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राजेश गौड़/ Rajesh Gaur

विनती
हे निराकार साकार ब्रह्म स्वरूप सृष्टि के त्राता
हे अविनाशी निष्पाप नारायण निर्गुण रूप विख्याता 1॥

हे अगम अनादि सर्वव्यापी ज्योति रूप अनंत प्रभु
हे निर्विकल्प निराधार ईश्वर योगी संत महंत प्रभु 2॥

हे अलख अगोचर ब्रह्मंड के मालिक घट घट के अन्तर्यामी
हे निर्द्वंद निष्कलंक निरोगी निष्क्लेश और निष्कामी 3॥

हे विश्वम्भर विधिवेता वियोगी मायापति और अवतारी
हे त्रिलोकनाथ देवों के देव हे सारंगपाणी चक्रधारी 4॥

हे चराचर कण कण के रचयिता पूर्णब्रह्म अवतार प्रभु
हे विश्वेश्वर राजेश के रक्षक द्यो दीक्षा जगदाधार प्रभु 5॥

दोहा
गणनायक हे गजमुख, गौरीपुत्र गणेश ।
प्रथम वंदन आपको, करता है राजेश ॥

(तर्ज – मेरी आद भवानी देवा खेवा कर भगतों की पार) हे गजानन्द आनंद कंद मेरी सुनो ये करुण पुकार ॥ टेक

करुणा सागर करुणा निधान
देवौं मे है अगम अस्थान
हे गजमुख मेरा करके ध्यान
करो भव से खेवा पार 1॥

भोलेशंकर के हो दुलारे
पार्वती के आँख के तारे
दयावन्त तैने भक्त उबारे
मेरा भी करो उद्धार 2॥

विघ्नहरण हे मंगलकारी
पितृभक्त हे चार भुजधारी
दयानिधान हूँ शरण तुम्हारी है विनती बारंबार 3॥

गणपति बप्पा सिद्धि विनायक लंबोदराय हे गणनायक राजेश थारे चरणों का पायक दिखाओ राह आधार 4॥

मांई शारदा का ध्यान लगाओ
बल बुद्धि विद्या पाओ ॥ टेक

मांई ध्यान सदा मोहे तेरा है
नित चरणों में तेरे डेरा है
मुझपर किरपा बर्षाओ
मोहे विद्या दान दे जाओ 1॥

मांई अदभुत छवि तुम्हारी है
मैया हँस आपकी सवारी है
मांई हँस पै बैठ के आओ
मेरे घट में आसन लाओ 2॥

मांई वीणा पुस्तक धारणी
भगतों के कारज सारणी
निज दास पै दया दिखाओ
मेरा ज्ञान अपार बढ़ाओ 3॥

मांई रूप अनेक ये तेरे हैं
और नाम आपके घनेरे हैं
किस नाम से पुकारूँ बताओ
राजेश को राह दिखाओ 4॥

दोहा
वंदन नमन गुरुदेव को, श्रद्धा से शीश झुकाय ।
चरणकमल रज हेत मैं, झोली दई फैलाय ॥

टेक - गुरु महिमा का वर्णन करना साधारण सा काम नहीं
सतगुरु चरण सा दुनिया में दूजा और धाम नहीं ॥

सतगुरु सत्य के संगाती हिमाती बन करते पृथपाल
आशा तृष्णा मोहमाया के छुड़वाते सब भ्रमजाल
झूठ कपट और बेईमानी से गुरूजी लें बाहर निकाल
धर्म कर्म की राही दिखा जीवन को करैं निहाल
विशाल छवि गुरुवर की चित से बिसरै सुबह शाम नहीं 1॥

पत्थर को पारस का रूप बनाते हैं गुरु महान
भक्ति की सोबत देकर लगवाते प्रभु में ध्यान
मूढमति अज्ञानी को सुनाकर नित दिव्य ज्ञान
चौरासी का फेरा काट करवाते अटल सत्य का भान
गुणगान श्रीहरि का सिखाते बाकी और नाम नहीं 2॥

कांचमणि और हीरे का गुरूजी भेद बतावैं
कुसंगति से दूर हटा सत्संग की राह दिखावैं
जन्म मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग सुझावैं
दे सहारा निज शिष्य को भव से पार लंघावैं
पावैं गुरु चैन ना जबतक मिटा दें अघ तमाम नहीं 3॥

सतगुरु श्री महोर सिंह से अनमोल ज्ञान मैं पाया
ध्यान लग्या गुरु चरणों में सत्संग मेरै मनभाया
जीवन सफल हुया है जबसे गुरु शरण में आया
धर्म कर्म में लौ लगी राजेश कै आनंद छाया
मोहमाया के बंध कटे बिन लूंगा अब आराम नहीं 4॥

चरणकमल रज सगुतरु की किसी बिरले नै पावै सै
मोहमाया से ध्यान हटै और सत्संग मनभावै सै ॥

सतगुरु की किरपा मिलै हों जिनके भाग बड़ेरे
भव-बंधन से पार लंघै कटैं चौरासी के फेरे
निष्काम भाव से सतगुरु नाम की रटना शाम सबेरे
ज्ञानरूप प्रकाशपुंज से सब हो घट के दूर अंधेरे
मनोविकार सब मिट ज्यां तेरे कुसंग नै दूर दुरावै सै 1॥

सतगुरु नाम अगाध समंदर थाह नहीं कोई लाय सकै
पांच भूत और तीन ताप से मुक्ति कैसे पाय सकै
वैतरणी के संकट से बस सतगुरु गैल छुटाय सकै
दोजख सैं मुक्ति का मार्ग सतगुरु ही सुझाय सकै
नेक राही दिखाय सकै वोही सतगुरु कहावै सै ॥

स्वायम्भू बना हुया क्यूं भूमंडल को तोल रहा
खुद ही को बलवान मान ओछे वचन बोल रहा
ओछी करनी कर-करकै क्यूं नरकद्वार को खोल रहा
अमृतरस धर्मकर्म में पाप-विष तूं घोल रहा
इस दुनिया में वो निरोल रहा जो चित से सतगुरु ध्यावै सै 3॥

शुभकर्मों का फल भी शुभ हो यही सतगुरु शिक्षा है
आत्मसात करो सदगुण को यही सच्ची दीक्षा है
जीवन सफल हुआ जिन्होंने करी पास परीक्षा है
नतमस्तक राजेश नै पाई गुरु से भिक्षा है
भवनिधि से वो निकसा है जो गुरु के गुण गावै सै 4॥

दोहा
गुरुमूर्त गोविन्द सम, बता गये संत महान
गुरुनाम के भजन से, हो जाये कल्यान ॥

टेक - सतगुरु सतगुरु नाम के जप से मेरा संवर गया संसार ॥

सतगुरु कृपा बिना था अधूरा
करता फिरा मैं कुश्ती-नूरा
किया ना गर्भ का कोल तक पूरा
नैया अटकी थी मझधार 1॥

ना सत्कर्म को कभी विचारा
अहंवश वृथा ही जन्म गुजारा
भगवद भजन का लिया ना सहारा
फिर मेरा कैसे हो उद्धार 2॥

अब मेरे उदय हुये हैं भाग
हटने लगे हैं द्वेष और राग
गुरुचरणों में सुरत रही लाग
छंट गया घट-अंतर अंधकार 3॥

नितप्रति चरणीं शीश नंवाकर
सतगुरु महोर सिंह दर जाकर
आशिर्वाद गुरु से पाकर
ख़ुशी राजेश को हुई अपार 4॥

माँ भगवती की भेंट) दोहा
जगजननी जगमाता, आदिशक्ति अनंत ।
श्वास श्वास तेरा भजन, करूं जन्मपर्यंत ॥

टेक - हो- सबकी झोली भरती
मुरादें पूर्ण करती
हे जगदम्बा शेरांवाली ॥

कटरा में है वैष्णो दुवारा
पिंडी रूप हों दर्शन थारा
भीड़ भक्तन की लगती
ज्योत जहाँ तेरी जगती
हे मैया पहाड़ों वाली 1॥

शीतला धाम माईं का पावन
छटा भवन की अति मनभावन
दर्श वहां तेरे पाकर
कारज सफल बनाकर
दर से जायें सवाली 2॥

नवदुर्गा मां तू ही कहाई
निज जन की तू करती सहाई
मात तू जगकल्यानी
तुही शारदा भवानी सृष्टि की पृथपाली 3॥

अनेकों अनेक माईं धाम हैं तेरे
दर्शन पावैं जन भाग बड़ेरे
मात मैं बस यही चाहूँ
दर्श पाने को आऊं
भेजो बुलावा तत्काली 4॥

(मिलावट के खिलाफ अभियान)

मिलावट का है ज़ोर, दौर ये, नकलीपन का आया ।
मानवता के दुश्मन बन रहे, अधर्म में चित लाया ॥

एक समय था जब शुद्ध वस्तु मिलती थी बाजार में
सामान पूरा मिलता था कीमत के अनुसार में
नियत थी ठिकाने पर ना छल कपट व्यौहार में
गुणवत्ता से खिलवाड़ नहीं था चहे नकद हो या उधार में
आजकल संसार में, क्यूं दीन ईमान डगमगाया 1॥

बेशक मोल चुका ल्यो पूरा मिलता सही सामान नहीं
तोल तराजू में हेराफेरी, झांकैं निज गिरेबान नहीं
भोजन तक में विष परोसते सही गलत पहचान नहीं
मौत के इन सौदागर का क्यूं, बिगाड़े कुछ भगवान नहीं
सरकार भी लेती संज्ञान नहीं, ये गोरखधंधा पनपाया 2॥

मिलावटी घी तेल क्या, सब्जी, रोटी तक असल नहीं
इंजेकसन संग सब्जी फल पकते प्राकृतिक ये फसल नहीं
दवाई तक नकली आई वो वस्तु क्या जाकी नकल नहीं
इंसानियत के गद्दारों को अबतक आई अक्ल नहीं
जो निकाला कोई हल नहीं तो जागा नुकसान उठाया 3॥

बेईमानी रग-रग में बस गई पेट खढ़ा भरता नाईं
कीमत लेकर भी काम करें ना “चलता है" रीत अपनाई
कंज्यूमर जीवै मर मरकै कहीं नहीं है सुनवाई
गुरु महोर सिंह के सत्संग में राजेश को भक्ति मनभाई
अब ईश्वर ही करेंगे सहाई, आठों पहर मैं गुण गाया 4॥

(बुराई या Darker Side)
फोटू में आच्छे लागैं पर जीते जी ना बूझैं हाल
मरे पाछै खीर खुवावैं बिगड़ी किसी दुनिया की चाल

बड़े बुड्ढों की सेवा नै पुण्य समझा करते
पर आजकाल बुजर्ग अपना मुश्किल तै पेट भरते
मां बाप बने बोझ ईब फिरते भूखे मरते
औलाद कै ना फर्क पडै ना बदनामी तै भी डरते
पेट काट कै पाले पर बुढ़ापे में ना करैं संभाल 1।।

आजकाल की औलाद नै ना डर समाज का
समाज भी के करले इसे बदमिजाज का
वृद्धाश्रम में छोड़ दें सैं कई दुश्मन नाज का
आवरण धरया तार कै शर्म लिहाज का
कानी काट ज्यां दुष्ट तोड़ बंधन तज मोहजाल 2।।

कुत्ते पालना शान समझते मां बाप तै दूरी रै
जिनके साथ बिना जिंदगी लाग्या करती अधूरी रै
भूखे मरते छोड़े बुढ़ापे में इसी के मजबूरी रै
घर आली नै सिर पै बिठा रे छाई के मगरूरी रै
मां तो मां अर बाप संसार या बात सुन खाइए उबाल 3।।

बुरे काम का बुरा नतीजा यो सबने बेरा सै
चार दिन का मेला इसमें के तेरा के मेरा सै
गुरु महोर सिंह कहें दुनिया में ना परमानेंट बसेरा सै
राजेश उठ जाग देख यो नित नया सवेरा सै
मां बाप की सेवा मेवा देती बनकै ढाल 4।।

(अच्छाई या Lighter Side)
मातपिता की सेवा तै बढ़कर ना कोई काम सुनो
सेवा का फल मेवा हो सै ला कै कान तमाम सुनो

श्रवण कुमार था मातपिता का बेटा आज्ञाकारी
सेवा में कुर्बान करी उसने जिंदगी अपनी सारी
हालांकि इसे श्रवण बनना आज काम बड़ा भारी
पर अपने हिस्से की चाहिए बरतनी ईमानदारी
लाचारी का मोल नहीं पर आगाज उसा अंजाम सुनो 1।।

झूठ कपट ईर्ष्या लालच स्वार्थ ने बिगाड़ा ढंग
मतलब सार दुनिया होगी मतलब का चढ्या रंग
पर जिसके मन में सेवा भाव लगाव की चढै उमंग
उनका होज्या राम हिमाती जीत जाते सारी जंग
संग मिलै सत्संग मिलै अंत हरिहर धाम सुनो 2।।

मातपिता की सेवा में जिनका हो जीवन कुर्बान
अगली पीढ़ी नै वो बंदे करा देते मूल्य पहचान
संस्कृति नै ट्रांसफर करकै औलाद को दें गूढ़ ज्ञान
बुढ़ापे में सेवा और साथ में रहै उनकी संतान
सम्मान मिलै ऐसे जन को सज्जनों सरेआम सुनो 3।।

दुनियादारी देख देखकै चक्कर खा जाता दिमाग
दुर्जन को मिलै मौज सदा जो मां बाप तै रहै बेलाग
सज्जन जन का उदय होंवता दीख्या ना हमनै भाग
मालिक जानै कब सी हटैगा ‘राजेश’ का द्वेष राग
गुरु महोर सिंह देते अनुराग संग ये पैगाम सुनो 4।।

चार दिन का मेल मुलाजा यो बखत गंवाना ठीक नहीं
राख कै मरोड़ बिगारी सींग अलझाना ठीक नहीं ॥

प्रारब्ध का मेल मिलै जब हो दुनी में आना
पूरबले कर्मों से मिलते मात पिता दादा नाना
भाई बहन बुआ मामा भी कर्म ही के अधीन जाना
लेन देन चुकता करने का बताया जीवन बहाना
यही सच दिल में बिठाना सहम धिंगताना ठीक नहीं 1॥

बचपन में रहै निर्मल मन करै सबतै प्रेम घनेरा
समझ बढै तो अहम चढै, छ्यावै अक्ल अंधेरा
अपनी बराबर ना समझै किसी नै मदमान नै घेरा
रिश्ते नातों की कद्र भूलकै लावै इकंत में डेरा
बुरा बनै बर्ताव तेरा, यो घणा गर्बाना ठीक नहीं 2॥

बख्त की चाल हुई कुढाल ब्याल नै दूध प्यावैं लोग
मीठे ठग की ना समझैं रग चलती नाव डगमगावैं लोग
खाते पीते परिवार प्यार में दरार खूब गिरावैं लोग
भर भरकै कान खानदान में पाटा टूट चाहवैं लोग
बेर से बिखरावैं लोग न्यूं आंख मिचाना ठीक नहीं 3॥

मत मारो टाड ना करो राड़ भाईयां की ठाड हुया करै
आपस की टीस झुकवावै शीश ना सब इक्कीस हुईं सरै
खींचतान कर दे विरान ए नादान क्यों ना धीर धरै
बंधे भरम बनी रहैगी शरम किसी नरम गरम से दूर टरै
राजेश कहै कुणबे तै परै हो जोर अजमाना ठीक नहीं 4॥

जिसा बख़्त हो उसाए काटणा पड़ै सै दुनिया में
बख़्त कै आगै बता कौण कद अड़ै सै दुनिया में ॥

बख़्त आछ्या हो तो सारे काम सुधरते चले जां सैं
बुरी घड़ी में खड़ी फसल नै कौए चिड़िया खां सैं
भाईबंध और मित्र सखा की आच्छे बखत की हां सै
टैम पलट ज्या आँख बदल ज्यां हर बात के खातर नां सै
बहोतै बड़ा यो घा सै, नाग सा लड़ै सै दुनिया में 1॥

ओली घड़ी में बाप बेटे का जूत बाजता देख्या सै
बिना बात के भाण भाई का रोला माचता देख्या सै
राखी के पवित्र बंधन पै भैरूं नाचता देख्या सै
भाई कै भाई हमनै घाव घालता देख्या सै
गणेश विराजता देख्या सै बख्त लिकड़ै सै दुनिया में 2॥

मर्द बीर की पाटैं चुटली जात तारती पाई सैं
ओछे ओछे बोल बोलकै हल्की अपनी कराई सै
शादी के पावन रिश्ते पै कालिख जो पुताई सै
दो जिस्म एक जान कहावत की हंसी जो उडाई सै
ये बखत की रुश्वाई सै जो झगड़ै सैं दुनिया में 3॥
कालचक्र की गति क्या होती एक समान नहीं
अज्ञानी और मूढ़मति कर सकते सत्य पहचान नहीं
राम नाम के जपने हारे का होता कदे अपमान नहीं
गुरु महोर सिंह जी की कृपा से भटकै मेरा ध्यान नहीं
राजेश इसा विद्वान नहीं जो छंद जड़ै सै दुनिया में 4॥

है अजब समय की चाल झाल कलिकाल की है भारी
सब बिगड़ गई मर्याद विषाद याद रखैं नरनारी ॥

भाईभाव हुया नष्ट भ्रष्ट होने से कष्ट ठाया
देख मौका लावैं चौका धोखाधड़ी मनभाया
अच्छाई दई दूर दुराई बुराई का संग लाया
काट गला फूला फला दल्लागिरी कर खाया
बिसराया सब धर्म कर्म शर्म की तजी सवारी 1॥

सच्चाई परै बैठाई झूठ कमाई में प्रीत जागी
पराये धन पै डोला मन हड़पन की लत लागी
रागद्वेष रखते हमेश अपनेश भावना त्यागी
मन मुटाव रह्या घाल घाव दांवपेच के हो सागी
बड़भागी बने बैरागी दागी चढ़ बैठे अटारी 2॥

नेक काम भूले तमाम बदनाम कार करैं अन्याई
गुटबाजी में होकै साझी नाराजी हर बख्त छाई
आचार विचार में आया विकार छोड़ दई भलाई
बोलैं बोल ओछे बेतोल मखोल करैं आताताई
ध्याई रीति नीति बदी की सदगीती तो बिसारी 3॥

परोपकार तो दिया बिसार कुटिल व्यवहार संसार किया
नालायक खलनायक दुखदायक सरकार किया
धर्मधारी पै विपत्ति भारी दुराचारी मुख्त्यार किया
छाई बेशर्मी दुखी सुकर्मी सत्धर्मी लाचार किया
हरबार किया राजेश गान धर ध्यान महान असुरारी 4॥

दोहा
कालचक्र की गति, भले ही एक समान ।
पर देखी बदलती, रीत पुरानी आन ॥

  भजन देखो समय की अजब कहानी
समय पाय सभ रीत बदलती रही ना एक समानी ॥


कैसी कैसी समय थी कैसी कैसी गई आय
कुल वर्ण धर्म की मर्याद सब दई मिटाय
ऊँच नीच छोटा बड़ा काण भी दई हटाय
बंट गये परिवार
बने सभ सरदार
आपस की तकरार
सब हो गए मन में ज्ञानी 1॥

वो भी एक समय था बुजुर्गों का होता सन्मान
मोरधी कहलाते पक्षपात सेती अंजान
आजकल बुजुर्गों की मिट गई सब गिलान
करने लगे रूहरात
बैठ बीच पंचात
देख ऐसे हालात
भा गई सभ को मनमानी 2॥

भाई-भाव लुप्त हुया उदय हुया कपट-छल
लोभवश होय रहे पाय रहे प्रतिफल
स्वार्थ सिद्धि करने लगे प्रेमभाव गए बदल
चले गए लक्ष्मण राम
दाऊ और घनश्याम
करने लगे बदनाम
इस रिश्ते को अज्ञानी 3॥

पिता पुत्र का भी रिश्ता लालच में गया समोय
अर्थ प्रधान युग पावन रिश्ते को रह्या डबोय
बहन-भाई माँ-बेटी मतलब सार गई होय
होने लगी अनरीत
कैसे होगी सच्ची मीत
नहीं होती प्रतीत
राजेश नै समय पहचानी 4॥

सोहनी
(आधुनिक काल में रिश्तों की बदलती परिभाषा)
बिन आपस के मेल का जीवन नहीं ये नरक है
समझो उन्हें नादान जिनके मनों में फरक है ॥

जहां भाव का आभाव है और छल कपट का मेल है
वहां धर्म ना अधर्म है जहां पक्षपाती खेल है ॥

लोभ लालच तृष्णा बिन मुश्किल जगत में जीना है
राजेश कहै हरिभक्ति बिन वृथा जन्म धर लीना है ॥

दोहा
रिश्ते नातों की कद्र, जानत ज्ञानी लोग
अपनाकर सद्भाव को, बिसराते सब सोग ॥

भजन (जकड़ी)
बदली जग की सार, भावना हीन हुई ॥

रिश्ते नाते और अश्नाई, महिमा जिनकी बड़ी बताई
समझा जिनको सदा हितकारी, उंची थी जो रिश्तेदारी
जिनके नाम से खुश होते थे, मिले बिना ना पल सोते थे
जिनके संग में जिंदगानी थी, प्रीत प्रेम की नई कहानी थी
जिनके संग सजते थे सपने, जिनको नित बतलाते अपने
जिनके संग हंस बोलते खाते, पल ना उन्हे हम मन से दुराते
जिनके लिये बढ़ जाती धड़कन, बिन दर्शन होती थी तड़पन
जिनके संग था जीवन प्यारा, सुख चहे दुख हरपल का सहारा
दई सब रीत बिसार, समझ मलीन हुई 1॥

बुआ बहन का रिश्ता प्यारा, भाई भतीजा जिनका दुलारा
घर में उनकी कदर घटी है, मिलन जुलन की चाह हटी है
गर्मी की छुट्टी में आना, संग बैठकर भोजन पाना
बच्चों के वो खेल निराले, दूध दही और छाछ के प्याले
खेल खेल में मित्रता बढ़ती, आपस-प्रेम की बेल भी चढ़ती
मोबाईल नै चाल बिगाड़ी, प्रेमभाव तज बने अनाड़ी
अपने मन मदमस्त हुये है, संस्कार भी ध्वस्त हुये हैं
इकलखोरी की भावना जागी, मेलजोल की राह तक त्यागी
टूट गये परिवार, एकता क्षीन हुई 2॥

बहू का घर में वर्चस्व बढ़ गया, स्वार्थसिद्धि का रंग जो चढ़ गया
पीहर का रहै चाव निराला, ससूराल के नाम पै ताला
सास ससुर का मान रह्या ना, संस्कृति का ध्यान रह्या ना
जो थे कभी भगवान समाना, वो अब खाते केवल ताना
बन मेहमान रहैं अपने ही घर में, कोई कोई अलग रहै उसी नगर में
रात और दिन बस ताड़ना खाते, सास ससुर इसे भाग्य बताते
मायके और ससुराल का अंतर, बच्चों संग भी दिखा तदन्तर
मायके के बच्चों को प्यार दें, बाकी को वे तुरंत दुदकार दें
सौतैला सा व्यवहार दिखाती, हिचक समाज की अब नहीं आती
सनातन रिवाज़ आधार, तेरह-तीन हुई 3॥

बेटों का भी हाल यही है, करते वही जो पत्नी ने कही है
पत्नी-प्रेम में अंधे हो रहे, मातपिता का दुलार जो खो रहे
साली सलहज और सास का, भरा भाव अब नये विश्वास का
छूट गये अब मामा नाना, जिनके यहाँ था नित का जाना
लोगों की अब सोच बदल गई, पत्नी के ही रंग में ढल गई
बहन से प्यारी लगती साली, जिसने घर में पकड़ बना ली
सास का कद बढ़ गया मात से, होते काम उस ही की हिदात से
पिता का दर्जा उत्तम कहाया, पर ससुर के आगे क्यूं डगमगाया
जग में न्यारी बयार बही है, ईश्वर जाने कौन सही है
गुरु महोर सिंह जी कृपा करना, दास को अब लीजे शरणा
रट राजेश करतार, भला हो मीन हुईं 4॥

(बहन भाई का अटूट प्रेमबंधन एवं विघटन)
सब रिश्तों से बड़ा कहाया भाई बहन का नाता
पवित्र पावन मनभावन जिसके सृजनहार विधाता ॥


परमपिता ने सबसे पावन रिश्ता एक बनाया है
भाई बहन का बंधन जग में रिश्ता वही कहलाया है
विचित्र लगाव भाव चाव दोनों तरफ दर्शाया है
बहन को भाई, भाई को बहना से प्रेम विशेष बताया है
समर्पण ही मनभाया है दिये संस्कार पिता माता 1॥

बालापन में एक छत के नीचै दोनों करैं बसर
साथ ही खाना साथ ही खेलना मिट्टी के बनाकै घर
संग संग ही पाठ्शाला में जाना घर से सज संवर
प्रेमभाव से भरी हुई तकरार दिखती है अक्सर
बंधन ये रह जाता अमर जो स्वार्थ बीच ना आता 2॥

मामुली से लालच में फंस हो जाता है शुरु विवाद
कभी दबाव ससुराल से होता नित नई आती फरियाद
कभी मातपिता के कारणै आपस में बढ जाता विषाद
प्रोपर्टी का लालच भी करवा देता है अपराध
जब पूरी ना हों मुराद तो मिथ्या लगै दाता 3॥

किस बात का द्वेष है जब सब कुछ छोड़ यहीं जाना है
प्रेमभाव है अनमोल धरोहर यही सबको समझाना है
ईश्वर ने जो बनाए बंधन हर हाल उन्हे निभाना है
गुरु महोरसिंह जी की शिक्षा को हितचित से अपनाना है
राजेश तेरा बिरथ गाना है जो ना सुमरे जग विख्याता 4॥

(Daughter - The Pride)
दोहा
पिता का मान सन्मान है, माता के नैन की नूर |
बेटी मे बसती आत्मा, पल भर भी हो नहीं दूर ॥

है शान पिता की जग में पुत्री प्यारी ॥

बिन पुत्री घर सूना सूना
देश द्वारा लगै बिहूना
बेटी हेत मन में करुना
हरदम रहती भारी 1॥

पिता पुत्री का रिश्ता अनूठा
मरते दम तक पड़ै ना झूठा
चाहे सकल जहान हो रूठा
बेटी रहै हितकारी 2॥

माता का नित हाथ बंटाती
पढ़ती लिखती अव्वल आती
फिर भी वो परधन कहलाती
जननी की वो दुलारी 3॥

बिन लालच के प्रेम निभाती
पुकारते ही हाजिर हो जाती
पलभर की ना देरी लाती
ना करती बेइतबारी 4॥
प्रभु नै जिसको पुत्री प्रबीनी
तिन पर असीम किरपा कीनी
आत्मजा राजेश को दीनी
अनुकम्पा है तुम्हारी 5॥

दोहा
संतान सुपात्र सुखदाई, कुपात्र दुख का मूल
कर्माधीन सब खेल है, शोक संताप फिजूल ॥

सोहनी
संतान योग संयोग दुनी में भाग्य के आधीन है
सज्जन को कपूत कभी दुर्जन को मिले शालीन हैं ॥

यहां उग्रसेन कै कंस जनना विधि का ही खेल था
प्रहलाद और हिरणकश्यप के भावों में कहां मेल था
कर्मों से मिलते हैं जगत में आयु धन औलाद जी
कोई दीन कोई धनहीन है कोई कर्मों से बर्बाद जी ॥

कोई सुखमय जीवन जी रह्या कोई दुखों से भरपूर है
कोई ठाठ-बाट को भोगता कोई जन्मभर मजबूर है ॥

कोई विद्याबल का साध है कोई तपोबल प्रवीण जी
कोई भक्ति में गरगाप है कोई धर्म कर्म से क्षीण जी ॥

गुरु महोरसिंह के नाम से राजेश हरदम मौज में
गृहस्थ के जंजाल में फंस रह्या रस्ता खोज मैं ॥

जीवन बनै स्वर्ग समाना, जो पुत्र हो आज्ञापालक ॥ टेक ।

पुत्र पिता का गुरूर कहाता
सहारा बनता हाथ बंटाता
सत्य यही सर्बजग विख्याता
हरदम पिता को गुमाना, विरासत का बनै वो मालक 1॥

माता के नैनों का नूर जी
पलभर चित से हो ना दूर जी
जिस बच्चे को होता सहूरजी
बनै संस्कारी विद्वाना, वो ही सच्चा पितृ पालक 2॥

पुरुष प्रधान ये समाज बताया
बेटा घर का चिराग कहाया
सुख ये चतुर्थ पुरखों नै सुनाया
शास्त्रों नै बखाना, बेटा हो कुल रखवालक 3॥

प्रह्लाद कंस ये दोनों पूत जी
एक सज्जन था एक अवधूत जी
उदाहरणों से ना समाज अछूत जी
सुत श्रवण सा मनभाना, मिलै सबको ऐसाई बालक 4॥

पूत सपूत जनप्रिय होता
कपूत कुल का नाम डबोता
धन संपदा मान सब खोता
प्रभु में ध्यान लगाना, राजेश वो श्रेष्ठ संचालक 5॥

दोहा
माँ ममता की मूर्ति, ज्यूं अगाध समंद ।
आँचल मां का पाकर, बालक रहैं अनंद ॥

माँ की ममता, मन में समता, धैर्य क्षमता
बता कौन कवि दे बरण ॥ टेक ।

शीतल स्वभाव भोली सी सूरत
शांत चित प्रेम की मूरत
करुणामय हिरदा, सच्ची श्रद्धा, कुलधर्म परदा
बिरधापन तक निभाती परण 1॥

वेद शास्त्र में यही बतलाई
मात प्रथम जननी कहलाई
जन्म की दाता, भाग्य विधाता, भय की त्राता
माता औलाद का करती भरण 2॥

सज्जनता बेजोड़ भरी है
कुटंब की नित पालना करी है
स्नेहिल घट से, अंतरपट से, संतान के झट से
फट से कष्टों का करती हरण 3॥

मातृभाव का वर्णन करना
विकट काम दुनि में बरना
कोशिश कर लई, अंतरा भर लई, राजेश को जर लई
अधर लई हरि नाम सुमरण 4॥

अरिल
ये सच है के रिश्तों से बड़ा कुछ और ना
रिश्ते पावन होते करै कोये गौर ना ।

बेशक दौलत कै आगै चलै कोई जोर ना
रिश्तों से हीन मनुष्य को जग में ठोर ना ।

राजेश कहै भरो भाव बनो अब कठोर ना
रहो ज्यूं चंदा बिना रहै चकोर ना ॥

दोहा
पिता समान हिमाती, ना कोई दूजा और ।
संतान हित कै कारणै, रहै तत्पर सिरमोर ॥

भजन
पिता का दर्जा बड़ा महान, परमेश्वर समान बतलाया ॥

निश्चल प्रेम औलाद से करते
उनके दुख संकट सभ हरते
झोली खुशियों सेती भरते
चहे कितना भी कष्ट उठाया 1॥

स्वभाव कड़क बाहर से दिखाते
करुणा अंतर माहिं छिपाते
श्रीफल की भांती दर्शाते
घट में स्नेह अगाध समाया 2॥

पिता का सर्वोत्तम है स्थान
गुरु भगवान की सम जान
जो हैं स्वार्थी और अज्ञान
वो ना पाते उनकी छाया 3॥

रहा राजेश इससे अनजान
भ्रमता फिरा सकल जहान
लगाया ना पितु चरण में ध्यान
रोजी रोटी को बड़ा बनाया 4॥

(तर्ज – सोचती हूं कि वो कितने मासूम थे )
पिता माता के चरणों में जन्नत का सुख
कैसे बिसरा दूँ चरणों की छांव को मैं
रूप भगवान का जग में ये ही तो हैं
कैसे वर्णन करूं लाड चाव को मैं ॥

थी चौतरफा फैली खुशी की लहर
जब माँ बाप के रहता साये में मैं
घूमता था मैं आनंदी बाजार में
जब पूजता था उनके पाँव को मैं 1॥

पेट पूजा ही समझा था काम बड़ा
जिस हेत मोहे गांव तजना पड़ा
दुनिया बेशक हुई अब दीवानी मेरी
पर तरसता यहां पितृभाव को मैं 2॥

उनके दीदार को मन तड़पने लगा
गैर मौजूदगी मन सताने लगी
मानो झोली में आया जमाने का दुख
याद कर- करके रोता हूँ गांव को मैं 3॥

दिन गुजरने लगे यूं ही बेकार में
ना अपना कोई दिखता संसार में
राजेश को विपदा हुई ये बड़ी
किस भांति भरूँ इस घाव को मैं 4॥

दोहा
नारी का सम्मान जहां, है वो देव अस्थान ।
धन कुटंब सुख संपदा, भंडारे भरते आन ॥

(Empowerment of Women)
है गृहलक्ष्मी का काम बड़ा, इसे नहीं भुलाना चहिये ॥

घर की पूरी ज़िम्मेदारी
निभाती लगाय ईमानदारी
करती सबकी ताबेदारी
त्याग कर विश्राम बड़ा, इसे नहीं झुठलाना चहिये 1॥

भोजन प्रथम कुटंब को जिमाती
स्वयं बेशक अंत में खाती
अन्नपूर्णा वो ही कहलाती
संग बच्चो का लाम बड़ा, हमें सबको बताना चहिये 2॥

यही सिखावन मातपिता का
ससुर घर असली कहाया सुता का
रिश्ता बनै डोली से चिता का
पीहर का करना नाम बड़ा, हमें नहीं उल्हाना चहिये 3॥

घर धणियाणी का सन्माना
मिलना चहिये उचित अस्थाना
कहै राजेश द्यो आदर माना
समाज के सब तमाम बड़ा, को आगै आना चहिये 4॥

ये भाई का रिश्ता हमको अनोखा सा पाया ॥

भाई से बढ़कर दुनिया में और कोई प्यारा नहीं
मातपिता तुल्य हितैषी
और ना कोई जग में दूजा कहाया 1॥

एक उदर और एक खून जिनकी रगों में दौड़ता
एक गोद में पले बढ़े हैं
एक पिता का जिनको मिलता है साया 2॥

संग ही खेले पढ़े लिखे और संग बैठ भोजन पाते
एकाएक विचारों की भिन्नता
कैसे एक दूजे को कर दे पराया 3॥

स्वार्थ और लालच के वश हो मर्यादा बिसरा रहे
प्रेमभाव को भुला अनाडी
राजेश रिश्ते कै कलंक लगाया 4॥

है मित्र वही जो समझै मन की बात ॥

प्रेमभाव और मित्रताई
इनसे बढ़कर क्या अश्नाई
मित्र कहाया धर्म का भाई
दुख-सुख में रहता साथ 1॥

कृष्ण सुदामा दोनों मित्र जी
भावना जिनकी थी पवित्र जी
स्नेहिल हिरदा जिनका विचित्र जी
थे एक प्राण दो गात 2॥

मित्रता का धर्म बड़ा है
भरोसे की नींव खड़ा है
सच्चाई की डोर जुड़ा है
रिश्ता ये साक्षात 3॥

मित्र मनोभाव को लखता
सत्कर्मों को झट से परखता
दुष्कर्मों से गुरेज रखता
सही की करता हिमात 4॥

मित्र वही जो साथ निभाये
भले बुरे का भेद बताये
बख्त पड़े सही राह दिखाये
तज राजेश रूहरात 5॥

ये खून के रिश्ते नाजुक होते हैं ॥

जन्म के रिश्ते इत्तेफाक से
जुड़ जाते कुल गोत्र साख से
मिटाये मिटें ना चिता राख से
जिन्हें भाग्य पिरोते हैं 1॥

मालिक नै ये नेमत कीन्ही
प्रेमभाव करुणा भर दीन्ही
नेकी बदी की समझ भी चीन्ही
बख्शीश बहोते हैं 2॥

इनके अलावा भरा लगाव जी
अपने पराये का बर्ताव जी
खुशी-नाराजी जुड़ाव चाव जी
हर हिरदे संजोते हैं 3॥

अलग हो ज्याते पुत्र मात से
बिखराव हो ज्या छोटी सी बात से
बंध ज्यां बैर सहोदर जो भ्रात से
संबंध बिगोते हैं 4॥

कठिन काम हो इनका निभाना
अग्न परीक्षा के सम माना
राजेश हरि-शरण में जाना
वो अघ सभ धोते हैं 5॥

ओछे कर्मों को करन लगे, दई बिसर कुल की मर्यादा ॥

पणधारी जो वंश कहाया
सत्कर्मीं सत्धर्मी बताया
क्यों उन्हीं सत्कर्म बिसराया
कलंकित हो विचरन लगे, डुबो दिया नाम परदादा 1॥

मदिरा मांस की जहाँ आण थी
तुच्छ कर्मों से जिन्हें काण थी
शुभकर्मों की जिन्हें पिछाण थी
अब निम्नकर्म सिर धरन लगे, ऐसी क्या आ गई बाधा 2॥

जुआ खेलैं कसीनो जाकर
पीवैं शराब मांस संग खाकर
कुल कुटम्ब की रीत भुलाकर
व्यभिचार को परन लगे, संख्या इनकी हुई ज्यादा 3॥

कर्म शुभाशुभ फल को पाते
धर्मीं भव से पार तर जाते
गुनी महोर सिंह यही सिखाते
राजेश प्रभु की शरन लगे, भक्ति का अटल इरादा 4॥

हुया वोही दरिद्र जिसने सुस्ती धारी ॥

सुस्ती के अनेक आयाम जी
काम धाम और व्यायाम जी
वर्णन करता हूं तमाम जी
एक एक नंबरवारी 1॥

सुस्त मनुष्य हो काम में ढीला
कमा सकता ना पैसा पीला
जिसका यही मिलता है सिला
हो गरीबों नाम सुमारी 2॥

ऐसे मनुष्य ना करते कसरत
आलसीपन की बनती फिदरत
साफ सफाई से रखते नफरत
लग जाती हैं बीमारी 3॥ जो थोड़ा कुछ धन हो घर में
वो भी दवा दारू चक्कर में
खर्ची कर रहे सोच फिकर में
किसबिध हो पार निवारी 4॥

सुस्ती को दूर हटाओ
सुकर्म संग द्रव्य कमाओ
राजेश कहै फेर हरिगुण गाओ
भली करेंगे गिरधारी 5॥

दोहा
चोट आत्मा पर लगे, आबरू हो तार तार ।
ऐसे दरिंदों को मिले, सजा-ए-मौत तेही बार ॥

द्यो फांसी उनको जो करते हैं दुराचार ॥

हिन्द में नारी का ये नाता
बहन बेटी या सम माता
समाज हमारा यही सिखाता
इसी रूप में लखो परनार 1॥

बड़ी को माता हम-उम्र को बहना
छोटी को फिर बेटी कहना
इसमें रत्ती भर दोष है ना
ऐसा करो व्यवहार 2॥

रिश्तों की गरिमा को भुलाकर
फंसे विषय वासना में आकर
दानव दुष्ट सा रूप बनाकर
करते हैं व्यभिचार 3॥

औरत के सन्मान मान को
समझा नहीं उसकी शान को
लटकाओ फांसी उस शैतान को
जो नीचकर्म दुराचार 4॥

संविधान में बदलाव लाओ
कड़े कठोर कानून बनाओ
कहै राजेश उसे फांसी दिलाओ
जो आबरू करै तार तार 5॥

दोहा
विषय विकार बढ़ गया, नशा चढ़ा परवान ।
जनमन व्याधिग्रस्त हो, बन बैठा नादान ॥

व्यसनों के आदी हो गये, यूवक अब भटके राही ॥

पता नहीं चल रहा किसबिध बनी ये बात
देश के युवाओं पर किसने लगाया घात
नशे की लत लागी धुत रहैं दिनरात
नशे की ही खेती कुछ लोग जो कर रहे
राजधर्म प्रजाधर्म दोनों ही बिसर रहे
जनमानस को वे हरपल अखर रहे
बीज जहर के बो गये, समझाये समझें नाहीं 1॥

कुछेक तो राज्य हमारे चपेट में खूब आये
बालक तक जहां के इससे ना बच पाये
कारोबार नफे का जान लोगों नै जो अपनाये
सामाजिक संस्था विरोध में बहोत आई
जलसे प्रोग्राम कर अपनी बात समझाई
कुचक्र बड़ा है पार उनकी नांह बसाई
व्यर्थ ही झगड़े झो गये, कुछ फर्क दिया ना दिखाई 2॥

  सरकार नै भी तेज करा अपना अभियान
दोषियों को सजाका बनाया मास्टर प्लान
अदालत नै अपराध पै लिया कड़ा संज्ञान
मीडिया में चर्चा चली जागरूक देश हुया
बुराई को मिटाने का आम संदेश हुया
जनता का इस और ध्यान जो विशेष हुया
कारोबारी रो गये, डर उपजा हिरदे माहीं 3॥

सिनेमा संगीत का भी योगदान भारी है
बुराई को मिटाने की प्रतिज्ञा जो धारी है
निज निज ढंग से अर्ज गुजारी है
बुराई को तज तुम अच्छाई अख्त्यार करो
देश की तरक्की में तन धन निसार करो
भविष्य उज्ज्वल होगा मन में विचार करो
राजेश वक्त को खो गये, अब कैसे पुगैगी उगाही 4॥

दोहा
धर्मधुरंधर हो गये, दारुबाज़ पिशाच ।
दगाबाज अब कर रहे, नैतिकता की जांच ॥

(सांगीत)
सज्जनों नैतिकता का ज्ञान
नैतिक मुल्य सब बिसर दिये लग्या जोड़-तोड़ में ध्यान ॥ टेक


नैतिकता का विषय आया सामाजिक विधान में
कायदे ये मौखिक थे सृष्टि के कल्यान में
अर्जन किया गया जिनका सभ्यता उत्थान में
नेकनीति, निष्कपटी जिनका हो आचरण
सत्यकर्म सदभाव जीवन भर निभाते परण
मां बाप की सेवा और ईश्वर की रहैं शरण
सब जीवों का सन्मान 1॥


लिखे पढे सुने जो नैतिकता के हैं आयाम
ध्यान धर सुन लीजै सुनाऊँ मैं बाकी नाम
ईमानदारी, वफादारी, सदाचारी तमाम
सत्यनिष्ठा परोपकार और हो श्रेष्ठ व्यवहार
सज्जनता स्वभाव में शुद्ध आचरण विचार
निष्छल प्रेम संग जीता जाये संसार
बनै धरती सुरग समान 2॥

  परमारथ का बतलाया बहोत ज्यादा सार जी
मान सन्मान संग उत्तम शिष्टाचार जी
निरंतर प्रयास कर खुद को निखार जी
घर चाहे बाहर जो सफाई का रखता ध्यान
मानवता के धर्म का वो सच्चा पुजारी जान
छोटी छोटी बातों का ख्याल जो रखता इंसान
प्रशंसक उसका जहान 3॥

वर्णन नहीं मिलै इनका कहीं संविधान में
व्यवहारिक बात है ना बरनी विज्ञान में
अनुपालान हेत आई सरकारी संज्ञान में
क्षमा और दया दोनों नैतिकता के हथियार
देश क्या विदेश सभ जगह करो परचार
उन्नति के पथ में ‘राजेश’ बन भागीदार
बढ़ेगी देश की शान 4॥

इतिहास हुया करै ख़ास शिक्षा सागर बतलाया
तज दे जो अतीत प्रीत वो नुगरा कहलाया ॥

ऋषिमुनि और ज्ञानी ध्यानी रच गये सब इतिहास
कर रामायण की गीती प्रीती दिखा गये तुलसीदास
महाभारत का बखान महान कर गये ऋषि वेदव्यास
महापुरुषों की गाथा में जो विधाता सम करै विश्वास
त्रास हटै कष्ट कटै ये श्रुतियों नै समझाया 1॥

गुरु की वाणी मनमानी सिखों कै हर श्वास
धर्म से और कर्म से वो पढें वीर इतिहास
गुरु के चरण शरण जा करैं नित अरदास
आराधन साधन कर कटवावैं जम की फांस
अकाश पताल देखो चाल यो सुगरा सुख पाया 2॥

इतिहास दे शिक्षा परीक्षा ले वर्तमान की
निरधार करै आधार बन राह ज्ञान की
भारत देश परिवेश ये भूमि संत सुजान की
लाल बाल और पाल भगत आजाद बलवान की
विद्वान् की विज्ञान की खोज सैं लाभ ठाया 3॥

दौर शोर का जोर देख अज्ञानी इतराते
अटकल पच्चू जोड़ तोड़ कर जनता को बहकाते
सज्जन लोग जोग वियोग से ना भटकाते
राजेश कहै गुरुभक्ति से मुक्तिपद पाते
दिखलाते विश्वास गुरु में वो ना कभी भरमाया 4॥

(तर्ज – महल में दीवा ना बाती, बता क्यूं तलै पड़ी मेरी नार)
भक्त की सुनकै करुण पुकार
आन करो किरपा जगदाधार
सुधि मेरी लीजे बनमाली
चौरासी के चक्कर में पड़ हो लिया ख़स्ताली ॥

दुनी के झगड़ों में पड़कर हो लिया दुखी
पाप ताप माफ करो है सर्वसुखी

बेरुखी किस कारण दिखलाई
बता दो आकर कृष्ण कन्हाई
मेरी मेटो तंगहाली
मोहे चरण शरण ले भवपार करो हे पृथपाली 1॥

काम क्रोध मद लोभ नै घेरी लगाई
विषय भोग रोग में उंवर गंवाई

लई ना शरणाई मैं थारी
बदी की कार करी सारी
पाप की पोट सिर ठा ली
बुरे कर्म का संगी बन खुद नाव डुबा ली 2॥

मातपिता गुरुजनों की सेवा नाँह करी
अन्न धन दान कर झोली नाँह भरी

हरि के भजन से मुख मोड़ा
बिरथा कमा कै धन जोड़ा
क़ीमती समय निकाली
मिथ्या कमाई से नाहक प्रीत मैं पाली 3॥

अब शरणागत हूं आपके जगत तारणहार
अज्ञान जान माफ करो द्यो चरणों का आधार

मझधार बीच है नैया
करियो पार है खेवैया
क्यूं नजर चुरा ली
राजेश खड़ा है द्वारै थारै बनकर सवाली 4॥

टेक – करले भजन भगवन का
तेरा मिट ज्या तिमर अज्ञान का ॥

आवागमन का ये संसार है
मिथ्या ये प्रेम का व्योहार है
भजन अदूली की जो कार है
मालिक का कर दे गुनहगार है
वक्त तेरा है इम्तिहान का
सत्य असत्य पहचान का 1॥

गर्भवास के करार तू
भूला है बंदे आ बाहार तू
भक्तिभाव उर धार तू
नेक कर्म अख्तियार तू
यही समय है बन्दे ध्यान का
सुमिरन करुणानिधान का 2॥

अपना पराया मेरा मेरी में
बख्त गंवाया हथफेरी में
हर्जा बढ़ेगा बंदे देरी में
लिखतम चढ़ेगी बही तेरी में
लगा विचार कुछ ज्ञान का
तज दे कर्म नादान का 3॥

गुरु महोर सिंह बतला रहे
बर बर तोहे समझा रहे
सत्य की राही दिखला रहे
मुक्ति की युक्ति सुझा रहे
गुरुज्ञानरस पान का
राजेश मुरीद उस गान का 4॥

टेक - किसबिध करूं पुकार तुम्हें ऐ तारणहार मैं
शुद्ध अशुद्ध का बोध नहीं हुया लाचार मैं ॥
पढ़ा नहीं मैं मथुरा काशी ना भाषा का ज्ञान मनै
व्याकरण का अंदाज नहीं मात्रा का ना भान मनै
साहित्य शिक्षा पाई ना, ना लोग मिले गुणवान मनै
धर्म धुरंधर ज्ञानी से भी पाया ना वरदान मनै
विद्वान मनै ढूंढें ना, रह्या लिप्त बुरी कार में 1॥

संगीत गीत से बिलग रह्या ना जानूं सुर ताल
छंद काफ़िये बंधन से भी रहा दूर मैं चहूँ काल
कर्णइंद्री के वश में होकै सुनता रहा रसीले ख्याल
कुचक्र में फंस मनै दिया सब बख्त निकाल
चाल कुचाल चाली सदा ना सीखा सदव्यवहार मैं 2॥

मित्र सखा सब मिलते जग में स्वभाव कै अनुरूप
अच्छे बुरे सज्जन दुर्जन सुन्दर रूप कुरूप
धन यौवन के मद में भूला हे ईश्वर तेरी छवि अनूप
काया माया ढ़लती छाया ज्यूं दुपहरी धूप
स्वरूप तेरा है अजर अमर प्रभु इस संसार में 3॥

सब कहते मालिक देता सबको नीयत काम
उसी कर्म में लीन होकर करता गया तज आराम
गृहस्थी का हो बोझ बड़ा फेर कैसे होता निफराम
अठसठ तीर्थ यात्रा राजेश नै समझा यही मुकाम
तमाम गुनाह की माफ़ी मांगूं हे करुणाधार मैं 4॥

टेक - जप ले हरिनाम काम बनैं सभ तेरा
हरिनाम सेती कटै चौरासी का फेरा ॥

हरिनाम माला भज भव पार तर ज्या
नर तन चोला मिला सफल इसे कर ज्या
संवर ज्या जीवन हटै मोहमाया का घेरा
हरिनाम सेती कटै ..... 1॥

सत्संग ज्ञान ध्यान उत्तम हैं साधन
गुरुसेवा पितृसेवा कर तू कमा धन
करले तूं आराधन बन चरणों का चेरा
हरिनाम सेती कटै ..... 2॥

सुखकारी भयहारी भक्ति की राही
जिससे पुगै इस जन्म की उगाही
भक्तिरस संसार माहीं कर तूं बसेरा
हरिनाम सेती कटै ..... 3॥

भगवद भजन संग मिटा सब ताप जी
राजेश जन्मों जन्म के पाप जी
वो प्रकाशपुंज आप जी मिटा दे अंधेरा
हरिनाम सेती कटै ..... 4॥

अविनाशी हे दान के दाता
जगतपिता हे भाग्यविधाता
दीनदुखी के हे भयत्राता
अर्ज मेरी स्वीकार करो ॥

तूही भक्ति तूही शक्ति तूही जगदाधार प्रभु
तेरी कृपा की छाया में ये आनंदित संसार प्रभु
आधार प्रभु है तू ही जन का
राजा प्रजा योगी संतन का
दीजे वर भक्तिरस धन का
भगवन ये उपकार करो 1॥

तूही जड़ और तूही चेतन तूही सकल जहान प्रभु
तेरी महिमा लख ना सकै कोई ज्ञानी विद्वान प्रभु
नादान प्रभु मैं सेवक थारा
कर जोड़ कहूं दीजे सहारा
मुक्तिमार्ग ज्ञान पिटारा
देकर अब उद्धार करो 2॥

तूही साधन तूही साध्य है तूही देव अस्थान प्रभु
तेरे दर्शन हेत लगाकै बैठा हूँ मैं ध्यान प्रभु
गुणगान प्रभु तेरे नाम का
सुमरण करता मैं घनश्याम का
रस्ता दिखा अब परमधाम का
ये चौरासी निस्तार करो 3॥

तूही पालक तूही नाशक सर्वज्ञ ब्रह्म निर्दोष प्रभु
तेरे नाम के जप से मिलता हरपल नया जोश प्रभु
संतोष प्रभु तेरे दर्शन से
मिलै मुक्ति सब बंधन से
कहै राजेश दुखभंजन से
नैया भव से पार करो 4॥

सब दिन होत ना एक समाना
सुख दुख है आना जाना ॥

महादुख ठाया नल राजा नै जूए का बना बहाना
महासती को वन में घूमकर पड़ा था बख्त बिताना 1॥

हरिश्चंद्र को समय के कारण बदलना पड़ गया बाना
पत्नी पुत्र को कांशी में जा बेच बना बेगाना 2॥

पांचों पांडव बने थे चाकर छूट गया था ठिकाना
द्रोपदी ने बन सैरंदरी बुरे बखत को जाना 3॥

समय के फेर में सुदामा नै फंस भोगे थे दुख नाना
श्रीहरि की कृपा हुई मिला सुख साधन का खजाना 4॥

भले बख्त को देख मूरख क्यूं हो रह्या मस्ताना
भवबंधन से पार लंघावै राजेश हरि का गाना 5॥

कान्हा की हेरत बाट गोपियन खड़ी हुई पनघट पर ॥

एक समय की बात चली मिल साथ गोकुल बालन
लिया बना यही मश्वरा जरा ना देर लगाओ ग्वालन
हिलमिल चलो हे सुहेली मेली मिलै नंद को लालन
सब लीज्यो मटकी हाथ नाथ के दरस पाय निहालन
ना चलैगा कोई बहाना
तुम जल्दी से सब आना
लो नवीन वस्त्र साज पहुंचो आज जमना तट पर 1॥

वहां बजै मुरली की धुन मधुर सुन झूम रही हैं गैया
जहां पक्षी करैं चहचाट बनाया झुंड विराट गोरैया
रहे नाच उमंग भर मोर शोर सुन किलकिलाती बैयां
कर दर्श हुये सब हर्ष करत हैं अर्ज सुनो खेवैया
हम अधम पतित अघोरी
लो थाम जीवन डोरी
तुम रखते सबकी लाज भाजकर आंवते हर रट पर 2॥

खड़ी-खड़ी पुकारैं नाम धाम तज आवो हे गोविंदा
म्हारै घली है जम की फांस मेटो त्रास हरो दुख द्वंदा
सुनो टेर द्वारकाधीश झुकावैं शीश ग्वालन वृंदा
मत करो निराश है आश आपसे पूर्णिमा के चंदा
मत लीजै और परीक्षा
दे दीजै दर्शन भिक्षा
ना कर सरोवर अस्नान तजैंगी प्रान दर्शन हठ पर 3॥

आये ना कृष्ण मुरार निहार निहार थक गई बाला
हुईनिराश टूटी आश अबतक आये ना नंदलाला
ये कौन जन्म का पाप यादकर श्राप खांय तिंवाला
तब प्रेम सच्चा जान लिया संज्ञान मुरलीवाला
चल आये चक्करधारी
करैं चरण वंदना सारी
राजेश करै अरदास श्वास दर श्वास तेरी चोखट पर 4॥

श्यामरूप की छटा निराली निराकार साकार बनी
उस परमपिता परमेश्वर के दर्शन की आधार बनी ॥

उस अलख अगोचर अंतर्यामी की हर कोई अलग पहचान करै
अपने अपने भाव लगा महिमा उसकी बखान करै
कोई देव पैगम्बर गुरु बता श्रद्धाभाव व्याख्यान करै
कोई योगी संत महंत कहै कोई निर्गुणरूप गुणगान करै
कोई बैठ इकंत में ध्यान करै बिन दर्श सबको लाचार बनी 1॥

कोई मंदिर मस्जिद गिरजाघर जा परमसत्ता की खोज करै
अठसठ तीर्थ हज की यात्रा गंग किनारै भोज करै
कोई जलांजली कोई सदाव्रत कोई अन्न भंडारा रोज करै
कोई दान-धर्म और सत्यकर्म कर पुण्य पिटारा बोझ करै
कोई-कोई बैठा मौज करै ये लिखंत विधि अख्त्यार बनी 2॥

कोई साधु संत बन धूणी तपकर मालिक से अरदास करै
कोई ले वैराग गृहस्थी को त्याग जा तपोवन में वास करै
कोई निरंकारी कोई सतधारी बन जनसेवा हर श्वास करै
कोई न्यौछावर सर्बस अपना कर समाजी सेवा खास करै
कोई प्रवचन में विश्वास करै वाणी जिसकी रसधार बनी 3॥

उस निराकार ब्रह्मस्वरूप की झांई कण-कण के मांईं
जो अगम-अनादि अविनाशी और सर्वव्यापी बतलाई
ज्यूं बीज में अंकुर, मेहंदी में लाली बिना जत्न ना दर्शाई
महक पुष्प से, घी दूध से तरकीब संग जा प्रगटाई
सतगुरु महिमा बड़ी बताई राजेश वो धुरी करतार बनी 4॥

टेक - सत्संग गंग की लहर में
एक गोता ला सैलानी ॥

भगवद नाम जहां गूंजता हरपल
संध्या भजन के प्रेमी निष्छल
प्रभु स्मरण का पाते शुभफल
रटना आठों पहर में
वहां करते ज्ञानी ध्यानी 1॥

सत्संग रूपी डोर सहारै
जीवन नाव को लगा किनारै
पलभर भी मत नाम बिसारै
मत फंस तृष्णा कहर में
जा समझ तज मनमानी 2॥

प्रभु भजन को बना आधार तू
जन्म-मरण के बंध बिसार तू
मिथ्या समझ ये संसार तू
चौरासी जग जहर में
मत बना फिरै अभिमानी 3॥

गुरु महोर सिंह जी सत्संग कीना
सर्बजन को संदेश ये दीना
भजन कर तजो मन का मलीना
राजेश भजन की बहर में
सत्संग को रहै अगवानी 4॥

तन मिला है तुझे उधार का
क्यूं समझ लिया इसे अपना ॥

प्रारब्ध देख तेरा प्रसन्न हुये भगवान
उसी की कृपा से तुझे नरदेह मिली आन
कबूल कर आया था करूंगा नित तेरा ध्यान

गर्भवास के कौल तैने बाहर आ बिसर दिये
अटसट काम फिर दिन और रात किये
झूठ जाल बीच रहा दो नाम ना अधर लिये
गया समय बेकार का
किया एक घड़ी भी जप ना 1॥

बालापन में काया देख फूला नहीं समाया था
तनमन साफ़ था सबके मनभाया था
लाड चाव हुये सब गोद में उठाया था

किशोरपन में तेरे मन में विकार हुया
दुनी के झगड़ों में फंसा तनमन लाचार हुया
कोल बेकोल करे खुद मुख्त्यार हुया
लगा मोह संसार का
पलभर की लई ना रटना 2॥

  गृहस्थी में पड़कर वचन सब भूल गया
मिथ्या कमाई कर नरककुंड झूल गया
तृष्णा के अधीन हो हुक्म को अदूल गया

कुटंब की चिंता तोहे खाने लगी दिनरात
अनर्थी कर्म से करी बहोत तैने जायदात
धोखा धर पछताया लागा नहीं कुछ हाथ
करा था करम बेकार का
तैं कमाया कोये हरफ ना 3॥

बुढापे को देख जब रोने लगा सिरमार
संगी ना साथी कोई बिछट जाय बरनार
तब भी मूर्ख याद तेरै आया नहीं कौल करार

घड़ी दो घड़ी नित भजन जो कर लेता
हरि सुमरन कर झोली को भर लेता
कर्ज को चुका परमधाम का सफ़र लेता
राजेश ध्यान करतार का
निज मनमंदिर में रखना 4॥

(तर्ज – मैं कोई सूनी नहीं हूँ नार)
टेक - जग में राम नाम की माया बन्दे करले मुख से जाप ॥

राम नाम सबरी नै रटा था
श्रीचरणन में चित डटा था
पल ना मुख से जाप हटा था
सबरी का कटा था ताप 1॥

राम की भक्ति बड़ी सुखदाई
काम पवनतनय के आई
हुये अमर जग में कपिराई
भक्ति में होकर गरगाप 2॥

बाल्मीक नै राम को भज जी
भक्ति करी मोहमाया तज जी
राम चरण की लेकर रज जी
भक्त होय गया निष्पाप 3॥

ऐसाई वर मुझको भी दीजे
शरण में लेकर किरपा कीजे
मनोविकार मेरे हर लीजे
गुनाह राजेश की करना माफ़ 4॥

भगवन उंवर बहतेरी जा लई तेरा भजन ना करने पाया ॥

खेलकूद में खोया बचपन
जवानी गई कमाने में धन
पल ना किया नाम का सुमरन
यूं ही फिरता रहा भरमाया 1॥

भौतिक सुख की ललक जगाई
धन सम्पदा की करी कमाई
तृष्णा कीच में डुबकी लगाई
अक्ल अन्धेरा छाया 2॥

संध्या भजन से किया किनारा
मेरा मेरी में बख्त गुजारा
जप तप यज्ञ का ना सहारा
ना कोई सुकरम ही कमाया 3॥

दीन होय लिया है शरणा
गुरु महोरसिंह जी किरपा करना
नितप्रति नाम सुमरना
राजेश कै मन भाया 4॥

उस प्रभु की लीला समझ पाना मुश्किल ॥

राजा रंक, धनी और निर्धन
दयालु निर्दयी सज्जन दुर्जन
शील क्रोधी, दानी कृपण
सबका वोही आदिल 1॥

कोई रोगी कोई तंदुरुस्त है
कोई आलसी कोई चुस्त है
कर्मों के अनुसार पुश्त है
दिलेर तो कोई बुजदिल 2॥

कहीं पर्वत तो कहीं नदी नाला
कहीं बंजर कहीं वृक्ष विशाला
कहीं तेल भंडार निराला
कहीं सूना कहीं झिलमिल 3॥

कभी जन्म तो कभी हो मरणा
कभी दुख तो कभी सुख हो भरणा
गुरु महोर सिंह का लिया है शरणा
राजेश की यही मंजिल 4॥

टेक - हे नवनीत थारी रीत प्रीत
करते सब नरनार से
चराचर बहार से
जड़-चेतन संसार से
भूभार हरने, मंगल करने, आते बारंबार से ॥

धर्म कर्म के बने अनुरागी
अधर्म की छाया तक त्यागी
बैरागी योगी संत
धरैं ध्यान एतबार से
मनोयोग आधार से
भक्तिरस अख्त्यार से
भरमजाल तज भज तर जाते मझधार से 1॥

निर्बल के नित बनकर सहाई
आन बख़्त पर लाज बचाई
शरणाई थारी हितकर
करै रक्षा दुराचार से
झोली भरै उपकार से
रखती अलग विकार से
जो चरण शरण ले तारणहार की शुद्धभाव विचार से 2॥

सर्वव्यापक प्रभु नाम धराये
जर्रे जर्रे आप समाये
बनाये दुनी में सज्जन दुर्जन
गुण दोष आगार से
नेक कुटिल व्यवहार से
सरल कठोर आचार से
अवतार धार हरबार आते, भक्तों की पुकार से 3॥

शरण आये का मान प्रभु रखते
बिन कहे मनोभाव को लखते
भखते तुम सकल जहान
सृष्टि के उद्धार से
खलदल संहार से
कर विनती हृदय उदार से
दीन मीन ज्यूं हीन होय, राजेश जगदाधार से 4॥

दोहा
राम नाम तारण तिरण, राम नाम निज मूल ।
राम नाम के आलसी, मत नाम को जाना भूल ॥

टेक - पल तो जपले हरि का नाम
राम राम श्रीराम जय जय राम बोलो राम ॥

राम नाम का चोला पहनकर पाप ताप दे बिसार
सतसंगत और राम को भज तू तज दे अनर्थी काम 1॥

दोजख के मांह विचरण कर रहा लोभ मोह वश होय
हरि का शरणा लिया नहीं तो ठावैगा दुख तमाम 2॥

हरिनाम की महिमा ना जानी पढ़ा ग्रंथ कुछ और
परोपकार कुछ करा नहीं और किया ना तीर्थ धाम 3॥

गुरु महोरसिंह कहैं राम भजन की कश्ती भव से तारै
राजेश किरपा होगी तुझपर करले भजन निष्काम 4॥

भक्ति का मार्ग सहज नहीं पाना ॥

जग में बड़ी बताई गृहस्थी
गृहस्थ संग मुश्किल हो भक्ति
लालच मोह विषय की विरक्ति
कठिन काम माना 1॥

सत्संगी और सत्कर्मी को
भक्ति मिलै सत्धर्मी को
पापी नीच दुष्कर्मी को
दुर्लभ दर्शाना 2॥

भक्ति के मार्ग अनेक हैं
हरि सुमरण में ना कोई मेख है
जिसकी जैसी कर्मरेख है
वैसाई फल जाना 3॥

गुरु महोरसिंह कर सच्ची भक्ति
चौरासी से पा गये मुक्ति
राजेश को मिली सतगुरु शक्ति
नैया पार लगाना 4॥

भगवन दीज्यो दर्शन आन
शुद्धभाव से ध्यान धरूँ मेरा कर देना कल्यान ॥

मैं पापी नीच अधम पतित मैंने किये करोड़ों पाप
करकै माफ मेरे अघ सारे देना चरणन अस्थान 1॥

दया धर्म से बिलग रहा मैं किया ना यज्ञ और जाप
कुसंगति का असर रहा बिसराया पुण्य दान 2॥

सतकर्मों को दूर दुराया रहा मलिन चहूँ काल
भक्ति भाव का खेवा छोड़ा करता फिरा शैतान 3॥

अक्ल अंधेरी छाई रही इस दोजग के दरम्यान
गुरु महोर सिंह ‘राजेश’ के घट में भर दो आकर ज्ञान 4॥

तर्ज – तुम तो ठहरे परदेशी
टेक - श्याम तेरे चरणन में अरज गुजारी है
द्यो दर्शन हे बाबा लई शरण तुम्हारी है ॥

ये सुना है तुम सबकी बाबा झोली भरते हो
दीन दुखी के तुम सब कारज सरते हो
मुझपर भी करो कृपा प्रभु आश तिहारी है 1॥

सब कहते हैं तुम तो हारे का सहारा हो
इस दुनिया के तुम तो प्राण आधारा हो
रख लीजे लाज मेरी यही विनती हमारी है 2॥

मनोकामना तुम बाबा सब पूरण करते हो
शरणागत के तो तुम सब काम संवरते हो
कृपालु किरपा की छवि विस्तारी है 3॥

भवसागर से जग को तैने ही तारा है
गुरु महोर सिंह कहते मेरा श्याम पियारा है
राजेश नहीं ऐसा बड़ा परचारी है 4॥

(झूलना)
मेरे बाबा श्याम बिहारी
बड़ी अदभुत महिमा तिहारी
शरणागत हैं सभ नरनारी
तेरै ओ खाटू नरेश जी 1॥

तेरे दर पै हों पूरी मुराद
नित रहै खाटू धाम की याद
जन की आस्था बड़ी अगाध
पहौंचें बना निराले भेष जी 2॥

जब सैं ध्यान तेरे तै लाया
मैं सदा मन इच्छा फल पाया
रसना पै नाम तेरा आया
गाऊँ महिमा थारी हमेश जी 3॥

सां॰– भीम हेडम्बी का पुत्र नाम था बरबरीक कुमार
ब्रह्माजी का तप करा जाय बण कै मंझार
वर देन आये भगवन बोले वचन उचार
हारे का हिमाती बनिये तेरी कदे ना होगी हार ॥

ले आशीष ब्रह्मधाम की चाल पड़ा बलकारी
कुरुक्षेत्र भूमि में युद्ध की थी तैयारी
पीपल के वृक्ष नीचै मिले अर्जुन गिरधारी
विस्तार से बरबरीक नै कथा सुनाई सारी ॥

जतन भगवान नै बनाया
अर्जुन बर्बरीक अजमाया
पीपल पत्ता छिदवाया
बली नै पार्थ को हराया
ख्याल केशव को फिर आया
कैसे इसे यमपुर जा पहूंचाया
भेद शक्ति का लगाया

बोले बरबरीक बलवान
ब्रह्माजी का आख्यान
मौत पैर तले जान
करी युक्ति भगवान
अपना धनुष खैंच तान
दोनों छोड़ो एक एक बान
पहला पाताल दरम्यान
दूजा भेजो आसमान

सां॰– खींच तान जोर में खेल भगवन दिया बनाय
ऊपर बाण छोड़ा तबतक नीचे वाला लगा पैर मांय
बरबरीक बोले भगवन युद्ध देखन पाया नांय
धोखे से प्राण मेरे आपनै दिये गंवाय
प्रभु बोले युद्ध दिखाऊं पूजा भी द्यूंगा कराय

कलियुग में श्याम कहाये
आ खाटू में आसन लाये
सतगुरु चिम्मन लाल बताये
श्रवणकर कथ रहा राजेश जी 4॥

पवनपुत्र बजरंग बली मेरे कारज सार दे
भंवर बीच है नैया भगवन पार उतार दे॥

चौरासी में भरमत भरमत बिरुन हो लिया
उद्भिज स्वेदज अंड जरायुज खूब सो लिया
कर्म अनर्थी करकै मग में कांटा बो लिया
मेरा मेरी मोह ममता का झगड़ा झो लिया
खो लिया अनमोल बख्त सद्बुद्धि अंश त्रिपुरार दे 1॥

अजर अमर हे अंतर्यामी तैं सृष्टि का उद्धार करा
विभीषण अंगद सुग्रीव क्या राम लखन का काज सरा
संत शिरोमणि तुलसीदास नै भगवन थारा ध्यान धरा
किरपा बरसी आपकी पुण्य पिटारा खूब भरा
खरा सोना जीवन उनका जिन्हें आप प्यार दें 2॥

भक्त वत्सल थारा नाम कहाया भक्तों के रखवाली हो
झोली तुम सबकी भरते ना रखते किसी की खाली हो
मन की दुविधा दूर हों जो दर आया सवाली हो
सुमिरन करा हितचित से तो करी आप पृथपाली हो
उठा ली हो कर माल मैंने आन कष्ट बिसार दे 3॥

चौतरफा घिर गया हूँ मैं इस दुनियादारी में
गुरु महोर सिंह जी के सत्संग में ना सुरती धारी मैं
जगत जाल विकराल है ये आज विचारी मैं
कर्ज बोझ बढ़ा लिया ना चुकाई उधारी मैं
लाचारी में फंसा राजेश प्रभु आन उबार दे 4॥

दोहा
मंगल के अवतारी, बजरंग बली हनुमान ।
ऐसा वर दीजे मोहे, रहै चरणन में ध्यान ॥

टेक - राम नाम के जपने हारे
भक्त शिरोमणि राम दुलारे
अंजनी मात के प्राण पियारे
पवनपुत्र हनुमान जी ॥

दसानन का मदमान हड़ा था
राक्षसकुल को दिया घाव बड़ा था
पड़ा था नजर रूप विकराला
पूंछ मांह जद जगी ज्वाला
सुक्षमरुप धर तत्काला
धरा रघुवर का ध्यान जी 1॥

फूंक दिए सब महल अटारी
हुये भयभीत सकल नरनारी
मारी हाक दई किलकारी
सीता माता को संतोष भारी
चूड़ामणि निशानी प्यारी
लेकर किया पयान जी 2॥

सिंधु लांघ कपिदल मांह आये
अंगद के हो गये मन चाये
गाये गुण फेर राम नाम के
उर आनंद भये तमाम के
जामवंत कहैं गुणधाम के
आशीष का फल जान जी 3॥

वानरराज सुग्रीव संग बोले
रघुवर सन्मुख भेद सभ खोले
शोले जो उठे अगन के
फटे कलेजे राक्षसगन के
राजेश उदगार मन के
करता है बखान जी 4॥

जय जय जय जय जय बजरंगी
कर द्यो कृपा राम के संगी
आन बिसारो मेरी ये तंगी
भगवन जीवन जन्म संवार द्यो 1॥

हरपल राम नाम गुण गाऊँ
थारे चरणीं शीश नवाऊँ
भक्तिभाव में उंवर बिताऊँ
बाबा भ्रम से मोहे उबार द्यो 2॥

थारी महिमा है बड़ी अगाध
कर दो माफ़ मेरे अपराध
कर जोड़ करूं मैं फ़रियाद
भव से खेवा पार उतार द्यो 3॥

भगवन शरण आपकी आया
नित गुरु महोरसिंह को ध्याया
सेवक राजेश का करो मनचाया
प्रभुजी कारज मेरे सार द्यो 4॥

स्तूति
हे बज्रबाहू तेरे नाम से डरते, दुष्ट निशाचर दुराचारी ।
हे पवनपुत्र हे भक्त शिरोमणि, तुम परहितैषी परउपकारी ।
सुर नर मुनि सब तेरी शरण में, हे महाबीर हे बलकारी ।
शरणागत हूं भगवन आपके,कीजे मेरी पार निवारी ॥
टेक - अंजनी के लाल थानै, अरज गुजारूं जी॥

हे अजर अमर प्रभु अंतर्यामी
दीन होय थारी आरती उतारूं जी 1॥

हे महाबाहू प्रभु बलकारी
शरणागत हो नाम सहारूं जी 2॥

परमभक्त हे संकट हरता
चौखट पै थारी खड़ा मैं पुकारूं जी 3॥

ऐसी किरपा मुझपर कीजै
पलक तिहारा ध्यान ना बिसारूं जी 4॥

मोहमाया के संग ही हर लो
काम क्रोध मद लोभ ये च्यारूं जी 5॥

नतमस्तक राजेश हो टेरै
श्वास श्वास थारी महिमा उचारूं जी 6॥

शेर
श्याम सांवरे की कृपा जो जन पाता है
जीवन उसका सफल हो जाता है ।
हे मधुसूदन तेरे दर पर मैं आया हूं
रखना लाज केशव, मैं भिक्षु तू दाता है ॥

टेक - ए कान्हा ओ बांके बिहारी
तेरी शान-ओ-सुरत है निराली
हे गिरिधर हे बंसी बजैया
तेरे द्वारे मैं चलकर के आया
भर दो जीवन में भगवन उजाला
सुनो विनती मेरी बनमाली ॥
ये झूठा है जग का झगड़ा, मोहमाया की लग गई है घेरी
ध्यान लगता नहीं भक्ति में, मन भटकाती दुनिया ये तेरी
नितप्रति फिरता हूँ, भूखा प्यासा, रोटी कमाने की लेकर आशा
कर दो रहम प्रभु, दीजे ये दिलाशा
बन केवट मेरी नैया के, दूर कर दोगे ये तंगहाली 1॥

घट घट में हो आप समाये हुये, है तुमसे छुपा क्या मेरे सांवरे
सिर अपना झुकाकर मैं द्वारे तेरे, करवाऊँगा माफ सब अघ मेरे
है यकीं के आप सुधि लेंगे मेरी,
बन केवट मेरी नैया के ........
मेरा विश्वास तुमसे ना टूटे, हे नटवर दिखाओ ये लीला
छूट जाये दुनी का ये दगड़ा, राजेश को द्यो खुशहाली 2॥

जय जय राधे राधे, जय राधे राधे ....... राधे ए ए ए ए ए ए ए ….....

नंदलाला, गोपाला हो
पृथपाला, ब्रजलाला हो
रखवाला, दीनदयाला
टेर भगत की सुन लो ॥

आप बिना मेरा कौन सहायक
मैं हूं थारे चरणों का पायक
सुखदायक करो जीवन मेरा
चरणों में मोहे दीजे बसेरा
चौरासी का काटकै फेरा
छुटा दगड़ा दुन लो 1॥

बिन भक्ति का ऐसा जीना
जैसे शरीर श्वास विहीना
कीन्हा ना हरी सत्संग
बहती जहां ज्ञानगंग
जीवन हो चला बेरंग
सुधि मेरी निर्गुन लो 2॥

धर्म कर्म की नेक नीति
अपनाई ना मैंने सदगीती
प्रीती मेरी परिवार से
क्षणभंगुर संसार से
विनती यही करतार से
सेवक अपना चुन लो 3॥

हे मुरलीधर कृष्ण कन्हैया
मोर मुकुट बंसी के बजैया
नैया पार लगावो मेरी
गुरु महोर सिंह अब शरण है तेरी
अर्ज ये राजेश नै टेरी
स्वीकार पुकार करून लो 4॥

(तर्ज – मेरी आद भवानी देवा खेवा कर भगतों की पार)
टेक - ब्रजराज आज मेरी अरज सुनो ये दास दीन हो टेरा ॥

सुदामा की ज्यूं सुधि लई थी
दर्शन से दारिद्र गई थी
उसी प्रकार ये अर्ज दई थी
हरो सब संकट मेरा 1॥

द्रुपदसुता की लाज तैं राखी
बढ़ाया चीर लिहाज तैं राखी
दूरी बता किस काज तैं राखी
जो लिया ना अबतक बेरा 2॥

पंडवों के ज्यूं बने हिमाती
महाभारथ में रहे संगाती
ऐसे ही मुझको देना हिदाती
क्यूं ठाय इकंत में गेरा 3॥

विदुर भक्त से प्रेम निभाया
सज्जनता का मान बढ़ाया
राजेश चरणीं शीश नवाया
हरपल रहै बन चेरा 4॥

भगतन को प्यारो, रखवारो, मेरो कहां गयो नंदलाल ॥

ढूंढत ढूंढत यशोदा मांई चल ग्वालन पै आई
जाई पूछत कन देख्यो, मेरो छोटो सो गोपाल 1॥

माखन मिश्री खावन आयो, म्हारे घर के मांय
खाय माखन खेलन लाग्यो, बतला रहे ग्वाल 2॥

खोजत खोजत गोपियन इतने में गई आय
पाय अवसर देत उल्हानों, मांई खोटो है तेरो लाल 3॥

बतलावत हैं गोपियन, कैसे खोटो ब्रजलाल
ग्वाल बाल संग मटकिन फोरी, नटखट हैं ब्रजबाल 4॥

माखन मुख लिपटाये आये, इतने में तारणहार
करतार देख राजेश नमन हुया, करना प्रभु रखवाल 5॥

दोहा
कृष्ण-कृष्ण मुखजाप से, जन्म सफल तेरा होय ।
पल ना नाम बिसारिये, लगा भजन में लोय ॥

भजन (तर्ज- गिरिधरण लाल तेरी गही है शरण)
टेक – श्रीकृष्ण कन्हैया थारी मुरली की धुन
चली आती थी गैयां जिसे वन में सुन
अब वाही धुनि फिर से सुनाओ रुन झुन ॥

जरा आकर फिर से संभालो ये दुन
सुनलो गैयों की पुकार करुन
बिन आपके सुध अब लेगा कुन 1॥

हे दीनदयाल जग में आवो पुन
दुष्टों का दमन करो प्रभु चुन चुन
संग अपने लेकर आओ अर्जुन 2॥

अवतार धरो अब हे सर्वगुन
भू भार हरो और मिटाओ अवगुन
करो धर्म की रक्षा सिखाओ सदगुन 3॥

बिन भक्ति होती ये दुनिया बिरुन
राजेश को शरण मे ले लो निर्गुन
थारी रटना से होते नित भले शगुन 4॥

(शिव स्तूति)
टेक - हे गिरिजापति, हे शंभुनाथ, हे गौरीशंकर अविनाशी
हे डमरूधारी, मदनारी, हे असुरारी, हे कैलाशी ॥

थारी लई शरण, मैं गहूं चरण, मेरा राखो परण, हे शिवध्यानी
सत्संग गंग का चढ़ावो रंग मैं मूर्ख मूढ़ अज्ञानी
जानी ना महिमा थारी हे अलख अगोचर विश्वासी 1॥


मैं दुर्बल दीन, हूं ज्ञान विहीन, सकूँ ना चीन, थारी माया
करकै उपकार, करो उद्धार, मैं हुया लाचार, बिन छाया
पाया ना कोई मार्ग प्रभु मोहे शरण दियो हे शिवकाशी 2॥

हे भक्त उबारण, भवपार उतारण, किस कारण, हे नंदीश्वर
मोहे दूर दुराया, ना पास बुलाया, गोद उठाया, ना सिद्धेश्वर
त्रयंबकेश्वर मेरी सुधि लियो अब हो लई जग में बहोत हांसी 3॥

हे चन्द्रभाल अब ल्यो संभाल करो ख्याल मेरा आकर
हे सुरेश थारा ध्यान हमेश करै राजेश नित गाकर
प्रभुवर थारी कृपा पाकर छूट ज्यागी मेरी चौरासी 4॥

- गुड़गांव की पावन भूमि को
मिला है माँ का वरदान ॥

ऐतिहासिक नगरी ये हजारों वर्ष पुरानी है
महाभारत काल से जुड़ी इसकी कहानी है
द्रोण गुरु आश्रय लिया ग्रंथों नै बखानी है
गुरुधाम होने की भासी यहाँ निशानी हैं
पास छोटा सा एक मंदिर
आस्था का समंदर
माई शीतला है अंदर
ऐसी मनभावन भूमि को
गुरु नै माना निज स्थान 1॥

शीतला माई का आशीष सदा फलता है
इसी विश्वास से जो घर से निकलता है
मनोरथ पूर्ण होते भाग्य में सफलता है
मग के हों कांटे साफ जीवन बदलता है
गुरुपत्नी ले आश
आई माता के पास
रखकर विश्वास
लगी है ध्यावन भूमि को
जाकर मंदर दरम्यान 2॥

माता के आशीष से ईलाज यहां होता है
पास एक तालाब जहां रोगी देह धोता है
व्याधिमुक्त होकर जा चैन से घर सोता है
आस्था विश्वास जो माता में संजोता है
गर्दभ वाहन है थारा
नीम तुलसी पत्ता प्यारा
जग इसी से निस्तारा
भक्त मनावन भूमि को
दूर दूर से पहूंचै आन 3॥

एक महापुरुष हुये नाम जिनका दादा बीसा
स्वपन में माता नै दर्शन दे सुनाया किस्सा
मंदिर मेरा शिफ्ट करो माता नै दिखाई दिशा
शुभकर्म जानकर गांव ने भी लिया हिस्सा
पालकी को शीश धार
गया गांव के उसपार
बना माता का दरबार लगा सजावन भूमि को
राजेश वो बीसा महान 4॥

माईं शीतला का धाम अति प्यारा
जहां बह रही भक्ति धारा ॥

भक्तजनों के कष्ट मिटाती
संकट हरती सुख दर्शाती
गुड़गांवे में तेरा द्वारा 1॥

रोगमुक्त जहां परजा हो रही
दर्शन पाकर ताप को धो रही
पावन धाम वो थारा 2॥

दूर दूर से सेवक आवैं
दर्शनसुख अनुभूति पावैं
निहाल हों आ दरबारा 3॥

सेवक मैं अबोध नादान हूं
भक्ति शक्ति से अंजान हूं
राजेश को दीजै सहारा 4॥

- पहाड़ों में जाकर समाई, माँ अम्बे भवानी ॥

कटरा बस गई वैष्णो देवी
कांगड़ा में ज्वाला मांई
माँ अम्बे भवानी 1॥

गोहाटी में कामाख्या देवी
नील पहाड़ी मनभाई
माँ अम्बे भवानी 2॥

माउंटआबु में अधर देवी
दिल्ली में कालका आई
माँ अम्बे भवानी 3॥

मुंबई में है मुम्बा देवी
अदभुत छवि दर्शाई
माँ अम्बे भवानी 4॥

आदिशक्ति हे जगदंबा
करिये राजेश की सहाई
माँ अम्बे भवानी 5॥

मैया शेर की सवारी कर आई भवन में ॥

दाने मारे मांई भक्त उबारे
कष्ट मिटाये सारे एक छन में 1॥

हाथ त्रिशूल ध्वजा संग में लाई
पा दर्शन मेरै छाई खुशी मन में 2॥

मोहनी सी मूरत मांई की निराली
देखने को होड़ लगी भक्तन में 3॥

ऐसा वर मैया मुझको दीजे
रहै राजेश थारे चरणन में 4॥