Loading...

गदा पर्व

दोहा:-
अर्धदिवस लड़ शल्य का, प्राण त्याग गया होय ।
सेना सारी भग चली, रक्षक रह्या ना कोय ॥


शल्य मरते ही छक्के छूट गए
दुर्योधन अभिमानी के ॥ टेक । (सांगीत)

भीष्म द्रोण कर्ण से महारथी सब मारे गये
ग्यारह खोहण दल घाट मौत कै उतारे गये
हाथी घोड़े रथ रणभूमि में पसारे गये
ग्यारह क्षोहणी का नायक खड़ा है भयभीत हुया
राजपाट धन धान्य शुन्य सम प्रतीत हुया
घाव रहे भड़क अब काल विपरीत हुया
जगत के नाते टूट गये, भर रहे नैन पानी के 1॥

राजाओं के शिविरों में माच रही हाय होय
दुर्योधन विदुर वचन याद कर रह्या रोय
मामा तेरी सीख नै मैं दुनिया सैं दिया खोय
हो रह्या बेहोश रोष भर उठ भाग चला
करतबों को यादकर रणभूमि त्याग चला
संगी ना साथी कोय होयकै बेलाग चला
भाग पिता के फूट गये, दुरदिन आये रानी के 2॥

जल थम्बण मंत्र जप सरोवर में छुपा जाय
पीछे सैं कृतवर्मा अश्वथामा पहुँचे आय
पंडवों से लड़ैंगे दुर्योधन मत घबराय
दुर्योधन बोला वीरो आज मैं लड़ूंगा नहीं
थक रह्या शरीर मेरा करूंगा विश्राम यहीं
कल मैं लड़ूँगा भाग जाओ ल्हुक जाओ कहीं
आरत बैन सुन ऊठ गये, सर्वसुख तज रजधानी के 3॥

पांचों पंडु कृष्ण फिरैं ढूंढते रणभूमि मांय
दुर्योधन कहाँ गया पता कुछ चलै नांय
इतने में सामने सैं एक ब्याध गया आय
भीम का था प्रेमी सिर झुकाय बैठ गया पास
देख्या सुना जितना सुनाया सब इतिहास
महोर सिंह डरकै रहना जगत है कालग्रास
कालबली सिर कूट गये, ज्ञानी क्या विज्ञानी के 4॥

दोहा:-
सरतट पर खड़ा होय कै, धर्मसुत दई आवाज़ ।
जल में आकर ल्हुक गया, दुर्योधन निर्लाज ॥


प्राणों के लोभी शर्म तुझे नहीं आई ॥ टेक ।

रण में सब परपूत खपाकर
भाग चल्या तूं पीठ दिखाकर
नींद नचीती सो गया आकर
हुई नही खत्म लड़ाई 1॥

ग्यारह खोहण दल का नायक
धब्बा लगा दिया नालायक
जो विधि विष्णु शिव हों सहायक
बचै नहीं जान बचाई 2॥

जो तू शरण कृष्ण की आता
अभिमानी जरूर बच जाता
कुल कुठार फिरै धक्के खाता
करकै कुल की सफाई 3॥

जल बाहर आ बंधु बडेरा
सुख निद्रा सो लिया भतेरा
घाव आज सब भर ज्यां मेरा
दे एक बार दिखाई 4॥

कुटिल क्रूर पानी में सोकर
जिंदा ही मर गया नाक डबोकर
कृष्ण के पैर पकड़ ले रोकर
जो चाहै बीर भलाई 5॥

जल बाहर आ युद्ध करैंगे
मारैंगे या आप मरैंगे
महोर सिंह सब काम सरैंगे
कृष्ण की ले शरणाई 6॥

अभिमानी जल में बोल रह्या
सुन सुन धर्मसुत की बानी ॥ टेक । (सांगीत)

थक रह्या शरीर मेरा आज लड़ना चाहता नहीं
घाव रहे भड़क शस्त्र भी उठाया जाता नहीं
लड़ना है वृथा तुझसे मैं घबराता नहीं
जिनके लिये लड़ रह्या था खप गये वो मेरे भाई
मन मेरा बुझ गया हुई नहीं मन चाई
पृथ्वी शोभाहीन हुई विधवा स्त्री की नाईं
घाव जिगर को छोल रह्या, बैठा कर कुणबा घानी 1॥

आज लड़न का मेरै पास ना कोई सामान
हाथी ना पदाती साथी ना ही कोई रथवान
साज तन साज नहीं तूण तरकस धनुष बाण
पांचों को परास्त करूँ करकै घोर संग्राम
राज भी मैं ले सकूँ पर मेरै वो किस काम
मृगछाल ओढ मैं तो वन में करूँ विश्राम
जग हारे मन डोल रह्या, तर तोला समर प्राणी 2॥

मेरे हेत भीष्म द्रोण कर्ण सब मर गये
दल बल धन सब अर्पण मुझको कर गये
जिन बिन मेरे हाव भाव सब बिसर गये
थारी तो औकात क्या मैं इन्द्र से भी डरूँ नाहीं
सात्यकी प्रद्युम्न धृष्टद्युम्न से भी मरूँ नाहीं
मैं हूँ एक तुम हो घने यूं मैं युद्ध करूँ नाहीं
जाओ सभ थारा भुगोल रह्या, दे चुका राज रजधानी 3॥

तुम घने मैं एक, एक-एक लड़ो मेरै साथ
न्याय का रण कर देख लियो मेरे हाथ
धर्म नहीं एक पै जो सब मिल करैं घात
पांचों तुम खड़े हो तुम में जो भी है बलवान
देर मत लाओ आओ मांडो रण मैदान
महोर सिंह तजै नहीं दुर्योधन अभिमान
यूं ही धरती को तोल रह्या, मरने की मन में ठानी 4॥

दोहा-
धर्मपुत्र कहने लगे, धन्य सुयोधन बीर ।
न्याय आज दीखन लग्या, हुया धर्म में सीर ॥

बण आये जितने बुरे से बुरे करे काम ॥ टेक ।

विष लड्डुओं से भीम जिमाये
फिर हम लाखा भवन बसाये
अग्न लगा फूकने ठहराये
अंध के जाम कुजाम 1॥

जूवा खेल लगा कै बाजी
पासे पटके हो हो राजी
करकै दगा छीन लिये पाजी
राज पाट धन धाम 2॥

रजस्वला नारी महापापी
सभा में नंगी करणी थापी
अनरथ देख सभा नहीं कांपी
बणे सभ तेरे गुलाम 3॥

तेरह बर्ष का दिया देसोटा
वो भी पूरा किया बणसोटा
मांगा दान दीन्हा ना ओटा
पांच मांग लिये गाम 4॥

न्यायकारी है बंश तुम्हारा
अभिमन्यु मिल छैहीं मारा
च्यारों तरफ जाहां खड़े अठारा
घाती भूप तमाम 5॥

तुमने राज लिया था छल से
हम लेंगे अपने भुजबल से
कुल खपाय खारीज अकल से
अब लग्या देन इनाम 6॥

जल्दी जल से बाहर लिकड़ ले
कवच पहन ले धनुष पकड़ ले
मन चाहै उस ही से लड़ ले
करना पड़ैगा संग्राम 7॥

जल्दी आ मत देरी कर तूं
देख रहा क्या उधर इधर तूं
महोर सिंह हरिनाम सुमर तूं
सुध लेंगे घनश्याम 8॥

सोहनी-
वचन सुने जब धर्मपुत्र के आँखों में सुरखी छा गई,
माथों में त्रिवली पड़ गई संग भोंह भी बल खा गई ।

चढ़ी बीरता उस बीर कै जल चीर कै ललकारता,
मैदान में अकड़ा खड़ा नहीं मन में समता धारता ।

कवच पहर कै आऊं अब देरी का नहीं काम है,
पांचों में जो है शूरमा उस से मेरा संग्राम है ।

इतने वचन कह चल पड़ा शिविर में पहूंचा जाय कै,
माता कै आगै बैठ गया पिछला वृदंत सुनाय कै ॥

दोहा-
माता कहै मेरे सामने, हो ज्या अंग निहंग ।
दृष्टिपात कर तेरा, बज्र बना दूं अंग ॥


(भजन पारवा)
पुत्र की औड़ निहारै है
पट्टी खोल मात गंधारी ॥ टेक ।

शर्म का मारया हुया ना नंगा
ढकी रखी आधी कटि जंघा
भावी बस हुया काम दुरंगा
पुत्र से बचन उचारै है
सुत भूल करी बड़ी भारी 1॥

पट्टी खोल दृष्टि जब गेरी
वज्र अंग हो गया रणकेरी
कटि जंघा कच्ची रही तेरी
दुखभरी श्वासा मारै है
सौ पुत्रों की दुखियारी 2॥

बज़्र बनी काया गदाधारी
निर्भय खेल अब जंग खिलारी
जांघों की रखिये निगाहदारी
पुत्र का सिर पुचकारै है
बड़े हित चित से महतारी 3॥

मात अपनी को शीश नवाकै
चला पिता से आज्ञा पाकै
महोर सिंह कहते पद गाकै
प्रभु से अर्ज गुजारै है
मैं लई है शरण तिहारी 4॥

दोहा-
भीम खड़ा मैदान में, रह्या टकटकी लाय ।
दुर्योधन कहै ब्रजराज से, सज धज पहुंचा आय ॥

(आल्हा)
उत कट भट दोनों डटे हैं जंग खिलारी ॥ टेक ।

बज्र गदा ले रहे हाथों में अकड़े खड़े नहीं मुड़ै नाड़
बलैं आँख आपस में जिनकी भरी वीरता पीसैं जाड़
काल कराल रूप हुये जिनके धर धर कै मारैं चिंघाड़
गदा उठाकै भीम कहन लग्या सावधान हो सिंह पछाड़
जूवे का यो खेल नहीं धक्के दे घर से दिये लिकाड़
मच्छ भूप की गऊ नहीं यहाँ धाड़ा मार ले चढ़े धाड़
सभा बीच सताई द्रोपदी जिगर में खुल रह्या दराड़
अरे अधर्मी महापापी काल तेरा रह्या है दहाड़
इतने वचन कह भीमबली ने बज्रगदा चुचकारी 1॥

भीमसेन की सुनकै वाणी अभिमानी चाबन लाग्या दाँत
काल मौत से डरूँ नहीं मूर्ख तेरी क्या है औकात
भीष्म द्रोण कर्ण मैं नहीं हूँ नाम सुयोधन जग विख्यात
भीम से कब हो गदा युद्ध बाट देख रह्या था दिन रात
मुश्किल से दिन नसीब हुया हो सावधान देख मेरे हाथ
गदा घुमाय जबान बंद कर कह लई सुन लई सारी बात
अवसर पाय दोनों वीरों ने चुचकारी गदा एक ही साथ
हुया युद्ध आरंभ परस्पर होय रहे गदा आघात
गदा युद्ध देखन को आये दाऊ और गिरधारी 2॥

छाती भिड़ै भरैं ज़ोर कूद कूदकर करैं प्रहार
भिडैं गदा बिजली सी कड़कैं होने लगा शब्द भयकार
टूट टूट पड़ैं अग्न पतंगे उठैं भभूके बेसुम्मार
धरण धमाका खाय रही है हट हट करैं वार पै वार
फूट फूटकर अंग झरोखे बह बह चली खून की धार
चढैं सांस बाजैं नास बल पराक्रम में दोनों इकसार
कभी उल्टे हट ज्यां चढैं मोर्चे दूर हटैं कभी जावैं हार
जंग खिलारी महा-बलकारी करैं गर्जना बारंबार
गदा उठाय गुरु का स्वागत करने लगा रणधारी 3॥

खून में लथपथ होय रहे थे जर्जर जिनके हुये शरीर
तरह तरह की चाल चलैं हैं भृकुटी बदल रहे रणधीर
अर्जुन जंघा कूट रहा गए भीमसेन भी समझ लकीर
गदा घुमाकै कूदन लाग्या गरजा शब्द हुया गंभीर
दुर्योधन ऊपर को उछला भरकर ज़ोर भीम रणबीर
जंघ स्थल पर मारी गदा, गदा गई जंघों को चीर
पैर अलग धड़ अलग पड़ा दुनिया से भूप का टूटा सीर
महोर सिंह दल सारा खप गया दुर्योधन तो खपा अखीर
कोटि बिधि चहे लाख जतन करो भावी टरै ना टारी 4॥

दोहा-
जंघा कटते शूरमा, पड़ा धरण के मांय ।
विकल हुया दृग मिंच गये, मुख से निकसै हाय ॥


(सांगीत)
अजी एजी पवनसुत मारै है किलकारी
दुर्योधन की गदा खोस लई सिर में ठोकर मारी ॥ टेक ।

कहां तेरा मामा शुगनी कहां भीष्म द्रोण कर्ण
जिनके घमंड से घमंडी तैने मांड्या रण
कहां तेरे सौ भाई जो नित तोलते धरण
कहां तेरे गज बाजी ग्यारा क्षोहणी दल
कहां तेरा आज गया दस हजार गज बल
कुणबा घाणी कर लई अपनी आप महाखल
जूवा खेल खिलारी 1॥

धर्मपुत्र कहने लगे शांत होवो भीमसैन
पैज हुई पूरी तेरी भाषो मत कुफर बैन
नाम लेवा पानी देवा इसकै कोई रह्या हैन
हो रह्या बेहोश प्राण छाती में धड़क रहे
अंग भंग होय रहे घाव भी भड़क रहे
मुर्दे के सिर पै तुम काल ज्यूं कड़क रहे
ये धर्म नहीं पणधारी 2॥

धरणी में अकेला पड़ा ग्यारा क्षोहणी का स्वामी
भूपन का भूप सभ राजों में था अग्रगामी
यो दिन नहीं जाना पल्ले बांध लई बदनामी
कितना कुटम्ब था ओर कितने थे रिश्तेदार
द्रोपदी की हाय एकदम सभ को गई मार
कितने ही जतन करो होकै रहै हूणहार
काहू बिध टरै ना टारी 3॥

सिर कहीं धड़ कहीं पैर कटे पड़े कहीं
उग्र क्रूर कर्म का फल जीव भोगते यहीं
दाह क्रिया करने वाला आज इसकै कोई नहीं
गहन गति कर्म की पता ना कोई पाय सकै
तक़दीरी लिखत तदबीर ना मिटाय सकै
धर्मसुत के रोष को महोर सिंह नहीं गाय सकै
दुख होय रह्या बड़ा भारी 4॥

दोहा-
कृतवर्मा कृप द्रोणसुत, दुख भरे मारत श्वास ।
बख्त मिला तीनों गए, दुर्योधन के पास ॥


दुर्दशा देख दुर्योधन की
तीनों को हुई दुखदाई । टेक । (त्रिभंगी)

तीनों होय कै उदास, बैठ गए ल्हास पास, दुख भरे मारैं श्वास, बोले बानी
एकबार दृग खोल, भूप मुख सेती बोल, तेरा पूरा करैं कोल, मन में ठानी
रोष भरे आरत बैन, सुन खुल गए नैन, चित को ना पड़ै चैन, दृग भरे पानी
पापी भीम मेरे संग, लड्या तोड़ गया जंघ, हुया पड्या हूँ अपंग, रण मैदानी
दल हुये बारा बाट, गए आए राजपाट, हुई मोत के आ घाट, कुणबाघानी
पांचों पंडु मरे नांय, स्याल रह्या छाती मांय, जो वै अभी मारे जांय, सुन तजूँ प्रानी
वै तो पांचों जंग जीत, बैठे होय कै नचीत, मेरी मट्टी है पलीत,
जब तपत बुझै मेरे तन की
मारे जां पांचौं भाई 1॥


अश्वथामा बलकार, बोल्या भूप धीर धार, शीश पांचों का उतार, तेरे पास ल्याऊं
उल्लू गुरु मैं बनाया, कुछ सीख उनसे पाया, करूँ तेरा मनचाहा, अब ही जाऊं
इतनी कहकै चाल पड्या, जाय शिविर मांह बड्या, आगै द्वारपाल खड्या, क्या जत्न बनाऊं
करै शस्त्रों से प्रहार, खाली गए सब वार, देख्या रूद्र का आकार, शिव को ध्याऊं
हुया अग्नि में प्रवेश, प्रकट हुये तब महेश, हतूं दल रहे शेष, यही वर पाऊं
शिव देकै वरदान, होय गए अंतर्ध्यान, अब करूँ घमासान, शिव खड़ग ठाऊं
द्वारै कृतवर्मा बैठाया, आप खड़ग लेकै ध्याया, द्रुपद पुत्र जा जगाया
कर मार पीट धृष्टद्युम्न की
बड़ी देर में जान छुड़ाई 2॥


धीर वीर अश्वथामा, पहन लिया खूनी जामा, बोल दिया कतलामा, दें किलकारी
खड़ग लिया है चुचकार, करन लग्या है संहार, शयनसेज को बिसार, भाग चली नारी
मांच गई हाय होय, आगै पड़ै नहीं कोय, बालक भागैं रोय रोय, छोड़ महतारी
हो रही भागा दौड़, भागे शिविर छोड़ छोड़, आग लाई ठोड़ ठोड़, जलैं छोलदारी
भागे फिरैं घोड़े हाथी, चिथ चिथ मरैं पदाती, जिनका कोई ना हिमाती, हुई लाचारी
दरवाजे पै डाट डाट, कृतवर्मा रहे काट, शिविर हुया बाराबाट, छवि गई सारी
पैदल काटे दस हज़ार, पंच सहस्र घुड़सवार, दो सहस्र रथी मार
लग्या तल्लाश में फेर पंडवन की
कहीं देते नहीं दिखाई 3॥


हाथीवान शत सात, करकै उनका भी घात, शिव खड़ग लिया हाथ, आगै ध्याया
देख्या नज़र को पसार, पांचौ द्रोपदी कुमार, लिये खड़ग हथियार, मोर्चा लाया
पाँचौ उमंग उमंग, खूब खेले रण जंग, आखिर वै भी हुये तंग, काल सिर छाया
करकै खड़ग का प्रहार, पांडवसुत दिये मार, शीश पाँचौं का उतार, चलकर आया
जैसे पंडु हैं अनूप, पांचों पुत्र तदरूप, देख दुर्योधन भूप, बड़ा हर्षाया
देखते ही दृग मींच, गया कपाली कूं खींच, प्राण त्यागकै कुलींच, स्वर्ग पद पाया
महोर सिंह मतिमंद, नित भाषा कथै छंद, गुणी करते पसंद
टूटी फूटी वृद्धापन की
ये है मेरी कविताई 4॥


दोहा-
सारथी धृष्टद्युम्न का, ल्हुक छुप प्राण बचाय ।
पंडवों से जा शिविर का, दिया सब हाल सुनाय ॥


शिविर में आये पंडू कृष्ण मुरारी ॥ टेक ।

नज़र ना आये घोड़े हाथी
कटे पड़े सब संगी साथी
मूंडी धुनै नार बिलखाती
पति पुत्रों की दुखियारी 1॥

शिविर में आज हूणी गाजी
हमको तीर्थ पर ले भाजी
कौरवों की हो गई चढ़ बाजी
नीची हुई है हमारी 2॥

दिन अठारा करी लड़ाई
खोवण ग्यारा मार खपाई
जय हो गई जंग फतै पाई
निष्फल हो गई सारी 3॥

हुये पराजित हम जै पाकर
हूणी के चक्कर में आकर
महोर सिंह कहै पद में गाकर
भावी टरै ना टारी 4॥

हा बंधु हा पुत्र पुकारती
इतने में द्रोपदी आई ॥ टेक ।


हो गया पिता स्वर्ग बासेरा
खप्या शिखंडी बंधु बडेरा
पीहर में सीर रह्या ना मेरा
दुख भरी हूमर मारती
आज खप गया छोटा भाई 1॥

पाँच पुत्र मेरे मारे गये जी
नींद में ही संहारे गये जी
मरे हुयों के सिर तारे गये जी
मरण मारण की धारती
हो गई महादुखदाई 2॥

उस दुष्ट को वेग पकड़ो जाकै
मारो मेरे सामने ल्याकै
नहीं ल्याये तो मरूँ विष खाकै
आरत वचन उचारती
दे रहे धीर यदुराई 3॥

धीर धार ले द्रुपद दुलारी
मंशा पूर्ण होय तुम्हारी
महोर सिंह न्यू अर्ज गुजारी
पतियों की ओड़ निहारती
पार्थ को देख बिरलाई 4॥

दोहा –
पार्थ बोले सती अब, काहे को रही रोय ।
बननी थी सो बन गई, अब रोये क्या होय ॥

सती ल्याकर तेरे सामनै
उस पापी को मारूँगा ॥ टेक । (सांगीत)

पुत्रों का हमारा सती इतना ही था संस्कार
मत रोवै सबर कर हिरदा डाट धीर घार
स्वपन की समान जान क्षणभंगुर संसार
जो उसकी सहाय करै विधि विष्णु शिव आन
तो भी उस नीच के सती आज ना बचैगें प्राण
ल्हुका छुप्या छोड़ूँ नहीं तीन लोक दरम्यान
अधर्मी जाम कुजाम नै, तेरै आगै संहारूंगा 1॥

इतने में ही रथवान रथ को ल्याया सजाय
सारथी श्रीकृष्ण बने पार्थ बैठा रथ मांय
खोज ले दौड़ाया रथ द्रोणी पीछै दिया लाय
दूर से नज़र पड़ा दुष्ट भागा जाय रह्या
देखकै भयभीत हुया कृष्ण अर्जुन आय रह्या
लिया पहचान पार्थ वचन सुनाय रह्या
रहा लजा पिता के नाम नै
तेरे सिर में खाख डारुंगा 2॥

अरे नीच अरे खल आतताई दुष्टाचारी
शिविर में आ चोर सूती सेना काट दई सारी
आज तेरा ब्रह्मतेज नष्ट हुया धर्महारी
भागे से ना प्राण बचैं कितनाए भाग दौड़
ब्रह्म बंधु अब अपने जीवन की आश छोड़
यहाँ तुझे मारूँ नहीं ले चलूँगा उसी ठोड़
दिखा कै रणवास तामाम नै
तब तेरा शीश तारूंगा 3॥

इतने वचन कह रथ सेती कूद पड़ा
द्रोणसुत कै पीछै भाग्या द्रोणी रह गया खड़या
भूल गया औसाण उग्र पाप आगै आय अड़ा
चोटा जाय पकड़ा द्रोणपुत्र हो गया निराश
रस्सियों से बांध जूड़ ले आया रथ पास
सुत महोर सिंह को गायन विद्या का अभ्यास
करवाया पिता रतिराम नै
जन्म भर चरण चुचकारूंगा 4॥

दोहा –
गले में रस्सी डालकर, कर पद लीन्हे बांध ।
जगह जगह बंध लायकर, फंद में लिया है फांद ॥


द्रोणी को पशु ज्यूं पकड़े शिविर में ल्याये ॥ टेक । (जंगम)

द्रोपदी नै सुना पुत्रघाती आ गया शिविर की बुलवा लई नारी
सभी का बनकै दुहतर चली है पति पुत्रों की दुखयारी
बिरलाती आय रही बड़ी दूर से नज़र पड्या अत्याचारी
सती द्रुपदसुता नै शीश झुकाया करै नमन नीर नैनी जारी
यो गुरु पुत्र है जल्दी छोड़ो मत मार दियो हे धनुर्धारी
मेरी तरह मत करियो रूदन वो कृपी इसकी महतारी
गुरु द्रोण से विद्या पढ़कर धनुर्धारी कहलाये 1॥

सती द्रुपदसुता के सुने वचन जद बोल उठे जादूराई
ब्राह्मण वध करना अयोग्य हो वध करने जोग आताताई
कहै भीमसैन इसे मारो वेग मैं मुख देख्या चाता नांई
इन सूती सेना काट दई है आताताई महाअन्याई
पार्थ कर रहे विचार किसविध हो चारों की मनचाई
जिस तरह चारों के वचन हो पूरे पार्थ मैं सुमती आई
मणि काढ़ी और केश चुने हैं द्रोणी अभद्र बनाये 2॥

करकै विरूप दिया द्रोणी छोड़ ब्रह्मबंधु का मारना यही
वर्ष तीन हज़ार वनों मैं भरम तेरे पास कोई आवैगा नहीं
दुर्गन्धी आवैगी शरीर में चाहे चल्या जा तूं कहीं
अपने कर्मों का भोग तूं पापी भ्रमण कर संसार मही
जल्दी यहाँ से चला जा तेरे ना प्राण बचैंगे यहां रहीं
कृष्ण वचन सुन द्रोणपुत्र कहै जाता हूँ मैं अब ही
बंधन कटे अश्वत्थामा चल पड़े बन को ध्याये 3॥

श्रीकृष्ण शिविर के सैनिकों का दाह-कर्म करवाय रहे
फिर गंगा तट पै जाय नाम ले लेकै अंजली लाय रहे
जो त्रिया करैं थी रूदन शिविर में उनकी धीर बंधाय रहे
फिर भस्म उठा सब वीरों की गंगा कै बीच बहाय रहे
फिर गांधारी धृतराष्ट्र पास चलने का बता उपाय रहे
पंडवों नै फतह पा लई जंग की महोर सिंह गुण गाय रहे
श्रीकृष्ण को संग ले पंडू अंध राजा पै आये 4॥

----- इति श्री -----