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कर्ण पर्व

दोहा –
हूणहार भावी प्रबल, मेट सकै ना कोय ।
दिवस पांचवें गुरु का, स्वर्गवास गया होय ॥


रण का सिर ऊपर भार धरया
द्रोण मरते ही बीर कर्ण नै ॥ टेक । (दुटेका सांगीत)

सेनापति कर्ण भये वीरों कै चढ़ी उमंग
हो गये अभिसप्त बाजे शंख भेरी रण श्रंग
ढोल धोंसे दुंदुभी डिमडिम झर झला मृदंग
धार वाले शस्त्र सब साण धरवाय लिये
हजारों हजार छकड़े गाड़े भरवाय लिये
रण साज ताज तनौं ऊपर करवाय लिये
आवाहन दिव्य अस्त्रों का करया
पार्थ के प्राण हरण नै 1॥

बल विद्या बुद्धि में अर्जुन मेरे समान नहीं
जैसा उसका सारथी वैसा मेरा रथवान नहीं
क्या तो आज मेरे क्या धनंजय के प्राण नहीं
नाम लेत पारथ का देह अकड़ाय गई
धनुष को उठावै धरै भोंह भी बल खाय गई
वीरता भरी है नैनों बीच सुरखी छाय गई
तन में अतुलित क्रोध भरया
जब तोलन लगा धरण नै 2॥

सम्मति मिला कै भूप दुर्योधन से बोला जाय
शल्य अश्व विद्या में उस कृष्ण से कुछ कम नांय
सारथी बनाओ इसको जंग फतह लेंगे पाय
सुनकै वचन दुर्योधन गया शल्य पास
प्राण प्यारे मामाजी निज भानजों की मेटो त्रास
कर्ण के रथवान बनो घोड़ों की पकड़ ल्यो रास
सुन वचन शल्य नृप भी उचरया
आया हूँ तेरै हेत मरण नै 3॥

हमतो सोमवंशी छत्री कर्ण है सुरहैतवाल
कैसे नीचा पद गहै मद्र देशी भूपाल
सारथी बनूं ना निज देश को मैं जांगा चाल
समझ कै अपमान क्रोध भरा शल्य चाल पड़ा
दुर्योधन हाथ जोड़ शल्य आगै हुया खड़ा
महोर सिंह पद गावै भाषा मांह छंद जड़ा
खोटा दाम कर दिया खरया
बहोतों का हरि शरण नै 4॥

दोहा –
त्राहि त्राहि करने लग्या, दुर्योधन कर जोड़ ।
आप बिना अबतो मोहे, कहीं ना दीखै ठोड़ ॥


मामा जी हमको बड़ाये भरोसा तेरा ॥ टेक ।

संचित पाप हमारे जागे
बिन अपराध भानजे त्यागे
हमको अधोधार तज भागे
पीठ दई मुख फेरा 1॥

बणी बणी के सब संगाती
बिगड़ी का कोये बिरला साथी
भीष्म द्रोण समान हिमाती
तुम बिन और ना मेरा 2॥

शोक आराती भय का त्राता
परमप्रिय मित्र वोही कहलाता
वख्त पड़े पै पीठ दिखाता
ऐसा तो मित्र घनेरा 3॥

शिव नै त्रिपुर के प्राण हने थे
ब्रह्मा जी सारथी बने थे
पंडू पांच हम बोहोत घने थे
हो गया खेल बखेरा 4॥

अश्व विद्या में निपुण यदुराई
आप में उनसे है अधिकाई
कर्ण है मेरा धर्म का भाई
बांध लिया रण सेरा 5॥

बख्त पड़ा जब पीठ दिखा रहे
छत्रीकुल कै धब्बा ला रहे
महोर सिंह पद कथ कथ गा रहे
हरि चरणों का चेरा 6॥

दोहा –
जो चाहै सो कहूंगा, क्षमा करै दातार ।
सारथी पद इस शर्त पर, करता हूँ अंगीकार ॥


जो शर्त मेरी मंजूर है
तो बणूं सारथी तेरा ॥ टेक । (दुटेका सांगीत)

शल्य के वचन सुन बोले कर्ण दातार
मद्राधिप शर्त तेरी मैंने करी अंगीकार
पार्थ से है जंग जल्दी रथ को करो तैयार
शल्य कहै सूतज आज अक्ल खोई गई तेरी
दुर्योधन के टुकड़े खाय छाय रही अंधेरी
कहां शस स्याल और कहां बण बब्बर केरी
इतना फरक जरूर है
क्या अबतक तुझे ना बेरा 1॥

अकेले अर्जुन नै जीते स्वयंबर के भूपाल
भीष्म द्रोण कृप से सभ शूरमा गये थे हाल
भीम की गदा नै शत्रु कर दिये थे पैमाल
अकेले अर्जुन नै खंडा बन की बनाई छार
विराट की गऊ छुटाई धक्के थारै दिये मार
छोटे मुख बड़ी बात कर्ण तुझको धिक्कार
लड़ने का ना तुझे सहूर है
घर बैठ मान कहा मेरा 2॥

शल्य के वचन सुन बोल उठे दातार
वचनों में बंधकर होय गया लाचार
बंधन में नहीं आता तो तेरा शीश मैं लेता उतार
अरे पापी शल्य महापापी तेरा मद्र देश
मलेच्छों का देश वो जिस देश का तूं है नरेश
ल्हसण मांस खाते सब मदिरा पींवते हमेश
पापौं से वो भरपूर है
जिस देश का तूं बासेरा 3॥

नग्न होकै नांचते हैं मद्रदेशी नरनार
धर्म कर्म शर्म नहीं बहोत ज्यादा व्यभिचार
पतित देश में तूं जन्मा शल्य तुझको धिक्कार
जैसी तून कहैगा वैसी वैसी ही मैं भी कहूंगा
मारूं ना उतारूं रथ से तेरे वचनों को सहूंगा
कौन कृष्ण अर्जुन जब मैं विजय धनुष को गहूंगा
सभ दल चकनाचूर है
पद महोर सिंह नै टेरा 4॥

दोहा –

कहा सुणी सभ हो लई, कर अब बंध जबान ।
रथ मेरा सजवाय कर , जल्दी ल्या रथवान ॥

रथ साज कर्ण का ले आया रथवान ॥ टेक ।

कर्ण नै रण सिंगार तन साजे
बाजन लगे झुझाऊ बाजे
शंख ध्वनी हुई एकदम गाजे
धरती और असमान 1॥

महादान दे दानी आया
रथ पर चढ़ वीरासन लाया
चौतरफा खड़ा दल लहराया
कर रहे वीर ऐलान 2॥

प्राण लोभी पीछै हट ज्यावो
यश के लोभी आगै आवो
कर द्यो कूंच देर मत लावो
पहौंचो रण मैदान 3॥

आगे से पांडव दल आ रहे
हद पर आन मोर्चा ला रहे
महोर सिंह पद कथ कथ गा रहे
भारत का आख्यान 4॥

दोहा –
मकर व्यूह रच कर्ण नै, दिया मोर्चा लाय ।
अर्धचंद्र व्यूह पार्थ नै, सन्मुख दिया बनाय ॥


सोहनी –

दोनों तरफ सजी धजी सेना खड़ी है चतुरंगिणी
एक तरफ धृष्टद्युम्न दूजी तरफ सूतज दल धणी ।

ओट के और चोट के अणी के और धार के
हाथौं में जोध्या ले रहे हैं शस्त्र चार प्रकार के ।

बाजे झुझाऊ बज रहे हैं शंखों की ध्वनि हो रही
धनुषों की हो टंकोर बैठी मौत बाट संजो रही ।
हाथी मारैं चिंघाड़ धर धर घोड़े भी हिण हिणा रहे
दोनों तरफ से दूत लेले सन्देश आ रहे जा रहे ॥

दोहा –
आगै आगै बढ़ रहे, दलबल ले भूपाल ।
कान पड़ी सुनती नहीं, मांच रहा भूंचाल ॥


हुया युद्ध आरम्भ शूरमा लड़न लगे ॥ टेक । (जकड़ी)

मोहरे मिले वीरता जागी
बाण धार जब बर्षण लागी
खैंचत धनुष प्रत्यंचा भड़कैं
छूटैं बाण बिजली सी कड़कैं
जिमी शलभा के दल चढ़ आये
ऐसे ही बाण गिगन में छाये
भिड़ैं बाण झड़ैं अगन पतंगे
दोनूं दल हो गये बिरंगे
टूटैं रथ घोड़े मर जाते
कट ज्यां धनुष नहीं घबराते
कटैं कवच सारथी मरैं हैं
फिर भी मारोमार करैं हैं
कोई मूर्छित कोई घायल हो गया
कोई बीर प्राणों को खो गया
हो रहा जंग ढंग कतलामी
खपे शूरमा नामी ग्रामी
कट कटकर भुज शीश धरण में पड़न लगे 1॥

एक तरफ गज सेना लड़ रही
महावतों की किलकी पड़ रही
गज चिंघाड़ैं घंटा बाजैं
तुमल शब्द धरा अंबर गाजैं
सूंड उठाय हूल मारैं हैं
दल को गजदल संघारैं हैं
गज बाही जोध्या मतवाले
मारैं गजौं के सिर में भाले
कट कट सुंड पड़ैं सुंडाला
गजौं का उस दिन हुया हिमाला
पड़े पड़े हाथी चिंघाड़ैं
दांतों से गजदंत उखाड़ैं
होदे टूट पड़ै अंबारी
खहाखसी मच रही बड़ी भारी
सुंड में सूंड घाल लेते हैं
पैर में घाल गिरा देते हैं
गजबाही आपस में प्राणों को हड़न लगे 2॥

एक ओड़ लड़ रहे रिसाले
बह रही किरच सेल और भाले
घोर युद्ध घुड़ सवार कर रहे
घोड़े और घुड़बाही मर रहे
कट ज्यां नाड़ घुमेरी खाकै
पड़ैं तुरंग धरणी में आकै
कहीं सवार बिन घोड़े सूने
कहीं घुड़ बिन घुड़बाही बिहूने
खपे सहस्रों घुड़ सवार जी
घोड़ों का नहीं अंत पार जी
छिन्न भिन्न घुड़सेना सारी
हो गई युद्ध हुया बड़ा भारी
एक तरफ लड़ रहे पदाती
कर्ण और अर्जुन के साथी
रण के बाजे बाज रहे हैं
धरती अंबर गाज रहे हैं
शूरवीर आगै बढ़ बढ़कर भिड़न लगे 3॥

तोमर परिघ पट्टिस गदा मुगदर
करने लगे प्रहार धनुर्धर
बगने लगे शेल और भाले
कट कट मरैं तलवारों वाले
शक्ति सांघ दें खोल दराड़ा
पड़ैं धरण में खाय पछाड़ा
मांच रही है घूमा घाणी
लड़ लड़ सेना हुई निताणी
क्षुर प्रभल्ल नाराच चलैं हैं
दोनूं दलौं में घाव घलैं हैं
कट ज्यां शीश कबंध लड़ैं हैं
करकै वार धरणीं में पड़ैं हैं
बहोत से धड़ सिर फिरैं उछलते
पड़ते पड़ते दलदल मलते
दोनौं दलौं में हाहो मच रही
बहै रक्त रणभूमि रच रही महोर सिंह महाभारत के पद जड़न लगे 4॥

दोहा –

कर्ण और धर्मपुत्र का, होय रहा संग्राम ।
भाई के रक्षक खड़े, माद्री के दउ जाम ॥


लिये दबा कर्ण दातार नै
जब धर्मपुत्र घबराये ॥ टेक । (दुटेका सांगीत)

कर दिये क़त्ल घोड़े मार दिया रथवान
रथ दिया तोड़ काटे कवच तूणी धनुषबान
हो गये निहत्थे धर्मपुत्र भूले ओसान
पीछै पीछै हटते जा रहे कर्ण की ना उटै झाल
रथ के सहायक माद्रीसुत भी दोनूं गये हाल
सेना तितर बितर हुई कर्ण नै करा कमाल
लग रहा शस्त्र मारने
भगे जा रहे प्राण बचाये 1॥

कर्ण बोल्या अरे भीरु क्यूं अब भागा जाय रहा
समर में दई पीठ धब्बा नाम कै लगाय रहा
अरे प्राण लोभी दूध माता का लजाय रहा
शल्य बोला बीर कर्ण इनका पीछा छोड़ चल
भीम नै दबाय लिया दुर्योधन की ओड़ चल
मार देगा भीम बहोत जल्दी करकै दोड़ चल
लग रहा गदा प्रहारने
दल बहोत से मार गिराये 2॥

आज तैं प्रतिज्ञा करी अर्जुन के मारने की
केकये सोमक श्रंजय पांचाल संहारने की
लाभ क्या धर्मसुत हते बात है बिचारने की
बिन पार्थ किसी और से तुम मतना लड़ो रणवीर
औरों से लड़ आपका थकित होय ज्या शरीर
पार्थ के फिर आपसे सहे जा नां लख्संधानी तीर
देख भीम बलकार नै
तेरे दल सभ मार भगाये 3॥

आगै आगै बढै भीम व्यूह तोड़ दिया तेरा
जो तूं खैर चाहै रथ मोड़ मान कहा मेरा
हित के बचन सुन रथवान से कर्ण टेरा
जल्दी घोड़े मोड़ अब देर मत लावै शल्य
बड़ी शीघ्रता से उस भीम के तूं पास चल
महोर सिंह गावै भागा जाय रहा कुरुदल
शस्त्रों को लग्या धारने
चल निकट भीम कै आये 4॥

दोहा –
भीमसेन के निकट जा, दिया मोर्चा लाय ।
धनुष टंकारा कर्ण नै, बोल्या बचन सुनाय ॥


घमंडी तेरा देखूंगा आज घमंड ॥ टेक ।

महामूढ़ घना खाने वाला
कर्ण से आज पड़ा है पाला
देख यहीं हो जाय हिमाला
टंकारा कोदंड 1॥

बोल्या भीम मत कहै घनेरी
बोलै है आज कालरी तेरी
बलैं आँख दोनूं रणकेरी
हो गये चंड प्रचंड 2॥
बरषैं बाण जैसे जलधारा
भिड़ भिड़ झड़ झड़ पड़ैं अंगारा
उठी गर्द छा गया अंधियारा
नजर पड़ै ना मार्तण्ड 3॥

अगणित हाथी पदाती घोड़ा
कटा पड़ा अगणित रथ तोड़ा
महोर सिंह कहै कर्ण नै छोड़ा
भार्गव अस्त्र अखंड 4॥

ख्याल –
गुरुपुत्र को परास्त करकै बहोत से संसप्तक संघार,
रथ दोड़ाय भीम पै आये पार्थ और श्रीकृष्ण मुरार ।

अर्जुन बोल्या भीम से भैया देख लिया मैं नजर पसार,
धर्मपुत्र कहीं नजर नै आया क्या कहीं दिया कर्ण नै मार ।

शिविर में जाय खबर तुम ल्यावो आवो शीघ्र मत लाइयो बार,
पार्थ के सुन वचन महाबली भीमसेन कर गया इनकार ।

जो मैं मोर्चा छोड़ द्यूं तो सभ कहैं भीम गया कर्ण से हार ,
तुम जाओ चाहे मत जाओ मैं जाऊं नहीं चहे कहो हजार ॥

दोहा –
अर्जुन कहै गुरुपुत्र से, था मेरा संग्राम ।
संसप्तक जीते बिना, मैं भी हूँ बदनाम ॥


अजी एजी पवनसुत रथ से कूद पड़े
गदा घुमा किलकार मार कुरुदल में जाय बड़े ॥टेक । (सांगीत)

कालरूप धार बलि घोर जंग खेलन लगे
हाथियों पर हाथी ठा उठाय कै बगेलन लगे
सुंड पग मरोड़ तोड़ पीछे को धकेलन लगे
महाबाहू भीम नै गज सेना करी तेरा तीन
मरा अधमरा कोई सुंड पुच्छ पगहीन
दस हजार गज हने रक्त से रांची जमीन
रण इस कदर लड़े 1॥

बज्रबाहू भीम घुड़दल में बड़ा ललकार
घोड़ों का संहार करने लगे गदा मार मार
घूमा घानी मांच रही कटैं मरैं घुड़ सवार
पंच सहस्र घोड़े बलि भीम नै संहार दिये
इतने ही घुड़बाह घाट मौत कै उतार दिये
दो सौ और दो लाख पैदल सेना के भी मार दिये
गदा से प्राण हड़े 2॥

गदा लिये भीम रथसेना सन्मुख जाय रहे
सारथी रथ पीछै पीछै भीम कै लगाय रहे
अस्त्र शस्त्र भरे छकड़े रथ कै पीछै आय रहे
सारथी से भीम बोल्या ऐ विशोक रथवान
कितने अस्त्र शस्त्र और कितनेक हैं धनुषबान
धनुर्धारियों से अब मंडै रण मैदान
सन्मुख अड़े खड़े 3॥

  मार्गण शस्त्र साठ हजार बतला रहा रथवान
दस हजार क्षुरप्रद दस सहस्र भल्ल उनमान
नाराच दो सहस्र प्रदर तीन सहस्र लीजै जान
छकड़े छ: भरे हैं गदा भुजबल तो दो हैं ही पास
रथ पै सवार हो ल्यो दुश्मनों का करो नाश
महोर सिंह गावै महाभारत का इतिहास
भाषा छंद जड़े 4॥

दोहा –
रथारूढ़ हो भीम नै, करी धनुष टंकार ।
धर्मसुत की सुध लेन गये, पार्थ कृष्ण मुरार ॥

अर्जुन श्रीकृष्ण मुरारी का
धर्मसुत नै स्वागत कीन्हा ॥ टेक । (दुटेका)

कर्ण को मार आज तुम आये
मेरे दारुण दुख नसाये
केश गहे दुर्वचन सुनाये
सर्वदुख पंच भरतारी का
पार्थ तैने हड़ लीन्हा 1॥

जाग्रत और स्वप्न के मांईं
कर्ण ही देता खड़ा दिखाई
धड़का रहता मन के मांई
डर लगता बलकारी का
तैं आज निडर कर दीन्हा 2॥

धन्य धनंजय धन्य बलशाली
आज सुहागण हुई पांचाली
धन्य धन्य यादव बनमाली
कर्ण मरे बिन धर्मधारी का
था वृथा जगत में जीना 3॥

आज घाव सब मेरे भर गये
वनोवास के दुख बिसर गये
महोर सिंह सभ काम सुधर गये
अंत हुया धर्महारी का
हुया दुर्योधन बल हीना 4॥

दोहा –
धर्मपुत्र के सुन बचन, पार्थ बोले बैन ।
कर्ण मरा नहीं आपकी, हम आये सुध लैन ॥


सुन वचन बंधु के धर्मसुत क्रोध भरे ॥टेक ।

कर्ण से प्राण बचाकर आया
कुल अपने कै धब्बा लाया
माता का तैं दूध लजाया
पिता बदनाम करे 1॥

पहर नपुंसक तील जनानी
पटक धनुष तज लख्संधानी
मिथ्या हो गई अकाशवानी
कुछ नहीं काम सरे 2॥

जो घड़ूंका अभिमन्यू होता
आज युधिष्ठर सुख से सोता
दुर्योधन दुख भर भर रोता
दोनूं वो वीर मरे 3॥

जो तूं नहीं गर्भ में आता
कष्ट ना सहती कोंता माता
पंचम मास क्षीण हो जाता
बिरथा जनमै धरे 4॥

दोहा –
धर्मपुत्र के सुन बचन, पार्थ बोले बैन ।
कर्ण मरा नहीं आपकी, हम आये सुध लैन ॥


सुन वचन बंधु के धर्मसुत क्रोध भरे ॥टेक ।

कर्ण से प्राण बचाकर आया
कुल अपने कै धब्बा लाया
माता का तैं दूध लजाया
पिता बदनाम करे 1॥

पहर नपुंसक तील जनानी
पटक धनुष तज लख्संधानी
मिथ्या हो गई अकाशवानी
कुछ नहीं काम सरे 2॥

जो घड़ूंका अभिमन्यू होता
आज युधिष्ठर सुख से सोता
दुर्योधन दुख भर भर रोता
दोनूं वो वीर मरे 3॥

जो तूं नहीं गर्भ में आता
कष्ट ना सहती कोंता माता
पंचम मास क्षीण हो जाता
बिरथा जनमै धरे 4॥

मैं घायल होकर रण त्यागा
व्यर्थ निहत्था होकर भागा
भीष्म द्रोण से डर नहीं लागा
कर्ण से आजै डरे 5॥

आप मरा ना कर्ण तैं मारा
जस अपप्रिय प्राण लगा प्यारा
महोर सिंह तेरा हो निस्तारा
भज सियाराम हरे 6॥

दोहा –
व्यंग वचन सुन पार्थ नै, खड़ग लिया है सूंत ।
सावधान हो क्लीव की, देख बंधु करतूत ॥


धर्मनंदन तेरा शीश उतारूंगा ॥ टेक । (जंगम)

मैं भाई भाव से भरा हुया तेरी सुध लेने को आया
बेगुना कटुक कहे व्यंग वचन अपमान करा ताना लाया
कहा धनुष पटक या और को दे धर्मराज आपनै फरमाया
इन ही दोनों बचनों पर मैंने बालापन में पण ठाया
जो धनुष त्याग की कहैगा कोई ल्यूं शीश काट करूं मनचाया
अब तक तो किसी ने कहा नहीं पर आज प्रथम अवसर पाया
मैं अपनी पैज को पूरी करूंगा धर्मपुत्र सुण घबराया
सावधान हो चुप क्यों बैठा वचन ना हारूंगा 1॥


तूं रण से भाग आया माता का दूध लजाय दिया ज्वारी
प्राणों के लोभी छत्रापन कै दाग लगाय दिया ज्वारी
तैं जूवा खेलकर बाजी में सर्वस्व हराय दिया ज्वारी
तैं रजस्वला का परदा फांस सभा में कराय दिया ज्वारी
हम तेरह वर्ष कै देसोटे तैनेइ कढाय दिया ज्वारी
तैं घटोत्कच अभिमन्यू कंवर से लाल खपाय दिया ज्वारी
कई लाखों किरोड़ों घरों का तैनेइ उठाण उठाय दिया ज्वारी
तेरा सिर काटे बिन मैं नहीं क्रोध बिसारूंगा 2॥


लिया खड़ग पकड़ जब बोले कृष्ण पार्थ क्या आज मन में ठानी
बड़ा बंधू पिता गुरु की समान जिसकी तूं करण लग्या कुर्बानी
महाहत्या तब तक धुवै नहीं रहै जब तक धरा पवन पानी
चोरासी लाख भोगैगा नरक ये बेद बचन हैं परमानी
रणखेत बीच तेरा लेले नाम गरजै है खड़ा कर्ण दानी
इस उग्र पाप से धनुष चढै ना चलैंगे तेरे लख्संधानी
इस बालापन की प्रतिज्ञा से सभ तरियों हैं तेरी हानी
पार्थ कहै सिर अपना काट कै धर्म उबारूंगा 3॥


श्रीकृष्ण कहन लगे हे पार्थ किस काज आज तेरी बुद्धि बही
तेरी प्रतिज्ञा पूरी होय चुकी फिर भी तूं कहना मानै नहीं
धर्मसुत का तैं अपमान करा है बड़ौं का तो मारना यही
है कर्ण से रण पार्थ प्रचंड न्यूं धर्मसुत नै बुरी कही
धर्मसुत हितकारक है तेरा कही सुणी माफ़ हों चरण गहीं
तुम जल्दी करो रण मांडो आज हो ज्याय तुम्हारे मन की चही
कहै महोर सिंह बनो लिछमन राम भला नहीं बाली सुग्रीव रहीं
बिगड़े काम को साम दाम से मैंई तो सुधारूंगा 4॥

सोहनी –
धर्मपुत्र उठकर चल पड़ा कहै देसोटे में जाऊंगा ,
अनसन व्रत कर प्राण तजूं आकर ना मूंह दिखलाऊंगा ।

मैं जा हिमालय में गलूं या अग्नि में जल जाऊंगा ,
भाइयों को मैंने दुख दिया किये कर्म का फल पाऊंगा ।

पार्थ आ मिल ले बंधू से फिर उल्टा मैं नहीं आऊंगा ,
महोर सिंह कहै बनोवास में गोबिंद के गुण गाऊंगा ॥


दोहा –
धर्मपुत्र के सुन बचन, पार्थ रिस को त्याग ।
चरण पकड़ लिये बंधू के, बढ़े प्रेम अनुराग ॥


श्रीकृष्ण कृपा से रोष रंज हुये दूर ॥ टेक ।

पार्थ गुना माफ़ करवा रहे
धर्मपुत्र छाती कै ला रहे
श्रीकृष्ण धन्यवाद सुना रहे
उर आनंद भरपूर 1॥

हुकम करो मैं जाऊं जंग में
लडूंगा जाय कर्ण के संग में
वीरता के मेरे अंग अंग में
उठ रहे आज हिलूर 2॥

चिमकै आग मेरे तीरों में
पड़ै खलभली रणधीरों में
मैं और कर्ण दोनों वीरों में
मरैगा एकै जरूर 3॥

जो मैं जय पराजय बिन आऊँ
फिर नहीं कर से धनुष उठाऊं
महोर सिंह कहै हरिगुण गाऊं,
बजा खटताल तंबूर 4॥

दोहा –
कृष्नार्जुन जै बोलकर, रथ पर हुये सवार ।
शंख ध्वनि होने लगी, करी धनुष टंकार ॥


यदुवर नै तुरंग टकोरे झननन उठी रथ की झनकार ॥ टेक ।

रण धुन सुन घोड़े हिण हिणा रहे
पुच्छ उठाय भागे जा रहे
घायल हुये दलबल भगे आ रहे
हाथीं ना हथियार 1॥

भीम कहै अय विशोक सारथी
आये ना पार्थ रण पुरषार्थी
यदुपति पंडवों के हितार्थी
आये ना कृष्ण मुरार 2॥

इतने में शंख ध्वनी सुन पाई
ध्वजा बानरी देत दिखाई
पार्थ का रथ पहौंचा आई
शस्त्रास्त्रों के भार 3॥

कृष्नार्जुन कुरुदल में बड़ गये
सबके होश हवास बिगड़ गये
महोर सिंह भाषा पद जड़ गये
राम नाम आधार 4॥

ख्याल –
कृष्नार्जुन कुरुदल में बड़ गये बड़ते ही मांच गया भूंचाल
चतुरंगी दल भाग चले जिमी शेर कै आगै भागै स्याल ।

धनुष पै धर धर छोडन लाग्या शक्ति सांघ सेल और भाल
कट करकर गज बाजी पड़न लगे पार्थ नै कर दिया कमाल ।

प्रदर मार्गण नाराच शस्तर दल में घाव रहे हैं घाल
लाखों लाख पदाती कट गये बहोत से मारे गये भुपाल ।

आगै खड़े दुस्सासन शकुनि दुर्योधन कृतवर्म भुवाल
महोर सिंह कहै युद्ध करण लगे कहां शेर और कहां श्रगाल ॥

दोहा –
अश्वथामा पहौंच गये, कृपाचार्य गये आय ।
छहों नै मिल पार्थ से, दिया मोर्चा लाय ॥


रथ चल्या कर्ण के सामने
छहों को परास्त करकै ॥ टेक । (सांगीत)

छहों के कवच काटे काट दिये धनुषबान
रथ तोड़े घोड़े मारे मार दिये रथवान
सेना छिन्न भिन्न हुई घाल दिया घमस्यान
आगै रथ बढ़ा मिले दुर्योधन के दस भाई
दसों मार दिये सारी सेना घायल कर भगाई
आगै नब्बै संसप्तक खड़े बीर बलदाई
छोड़े शस्त्र तमाम नै, धनुषों ऊपर धर धरकै 1॥

अर्धचन्द्र शस्त्र छोड़ पार्थ नै सभ मार दिये
वाहनों सहित घाट मौत कै उतार दिये
अनुयायी सहाई घेर घेर कै संघार दिये
आगै मलेच्छ तेरह सो गज वाहनों को साज रहे
विकट भयंकर हाथियों पर चढ़े गाज रहे
संग में झुझाऊ जिनके रण बाजे बाज रहे
पार्थ और घनश्याम नै
करी शंख ध्वनी रिस भरकै 2॥

प्राणहारी शस्त्र छोड़े मांच रह्या धर्राट
धराशायी कर दिये पार्थ नै मलेच्छ काट
हाथी घोड़े भागे फिरैं सेना करी बाराबाट
कांबोज कलिंग सौराष्ट्र मगध आदि भूपाल
कह रहे पार्थ का धार आया रूप काल
सबको आज निश्चय भखै नहीं यो करैगा टाल
भागो तज संग्राम नै, इस महाकाल से डरकै 3॥

आगै रथ बढ़ाया आया बलि भीमसेन पास
बंधू की कुशल का सुनाया सभ इतिहास
मग्न हो कहै भीम अब मैं दुश्मनों का करूं नाश
  चाव भरा रथ से कूदा भाव भर गदा घुमाई
मोर्चा तुम ओटो बीर रथ का मैं रहूं सहाई
महोर सिंह गावै गर्जन लाग्या भीम बलदाई
इस अधीरथ के जाम नै
आज हटैंगे मार या मरकै 4॥

ख्याल –
पार्थ रथ के बने सहायक श्रंजय सोमक और पांचाल ,
धृष्टद्युम्न सात्यिकी शिखंडी और पांचों द्रोपदी के लाल ।

उत्मौजा और युधामन्यू दोनों रथचक्रों के हैं रखवाल ,
बज्र कवच रहा पहर भीम सहचारी सारथी श्री गोपाल ।

उधर कर्ण रथ के रक्षक भये अश्वथामा बीर बिशाल ,
कृपाचार्य दुस्सासन शकुनि दुर्योधन कृतवर्म भुवाल ।

कर्ण के रथ का शल्य सारथी दोनों दलों की लागैं झाल ,
पाला बंदी होय रही कहै महोर सिंह भावी का ख्याल ॥

दोहा –
रण के बाजे बज रहे, धनुषों की टंकोर ।
शंख धुनी गर्जैं सुभट, तुमल शब्द घनघोर ॥

अबसो कर्ण अर्जुन के लागे बाण चलन ॥

दुस्सासन की गज धाड़
कड़ी मार रही चिंघाड़
भीम शेर ज्यूं दहाड़ लग्या दलन मलन
भीम हथियौं को मार
आगै बढ़ा बलकार
दुस्सासन को निहार लगी आंख बलन 1॥

दुस्सासन बलदाई
मांडी भीम से लड़ाई
झड़ी शस्त्रों की लगाई लगे घाव घलन
परिघ तोमर शेल भाल
दोनूं तरफ रहे चाल
कट कट कै भुवाल लगे रेत में रलन 2॥

दुस्सासन नै बानेत
भीम कर दिया अचेत
रथी त्याग रणखेत लग्या रण से टलन
इतने में भीम जाग
उठा मूर्छा को त्याग
तन में भड़क उठी आग लग्या जिगर जलन 3॥

दल कटे दोनूं ओड़
ल्हास पड़ी ठोड़ ठोड़
भीम कूदा रथ छोड़ लगी धरा हलन
दुस्सासन नै शक्ति बहाई
गदा भीम नै घुमाई
महोर सिंह लीला गई लगे कर्म फलन 4॥

ख्याल –
दुस्सासन नै भीम के ऊपर शक्ति एक चलाई जी
वीर घातनी खंखाती हुई पवनसुत के ऊपर आई जी ।

महाबली नै बज्र गदा से चकनाचूर बनाई जी
शक्ति खाख में मिला बज्रबाहू नै गदा घुमाई जी ।

सावधान दुस्सासन हो यूं कहकर गदा बगाई जी
रथ गया टूट बीर दुस्सासन पड़ा धरण के माईं जी ।

भाग कै भीम चढ़ा छाती पै भाग गये अनुयाई जी
शकुनी आदि खड़े सभ देखैं महोर सिंह छवि गाई जी ॥

दोहा –
जो हितकारक हो कोई, उसको बेग बुलाय ।
मारूंगा छोडूं नहीं, आज बख्त गया पाय ॥

दुस्सासन तेरे कित गये आज ढलेत ॥ टेक ।

कहां आज भीष्म बलदाई
कहां द्रोण तेरे सौ भाई
कहां शकुनी जन कुबध सिखाई
कहां वो कर्ण बानेत 1॥

अनुयाई सभ छोड़ अलग गये
सहचारी भी छोड़ कै भग गये
पापी आज तेरे आ लग गये
राहू शनिश्चर केत 2॥

अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूंगा
देसोटे के घाव भरूंगा
अब मैं तेरे प्राण हरूंगा
हो गई बहोत पछेत 3॥

जोन भुजा से पकड़ी साड़ी
तोड़ मरोड़ भुजा वाह पाड़ी
महोर सिंह सुख मिलै अगाड़ी
हरि से लगा ले हेत 4॥

दोहा –
उसी भुजा से मारकर, मिट्टी करी बिरून ।
छाती पाड़कर दुष्ट की, भीम पी गया खून ॥

दोहा –
दुस्सासन का खून पी, धर मारी चिंघाड़ ।
रूप भयंकर देखकर, भाग चली दल धाड़ ॥

अर्जुन श्रीकृष्ण मुरारी का
पड़ रहा कर्ण से पाला ॥ टेक । (त्रिभंगी)


बाज रहे रणतूर, जुटे दोनूं रणशूर, बल विद्या में भरपूर, कमती नांई
हृष्ट पुष्ट मजबूत, दिखला रहे करतूत, मानों एक मां के पूत, हों दोनूं भाई
स्वर्णमई रथवान, रत्न जड़ित धनुष बान, चांद सूरज की समान, दें दिखलाई
श्वेत घोड़े ध्वजा श्वेत, दोनूं बीर हैं बानेत, शोभित हो रहा रणखेत, बड़ी छवि छाई
साज साज कै बिमान, देवता भी पहुंचे आन, छाय लिया असमान, दे रहे बधाई
कर्ण रण फतह लेगा, कोई कहै बजा तेगा, पार्थ हाथ नहीं देगा, पखै यदुराई
इंद्र चरण चुचकारै, अर्ज ब्रह्मा से गुजारै, कौन जीतै कौन हारै, रण के माईं
ब्रह्मा वेद को बिचार, बोले कर्ण की है हार, इंद्र मन में धीरज धार
जय का दिन नर अवतारी का
दानी का आज है गाला 1॥


जैसे बरसता हो नीर, ऐसे बरस रहे तीर, दोनूं बीर रणधीर, ना धीर धरैं
शक्ति सांघ शेल भाल, दोनूं तरफ रही चाल, रण में घाव रही घाल, प्राणों को हरैं
रण पाले रहे मंड, जोध्या हो रहे प्रचंड, मारैं परिघ तोमर दंड, संघार करैं
गदा मुगदरों की चोट, शूरवीर ओट ओट, रणखेत में जां लोट, सुध बुध बिसरैं
क्षुप प्रदर रहे छूट, कटैं हाथी घोड़े ऊंट, रथी भागैं रथ टूट, रथवान मरैं
मांच रही घूमाघाणी, बाण बरसैं जैसे पाणी, मारोमार बोलैं बाणी, नहीं मरण से डरैं
ओट चोट अणि धार, कहीं बाजैं तलवार, अंग भंग बलकार, हुये खून झरैं
बीर खेलैं रण फाग, मोर्चे जां भाग भाग, भिड़ैं बाण बरसै आग
छुटा अस्त्र कर्ण बलकारी का
पार्थ दल में जगी ज्वाला 2॥


आग अस्त्र नै लगाई, वरुण अस्त्र नै बुझाई, दिव्य अस्त्रों की लड़ाई, लड़ैं बलकारी
कभी हवा बेसुम्मार, चलै कंकरी उडार, कभी घोर अंधकार, कभी उजियारी
कभी दिन से हो रात, कभी होते उतपात, फिरैं खप्पर लिये हाथ, जोगनी न्यारी
फिरैं कूदते कबंध, हाय होय करैं जिंद, भागे जा रहे गयंद, रण मंड्या भारी
भूतप्रेत और पिशाच, रणखेत में रहे नाच, रणभूमि रही राच, रुधिर से सारी
बहै चली खून धार, बैतरणी के उणिहार, अस्त्र पार्थ पै दातार, छोडै प्राणहारी
भीम अर्जुन गिरधारी, शल्य कर्ण रण खिलारी, डटे पांच बलकारी
जब धनंजय धर्मधारी का
छुटा बाण बना सरजाला 3॥


एक सुखेण नामक नाग, निकट कर्ण कै रह्या लाग, दुख खंडाबन की आग, का था विषियर कै
बाण बनकै वो नागेश, हुया तूणी में प्रवेश, बख्त देखता हमेश, दिव्य रूप धर कै
बीर कर्ण नै वो बान, लेकै अर्जुन का निशान, अपना धनुष खैंच तान, छोड़ा जोर भर कै दिये कृष्ण नै दचोड़े, बैठ गये चारों घोड़े, रथ के पहिये थोड़े थोड़े, जमीं में गरके
नाड़ निशाना गया ऊक, बना क्रीट के दो टूक, पहौंचा मारता हकूक, पास बीरबर कै
बोला कर्ण से कर जोड़, एकबार फिर मोहे छोड़, उस अर्जुन का सिर तोड़, आऊँ प्राण हर कै
कर्ण कर गया इनकार, तेरे बल की ना दरकार, अपने बल से जीत हार, करूं मार मर कै
एकबार शर चढ़ाता, दूजे हाथ नहीं लाता, महोर सिंह गुण गाता
धृतराष्ट्र खंभ दातारी का
संजय कहै गिरने वाला 4॥


शेर –
ब्रह्मादि देव विमानों में चढ़े रण देखन को आ रहे
बाजैं हैं दुंदुभी गिगन में सुगंधित सुमन बर्षा रहे ।

अप्सरा नृतत यानों में मधुर धुनी से गंधर्ब गा रहे
कोई कर्ण की कोई पार्थ की जय बोलैं ख़ुशी मना रहे ॥


दोहा –
खून में लथपथ हो रहे, रथ घोड़े रथवान ।
कटे कवच अर्जुन कर्ण, हो रहे लहू लुहान ॥

रण कर्ण अर्जुन का धर्मसुत देखन आये ॥ टेक ।

भार्गव अस्त्र कर्ण के चालैं
छूटत धरती अंबर हालै
कट कट पड़ैं घाव वही घालैं
परशुराम से पाये 1॥

दिव्यास्त्रों से अर्जुन काटै
कट कट अस्त्र पड़ैं धरा पाटै
पुत्र जयार्थी रवि रथ डाटै
देव दनुज घबराये 2॥

दूर दूर दल दोनों खड़े हैं
होश हवास सभके बिगड़े हैं
धर्मसुत उल्टे चाल पड़े हैं
समर देख दहलाये 3॥

काल कर्ण के कान में कह गया
तेरा बख्त थोड़ा सा रह गया
बचन श्रवण कर दानी दह गया
महोर सिंह जस गाये 4॥

दोहा –
जात छिपा विद्या पढ़ी, परशुराम का श्राप ।
धोखे में गऊ वध हुया, उदय हो गया पाप ॥


रथचक्र गरक गया कर्ण हुया लाचार ॥ टेक । (जंगम)

बलि खून में लथपथ होय रहा कर्ण दानी वो रथ से कूद पड़ा
कालरी भूमि पत्थर समान किस बिध इसमें रथचक्र गड़ा
अघटित घटना को देख बीरबर सोचै विचारै खड़ा खड़ा
जद पकड़ चक्र खैंचन लाग्या गर्त से बाहर नहीं लिकड़ा
पच हार लिया सिर मार लिया भावी नै सकल मदमान हड़ा
हूणी है अटल है कर्म प्रबल कोई करतब आगै आय अड़ा
कर्ण पै न्यौछावर बाणों की कर रहा इंद्र कुमार 1॥

जब तीन बार महाबली कर्ण नै करतूत अपनी दिखलाई
रथतल भूमि भूमि से टूट रथचक्र कै चिपटी ही आई
कर सोच विचार बख्त को देख पार्थ से बोल्या बलदाई
मैं युद्ध धरण से कर रहा हूं रथहीन खड़ा मैदान माईं
मैं तुझपर नहीं प्रहार करूं तूं मुझपर कर रहा अन्याई
ये है छत्रिन का ना धर्म अधर्मी धर्मनीत तैं बिसराई
धनंजय धर्महारी हो गया जनम जीवन धरकार 2॥

जब सुने कर्ण के बचन कृष्ण कहै आज धर्म लाग्या प्यारा
कर याद भीम को देकर जहर जहरीले सर्पों में डारा
तमी लाखा भवन कै लाई आग चौसर बाजी में धर्म हारा
द्रोपदी को सभा में ल्याये पकड़ उस दिन कहां गया धर्म थारा
भाइयों का हक़ लिया दबाय छहों नै मिल अभिमन्यू मारा
इतनी जगह धर्म नहीं दीख्या अधर्मी आज धर्म तैने धारा
श्रीकृष्ण के बचन श्रवण कर कोप गया दातार 3॥

रथचक्र छोड़ महाबली कर्ण नै विजय धनुष उठाया जी
शस्त्रों की झड़ी लगाय रहा अगणित अस्त्र बर्षाया जी
महाघोर अंधेरा छाय गया धरती अंबर थर्राया जी
सौ बार पार्थ के धनुष का रोंदा कर्ण नै काट गिराया जी
अर्जुन भी नये नये चढ़ाता रहा कुछ देर मूर्छा खाया जी
श्रीकृष्ण नै बीर सुचेत करा कै दसों नाम सुनाया जी
महोर सिंह नित उठ गुण गावै राम नाम आधार 4॥

दोहा –
शस्त्र धनंजय के बगैं, लख्संधानी तीर ।
बीर कर्ण मूर्छित भया, हो गया शिथल शरीर ॥


खड़ा हुया घुमेरी खा रहा
मूर्छा खुली बीर करण की ॥ टेक । (दुटेका सांगीत)

कट गया कवच तूण हाथ में ना धनुषबान
होश ना हवास रहा हो रहा लहू लुहान
दे रहा दिखाई काल भूल रहा ओसान
हालत देख कर्ण की अर्जुन भी ना करै प्रहार
बोल उठे कृष्ण पार्थ क्या तूं कर रहा विचार
इसी नै मरवाया मूर्छित अभिमन्यू कंवार
अवसर बीता जा रहा
करी प्रतिज्ञा प्राण हरण की 1॥

कृष्ण के बचन मान आंजलिक अस्त्र लिया
मंत्र बोल बोल कै वो अस्त्र अभिमंत्रित किया
शुभ कर्म करे धनुष ऊपर धर छोड़ दिया
धनुष सेती अस्त्र छूटा मांच गया धर्राट
जाय कै उस अस्त्र नै कर्ण का सिर दिया काट
समर में अंधेरा छाया नभ में मच्या करलाट
पांडव ख़ुशी मना रहा
हंस-हंस दानवीर मरण की 2॥

कर्ण मरते ही कुरुदल में पड़ी भागा दौड़
उसी वक्त धरणी नै भी रथचक्र दिया छोड़
हा-हाकार मची मारा गया दल का सिरमोड़
कर्ण के जीवात्मा जा सूरज में गये समाय
हो गये नगारे मोधे कुरुदल भागा जाय
पांडवों के दल में शंखों की धुनी रही छाय
दुर्योधन घबरा रहा, धुन सुन रहा कांप थरण की 3॥

पांडवों के दल में विजय के बाजे बाज रहे
जयति जय ध्वनि सेती धरती अंबर गाज रहे
ध्वजा पताकाओं से रथवान रथ साज रहे
कर्ण का मरण सुन धर्मपुत्र हर्षाये
देसोटे के घाव भरे तन मन लहराये
शिवरों में बधाई बाजैं महोर सिंह जस गाये
गुरु के भी गुण गा रहा, शिक्षा दई छंद भरण की 4॥

-------- इति श्री -------