दोहा –
उसी भुजा से मारकर, मिट्टी करी बिरून ।
छाती पाड़कर दुष्ट की, भीम पी गया खून ॥
दोहा –
दुस्सासन का खून पी, धर मारी चिंघाड़ ।
रूप भयंकर देखकर, भाग चली दल धाड़ ॥
अर्जुन श्रीकृष्ण मुरारी का
पड़ रहा कर्ण से पाला ॥ टेक । (त्रिभंगी)
बाज रहे रणतूर, जुटे दोनूं रणशूर, बल विद्या में भरपूर, कमती नांई
हृष्ट पुष्ट मजबूत, दिखला रहे करतूत, मानों एक मां के पूत, हों दोनूं भाई
स्वर्णमई रथवान, रत्न जड़ित धनुष बान, चांद सूरज की समान, दें दिखलाई
श्वेत घोड़े ध्वजा श्वेत, दोनूं बीर हैं बानेत, शोभित हो रहा रणखेत, बड़ी छवि छाई
साज साज कै बिमान, देवता भी पहुंचे आन, छाय लिया असमान, दे रहे बधाई
कर्ण रण फतह लेगा, कोई कहै बजा तेगा, पार्थ हाथ नहीं देगा, पखै यदुराई
इंद्र चरण चुचकारै, अर्ज ब्रह्मा से गुजारै, कौन जीतै कौन हारै, रण के माईं
ब्रह्मा वेद को बिचार, बोले कर्ण की है हार, इंद्र मन में धीरज धार
जय का दिन नर अवतारी का
दानी का आज है गाला 1॥
जैसे बरसता हो नीर, ऐसे बरस रहे तीर, दोनूं बीर रणधीर, ना धीर धरैं
शक्ति सांघ शेल भाल, दोनूं तरफ रही चाल, रण में घाव रही घाल, प्राणों को हरैं
रण पाले रहे मंड, जोध्या हो रहे प्रचंड, मारैं परिघ तोमर दंड, संघार करैं
गदा मुगदरों की चोट, शूरवीर ओट ओट, रणखेत में जां लोट, सुध बुध बिसरैं
क्षुप प्रदर रहे छूट, कटैं हाथी घोड़े ऊंट, रथी भागैं रथ टूट, रथवान मरैं
मांच रही घूमाघाणी, बाण बरसैं जैसे पाणी, मारोमार बोलैं बाणी, नहीं मरण से डरैं
ओट चोट अणि धार, कहीं बाजैं तलवार, अंग भंग बलकार, हुये खून झरैं
बीर खेलैं रण फाग, मोर्चे जां भाग भाग, भिड़ैं बाण बरसै आग
छुटा अस्त्र कर्ण बलकारी का
पार्थ दल में जगी ज्वाला 2॥
आग अस्त्र नै लगाई, वरुण अस्त्र नै बुझाई, दिव्य अस्त्रों की लड़ाई, लड़ैं बलकारी
कभी हवा बेसुम्मार, चलै कंकरी उडार, कभी घोर अंधकार, कभी उजियारी
कभी दिन से हो रात, कभी होते उतपात, फिरैं खप्पर लिये हाथ, जोगनी न्यारी
फिरैं कूदते कबंध, हाय होय करैं जिंद, भागे जा रहे गयंद, रण मंड्या भारी
भूतप्रेत और पिशाच, रणखेत में रहे नाच, रणभूमि रही राच, रुधिर से सारी
बहै चली खून धार, बैतरणी के उणिहार, अस्त्र पार्थ पै दातार, छोडै प्राणहारी
भीम अर्जुन गिरधारी, शल्य कर्ण रण खिलारी, डटे पांच बलकारी
जब धनंजय धर्मधारी का
छुटा बाण बना सरजाला 3॥
एक सुखेण नामक नाग, निकट कर्ण कै रह्या लाग, दुख खंडाबन की आग, का था विषियर कै
बाण बनकै वो नागेश, हुया तूणी में प्रवेश, बख्त देखता हमेश, दिव्य रूप धर कै
बीर कर्ण नै वो बान, लेकै अर्जुन का निशान, अपना धनुष खैंच तान, छोड़ा जोर भर कै दिये कृष्ण नै दचोड़े, बैठ गये चारों घोड़े, रथ के पहिये थोड़े थोड़े, जमीं में गरके
नाड़ निशाना गया ऊक, बना क्रीट के दो टूक, पहौंचा मारता हकूक, पास बीरबर कै
बोला कर्ण से कर जोड़, एकबार फिर मोहे छोड़, उस अर्जुन का सिर तोड़, आऊँ प्राण हर कै
कर्ण कर गया इनकार, तेरे बल की ना दरकार, अपने बल से जीत हार, करूं मार मर कै
एकबार शर चढ़ाता, दूजे हाथ नहीं लाता, महोर सिंह गुण गाता
धृतराष्ट्र खंभ दातारी का
संजय कहै गिरने वाला 4॥