दोहा –
जरजोधन के सुन वचन, द्रोपती गई घबराय ।
दादसरा जी भीष्म से, बोली वचन सुनाय ।।
परबस हो रही, दुखभर रो रही
मुंह दबको रही, आरत भीष्म से टेरी ॥ टेक !
भीषम जी थारै अगाड़ीं
धृक जीवन मनै करैं उघाड़ी
नेत्र खोलो, सुचेत हो ल्यो, मुख से बोलो
पितामह कौन गुणा मेरी 1॥
अव्वल तो मैं अबला हूं
और दूजे रजस्वला हूं
हो बलकारी, क्या तैं बिचारी
अनाथ नारी, पितामह संकट में गेरी 2॥
जो देखोगे उघाड़ी त्रिया
तो हो ज्यागा नष्ट ब्रह्मचर्या
पड़ ज्या दृष्टि, क्रिया भ्रष्टि, काया कुष्टि
पितामह हो ज्यागी तेरी 3॥
जो थारी जुबान हिल ज्या
तो मेरा संकट टल ज्या
हो बलदाई, ले ले भलाई, पीठ दिखाई
महोर सिंह छा गई अंधेरी 4॥