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द्रोपदी चीर हरण

दोहा –
द्रुपद सुता ल्याय कै, करी खड़ी सभा के बीच ।
क्रोध भरे बोल्या वचन, दुर्योधन बड़ा नींच ।।


अजी एजी सभा में कर दई ल्याय खड़ी
करती रोष बेहोश हुई पंडवों कै नजर पड़ी ॥ टेक । (सांगीत)

अर्जुन हू कै ज्वाला जागी देखी खड़ी अपनी नार
लख्सन्धानी बान लिये भीम रह्या ललकार
नकुल लई सांघ सहदेव ठाई तलवार
एक द्रोपती कै हेत
कर दें सोवन का खेत
भाई क्यूं ना आज्ञा देत
आ गई संग्राम घड़ी 1||

सुन कै वचन राजा शीश को दिया हिलाय
सत मत हारो भाई सत हारे पत जाय
सत की बांधी लक्ष्मी फेर भी मिलैगी आय,
बैठ जाओ नैन मींच
और श्वास लीजों खींच
मुख हू को भींच
कर्मों की रेख अड़ी 2॥

देख कै अन्याय विदुर भगत वहाँ से गये चाल
लाजे नहीं भीष्म द्रोण कर्ण अंध भूपाल
समय को विचार बतलाये चारों चिंडाल
बैरियों की नार
खड़ी सभा के मंझार
या का चीर ल्यो उतार
करो नंगी बस्त्र हड़ीं 3॥

दुस्सासन से कहन लगा दुर्योधन बलवान
चीर को उतार नचा सभा कै दरम्यान
नग्न जो बना कै मेरी जंघा पै बैठा दे आन
पड़ी कूएँ में भंग
सारे हो गये कुरंग
गुण गावै महोर सिंह
नोबत पर चोब झड़ी 4॥

दे रही दुहाई रानी पतियों से टेरी जी ॥ टेक ।

धर्मपुत्र तुम धर्म के त्राता धर्महेत या देहधारी
देहधार धर्म के किये कर्म सब जगत कहै था अवतारी
हो गये अधर्मी कैसे आज सभा बीच नगन होती नारी
क्या तो मेरी बंध छुड़ावो ना पिछली साख जागी थारी
कोमल हिया बज्र का कर लिया
ऐसी क्या छाई बलमा अक्ल अंधेरी जी 1॥

धर्मपुत्र कुछ बोलै नहीं जब अर्जुन से बोली बाणी
सभा बीच नग्न हो नार तेरी कित गये तेरे लख्संधानी
क्या टूटा धनुष बाण झूठे भये क्या विद्या भूल गये शस्त्रानी
क्या छत्री खून शीतल भया क्या देह बनी ये पाषाणी
पति धर्मसुत मुख मोड़ गया है
आपको सरैगा नहीं मुखड़ा फेरीं जी 2॥

अर्जुन भी कुछ बोले नहीं फिर भीम भीम कह रोय पड़ी
कित गया ज़ोर गज दस हजार का सभा बीच तेरी नार खड़ी
क्या पीकर मधु मन मस्त भये या सूंघी कोई मति भंग जड़ी
क्या कुछ कलंक लग गया मेरै या आय रही कोई मूढ़ घड़ी
जैसे गऊ को सिंह घेरता
ऐसे ही दुश्मन नै बालम मैं घेरी जी 3॥

भीमबली कुछ बोल्या नहीं फिर थरर थरर कम्प्या शरीर
सहदेव नकुल सहदेव नकुल करै दोनों हाथ रही पकड़ चीर
सभा बीच त्रिया होती नग्न हैं पति पाँच बड़े शूरवीर
पांचों ये मर्द नामर्द भये पांचों से टूट गया आज सीर
महोरसिंह प्रभु शरण तिहारी
पार ना बसावै त्रिया संकट में गेरी जी 4॥

दुस्सासन मेरे बीर तूं चीर उतार ले नै ॥ टेक ।

जा दिन बाजी खेलन ध्याये
इसनै अंध के अंध बताये
म्हारे सौवों के मान घटाये
खूब विचार ले नै 1॥

इसको जल्दी बना उघाड़ी
खड़ी कर दे मेरै अगाड़ी
इस बेश्याँ नार की साड़ी
बीर सहार ले नै 2॥

पंचभर्तारी को नग्न बनाकै
सभा के दरम्यान नचा कै
मेरी जंघा पै बैठा दे ल्याकै
बाजी मार ले नै 3॥

ऐसे जारजोधन टेरै
वो घाव भड़क रह्या मेरै
महोर सिंह सहारै तेरै
नाथ उबार ले नै 4॥

दोहा –
जरजोधन के सुन वचन, द्रोपती गई घबराय ।
दादसरा जी भीष्म से, बोली वचन सुनाय ।।


परबस हो रही, दुखभर रो रही
मुंह दबको रही, आरत भीष्म से टेरी ॥ टेक !

भीषम जी थारै अगाड़ीं
धृक जीवन मनै करैं उघाड़ी
नेत्र खोलो, सुचेत हो ल्यो, मुख से बोलो
पितामह कौन गुणा मेरी 1॥

अव्वल तो मैं अबला हूं
और दूजे रजस्वला हूं
हो बलकारी, क्या तैं बिचारी
अनाथ नारी, पितामह संकट में गेरी 2॥

जो देखोगे उघाड़ी त्रिया
तो हो ज्यागा नष्ट ब्रह्मचर्या
पड़ ज्या दृष्टि, क्रिया भ्रष्टि, काया कुष्टि
पितामह हो ज्यागी तेरी 3॥

जो थारी जुबान हिल ज्या
तो मेरा संकट टल ज्या
हो बलदाई, ले ले भलाई, पीठ दिखाई
महोर सिंह छा गई अंधेरी 4॥

दोहा –
कुलवधु के सुन वचन, पीठ लई है फेर ।
निराश हो अबला नै, गुरु से लाई टेर ।।

निराश हो भीष्म से अबला गुरु से अर्ज गुजारती ॥ टेक ।।

पक्षपाती बनियो मत गुरु तुम हो सबके सीर के
दीन को दीजे सबर खड़ी त्राहि त्राहि पुकारती 1॥

पांचों की मैं बीर पंच भरतारी मेरा नाम है
एक नै कैसे जिता दई करियो न्याव महारथी 2॥

जो पतियों नै खेल अपनी काया पहले हरा दई
फिर मैं किसनै डांव पै ला दई बर-बर यही बचन उचारती 3॥

रूखा रूखी की कहियो मत गुरु कहो तो कहियो न्याव की
महोर सिंह गुरु बोले नहीं तब कर्ण की ओड़ निहारती 4॥



दोहा –
द्रोण गुरु बोले नहीं, मुखड़ा लिया छुपाय ।
कर्ण से कहने लगी, तुम कुछ करो उपाय ।।

छुटवाले दानी कर्ण शरण लई मनै तेरी ॥ टेक ।

तू दानी वीर कहावै
तुझे जरा शर्म नहीं आवै
सभा में लाज आज मेरी जावै
दुस्सासन नै घेरी 1॥

दुष्ट खड़ा है चीर हरने
आज सभा में नंगी करने
मै अबला अब तेरै शरने
लाज बचा मेरी 2॥

  भीष्म गुरु दोनूं मुख फेरा
इस सभा में कोई ना मेरा
अब है भरोसा मुझको तेरा
क्यों कर रहे देरी 3॥

जो देखोगे उघाड़ी दानी
पीछै रहै ना देवा पानी
ये है साची सती की वाणी
कुल की हो ज्या ढेरी 4॥

कह रही जोड़ मैं दोनों कर जी
आगै आपकी जो हो मरजी
महोर सिंह रटै हर-हर जी
ध्यान लगा हरबेरी 5॥

दोहा –
द्रोपती के सुन वचन, कर्ण कहै चित लाय ।
बता सूत के पूत की, याद गई क्यों आय ॥


अब क्यूं रोवै सै हे
इस सूत के पूत अगाड़ीं ॥ टेक ।

तेरे पिता नै मच्छ टंकाया
लेकर बाण मैं बींधन आया
तैने सूत का पूत बताया
अब के जोवै सै हे
उस दिन बन रही थी ठाड़ी 1॥

आज वो घाव भड़क रह्या मेरै
क्यों नहीं याद है वेश्यां तेरै
खड़ी खड़ी क्यों आंसू गेरै
क्यूं मुंह ल्हकोवै सै हे
कराऊंगा नग्न उघाड़ी 2॥

अब उतराकर तेरी साड़ी
नचाऊं सभा में करकै उघाड़ी
क्यूं रो रही तू मेरे अगाड़ी
क्यूं कायल होवै सै हे
तेरी उतरैगी अब साड़ी 3॥

सुनकर कटु कर्ण की वाणी
रो रही खड़ी होकै राणी
महोर सिंह भज चक्रपाणी
क्यूं जिंदगी खोवै सै हे
तू करले चेत अनाड़ी 4॥

दोहा –
दानी के सुन वचन, द्रोपती भई लाचार ।
आश कर्ण की छोड़कर, अंध राजा से करै पुकार ॥


अंध राजा तेरै क्या अंधेर
सभा में अनरथ हो रह्या ॥ टेक ।

हिम्मत हार गया पति मेरा
भीष्म द्रोण कर्ण मुख फेरा
दुस्सासन नै लई मैं घेर
लज्जा मेरी खो रह्या 1॥

मित्र कुटम्बी गोती नाती
दुश्मन बनी सकल पंचाती
सब नै छोड़ दई है मेर
नाश का बिरवा बो रह्या 2॥

अब नहीं किसी का भाव है
अब है मेरी आपसे टेर
क्या तूँ मूंह दबको रह्या 3॥

  मोहे जान गरीब छुटा लिये
इस दुनिया में जस पा लिये
महोर सिंह सुन मुख लिया फेर
हंस त्रिया का रो रह्या 4॥

अब मेरा न्याव करैगी पंचात
पंचों की शरनाई है ॥ टेक ।


पाँच पंच जहां परमेश्वर है
पंचाती ईश्वर का घर है
जो करै रूखा रूखी की बात
पंच नही वो अन्याई है 1॥

कुछ भी कर दियो उजर नहीं है
बिना आपके गुजर नहीं है
अब मेरी जेठ बिगाड़ै जात
धृक जीवन दुखदाई है 2॥

जेठ हैं नग्न करन के गरजी
यही कुटंब परिवार की मरजी
अब है न्याव आपके हाथ
अबला किसनै डाव पै लाई है 3॥

हीन दीन आरत बेपत है
अब पंचों की शरणागत है
महोर सिंह सुनकर पंच मुस्कात
जब रानी द्रोपती घबराई है 4॥

इन सातों के सताये कुल नष्ट हो जाता है ॥ टेक ।

गऊ ब्राह्मण के सताये ब्रह्माग्नि उत्पन्न होती है
कुल को भस्म करती है कालाग्नि गऊ माता है 1॥
कुलवधु गरीब बालक बेगुणा सताते इनको
तीनों की हाय बज्र कुल नाश की दाता है 2॥

बंधु गुरुद्रोही जो है कुल नाश करते अपना
सर्व सम्पदा नस जाती जल्दी ही फल पाता है 3॥

कुलवधू की हाय बुरी है बुरी से बुरी हो ज्यागी
आगै खुशी रही थारी महोर सिंह गुण गाता है 4॥

हिमाती कौन अब तेरा सबकै आगै लई रोय ॥ टेक ।

जिनके बोझ मरै थी रातदिन कित गये अर्जुन भीम
हुमक न दुमक बोलैं न चालैं बनकर बैठे ढीम
देख पांचों नै मुख फेरा 1॥

नाती सब अजमा लिये अजमा लिया परिवार
पंचों आगै रो लई कतई ना सुनी पुकार
देख अब पुरषारथ मेरा 2॥

नंगी तोहे बनाय कै सभा के दरम्यान नचाय
जारजोधन की जांघ पर दूंगा अभी बैठाय
बना दूं बन का बासेरा 3॥

उसको और बुलाय ले जिसपर तेरी मेर
अब तेरे नंगी होण में जरा नहीं है देर
महोर सिंह भाषा पद टेरा 4॥

रहा पकड़ वधू का हाथ
जेठ तेरा धर्म नहीं ॥ टेक ।

मैं थी तेरी घर्म की बेटी
आण काण तनै सब मेटी
कीड़ी ऊपर कटक को तोल रह्या
लगा तूँ बिगाड़न जात
जेठ का यो कर्म नहीं 1॥

भाखैं कुफ़र कुफ़र तोलैं हैं
चाहे जो मुख से बोलैं हैं
हीड़ हटक ना रही किसी की
या डूब गई पंचात
किसी को आंखीं शर्म नहीं 2॥

भरी सभा में बोल रही हूं
घूँघट का पट खोल रही हूं
लाज शर्म मेरी अब उतरैगी
उघड़ैगा मेरा गात
किसी का कम्पै बिरम नहीं 3॥

वसुधा मात दराड़ा खा ज्या
इस दुखिया नारी नै समा ज्या
महोर सिंह कहै इस दुनिया में
मो सम नांह अनाथ
किसी का भरम नहीं 4॥

भीम कहै सुन धर्मसुत अब क्या कुछ बाकी रह रही ॥ टेक ।

सर्बस खो दिया खेल में हारे का दुख जरा भी नहीं
इस दुस्सासन के बोल सुन सुन करद कलेजै बह रही 1॥

कैरवों की कुनबाघानी सभा मोधी मार कै
तन की तप्त बुझाय ल्यूं अब काया मेरी दह रही 2॥

कैरवों का खून पी ज्यां जब सबर मुझको नहीं
बेगुना त्रिया हमारी दारुण दुख को सह रही 3॥

हथनापुर उज्जड़ करूँ कर दे इशारा हाथ का
महोर सिंह धर्मसुत ना बोले गांठ कर्म की गह रही 4॥

धीर धार मत करै विलाप
दिन म्हारे चक्कर खा रहे ॥ टेक ।

जब शुभ दिन म्हारे आयेंगे
तब खूनी नदी बहायेंगे
अब कोई उदय हो रहा पाप
संकट के दिन आ रहे 1॥

इस दुष्ट की भुजा उखाड़ कै
महानीच की जंघा पाड़ कै
मेटूंगा तेरा संताप
बस अब पल बगे जा रहे 2॥

सोवन की रैन बनाय दूं
तेरे तन की तप्त बुझाय दूं
बख़्त देख बैठे चुपचाप
घाव म्हारे भड़का रहे 3॥

कर सबर तूँ रोना बंद कर
मुख से गोविंद गोविंद कर
आप ही हो ज्यांगे गरगाप
महोर सिंह गुण गा रहे 4॥

भीम को धर्मसुत समझावै
मेरे भाई समता धार ॥ टेक ।

देख बंधु कैसी बनी नल राजा के मांह
बिखा बलाया फेर भी सत छोड़ा था नांह
सत से गई हुई लिछ्मी आवै 1॥

हरिश्चंद्र नै दुख सहे हो गये तेरा तीन
वचनों का पालन किया हुया नहीं धर्महीन
नाम सत्यवादी कहलावै 2॥

चार प्रिय इस जगत में पुत्र नार धन प्राण
दशरथ नै चारों तजे वचन नहीं दीन्हा जाण
जाये तो नरकवास पावै 3॥

आप ही मर ज्यायेंगे करैंगे जो अन्याय
थोड़ा कह्या घना मानकर चुपका भीम हो जाय
छंद कथ महोर सिंह गावै 4॥

भाई कैसे समता धारूं अनरथ हो रहा जी ॥टेक।

रूंग रूंग में लुक निकसैं हैं लगी जिगर में भाय
एकबर जीभ हलाय दे ल्यूं तन की तप्त बुझाय
बख़्त क्यों बिरथा खो रहा जी 1॥

काल मृत्यु से डरूँ नहीं ये तो हैं क्या चीज
इस अंध के बीज कुबीज को करूँ आज नरबीज
बीज यो विष के बो रहा जी 2॥

खेलन चले द्यूत क्रीड़ा और गये बख़्त को चूक
जो अब अवसर चूकगे तो लजै मात की कूख
क्यों नाम बिगो रहा जी 3॥

देखत म्हारी नार की मिट्टी करैं बिरून
महोर सिंह जब आवै सबर छाती चढ़ पी ज्यां खून
काल मुख धो रहा जी 4॥

दोहा –
महीदानी सुत ता सुता, ता पति तात के तात ।
निशिखंडन सुत भ्रात की, भार्या जोड़ कहै हाथ ।।


अहिपन रिपुपति सुनो टेर हो
दधिकुल सुत के नारी की ॥

वासुकिसुता पति तात संहारे
महिरिपु भ्रात पलक में मारे
घट श्रवण भ्रात निश्चरपति तारे
जरा ना लाई देर हो
काटी फांसी लाचारी की 1॥

तृतीय जन्म रिपु शिव वरदानी
करी मर्दन शशि भगनी आनी
जननीभ्रात मारा बलवानी
विपुल विपरों पै मेहेर हो
सुधि लीनी महतारी की 2॥

रविइंद्री हीन सुत बलकारी
जगत ठगन के रिपु हुए भारी
करुणा करो जैसे उरगारी
क्या कर लोगे फेर हो
रखो लाज मेरी सारी की 3॥

सत में पत है जिन चित लाया
जगत रिपु का तात हटाया
महोर सिंह कहैं जगत यश छाया
राई से करा सुमेर हो
मैं शरणा निर्विकारी की 4॥

दोहा –
दोनूं नैन मींचकर, इक टक ध्यान लगाय ।
अर्ज है दीनानाथ से, निर्बल की करो सहाय ।।


तुम बिन मेरा कोइ नहीं है सहारा ॥ टेक ।

अनाथ के तुम नाथ प्रभु
तुम ही पितु मात प्रभु
दुष्ट कर रह्या घात प्रभु
ये दुर्योधन हत्यारा 1॥

जब जब प्रभु भीड़ पड़ी हो
भक्तों की पीर हड़ी हो
आज थारै द्वारै खड़ी हो
गोविंद नाम पुकारा 2॥

नरसिंह रूप धारा आपने
हिरणाकुश को मारा आपने
भक्तों को उबारा आपने
मेरा भी करो निस्तारा 3॥

आज सभा मे करै उघारी
दुष्ट मेरी खींचै सारी
विपदा आन पड़ी है भारी
आकर करो उद्धारा 4॥

द्रोपदी की सुनी टेर जी
पलभर की ना लाई देर जी
वसन रुप धर करी मेहेर जी
चीर को विस्तारा 5॥

चलकर आए यादुराई
पांचाली की लाज बचाई
महोर सिंह छवि कथ गाई
ले राम नाम आधारा 6॥

दोहा –
दस हजार गजबल घट्यो, घट्यो ना दस गज चीर ।
दुश्मन उसका क्या करै, जिनके रक्षक यदुबीर ॥

------ ॐ श्रीरस्तु ------