा ऊंचा धाम
मेरे सतगुरु दीनदयाल आपको बारम्बार प्रणाम ॥

गुरु बिन ज्ञान ज्ञान बिन मुक्ति पा सकता संसार नहीं
इस अद्वितीय ज्ञान के दाता को लख सकते क्रूर विचार नहीं
गुरु महिमा से विमुख रहैं उन लोगों का उद्धार नहीं
कई कल्प वर्ष पर्यंत वे भव सागर कर सकते पार नहीं
गुरु सेवा जैसा सार नहीं मन लगा करो नित हो निष्काम 1॥

पौष महीना कृष्ण पक्ष तिथि दशवीं दिवस कहिए भृगुबार
इस दिन विशेष को परम गुरु की पुण्य तिथि हुई .............. बार
विस्मित हृदय कंपित हो उठता जब पहुंचू निकट थारी यादगार
दिव्य दर्श लख नेत्र संतुष्टि महिमा बर्णित अगम अपार
अन्तःकरण से शुद्ध विचार कर धरो ध्यान मन चंचल थाम 2॥

शिरोमणि कवियों की श्रंखला में जुड़वाया नाम बने तत्काली
नहीं खाया भय कवि दंगल में खड़ताल हाथ दोनों ठा ली
निज गुरु का नाम किया रोशन जिनसे काव्य शिक्षा पा ली
स्नेह विव्हल हो परम गुरु कै निकट समाधी बनवा ली
रक्षक रहे सदा बनमाली रटते थे हरदम जय सियाराम 3॥

पुण्यतिथि के जागरण की बांधी हुईं आपकी मर्याद
विष्णुदत्त जी आते थे कभी जब मंगशिर सुदी चौथ की आती याद
कर रहे प्रेम से जागरण थारे प्रिय अनुज बद्रीप्रसाद
मेरी विनय स्तुति स्वीकार करो कर जोड़ आपसे यही फरियाद
कर याद मगन रहूं मन में जब उच्चारण करते थे मुन्सीड़ा नाम 4॥

ये शुभदायक आनंद मय हो जच्चा का रंग भीना पीला ॥ टेक ।

पीले की महिमा अदभूत है
बरनै कवि जैसा जिसका मत है
अंतत: बात एक सत है
के जननी ने दीना पीला

जलवा पूजन के अवसर पर
मात भेजा प्रसन्न होकर
मंगल ध्वनि होती है घर घर
गावैं सब हसीना पीला

पीले में पड़ै है पचरंगी सी झलक
मोती मणियों की सी है ललक
सुखमय हो जाती हैं पलक
जिन्होंने ये चीना पीला

............................. का पोता
सुनत ही ये चित में सुख होता
बनो गुरु वाणी का श्रोता
मंशा का नगीना पीला