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सुशर्मा द्वारा गौ हरण

ख्याल –
कह सुशर्मा दुर्योधन से मेरी अर्ज सुनो महाराज
जिस दिन की मैं बाट जोहूं था वो दिन मोहे मिल्या है आज ।

राजभ्रष्ट किया मच्छ भूप ने शरण आपकी आया भाज
आपके बल से बदला लूँगा बनेंगे एक पंथ दो काज ।

पहले दिवस मैं गऊ हरण करूँ चढ़ूँगा दल चतुरंगी साज
महोर सिंह कह दिवस दूसरे चढ़ आईयो कुरु वंश समाज ॥

दोहा –
रथी अतिरथी महारथी संग लिये रणधीर ।
चतुरंगी दल साज कै चढ़ा सुशर्मा वीर ॥


गऊवों का डाका मारने
चल्या प्रथम सुशर्मा धाड़ी ॥ टेक ।

धाड़ी धाड़ लेकर धाया
मच्छ कै धाड़ा मारन आया
आकर वन कै घेरा लाया
लगे हैं ग्वाल पुकारने
खड़ी दीखी धाड़ अगाड़ी 1॥

ग्वाल फंधों में फांध लिए हैं
रथों कै पीछै बांध लिए हैं
तीर तमंचे साँध लिए हैं
चल पड़े घेर लंगार नै
गऊ वन से बाहर लिकाड़ी 2॥

एक लाख गऊ लिए जाय रहे हैं
धाड़ी मोह में आय रहे हैं
चलते ज़ोर जमाय रहे हैं
लगे धनुष टंकारने
ऊबट चले फसल उजाड़ी 3॥

ग्वाल अधिप नगरी में आया
राजा को सब हाल सुनाया
महोर सिंह भूपति पछताया
उस कीचक बलकार नै
म्हारी कर दई पुरी उघाड़ी 4॥

दोहा –
गोप बंधन गऊ हरण सुन राजा करत विषाद ।
जानै आगै क्या बनै कीचक आया याद ॥

अरिल –
हाय आज कीचक तुझ बिना म्हारे देश में डाका पड़ा
डाकेत डाका दे कै ले गये ग्वालों का गऊ धन हड़ा ।

कीचक तेरी मौजूदगी में यहाँ पक्षी पर नहीं मारता
आज हमरेई डाका पड़ा मेरा मन धीरज नहीं धारता ।

खुले दरवाजीं सोया करते साहबी सारी ले गया
सूना बिहूना देश कर गया हमको भी दुख दे गया ॥

दोहा –
भीमबली कहने लगा मतकर भूप विषाद ।
हम भी सेवक आपके पूरी करैं मुराद ॥


तेरी धैन छुटा ल्यावैंगे राजन मत कर सोच विचार ॥ टेक ।

जबतक है यहाँ रहन हमारी
खुले द्वार सोवो नरनारी
देश रक्षा करैगा भण्डारी
बन कर चौकीदार 1॥

अभी जाय कर धैन छुटाऊं
धाड़ेती को पकड़कर ल्याऊं
ल्याकर तेरा दास बनाऊं
मन में समता धार 2॥

मतना सोच करै मन माहीं
त्रिभुवन में गौ छोड़ूं नाहीं
आप बिराजे रहो यहांई
मन के तजो विकार 3॥

सुनकर खुशी हुया भूपाला
धौंसै चोब पड़ी तत्काला
महोर सिंह पद कथै निराला
लग्या आय दरबार 4॥

दोहा –
धन्य भंडारी आपको धन तेरे माँ बाप ।
धन्य धन्य उस वंश को जिसमें जन्मे आप ॥


पड़ी चोब नंगारै सेना हुई तैयार ॥ टेक ।

एक सहस्र हाथी मतवाले
चढ़े शूरमा ले ले भाले
आठ हजार रथी संग चाले
साठ हजार सवार 1॥

मच्छ भूप है आगाकारी
पीछै पीछै चल्या भंडारी
नकुल सहदेव धर्म अवतारी
चढ़े कुंतीसुत च्यार 2॥

जाकै अरिदल घेर लिया है
तिष्ट तिष्ट कह टेर लिया है
ब्यूह बना मुख फेर लिया है
करी है धनुष टंकार 3॥

दोनू तरफ से मिल गया मोरा
खैंच शरासन बाण टकोरा
महोरसिंह दल फिरे चहूं औरा
बीच में धैन लंगार 4॥

सोहनी –
बोल्या युधिष्ठिर भीम से अमानुष कर्म करना नहीं
शस्त्रों से करना युद्ध भूप त्रिगत को हरना नहीं ।

तेरह दिवस बाकी हैं हो बनवास दुख भरना नहीं
आपा छिपाकर लड़ना बिन लड़े काम भी सरना नहीं ॥

दोहा –
गुप्त मंत्र दे भीम को गये मोर्चे आय ।
श्रीकृष्ण का ध्यान धर लिए शरचाप चढाय ॥


अजी एजी समटे उत कट भट रणचारी
बाजे झुझाऊ बजे जंग खेलन लगे जंग खिलारी ॥ टेक । (सांगीत)

हाथीवान हाथियों से हाथियों को हूल रहे
घोड़ों के सवार सवारों से प्रतिकूल रहे
रथियों से रथी मरना मारना कबूल रहे
पयादों ने पयादों से मोर्चा मिलाया आन
कटा बढ़ी मच गई होने लग्या घमस्यान
गरद के गुब्बारे चढ़े ढ़क लिया आसमान
छाय गई अंधियारी 1॥


सांध्य संगीन बरछे बरछी गुप्ती सेल भाल
बगैं बेसुमार वार नहीं घाव रही घाल
परिघ तोमर गदा बाजैं माच रह्या भोंचाल
करद और कटार छुरे जिगरों को चीर रहे
खांडा रह्या बाज मोर्चों पै धीर वीर रहे
कायरों की भग्गी पड़ी बचावैं शरीर रहे
ज्यान लगै है प्यारी 2॥


अस्त्र शस्त्र बग रहे बरस रही बाणधार
गज बाजी पयादों का होय रहा संघार
इतने में भानू छिपा छाय गया अंधकार
थोड़ी देर बाद हुया चंद्रमा का प्रकाश
फेर जंग मंड गया ल्हासों पै पड़ैं हैं ल्हास
दोनू तरफ जीवने की काहू को रही ना आश
मंडा समर भयकारी 3॥


मोर्चों पै आवैं मर्द मार मारकै चिंघाड़
अस्त्र शस्त्र छाती बहैं खोल देते हैं दराड़
शतघ्नी भुसंडी कड़कैं बम्ब वर्षैं भुनै भाड़
मूर्छागत मच्छ भूप सुशर्मा ने हेर लिया
मूर्छित को उठाय ल्याय रथ माहीं गेर लिया
महोर सिंह कहै रण सेती मुख फेर लिया
कोपे देख भंडारी 4॥


दोहा –
मच्छ कहै बल्लभ बली तै जीत्या संग्राम ।
मैं तेरै अर्पण किया राजपाट धनधाम ॥


लिया पकड़ सुशर्मा सेना भाग चली ॥ टेक ।


चली सेना भाग, रण खेत त्याग, गये रस्तै लाग, पुर को ध्याये
गया विकट टूट, गई धैन छूट, गऊओं की लूट, का फल पाये
गऊओं कै हेत, लाखों बानेत, रह गये खेत, धोखा खाये
खपे गज हजार, ताजी सवार, सिर मार मार, कर पछताये
नहीं हुया धेय, अपयश को लेय, राजा को देय, कर हर्षाये
अनहूणी हूणे की नाहीं हूणी तो नाह्य टली 1॥