Loading...

सामाजिक चेतना, उपदेश, नारी सशक्तिकरण

अजी एजी देखो कैसी समय अब आई
चाल स्वदेशी छोड़ दई परदेशी चाल अपनाई ॥ टेक ।


धर्म गया कर्म गया दीन और ईमान गया
लाज गई शर्म गई मेल और मिलान गया
मेर अपनेश गई गुण और एहसान गया
रह गई दलील बाजी नुक्ताचीनी काट फांस
पक्ष पार्टी नै किया सत्कर्मों का नाश
मूर्खों नै भ्रष्ट किये वेद शास्त्र इतिहास
नई नई पोथी बनाई 1॥

सै बरकत रही ना अन्याय से कमाई करैं
रातदिन कमा कमा पेट की चटाई करैं
टुकड़े के मोहताज फिरैं फेर भी अंघाई करैं
शीश तो उघाड़ लिया बूगियों का सिंगार
पावों बीच पांवटी सलिपरों की फटकार
पहर लिये जांघिये पाजामे तहमद सिलवार
धोती काढ बगाई 2॥

कई तो बिना ही पढ़े बाबू बने अफलातून
सूट बूट पहन लिये कोट हैट पतलून
मूंछ कटा चश्में ला लें घर में चने का चून
बाबू जेंटलमैन बन बन होटलों में जाय रहे
चम्मचों से चाय डबलरोटी बिस्कुट खाय रहे
घरों के मांह देखो चूहे टक्कर बजाय रहे
लड़ लड़ मरैं बिलाई 3॥

मर्दों की देखम देख औरतों नै बदले भेष
धोती तो सफ़ेद बांधी सिर के हैं खुले केश
हाथों में ना चूड़ी नथ बोर का ना लवालेश
उतर गया सिंगार बड़ भागन और सुहागन का
पता नहीं चलता अबतो विधवा और अभागन का
माला तुम्बी की कसर है सांग तो बैरागन का
माईं कहो चहे बाई 4॥

कोई तो बैरागनी सी कोई पहन रही सूट
कोई तो सलीपर पहनै कोई तो सफेद बूट
छल्ली तक का काम नहीं तेल साबुन की सबूत
एक हाथ छाता लिया एक हाथ बांधी घड़ी
बागों की सैर करैं हाथों में ले लेकै छड़ी
खानदानी औरतों की अक्ल हू में धूल पड़ी
पकड़ी बेशरमाई 5॥

दंडवत प्रणाम गई छोड़ दई नमस्कार
रामरमी पांय लागूं ये भी दोनों दई बिसार
हाथों के मिलान करैं झटके मारैं तीन चार
रंगत पुरानी गई चढ़ गया नया रंग
नया रंग चढ़े पीछै दुनिया होती देखी तंग
कर्मों की मार बस चलै नही महोर सिंह
अब सुध लेंगे रघुराई 6॥

देखो देखो जमानो अबतो कैसो आयो जी ॥ टेक ।

न्हाणा धोणा चोका बर्तन इनसे नफरत लाते
जूता पहने होटल में जा-जाकै खाना खाते, देखो… 1॥

दूध दही अमृत को छोड़कर पीने लगे शराब
खीर खांड सा भोजन तजकर खाने लगे कबाब, देखो.. 2॥

धर्म त्रिया से जूता बाजी कंजरियों से भोग
करणी का फल यहीं मिलैगा लगै एड्स का रोग, देखो... 3॥

गंगाजल को बुरा बताते सोडावाटर पीना
महोरसिंह उन सख्शों का धिक्कार जगत में जीना, देखो... 4॥

आपस मे रखना प्यार
बुरा होता बैर का करना ॥ टेक ।


गौतम ऋषि कै अहिल्या नारी
चंदा ने ऊं संग कीनी जारी
मुनीजी मिल गए उसे अगारी
ऋषि की लगी फटकार
मुश्किल है दाग उतरना 1॥

पम्पापुर में हुया था बाली
भाई की स्त्री घर मे घाली
पाया मौत वो भी निराली
दिया एक बाण में मार
बाली सम कोई नर ना 2॥

रावण से हो गए बलकारी
वन में हर लई जनकदुलारी
वैरभाव मे लंका सारी
का किया पनिवा ढार
हुआ मेघनाथ संग मरना 3।।

पंडु पांच हुए पणधारी
जूवे के थे बड़े खिलारी
महोर सिंह भज कृष्ण मुरारी
पंडु सर्वस कूं हार
लिया वैराठ का शरना 4॥

अजी एजी सुधरना मुश्किल हिंदुस्तान
खान-पान पलटे पहरान पलटा खा गई जबान ॥ टेक ।


आठ सौ बरस मुसलमान बादशाही करी
चाल चलन छुड़ा दिये उर्दू की पढ़ाई करी
तोड़ दिये जनेऊ हिन्दु धर्म की सफाई करी
मंदिरों को तोड़ मस्जिद मकबरे चिनाये गये
तीर्थों के ऊपर मुसलमान जा बसाये गये
उत्तम धाम पुरियों के नाम तक मिटाये गये
छोड़ा नहीं निशान 1॥

विदेशी शासन में कटा मूंछ बने बाबू सहाब
सोडा वाटर पीने लगे और पींवते शराब
यूरोपी को चलन चला देशी को कहैं खराब
ढीला सा पाजामा और पहनकर अधूरा कोट
होटलों में जाकर खाते चाय बिस्कुट डबलरोट
कई खड़े खंभ ठोकैं बाबू जो बने हैं ठोंठ
भाखैं कुफ़र शैतान 2॥

हुक्का सुल्फा चरस गांजा पीते हैं शराब भंग
नशीली चीजों नै भारत देश का बिगाड़ा ढंग
बेहुदे नांच नै व्यभिचार का चढ़ाया रंग
न्याय भाव रहे नहीं अन्याय की पंचात रही
कुलकट पंच हुये ना पंचखानी बात रही
मिल गई मर्याद धूल जात ना जमात रही
बह गया दीन ईमान 3॥

बह गई सरदारी भी सरदार रिश्वतखोर हुये
भलों की बेकदरी और दुष्ट सहजोर हुये
पूत भले घरों के तो डाकू ठग चोर हुये
झूठ कपट छल दगा बेमानी के व्यौहार हुये
बाप बेटा भाई बहन विरोधी नरनार हुये
बावन वर्ष शिक्षा देकर महोर सिंह लाचार हुये
ना जोक लगै पाषान 4॥

तेरा पालन करने हारी वेद में नौ माता बरणी ॥ टेक ।

प्रथम जननी जन्म की दाता
दूजी जननी है गौ माता
इनमें जरा नहीं है भाता
तीजी माता है धरणी 1॥

चौथी विद्या माता कहाई
देश विदेश में करै सहाई
पंचम समझो गंगामांई
तेरे पापों को हरणी 2॥

छठी मात राजा की रानी
सप्तम गुरु की नार बखानी
अष्टम सास मात सम जानी
नोम बड़े भाई की परणी 3॥

इन नौवन मे राख संप्रीति
ये हैं वेद धर्म की नीति
महोरसिंह चलैगा जो इस रीति
तेरी सुफल होय करणी 4॥

इस कलूकाल के हाल में
दुखी प्रजा हो रही सारी ॥ टेक ।


सुक्ष्म वर्षा होय पछेती
लग लग अल जाण लगी खेती
धरती बीज भाड़ा नहीं देती
काल पड़ै हर साल में
छुटै ना माल सरकारी 1॥

मरने में कुछ संदेह नाहीं
फिकर अन्न का घर–घर माहीं
चिंता में दिन बीतें जाहीं
हरदम रहै इस ख्याल मैं
कैसे हो पार निवारी 2॥

नहीं किसी को कोई धेला देता
देता सो चौगुना कर लेता
महोरसिंह कहै ब्रह्मवेता
इस महाविपत के जाल मैं
सेना फिरै मारी मारी 3॥

वह नर समझो महामूढ़ है
जो जाति का अभिमान करे ।। टेक ।


तीन काम थे विप वर्ण के विद्या तप आचार
वे काहे के विप जिन्होंने तीनों दिए हैं बिसार
पशु ज्यूं पेट भरे 1।।

न्याय पै चलना धर्म पै डटना कहे पुगावैं बोल
तीनों कर्म छोड़ दिया जिन्होंने छत्री नहीं थे तिरगोल
क्यूं छत्रापन कै बोझ मरे 2॥

सत्य व्यापार सत्य ही बोलैं हो सत्य शरीर
जिन वैश्यों ने तीनों त्यागे वैश्य नहीं वे कीर
ढिसा क्यों वै पैर धरे 3।।

सेवा की जिम्मेदारी था चौथे वर्ण का काम
महोर सिंह सभी वर्णों ने छोड़े कर्म तमाम
भज सियाराम हरे 4।।

वह उज्जड समझो गांव वस्तु जहां पांच नहीं ।। टेक ।

जिस बस्ती में न्याय करनिया होय नहीं सरदार
वह बस्ती उज्जड समझो दुखी सभी नरनार
झूठ जहां सांच नहीं 1।।

जहां नहीं उपदेश करनिया पंडित या विद्वान
वह बस्ती मुरदों की समझो ज्यूं भूमि शमशान
भली बुरी की जांच नहीं 2।।

जिस बस्ती में वैश्य नहीं जो करते सत्य व्यवहार
वह बस्ती गंठकटों की समझो धृक धृक जीवनहार
भली जहां सभा कांच नहीं 3।।

वैद तपस्वी जिस नगरी में होते सज्जनों नांय
महोर सिंह ना रहिये भूलकर उस नगरी के मांय
जहां शिव रांच नहीं 4।।

अजी एजी कलियुग अच्छा रंग चढ़ाया
रंग सुरंग उपर तैने कुरंग का धब्बा लाया ॥ टेक ।


अव्वल तो दुनिया की तैनै नीत बदनीत करी
लोभ में फंसा कै मिट्टी बहोंतों को पलीत करी
जितनी तैं करी उतनी अनरीत करी
वेद शाष्त्रों का अर्थ उल्टा पल्टाय दिया
देव पित्र तीर्थों से भाव तैं हटाय दिया
साधु संत ब्राह्मणों का मान तैं घटाय दिया
पाखंडी पुजवाया 1॥

शाहों कै सबर नहीं लूटा और खसोटा भये
मारगिरे दिवालिये बणजोटा भी लेलोटा भये
कलि की कृपा से ऐसे शाह भी बणजोटा भये
तेरी दया से राजद्रोही नरनारी भये
चोर जार डाकू ठग बटमारे ज्वारी भये
शराबी कबाबी व्यभचारी मक्कारी भये
सर्भंग प्याला प्याया 2॥

भाइयों के बीच बिड़तोड़ा तैनै दिया गेर
पिता और पुत्र का भी मन तैनै दिया फेर
दर दर कली तैं तो अग्न सी दई कसेर
देवरानी जेठानी देखो जहं तहं लड़ रही
सास बहू जहं देखैं व्हईं तो झगड़ रही
मर्द बीर के भी प्रेम बीच भांजी पड़ रही
तैनै ही जूत बजवाया 3॥

ब्रह्मकुल सर्वभक्षी सर्भंग तैं बनाय दिया
मांस मदिरा ख्वा प्याकै छत्री तैं गिराय दिया
वैश्य वंश गांठ कटा तैनै ही कहाय दिया
वर्ण धर्म एक किए सब किए वेदपाठी
आज दिन कली तेरी चल रही पोल पाट्टी
जात तैं छत्तीसों उतार दई एक घाटी
पर दिन तेरा भी आया 4॥

सतयुग विप्र त्रेता छत्री वैश्य द्वापर जान
कलि पाप लिखा प्रथम स्कन्ध भागवत पुराण
अरे कलि पापी तैं तो पापियों का ही किया मान
चार वर्ण चार आश्रम खट कर्म खोय दिये
दान पुण्य भक्ति राम नाम तैं ल्हकोय दिया
भ्रष्टाचारी प्रजा करी धरम भी डबोय दिये
सबको एक बनाया 5॥

गौंओं का गला कटाया बेटी बिकवाय दई
एक पुरुष इस्त्री ग्यारह खसमी तैं बनाय दई
झूठी दे गवाही गंगाजल तैं उठवाय दई
कई हजार वर्ष पहले लिख गए वेदब्यास
चार सो वर्ष पहले कह गये तुलसीदास
वही समय बीत रही देखो पढ़ो इतिहास
जरा फरक नहीं पाया 6॥

हमीक हुये रिश्वती कोढ़ी हुई पंचात
ब्रह्मज्ञान बिना कोई दूसरी करै ना बात
कोड़ी कोड़ी लोभ बस करै विप्र गौ घात
क्रोधी अहंकारी मठधारी जो महंत हुये
जटाधारी ब्रह्मचारी बाणधारी संत हुये
खाखी और पौशाखी जानै कितने पंथ हुये
ये सब तेरी माया 7॥

न्याव भाव रहे नहीं भिवल गई मर्याद
सच का ना लेश रहा झूठ और बकवाद
लिहाज शर्म भाज गई नित नए परमाद
महाघोर कलि आया भूमि पै बढ़ा है भार
भार को उतारो निष्कलंक अवतार धार
महोर सिंह टेर रह्या जल्दी आओ करतार
आज अनाथ सताया !!8!

मरजाद सारी भंग हुई जी
देखो कैसी समै अब आई ॥ टेक ।


बाप बेटा का लीतर बाजै अरजम पुरजा भाई
मरद बीर की चुंटली पाड़ैं मर्द की मूंछ लुगाई 1॥

बहू की घर में हुई मालकी सासड़ परै बठाई
भूवा बहैन भाईयां नै अबतो बैरण देत दिखाई 2॥

गुरु चेला का प्रेम नहीं गई जिजमानी प्रोहताई
वेद विद्या आलोप हुई चली और ही और पढाई 3॥

पंडित रहे न साहूकार रहे चोधर भी गई आई
भले बुरे की पिछाण रही ना छोट बड़त रही नाईं 4॥

साढू सामणू थोड़ी घणी निपजैं हैं साल सवाई
ठाल में ऊंट लदाई करैं पर चलती है पेट चटाई 5॥

बाप नै गाय चराई वीत्यडूं माँ नै वीत्य उघाई
कुलकट पंच हुये गामों में गौला गोठ मचाई 6॥

तालेबर गरीबों का हक़ खा-खा करैं पेट भराई
फिर भी उनका भरै नहीं है बण गये करम कसाई 7॥

झूठ इर्ष्या बेईमानी चोरी जारी अन्याई
महोर सिंह कहै इन कर्मौं से परजा कूं हुई दुखदाई


घटती का पहरा आ गया जी
घट गया धर्म समै बल खाई ॥ टेक ।


माँ बापों का मान घट्या बेटा कहा मानै नाईं
सास ससुर की हुई बेकदरी बहुवीं कदर घटाई ॥

भाव घटा नाजौं का कितनी होय रही महंगाई
मोल तोल का टुकड़ा मिलता वो भी ना पेट भराई 2॥

डेढ़ सेर का दूध बिकण लग्या घी बिकै छटांक ढ़ाई
उसमें भी घी मिला विदेशी बेच रहे अन्याई 3॥

सवा सेर के गुड़ शक्कर बिकैं बण गई खांड दवाई
आध सेर चावल की किणकी एक रुपे में आई 4॥

उंवर घटी बल बुद्धि नयनों की घटी बिनाई
बिन चश्मै कुछ भी नहीं सूझै आंखीं अंधेरी छाई 5॥

साधु गऊ का आदर घट गया विप्रों की विप्राई
छत्रिन का छत्रापण घट गया गई आई ठकुराई 6॥

भाईभाव घट गया बैर हुया सिर की बाजी लाई
बीर मरद का प्रेम घट गया नित उठ होत लड़ाई 7॥

सदाचार आचार घटा घटी लाज शर्म उछनाई
महोर सिंह नै सिपत बखत की देखी उतनी गाई !!8!

> कलयुग आ गया जी सारी बिगड़ गयी मर्याद ॥ टेक ।

पहले कौशल्या दशरथ से हुया करते मां-बाप
पुत्र देख माता के सोत चल पड़ते थे आप ही आप
कलयुग आ .... 1॥

पहले रामचंद्र लखन से जन्मा करते पूत
अबतो देखो उन्ही कूखों में जन्मन लागे उत
कलयुग आ .... 2॥

पहले सीता सी घर घर होती थी नार
अबतो देखो उन्ही घरों में आने लगी बदकार
कलयुग आ .... 3॥

पहले भरत सरीखे भाई हुया करते जग मांह
अब देखलो भाई की भाई फिरै मारता छांह
कलयुग आ .... 4॥

सबकी नियत धर्म में थी जब बंच्या करती रामान
हुई अधर्मी प्रजा जब से चले नाच तोफान
कलयुग आ .... 5॥

अर्जुन सरीखे जती पुरुष से डटी हुई थी संसार
विद्यावान गुनी जगत में जन्मा करते दातार
कलयुग आ .... 6॥

दयाधर्म सत्संग जगत में कतई गये हैं ऊठ
महोरसिंह क्यूं घनी कहै तेरा गया ठिकाना छूट
कलयुग आ .... 7॥

प्रजा रही कर्म फल भोग
धर लिया नाम बीमारी का ॥ टेक ।


आहूती गऊ घृत से जब लगती
हवा तब शुद्ध होय कै बगती
अब बायु नै घेर लिए लोग
सुख गया दुनियादारी का 1॥

भूमि गऊ गोबर से लिप्या करती जब यह निरोग रहती थी धरती अब धरती से उत्पत रोग
दुखी जीवन नरनारी का 2॥

पहले गऊरस पीया करते
निरोगे सौ बर्ष जीया करते
अब गऊरस का बिगड़ गया जोग
निरादर गऊ बिचारी का 3॥

दुनिया जैसे कर्म करती है
दुख सुख वैसा ही भरती है
महोर सिंह बैठ गया संजोग
शरणा ले गिरधारी का 4॥

दया धर्म जिनमें नहीं
वे गोहचरारे के गाम हैं ॥ टेक ।


जिन गामों में गऊ तिसाई पीहि तक चलती नाईं
कर्म कसाई खुटदे वै छुरी मारों के जाम हैं 1॥

जिन गामों में झोटा आंकल कै कुल्हाड़ी मारते
बांध भूखा मार दें वै भी महानीच हराम हैं 2॥

जिन गामों में मुसाफिरों को रातवासा हैं नहीं
टुकड़ा पानी भी नहीं वह घरवासा किस काम है 3॥

जिन गामों में गरीबों पर तालेबर सख्ताई करैं
तालेवर वे हैं नहीं गुलामों के तुख़्म गुलाम हैं 4॥

जिन घरों में भीख पल्ले मंगत कै पड़ती नहीं
परलोक में इस लोक में वे घर गृही बदनाम हैं 5॥

दया धर्म जिस घर में नहीं उसे बूचड़घर जानना
महोरसिंह इस बूचड़पन में कहीं नहीं आराम हैं 6॥

दोहा
कफ बाई बादी हरण, धातु क्षीण बलहीन ।
लोहू को पानी करै, गुण दो अवगुण तीन ॥


हमारी आत्मा जी इन कर्मों से हुई मलीन ॥ टेक ।

हुक्के में कितनी हरकत है सोचो चतुर प्रवीन
नफा क्या देखा इसमें मित्रो गुण दो अवगुण तीन 1॥

नल का पानी पी पी हम तो हुये दीन बेदीन
गोरस खांड चर्बी के घी नै धर्म कर्म किये क्षीन 2॥

सोडा शराब रुच रुचकै अब पीन लगे मतिहीन
नौटंकी अश्लील नाच नै करे पाप में लीन 3॥

बच्चे बूढ़े नौजवान सब पापकर्म लौलीन
महोर सिंह कलियुग की करनी भावी के आधीन 4॥

मित्रो धर्म घटने से प्रजा में पाप छाया ॥ टेक ।

पुत्र मारै पिता कै जूती
रोवै माता बैठ इकलूती
बेगुना ला पूतकपूती
माता पिता सताया 1॥

हुया भाई का भाई घाती
घले घाव चल रही काती
यूं कट कट मरैं दिनराती
कैसा जमाना आया 2॥

त्रिया करने लगी अनरीती
गैरों से पालैं हैं प्रीती
पति मार होवैं नचिती
करैं अपने मन का चाया 3॥

बहू मारै ससुर कै सोटा
सासड़ का जो पाड़ै चोटा
महोरसिंह कहै ज़माना खोटा
देख दिल घबराया 4॥

कलियुग में बताओ धर्म डटै तो कैसे डटै ॥ टेक ।

प्रथम ब्राह्मण हो तपधारी
विद्यावान धर्म प्रचारी
अब ब्राह्मण हुए भ्रष्टाचारी
देख कै छाती फटै 1॥

छत्रीकुल हो गया शराबी
वेश्यांगामी और कबाबी
इन कर्मों से हुई खराबी
आयु बल तेज घटै 2॥

वैश्य का था दया धर्म का चोला
ये चोला था बड़ा अनमोला
अब हुया सट्टेबाज घटतोला
ग्राहक की गांठ कटै 3॥

रहे ना जती सती और दानी
संत भक्त पंडित प्रमाणी
चारुं वर्ण हो गये अज्ञानी
दुष्ट घट ज्ञान बंटै 4॥

सब ही यज्ञोपवीत को धारैं
चारों वर्ण धर्म को हारैं
तीरथ व्रत सत्संग बिसारैं
दिन दिन भाव हटै 5॥

पितृपूजा देव आराधन
छूट गए धर्म कर्म के साधन
महोर सिंह कलि लग रह्या बांधन
क्यों नहीं राम रटै 6॥

कलियुग में धर्म के चारों पैर कटे ॥ टेक ।

पहला सत्य का पैर निहार
सच बोल्या करता संसार
अब सच्चाई तज नरनार
झूठ पै आय डटे 1॥

दूजा पैर शौच का जान
शुद्ध रहता था सकल जहान
अबतो सरभंग बन गया आन शौच के कर्म घटे 2॥

तीजा पैर दया का चीन
अब सब हुए दया से हीन
निर्दई हो रहे तेरा तीन
दया से अलग हटे 3॥

चौथा पैर दान का साज
जिसपर रह्या कुल्हाड़ा बाज
महोर सिंह कहै देखो आज
धर्म के अंग बंटे 4॥

वृद्धापन में आन धर्म की कदर घटी ॥ टेक ।

सतयुग में धर्म शिशु था त्रेता द्वापर में जवान
कलियुग में बूढा हुया कोई नहीं करता काण
लाज गई शर्म हटी 1॥

प्राणों से प्यारे लगे जवानी में गऊ बैल
वृद्ध भये पराक्रम थके किए बूचड़ के गैल
जहां जाकै नाड़ कटी 2॥

जवानी में मां बाप के वचन किए मंजूर
वृद्ध अवस्था देखकै कहा न मानै कूर
अलग घाल दई खटी 3॥

सपूत भक्त मां बाप के कपूत हरगिज नांय
आता बुढापा देखकर महोर सिंह घबराय
नाम की माल रटी 4॥

रहै किसकी शरण मे सनातन धर्म ॥ टेक ।

ब्राह्मण वेद पढ़ते करते धर्म का परचार
अब लगे ब्राह्मण नाचने नर सेती बनकै नार
महानीचों को नहीं आती शर्म 1॥

तन मन धन से धर्म की रक्षा करते छत्री जाम
धर्म से नाता तोड़कै धरवा लिया रांगड़ नाम
बने बध्यक बध्यक के करते कर्म 2॥

वैश्य धर्म को धारते जब थे लक्ष्मी के ठाठ
धर्म का तपड़ पलट कै लगे काटने गांठ
गंठकटों का अबतो बाजार है गर्म 3॥

धर्म के सब सेवक थे जब सब तरियां थी ठाढ़
अबतो चारों वर्णों नै धर्म का दिया दिवाला काढ़
महोर सिंह कहै रहै कैसे भरम 4॥

धर्म रहै कैसे जमाना बह गया जी ॥ टेक ।

सच्चा संत हमीं ढूंढा बहोत और ढूंढा पंडित पूरा
असल तो कोई मिला नहीं जो मिला तो मिला अधूरा 1॥

गीता योगवशिष्ट शबद वाणी और अजपा के जापी
बुगले भगत बहोत से हमने देखे बज्रपापी 2॥

मठधारी पंथाई देखे देखे आर्यासमाजी
ज्ञानी गुणी गवैया देखे सब माया के पाजी 3॥

जती सती नजर आवैं कम पतिव्रता नारी
ग्यारह खसमी बहोत मिली मिली डाकण और सिहारी 4॥

आण काण कुलरीत तजी मर्याद धर्म की मेटी
गऊ ब्राह्मण का देखा निरादर बिकती देखी बेटी 5॥

विप्रों में ब्रह्मतेज न देखा छत्रियों में छत्रापन
बनियों में ना देखी दया सब प्रजा हो गई पापन 6॥

लोभी गुरु लालची चेला मित्र का मित्र घाती
झूठी गंगा उठती देखी डूब गई पंचाती 7॥

उंच नीच वर्ण में हमने जरा न अंतर देखा
वर्ण आश्रम के धर्म नसा सब हो गए एकम एका


दया धर्म संतोष शील की बिछटती देखी जोड़ी
लेलोटा सब परजा हो गई हाकिम बन गए कोड़ी 9॥

तीर्थ व्रत से भाव हटा तजी पूजा स्वर्ग नसैनी
कुछ ना रहा बहा जग सारा रह गई जेंटलमैनी 10॥

झूठ ईर्ष्या निंदा ठग्गी पाखंड चोरी जारी
इन कर्मों से रंगी हुई देखी परजा सारी 11॥

पापी जीव पेट पालनिये अहंकार नै छाये
महोर सिंह नहीं हाथ किसी कै दिन प्रलय के आये 12॥

दिन दिन भारत देश गारत होता जा रहा ।। टेक ।

विद्या गई अविद्या छाई लोभवश हो कर्म कसाई
भर कै ज़नाना भेष नाचें चमोला गा रहा 1।।

आदि युगादि रीति सभ मेटी डूब गए धड़े धर लई बेटी
तुल रह्या कुफर हमेश हाड़ बेचकर खा रहा 2।।

शुद्धि नै जाति जन्म डबोया आरज नै देश गर्त में विगोया
सत्संग का नहीं लेश स्वाद वाद में आ रहा 3।।

मदिरा मांस नै बुद्धि भ्रष्ट करी जूवा नै सभ क्रिया नष्ट करी
हुक्का सुल्फा विशेष लोगों के मन भा रहा 4।।

संत गऊ की सेवा छूटी भारत की अब किस्मत फूटी
परजा रही भोग क्लेश फल कर्मों का पा रहा 5।।

सज्जन कम हो बढ़ गए धूरत महोर सिंह सुधरण की ना सूरत
अब नहीं चलती पेश कलियुग जोर जमा रहा 6।।

भारत गारत हो गया रसातल में जाय ॥ टेक ।

प्रथम ब्रह्मचर्य नष्ट हुई फेर सारी प्रजा भष्ट हुई
शिशनों दर पै जन्म डबो गया दई उंवर बिताय 1॥

नेत्रों की ज्योति गंवा रहे ऐनक चश्मों से काम चला रहे
चेहरे की लाली खो गया रही ज़रदी छाय 2॥

पैदल कोस भी चला जाता नहीं कभी सत्संग में भी आता नहीं
रोगी हो खटिया में सो गया मुर्दा बना आय 3॥

व्यभचारी तू नामी हुया धर्म कर्म तज ग्रामी हुया
महोर सिंह मर्म को टो गया अब रह्या पछताय 4॥

कोई संत भेज भगवान ज्ञान दे ऊंची कोटि का ॥ टेक ।

यो भारथ हो रह्या गारथ दिन दिन जुल्म बढ़ै ज्यादा
सुधरै कैसे परिवार यार जो बिगड़ रह्या दादा
मर्यादा ना रही गही सब लालच रोटी का 1।।

जाय निजामत करैं अदालत भर लाते खीसा (जेब)
सभी मिनिस्टर बना रहे घर जमा करैं पीसा (पैसे)
गांधी जैसा कोई तेज संत दे भेज लंगोटी का 2।।

करै जुल्मों का अंत संत कोई सच्चा महात्मा
वेद विधान ज्ञान बतावै करै शुद्ध आत्मा
परमात्मा करै मेहेर फेर करै कोई साधु चोटी का 3।।

कर कर शोषण करते पोषण काम बुराई का
कहैं महोर सिंह मरते फिरैं करैं काम लड़ाई का
खुद भाई का करै नाश भाई कोई नीयत खोटी का 4।।

शिक्षाप्रद भजन

पशु था तब ही अच्छा था मनुष्य बन क्या किया तैनै ॥ टेक ।

पशु था जब भी दुख पा-पा किया पालन तैं ओरों का
मनुष्य बनकर जमाने के जीवों को दुख दिया तैनै 1॥

वृक्ष था जब भी दुख सह-सह किया उपकार तैं औरों का

मनुष्य बनकर अरे निर्दयी किया बज्र हिया तैनै 2॥

सुकर कूकर था जद भी तू डटा हुया अपनी हद पै था
मनुष्य बनकर किला हद का हरामी ढ़ाह लिया तैनै 3॥

भोग इंद्री के रहा बस में क्या पालन पेट का कीन्हा
महोर सिंह कहै बिना समझे वृथा जीवन जिया तैनै 4॥

पृथ्वीराज कै जी मित्रो सात वस्तु गई संग ॥ टेक ।

विप्रों का ब्रह्मतेज गया गये वेद वेद के अंग
छत्रियों का गया छत्रापन करनी में पड़ गया भंग 1॥

लाल गये पारस गया जिन बिन हुया भारत तंग
संजीवन बूटी गई मणधारी गये भुजंग 2॥

पाँच वस्तु और जायेंगी जिसदिन जा श्रीगंग
गीता गऊ गायत्री गोमती लक्ष्मी का अर्धंग 3॥

वर्ण धर्म रहैंगे नहीं छा ज्यागा सर्भंग
महोरसिंह चंद रोज में होने वाला एक रंग 4॥

इतने कामों सै जी घर में आती है कंगाली ॥ टेक ।

जो कोई नाम हरि का तजता
आठ पहर में कभी ना भजता
भोंकता फिरै ढ़ोल ज्यूं बजता
करता दाँत घसाई ठाली 1॥

जिस घर में ना होती सफाई
चूल्है पैंडै ना उच्छनाई
जिस घर त्रिया कलह मचाई
लड़ैं आपस में कर्म चिंडाली 2॥

मित्रो झूठ कपट बेईमानी
ये पहुंचाते धन में हानी
जुआ अपनी और बेगानी
संपै हरै करै खस्ताली 3॥

सुल्फई सट्टेबाज शराबी
वेश्यांगामी और कबाबी
महोरसिंह नही रहती आबी
चाहे हो घर कैसाई टकसाली 4॥

तैने छहों काम दिये छोड़ फेर भी मनुष्य कहाता है ॥ टेक ।

पहला काम मनुष्य का न्हाना
न्हाकै नित की भोजन खाना
वो नर सूकर स्वान समाना
जो बिन न्हाई खाता है 1॥

दूजा काम ध्यान का करना
हृदय में ध्यान हरि का धरना
संध्या नाम इसी का बरना
स्वायम्भू मनु गाता है 2॥

तीजै हवन बोलकर मंत्र
मात पिता की सेवा तदन्तर
पंचम विद्या पढ़ो निरंतर
जहां परम गुरु पढ़ाता है 3॥

छठ जो अतिथि द्वारै आवै
भूखा प्यासा जाण ना पावै
इन कामों सै मनुष्य कहावै
महोर सिंह गा समझाता है 4॥

दोहा
जो नर विद्याहीन है, समझो पशु समान ।
विद्या से प्रगटे धन की, हो निराली शान ।।


देश विदेश समुद्रों तक करवा देती सन्मान ।। टेक ।

दुनिया में श्रंगार नहीं कोई विद्या के समान
सभा में विद्यावान को निरखै सकल जहान 1।।

बड़े कामों से हीन दीन चाहे कितना हो खानदान
सभी तरह से उघड़े को भी ढक लेता विद्वान 2।।

विद्या सबसे बड़ा बना देती है अस्थान
महोर सिंह कहै गाय कै सदा पखै रहैं भगवान 3।।

मत चूकै नादान फेर पछतावैगा ॥ टेक ।

तनमन और धन से किसी को दुख मत दे
विक्रम ज्यूं परदुख में पड़कै भलाई ले
जिकर रह जावैगा 1॥

मिलजुल कर चल सभी से हंस हंस मीठा बोल
आये का आदर कर कुछ नहीं लगता मोल
सपूत कहावैगा 2॥

नेक नजर नित रखकर नेकी के कर काम
बदनीति बदनजर से हो ज्यागा बदनाम
कलंक लग जावैगा 3॥

छोटा बनकर गुजर कर बडपन को दे छोड़
महोरसिंह कहा मान ले मतना करै मरोड़
पता नहीं पावैगा 4॥

कुछ करदे अमर निशान सदा धन रहने का नाहीं ॥ टेक ।

नृग बली शिवि हरीचंद को बर्ष बीते लाखों लाख
क्या लाये क्या ले गये एक बाकी रह गई साख
कर्ण विक्रम का जग माहीं 1॥

बिहाणी में नन्दा हुया दादरी में सीताराम
दुर्गा झज्जर में हुया अमर कर गये नाम
कीर्ति देशों में छाई 2॥

चिड़ावा सूरजमल हुया अमरपदी लई पाय
लक्ष्मण झूलै जायकार पुल दीन्हा बंधवाय
कई धर्मशाला बनवाई 3॥

बीसलदेव बीस करोड़ धरे जमीं में सांच
आनासागर यों लिखी कोई लो पटा को बांच
माया किसी काम ना आई 4॥

नहीं लाया सुख संपदा नहीं चलेगी साथ
महोर सिंह रंगा जाय तो रंग ले क्यूं ना हाथ
लोक परलोक में बादशाई 5॥

नारी सशक्तिकरण, सम्मान व प्रेरणा


विरथा मत जन्म गंवाओ हे
कुसंग कूं तजकर तुम सत्संग में आवो हे ॥ टेक ।


चोर जार ठग पाखंडी साधां का बनाकर भेष
भोली त्रिया सब फंटी में लई दे देकर उपदेश
इनसे आपा बचाओ हे 1॥

गल में माला बगल में गीता उजले वस्त्र धार
ऐसी कुचलनी भगतनी बन करती फिरें व्यभिचार
पास उनके मत जावो हे 2॥

मीरा नै निज आत्मा से ही पाया था आत्मज्ञान
कर्माबाई कूं आत्मज्ञान से मिल गए थे भगवान
आत्मा को शुद्ध बनावो हे 3॥

काम क्रोध मद लोभ मोह तजो मान बड़ाई त्याग
इंद्री वश कर मन को वशो घर में ही मिले वैराग
क्यूं दर दर मन भटकावो हे 4॥

ऐसी धारणा करो मन में और राम नाम का जाप
छन में भष्म हो ज्यांगे तारे कोटि जन्म के पाप
वास बैकुंठी पावो हे 5॥

उत्तम कुल उत्तम जूणी पाई नर-नारायणी देह
जो अब नीच कर्म करोगी तो खाती फिरोगी खेह
फिर पीछे पछतावो हे 6॥

कटुक वचन मत मुख से भाषो बोलो अमृत बैन
महोर सिंह कहै राम नाम कूं मत बिसरो दिन रैन
जिगर के मांह जमावो हे 7॥

जन्मै थी ऐसे ऐसे लाल सुनो हे तुम भारत की नारी ॥ टेक ।

सत्यवादी हरिश्चंद्र से जन्मे भक्त ध्रुव प्रह्लाद
मोरध्वज शिवि कर्ण दधिचि ये तुम्हरी औलाद
बनी तुम इनकी महतारी 1॥

रामचंद्र लक्ष्मण और कृष्ण पीये तुम्हरे सोत
भीष्म अर्जुन भीम से योद्धा तुमने जने बहोत
गोद सब खेल चुके थारी 2॥

पर-दुखभंजनहार हुए विक्रम से थारे पूत
भोज से विद्यावान भरथरी गोपीचंद से अवधूत
करी तुमने पैदावारी 3॥

गुरु गोविंदसिंह तेग बहादुर थे थारे ही लाल
चिने हुए पुत्रों की देखो अबतक खड़ी दिवाल
गुरु ना हुए धर्महारी 4॥

ऐसे ऐसे जन्मती है तुम्हरी वही कूख
पर वो शक्ति अब तुम मे नहीं रज वीरज गए सूख
धर्म छुटने से हुई ख्वारी 5॥

पतिसेवा दया धर्म थे थारे सत के भरे शरीर
शौच शुद्धि पर डटी थी जब जन्मा करती वीर
भक्त दानी और अवतारी 6॥

जो आओ उस धर्म पर हो वैसी संतान
महोर सिंह गुनी गाय कर दे रहे व्याख्यान
सनातन का परचारी 7॥

b> लई जा तो ले ल्यो भलाई हे

सदा थिर रहना नाईं हे ॥ टेक ।

सास ससुर की सेवा करो नित पति संग में रखो प्रेम
परपुरुषों को भाई बाप तको यही धर्म और यही है नेम
पाओगी मान बड़ाई हे 1॥

कमचोरी कलिहारी चटोरी का भूल न करना संग
त्रिया कुचलनी से रहना बचकर ना करनी में पड़ ज्या भंग
कुलों कै लागै स्याई हे 2॥

मेरी तेरी पाड़ा तिवाड़ी जो करती फिरैं दिनरात
भीतर कपट बाहर मिठबोली का मतना पकड़ियो साथ
पल्लै बंधे बुराई हे 3॥

धन जोबन और भाग सुहाग का करना नहीं गुमान
नयकर चलना सत पर रहना यो सुपन समान जिहान
कर्मफल सुख-दुखदाई हे 4॥

ओस का मोती पानी का बुलबुला सा हाड़ लपेटी चाम
कीट वीट भष्मी हो ज्यागी या और ना आवै काम
करो कुछ नेक कमाई हे 5॥

सत्पुरुषों का संग करो और सत बाना लो धार
महोर सिंह कहै सत से ही बेड़ा होता आया पार
वेद में महिमा गाई हे 6॥

सुधरे तो जन्म सुधारो हे
भंग मत करणी मे डारो हे ॥ टेक ।


देह धार दारुण दुख सहे तुम सदा रही पराधीन
अधम से अधम पतित नरक गामी यो त्रिया का चोला मलीन
समझो सोचो विचारो हे 1॥

लाखों जन्म गए भरमत भोगत लख चौरासी जून
अबकै चूकी नहीं ठिकाना थम होती फिरोगी बिरुन
आगे की डगर बुहारो हे 2॥

सती अनुसूईया अरुंधति सीता नै लीन्हा था जन्म सुधार
कर्मा मीरा बस्ती रामा हुई भवसागर से पार
नेह दुनिया से बिसारो हे 3॥

काम क्रोध तज राम भजो मिलजुल करो उंवर बदीत
निंदा पराई सुननी ना करनी ना गावो कुचलना गीत
सुरत डाटो मन मारो हे 4॥

करी जा तो निरभंग ग्यास करो या गंगा अस्नान
जीवों को चूगा पानी अन्न भूखे को श्रद्धा समान
प्यासे की प्यास निवारो हे 5॥

गौवों की सेवा वृद्धा की टहल रखो देव पित्रों में भाव
महोर सिंह दे टेर प्रभु से पड़ी भवसागर में नाव
नाव कूं पार उतारो हे 6॥