श्री सतगुरु दीनदयाल को, हम प्रथम नमन करते हैं
श्री सतगुरु देवन के हैं देवा
करनी चहिये गुरुजी की सेवा
पार लगाते हैं गुरु खेवा
श्री सतगुरु रूप दिग्पाल को, हम उनका ही ध्यान धरते हैं
गुरु के बराबर नहीं कोई दूजा
करनी चाहिए गुरु पद पूजा
इनसे शबद ज्ञान का सूझा
गुरु काटैं भव के जाल को, गुरु पतितों का दुख हरते हैं
गुरु के बिना मिलै ज्ञान नहीं जी
ज्ञान बिना लगै ध्यान नहीं जी
ध्यान बिना मिलै मान नहीं जी
सतगुरु लखाते उस ताल को, जहां जन्म जीव मरते हैं
विघ्नों के विनाशक सुखदायक गुरु हैं गणेश
सृष्टि के वो कर्ता ब्रह्मा आप गुरू हैं दिनेश
पालना के करने वाले विष्णुजी का धरते भेष
देवों के देव महादेव गुरु हैं महेश
गुरु पारब्रह्म और गुरु सचिदानंद शेष
जिनके ध्यान धरने सेती जनों के मिटते क्लेश
मण्डल है अखण्ड ज्योति जहां अनहद की
चराचर व्याप्त सीमा नहीं उस नद की
गुरु बिन लखावै कौन गति उस पद की
अविद्या अज्ञान मोह माया तीव्र अंधकार
ज्ञानंजन सला सेती खोलै गुरु चक्षु द्वार
ऐसे परम सतगुरुजी को नमन करते बारंबार
वेद शास्त्र पढ़ ले कथा जान ले पुराण की
गुरु बिन मिलै नहीं ताली तत्व ज्ञान की
तत्व ज्ञान में है कृपा गुरु की जबान की
जैसे रत्न धातुओं में महिमा पारस पाषाण की
बूटियों में संजीवनी रक्षा करती प्राण की
मनुष्यों में महिमा ऐसे गुरु भगवान की
भक्त ध्रुव प्रह्लाद पर सतगुरु जी ने कृपा करी
गुरु के प्रताप जपे जाप आप मिले हरी
अमर काया बना दई अचल पदवी मिली खरी
गुरु सम दाता नहीं याचक शिष्य के समान
तीन लोक संपदा को सतगुरु करते दान
धाम साल्हावास गुरु महोर सिंह से पाया ज्ञान
अपने अनुचर मनीलाल को, गुरु गुण से बदन भरते हैं