दोहा –
क्रोध भरा शुगनी कहै, मत नहीं लावो देर ।
मांग खड़ी थारै सामनै, ल्यो संत को घेर ॥
कैरूवों ने अर्जुन घेर लिया
द्रोपत की कही ना मानी ।। टेक । (त्रिभंगी)
अस्त्र शस्त्र लेकै हाथ, चले इकोत्तर सौऊँ भ्रात, करने लगे वारदात, ना मानी कही
रहे भीष्म जी बरज, गुरु द्रोणाचारज, विदुर भक्त की भी अरज, कनी सुनी नहीं
जद बोल्या दानी कर्ण, द्रोपती से चरण, दबवाऊं जीत रण, मेरा पर्ण यही
मेरा मान जो घटाया, सूत पूत जो बताया, दोष कुल कै लगाया, के कसर रही
शुगनी कहै मारो मारो, मत बात और विचारो, शीश संत का उतारो, होगी मन की चही
कैरू भर भरकै जोर, करैं धनुषों की टंकोर, फिरे अर्जुन के चहुं और
अर्जुन नै भीम को टेर लिया
चुचकारा लख़्संधानी 1।।
जब भीम बली आया, मार गदा से गिराया, कौरवों को धमकाया, दूर किये सारे
चले अर्जुन के बाण, कम्पे धरती असमान, कैरू हुए सावधान, कई धनुष धारे
मारोमार करता आवै, झड़ी बाणों की लगावै, बड़ा जोश जो दिखावै, ना टरे टारे
हुया भारी संग्राम, नहीं मिलै उपराम, राजा देखैं थे तमाम, युद्ध हुये भारे
कई हुये छिन्न भिन्न, कोई भुजा शीश बिन, कइयों को गया चिन
जब सौवों नै मुख फेर लिया
गये जीत जंग सेनानी 2।।
चल पड़े जंग जीत, पांचों होय कै नचीत, राजा गाने लगे गीत, पाई प्रभुताई
कैरूओं का समाज, हाथी घोड़ा रथ साज, गए हथनापुर को भाज, वो सौऊँ भाई
जीत कैरुओं से जंग, चले पांचों निहंग, द्रोपती को लेकै संग, हुई सुखदाई
छाई द्रोपत कै उदासी, पुत्री ले गया सन्यासी, मेरा मरण जग हांसी, हुई हल्काई
मेरा डूब गया धर्म, और बिगड़ा है कर्म, आई राजा को शर्म
मुख पर पल्ला गेर लिया
नैनों में भर आया पानी 3।।
वो तो पांचों हरिजन, सजनों होकै मगन, कुम्हरी के भवन, चलकर आया
दई अर्जुन नै आवाज, माता भिक्षा लाये आज, सुन जननी आई भाज, आनंद छाया
जै जै बोली कोंता माईं, जो कुछ भिक्षा तुमने पाई, बांट लियो पांचों भाई, सुन पछताया
खोला कुटी का द्वार, माता निकसी बाहार, देखी खड़ी राजक्वांर, नैनीं नीर छाया
देख देख पछताती, धोखा मन माहीं खाती, कुछ पार ना बसाती, खूब समझाया
उस चकरी के धाम, पांचों ले रहे विश्राम, साँचा एक राम नाम
पद महोर सिंह नै हेर लिया
कथ दिया भजन परमानी 4।।
--------ॐ श्रीरस्तू--------