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दंगली प्रश्नोत्तर, रहस्यवाद

जो तूं कवि काव्य रचता है कवियों की बता परनाल
किस शक्ति से छंद बने हैं कहाँ से प्रगट हुये सुर ताल ॥ टेक ।


कितने छंद वेद में प्यारे क्या-क्या उन छंदों के नाम
उदाहरण और लक्षण जिनके वर्णन कर सम्बन्ध तमाम
पिंगल में कुल कितने छंद वृत्तरत्नाकर में कितने ठाम
कितने छंद श्रुतबोध में बरने बतलादे होकर निष्काम
किस किस छंद में कितने वर्ण हैं मात्रा उन वर्णों की संभाल 1॥

न्यास-अंश ग्रह-अंश बतादे ग्रंथों के दे दे प्रमान
कितने अंशों की बनी मुर्छना व्यक्ति का कर भिन्न बखान
ग्राम आलाप के लक्षण बतला बतादे छंदों के अस्थान
क्या विराम क्या यमक वस्तु है प्रहेलिका की कर पहचान
पिंगल या वृत्त रत्नाकर से अष्टदोष छंदों के निकाल 2॥

अब जाति बतला छंदों की वर्णन कर उनके श्रृंगार
कितने छंद पुरुषवाचक हैं कितने क्लीव और कितनी नार
अलंकार रस के प्रकार वर्णन कर छंदों का सुमार
क्या उपमान उपमेय वाच्य वाचक वाची का क्या आकार
प्राचीनों के ग्रन्थ देख उनमें ये मिलैगा सारा हाल 3॥

काव्य विषय के प्रश्न किये हैं ये नहीं पंडिताई की बात
सोच समझकर जवाब देना जो कविजन तुम्हे है खबरात
नहीं जानै तो हमसे पूछले जोड़ हमारै आगै हाथ
बकवादे और वाद-विवादे बिगड़ जायेगी तेरी जात
महोरसिंह पंडित से कोई पंडित ही करैगा जवाब सवाल 4॥

धरकै ध्यान अब सुनले प्यारे पिंगल के पद गाते हैं
साहित्यवृत्त श्रुतबोध ये पिंगल के अंग कहलाते हैं ॥ टेक ।


होकै प्रगट कांशी के बीच धर नागरूप कथ गये भगवान
वर्ण काम दुघा संती हैं वर्ण कामधेनू के समान
स्वर हैं सो ईश्वर तुल्य हैं पाणिनि ऋषि कर गये बखान
स्वर वर्णों के दीक्षित जी ने वर्णन किये प्रबल स्थान
वर्णों की जहाँ सन्धि होती वहां मिलाये जाते हैं 1॥

एक मात्रा हो जिस अक्षर कै हृस्व नाम वो कहलाया
द्वि मात्रो दीर्घ त्रिमात्रो प्लुतः अर्धमात्रिक व्यंजन गाया
सानुस्वार सविसर्ग दीर्घ संयुक्त आदि में जो गाया
उस अक्षर को गुरु कहैं हैं शेषनाग नै दर्शाया
पादन्तस्थ जो होते वर्ण वो गुरु और लघु कहाते हैं 2॥

पिंगल में अष्ट दग्ध वर्ण ह ज ध र घ न व भ सुन इनका विचार
रचते भाष्य कर कोप शेष नै फूंक दिये मारी फुंकार
इन वर्णों का भाष्य रचैं थे कण्व ऋषि से हुई तकरार
आठों को कर दग्ध हुईं अंतर हो गये शेष अवतार
इस कारण से ग्रंथादि में कविजन इन्हें बचाते हैं 3॥

ऊँचे स्वर वर्णों का उच्चारण उनकी संज्ञा बंधी उदात
नीचरैनुदात सम बत्या स्वरित स्वर वैदिकी में हैं विख्यात
वर्ण विवेक हुये बिन प्यारे पिंगल की नहीं हो खबरात
गुरु मुखराम पढ़ा गये हित से पिंगल की मुझे सारी हिदात
महोरसिंह उन ही की कृपा से नित नये छंद बनाते हैं 4॥

वर्ण विवेक हुये बिन प्यारे पद गाते होती बड़ी भूल
शुद्ध अशुद्ध का बोध नहीं निर्बोधक छंद बनाना फिजूल ॥ टेक ।


वर्गी कितने वर्ण वर्ग संख्या किसने बांधी प्यारे
स्वर संज्ञक व्यंजन संज्ञक अक्षर बतला न्यारे न्यारे
गुणवाचक वृद्धिवाचक नामी अक्षर कितने सारे
समान संज्ञक वर्ण सवर्णिक कितने अक्षर उचारे
वर्णों का बता कर्ता कौन है उपादान कारक निजमूल 1॥

वर्णों की अब आयु बता दे रूप रंग जाति अस्थान
शिशु संज्ञा कितने वर्णों की कितने वृद्ध और कितने जवान
कितने अक्षर विप्र वर्ण हैं क्षत्री वैश्य और शूद्र बखान
मित्रभाव किनका आपस में दुश्मन कौन कौन पहचान
संबंधादिक इनके कर उदाहरण ग्रन्थों के अनुकूल 2॥

अब प्रत्यय बतला वर्णों के वर्णन कर इनके अकार
हृस्व दीर्घ और प्लुत स्वरित का स्वर भर-भर कर उचार
पद संज्ञा किसने बांधी है सुप तिड. का करना सुम्मार
सिद्ध शब्द कैसा होता है गोण मुख्य का कर निरधार
प्रकृति प्रत्यय विकरण इनका भी कुछ चहिये बनाना सूल 3॥

वर्णबोध शब्दों की योजना वाशिष्ठी संबंध तमाम
किस मौके पर समास होता षटकारक का क्या क्या नाम
जितने प्रश्न किये हैं हमने उनके ज्ञाता गुरु मुखराम
महोर सिंह नै सेवा करी दस बारह बरस होकै निष्काम
इतने ज्ञान बिन छंद कथे जो उन नुग्रों के सिर पर धूल 4॥

दोहा –
उलटे सैं सुलटा करै, करै जो अर्थ विचार ।
ऐसे गुनी महाराज के, हम हैं ताबेदार ॥


कोई अर्थ हमारे छंद का
नुगरा क्या समझ सकता है ॥ टेक ।

धरा बरषै भीजै अकाशा
जल बिन मरै पपैया प्यासा
अजब और एक देख्या तमाशा
खद्योत रवि और चंद का
नित प्रकाश हो ढकता है 1॥

भिडाव से करै अजा लड़ाई
स्याली नै सिंघनी दबाई
चूहे नै लई पकड़ बिलाई
चीटी को देख गयंद का
सब बल पराक्रम थकता है 2॥

बहरा राग सुनै बिन कानीं
गूंगा बोलै अमृतवानी
अंधे से नहीं परजा छानी
नकटे को स्वाद सुगंध का
मुर्दा भोजन चखता है 3॥

छोलै वृक्ष कुल्हाड़ा छुलता
तोलै तराजू बनिया तुलता
महोरसिंह कहै अर्थ ना खुलता
अब गुण गावो गोविंद का
क्यों आल-बाल बकता है 4॥

दोहा –
वेद-शास्त्र की बात है, सुनो सभी धर ध्यान ।
सुगरों को अणु तुल्य है, नुगरों को पाषान ॥

कैसी अचरज की बात हुई
एक पुत्र हीजड़ा जाया ॥ टेक ।

महतारी स्नान नहीं कीन्हा
वीर्यदान पिता नहीं दीन्हा
आप ही आप भोग कर लीन्हा
वोही पिता वोही मात हुई
सुन बड़ा अचम्भा आया 1॥

कौन विधि कौन रस्ता पाकै
पड़ा पुत्र गर्भ में आकै
जनमत गेरा अलग उठाकै
उस बालक कै धात हुई
फेर किसनै आन बचाया 2॥

दूध नहीं जननी का पीया
किस प्रकार वो बालक जीया
कहां पड़ा किसनै ठा लिया
फिर उसकी क्या जात हुई
वो कौन नाम कहलाया 3॥

बतला दे कौन काल की
कौन महीना कौन साल की
इस बालक के सारे हाल की
महोरसिंह को ज्ञात हुई
जद ये छंद बनाया 4॥

दोहा –
ज्ञानी लखते ज्ञान से, ध्यानी लखैं धर ध्यान । जोगी लखते जुगत से, सबका एक निवान ॥ बता एक पति के संग में
कद सात सती हुई नारी ॥ टेक ।


कौन समय में विवाह कीन्हा
क्यों फिर उनको दुहाग दीन्हा
किस कारण फिर बैराग लीन्हा
भस्म रमा कै अंग में
पिया बन गये जोगाधारी 1॥

कहो पिया कितने दिन रहे जोगी
जोग धार त्रिया कैसे भोगी
भोग-भोग फिर क्यों हुये सोगी
ल्हुक गये जाय इकंग में
तजदई सारी की सारी 2॥

नारी नै पति का खोज चलाया
पति भी फेर उलट नहीं आया
बिन खोजे पिया कैसे पाया
सातों भरी उमंग में
कहो कैसे जली पिया प्यारी 3॥

उन सतियों का हाल सुनादे
कौन समय की ये बात बतादे
महोरसिंह कहै पता लगादे
रंगे हुये दिल रंग में
वै समझैं रमझ हमारी 4॥

दे अर्थ खोल इस छंद का
जो ज्ञान गुरु से पाया ॥ टेक ।


पुत्र जन्मा बंटी बधाई
जनमत ही जनै जननी खाई
पीछै खा लिये बहन और भाई
अपनी फेर समंद का
चुग चुग पाड़ोसी खाया 1॥

पहले तो करी कुणबाघानी
फेर जा खाए मामा नानी
नाने नै करी खेल बिझानी
फेर अपनी पसंद का
खा लिये जो आगै आया 2॥

सगों का सगा सगों का सोई
बाकी एक रह्या ना कोई
सबको खा गया वो निर्मोई
बजाकै साज आनंद का
फिर हंस हंस मंगल गाया 3॥

बता इस छंद का है अर्थ के
तूं भी गा दे ऐसा ही कथ के
महोर सिंह वेदों को मथ के
नुगरों के गल फंद का
फंदा मजबूत बनाया 4॥

कोई अर्थ करै इस छंद का
द्यूं भेंट का पांच रुपैया ॥ टेक ।


नभ में भानू अनंत प्रकाशे
फिर भी अंधकार नहीं नाशे
शशि कूं निरख राहू विश्वासे
ग्रहण हुया नहीं चंद का
राहू ही ग्रसा गया भैया 1॥

दूजी बात का अचंभा आवै
भैंस खड़ी खड़ी ढ़ोल बजावै
नाचै ऊंट ऊंटनी गावै
ब्याह हो रह्या गयंद का
संग फेरे लेत गधैया 2॥

तीजी बात एक और पुरानी
थी दादी कैसे लगी नानी
बहन की बहन कैसे दौरानी
उसी में साख ननंद का
जो सास वही है मैया 3॥

सुरता अर्थ सूरत से पाते
पंडित वेदों में दर्शाते
महोर सिंह पद कथकै गाते
बजाकै साज अनंद का
सिर मारैंगे कूर गवैया 4॥

यज्ञोपवीत का सारा हाल सुनाय देना । टेक ।

तज दीन्हा कहवा किस कारण
किया क्यों जाय कहवा धारण
कर दीजे मेरे दिल का निवारण
शंका मिटाय देना 1।।

जब जब शौच फिरागत जाते
क्यों दाहिने कान पर लाते
क्यों नहीं बायें पर ठहराते
भरम भगाय देना 2।।

क्यों इसे न्यारा न्यारा जोड़ा
क्यों नहीं बांधा जा इकठोडा
क्यों इतना ही लंबा चौड़ा
पता लगाय देना 3।।

गिरह तीन पांच लगी कैसी
क्यों ये आंट बैठाई ऐसी
महोर सिंह तज बहसा बहसी
लेख दिखाय देना 4।।

हो पढ़ लेख अचंभा आया
पंचवटी में रावण ध्याया ॥ टेक ।


रावण आया गये वन में रघुनाथ
पीछै पठाय दिये सीता जी नै लखन भ्रात
शिखर दोपहरी सीता हड़ी थी निखंड आधीरात
गुणवान गुणी बताओ कैसे बनी दो बात
किस तरह ये मेल मिलाया 1॥

धर योगी का भेष गया कुटी पै जब बलवान
भिक्षा देदे धर्मणी आकर किया बखान
अलख जगाया असुर नै जब आधा सूरज जान
आधा ही था चंद्रमा ये कैसे मेल मिला आन
ये कैसे जोग बैठाया 2॥

मिटते नहीं मिटाने से जो कर्मों के हैं भोग
भिक्षा घालण चाल पड़ी गया बैठ कर्म संजोग
सुदी बदी दो पक्ष तिथि आठैं का योग
दो पक्षों का एक दिन कैसे मिल गया जोग
चाहिये ये भेद बताया 3॥

इधर उधर की बात ना ऋषि बाल्मीक लेख
नाटक का भी विषय है कोई पढ़ लियो देख
मिटती नहीं मिटाई लिखी जो बिधी नै रेख
महोर सिंह नै कथ जड़ दई छंद की मेख
नुगरा सुन सुन भरमाया 4॥

श्लोक

अर्धरात्रि दिनस्य अर्धे अर्धचंद्रे अर्धभास्करे ।
रावणेन हता सीता कणण .... सीताष्टमी ।।

श्लोक

दस वर्ष सहस्राणि दस वर्ष शतानीच
रामो राजे मुया सित्वा स्वर्गलोके महीपते ।।

बाल्मीक ऋषि व्यास नै यह क्या गलती खाई जी ।। टेक ।

तेरह हजार वर्ष राम नै किया अवध में वास
नवम स्कंध भागवत में कथ गए वेदव्यास
लिखत लिखी ऐसी पाई जी 1।।

ग्यारह हजार वर्ष राज किया बाल्मीक का लेख
आदि कांड रामायण में बात दुभाँति देख
मेरे मन में भ्रमता छाई जी 2।।

एक कहै तेरह सहस्र की एक ग्यारह हजार
इनमें सत्य असत्य का जो कोई करै विचार
वो गुनी वोही अताई जी 3।।

दोनूं आरस ग्रंथ हैं दोनूं ऋषि परमान
जो इनकी करै एकता महोर सिंह गुणवान
को उस ही कि शरणाई जी 4।।

भरम की बात सुन-सुनकर तसल्ली दिल को ना होती ॥ टेक ।

महाप्रलय में ब्रह्मण्डी अस्त हो जाती है ज्योती
प्रलय हिरनायत की ना हुई ऐसी उसमें क्या थी जोती
भरम की बात ..... 1॥

कश्यप की नार से पैदा हुये वन पर्वत सारे
असंभव सी बात त्रिया तो पुत्र जनती हुई रोती
भरम की बात ..... 2॥

परिंदों ज्यूं उड़ा करते वन व पर्वत सारे
झूठ हम कह नहीं सकते लिखत श्रीमद भागोती
भरम की बात .... 3॥

घर जो घालदे इनकी गुरु वही महोर सिंह का
चरण पूजा करूं उसकी जिंदगी भर धोऊं धोती
भरम की बात .... 4॥

छत्तीस गर्भणी नार कै
पति छप्पन हैं क्वांरी के ॥ टेक ।


दादा हीजड़ा दादी महतारी
तीन पिता रंडक्या महतारी
आप मर्द कहलाता नारी
गर्भ में सुख भरतार के
करती है काम ख़्वारी के 1॥

सात बहन और सतरह भाई
नौ बेटी चौबीस जंवाई
अनगिन जिसकी चाची ताई
कुणबा कहूं विचार कै
इतने हैं इस प्यारी के 2॥

दस देवर हजार देवरानी
अगणित हैं इसकै जेठानी
सहस्र नणदल आनी जानी
लाखों कुटम्ब परिवार के
लाखों रिश्तेदारी के 3॥

असंख्य जिसके गोती नाती
तब भी वो निर्भाग कहाती
कहै महोरसिंह नहीं हिमाती
अपने साज संवार कै
गुण गा ले बनवारी के 4॥

ज्ञानी हो भेद बतावना
कुछ नहीं समझ में आती ॥ टेक ।


एक शख्स शादी रचवाई
पंचत्रिया तेल चढ़ावन आई
बैरी गावैं बंटैं बधाई
जम्बू कर रहे गावना
लोबाँ खुड़ताल बजाती 1॥

खर और खच्चर बना एक चोटा
लाग्या द्रब बांटने झोटा
ब्याह का खर्च जरख नै ओटा
पूरी हो गई भावना
ऊंटों की चुकी पंचाती 2॥

सूकर स्वाना भातई आया
भेडा नै जब ढ़ोल बजाया
बिज्जू नै सब राग सुनाया
चीता तान लगावना
रींछों की चढ़ी बराती 3॥

जो इस पद का अर्थ लगावै
ज्ञानी हो सो सही दर्शावै
महोर सिंह कहै हमें बतावै
मुश्किल भेद पावना
ब्रह्मखोजी को दर्शाती 4॥

लख रमझ समझ चित लाय कै
होता है प्रश्न हमारा ॥ टेक ।


अणु प्रमाण त्रुटी नै मेखा
अष्ट भार ठावल की रेखा
अक्षणों त्रिष्नों जो कभी देखा
कहो हाल समझाय कै
नौवों का न्यारा न्यारा 1॥

क्रोंच द्रोणक आडक खारी
इनकी कहो हकीकत सारी
अर्थ गति कहो न्यारी न्यारी
भाषा में दर्शाय कै
सभ हाल खोल दो सारा 2॥

उपसर्जन की क्या है रीती
कौन देश में लगी प्रीती
सुपुत्र की बतला दे नीति
कहो तद पद में गाय कै
कहो ग्रन्थ ही ग्रन्थ बिचारा 3॥

सुर बिन रहते किसकी सरद में
षटकारक हैं कितनी हद में
महोरसिंह कहते इसी पद में
भाई तुझे अजमाय कै
तूं जीत्या मैं हारा 4॥

दोहा –
अग्नि से पैदा हुई, जल में गई समाय । महादेव के सिर चढ़ी, रही पवन घर जाय ॥ ऐसी कौन हुई एक नार
लगी दादी दादस नानी ॥ टेक ।


फूफी फूफस और महतारी
मामी मोलस सास पियारी
ऐसी कौन हुई एक नारी
कौन हुया भरतार
नहीं रही किसी से छानी 1॥

मातपिता नै शादी रचाई
बेटे को बेटी परनाई
बेटे की मां बूवा कहाई
बन गये रिश्तेदार
जिनको नहीं आई गिलानी 2॥

बहु पुत्र की बेटी भानजी
ससुर की जहां नहीं कान जी
भाइयों तक भी नहीं आन जी
रही पतिव्रत धार
करै जारी नार मस्तानी 3॥

चार वर्ण नहीं दो दीनन में
पशु पखेरू कोई ना इनमें
महोरसिंह कहो नाता किन में
सुरता धर करो विचार
मूरख को मुश्किल पानी 4॥

एक देख्या अजब तमाशा
कहते भी शर्म आती है ॥ टेक ।


माता पुत्र को कहै जमाई
खसम बहु का लागै भाई
बुआ बाप की लगै लुगाई
नाता बना लिया ख़ासा
उन्हीं की धन छाती है 1॥

सासू को कहै माता माता
खसम बहन का वोही कहाता
भूवा में मामी का नाता
कैसा रह्या निकासा
वही गोती वही नाती है 2॥

माता मामा की अर्धंगी
करै रातदिन सेवा चंगी
पिता हुया मामी का संगी
देख्या अटपट रासा
मामी मां कहलाती है 3॥

इस अर्थ को खोल के गाना
नहीं आवै तो चुप हो जाना
महोर सिंह कहै पता ना पाना
पंडित करै प्रकाशा
मूर्ख मति भ्रम जाती है 4॥

लिकड़ कै जा ले गंग 4॥

पहले मेरा एक सवाल है
जरा सुन इस पद तेरे पै ॥ टेक ।


बिन दिवार चित्र नहीं बनते
लौकिक नाथा हजारों भनते
ये पद नहीं परमारथ जनते
बर बर यही मिसाल है
तेरे सब रूप टेरे पै 1॥

पद की संगति करकै सारी
फेर पदारथ का हो अधिकारी
दोनों विवस्ता कर दे न्यारी
बेहू की यही चाल है
कई प्रमाण हैं मेरे पै 2॥

पद गाते पदारथ के कारण
कर गये ऋषि मुनी ग्रन्थ उचारण
प्रमाण से करना निर्धारण
जो कुछ तुझे ख्याल है
पूछै जो हर बेरे पै 3॥

पद पदारथ का है अलझेरा
बिन सुरती ना हो बेरा
महोरसिंह कहै सुन पद मेरा
नुगरे का बेहाल है
जरदी छाई चेहरे पै 4॥

पद गाना तेरा फिजूल है
तुझे पदरथ का बेरा ना ॥ टेक ।


भाषा जानै भाषा गाता
भाषा ही के छंद बनाता
कोई कोई पद संस्कृत के लाता
ये तेरी बड़ी भूल है
कोई ग्रन्थ पढ़ा तेरा ना 1॥

बिन पढ़े शुद्ध गति आती ना
झूठी बात पार जाती ना
घर में तेल दीया बाती ना
अन्धेरा निजमूल है
प्यारेयहां तो अंधेरा ना 2॥

जो संस्कृत की करै हिरस तू
सतगुरु के जा चरण परस तू
काशी पढ़ दस बीस बरस तू
वहां मेरे पढने के स्कूल है
फिर पद में अलझेरा ना 3॥

पूर्ण गुरु से विद्या पाकर
करिये बात फिर हमसे आकर
महोर सिंह कहै पद में गाकर
जिनका झूठा तूल है
उनसे कलाम मेरा ना 4॥

तूं गाता है किस ढंग में
ना चढ़ी छंद पर कोटी ॥ टेक ।


टेक तो किस मार्ग में ठाई
कौन विषय की कली चढ़ाई
करने लग रहा रेत रलाई
गुनियों के सत्संग में
कहीं दे बैठैगा चोटी 1॥

चेता दिया है मैंने तुझको
अच्छा चहे बुरा कहै मुझको
कर चहे मत कर निवृत रुझको
क्या है जोराजंग में
तेरी लई देख हथोटी 2॥

हठ पकड़ा तो प्रमाण लेंगे
प्रमाण ऊपर प्रमाण देंगे
बेप्रमाण नहीं बात करेंगे
बाजी ला इस दंग में
तेरी लेंगे काढ़ लंगोटी 3॥

अबकै तेरा छंद निरख कै
बाजी लावैं कथन परख कै
महोरसिंह पद कथै हरख कै
क्रोध न व्यापै अंग में
चहे सौ-सौ कहल्यो खोटी 4॥

दिल भर-भर प्रेम उमंग से
हम भक्तिपद गाते हैं ॥ टेक ।


चटक-मटक और तानारीरी
इनसे हमको है दलगीरी
जो हैं हरिभक्ति के सीरी
रंगे हुये दिल रंग से
हम उनसे बतलाते हैं 1॥

तुम ताम ताना नाना
इसका नाम धरया तल्लाना
चितरंग धुरपद सरगम गाना
बिन व धा के अंग से
गा दोजग में जाते हैं 2॥

जिस पद में हरिभक्ति यश ना
निर्गुण सगुण हरी का जश ना
वो पद गाये भ्रष्ट हो रसना
ज्यूं द्विजकुल सरभंग से
भ्रष्टायन को आते हैं 3॥

भावभक्ति बिन आपा रिझाया
गाया ऐसे ही नहीं गाया
महोरसिंह भक्तिपद पाया
गुरुवौं के सत्संग से
इसे नुगरे नहीं पाते हैं 4॥

दोहा –
लय-स्वर का अंदाज ना, ना कोई रसिक आवाज । सभा बीच खड़ा होय कै, मुख बा दें निरलाज ॥ खाने का नहीं सहूर है
गाने का बांध लिया बाना ॥ टेक ।


कहां साज बजें कहाँ गाता है
स्वर को छोड़ भगा जाता है
पीटे पैड़ क्या हाथ आता है
गाने का घर दूर है
मुंहबाये हाथ क्या आना 1॥

जैसे बकरी भेड़ मिमाती
ऐसे अणमिल अवाज आती
शर्म नहीं आवै है गातीं
तू बेशर्म जरुर है
नहीं होता है खिस्ताना 2॥

अणमिल साज बजैं बेताले
लयकट नीचै बोलन वाले
बेसुध फिरैं मारते फाले
ज्ञान में चकनाचूर है
कहीं पड़कै खाट में गाना 3॥

ठठरागी दंगल में गावै
षटरागी जग लोग हंसावै
महोर सिंह से बाजी लावै
कहां का कौन फितूर है
हमने तो नहीं पिछाना 4॥

दोहा –
मर्म धर्म का लखा ना, पड़ा भरम का जाल । बुद्धिहीन नर जगत में, फिरे बजाते गाल ॥ इन बातों का घर दूर है
कोई महरम हो सो जानै ॥ टेक ।


अंधे को दर्पण दिखलावै
सुरत की मुरत लखी ना जावै
अंधा दर्पण को बिसरावै
दर्पण का कौन कसूर है
अंधे को कुछ नहीं भानै 1॥

भैंस के आगे बीन बजाई
मर्म लखे बिन मारण आई
पच लिये खांड ना गधे नै खाई
जाति गधे की कूर है
उसकै कुरड़ी मन मानै 2॥

मर्कट को जेवर पहनाया
मर्म लखे बिन तोड़ बगाया
चंदन घस सूकर कै लाया
कागा के पास कपूर है
पर कुछ नहीं मर्म पिछानै 3॥

निंदा करै मर्म नहीं लखता
बिन विचार फिरै नाहक झंखता
महोरसिंह कहै क्या बल रखता
शास्त्र का नहीं सहूर है
सुनी हुई दो बात बखानै 4॥

दोहा –
असुरबुद्धि नर हो गये, भोग रहे पशुजून । बिन विचार शठ जगत में, होते फिरे बिरून ॥ लख कहो धर्म की वारता
पापी कै एक जचै ना ॥ टेक ।


पतिवृत धर्म बेश्वां आगै
सुनाओ तो अच्छा नहीं लागै
सूमपने को सूम नहीं त्यागै
सुन दातारों की उदारता
दिल पर जरा रंग चढ़े ना 1॥

जार आगै कहो बात जती की
लत नहीं जाती कूरमति की
झूठे को कहो सत्यव्रती की
झूठ को नहीं बिसारता
बिन बोले चैन पड़े ना 2॥

पाखंडी को कहो परजा सारी
कदे ना लागै भक्ति पियारी
लख बरजो जूवे का खिलारी
जूवे को फिरै निहारता
चाहे कोडी एक बचै ना 3॥

क्योँ गुण सुना महोरसिंह खोवै
कर्म स्वभाव पलट नहीं होवै
वैसाई काटै जैसा बोवै
कलजुग जुल्म गुजारता
हूणी बिन नाच नचै ना 4॥

कर थोथी गाल बजाई
क्यों वृथा बख्त खोता है ॥ टेक ।


झूठी बात का ला लिया ऐड़ा
तजै ना हठ मारै गपेड़ा
यूं नहीं होने का नमतेड़ा
पुस्तक लो मंगाई
देखो फिर क्या होता है 1॥

अंग भंग छंदों का कर रहा
काव्य में नीरस काफिये भर रहा
कहीं के शब्द कहीं धर रहा
देख लई कविताई
अन्धेराये ढोता है 2॥

शुद्ध अशुद्ध का ज्ञान नहीं है
शास्त्रों का परमान नहीं है
जरा भी रसिक जबान नहीं है
करी ना वेद पढ़ाई
झूठा झगड़ा झोता है 3॥

खुद की तुझे संभाल नहीं है
बख्त का भी कुछ ख्याल नहीं है
गुणियों की यह चाल नहीं है
करन लग्या कुटलाई
गाता है क्या रोता है 4॥

भौँरा केसू देख लुभाया
बैठ गया कुछ रस नहीं आया
वो ही बख्त आज हमको पाया
बिरथा रैन गंवाई
धन्य जो जन सोता है 5॥

अब भी कहन हमारी मान ले
सतमार्ग पर सुरत ठान ले
महोरसिंह कहै निश्चय जान ले
अब ना होगी समाई
तू कुबध बीज बोता है 6॥

कोई चर्चा कर सत्संग की
इस झगड़े को जाने दे ॥ टेक ।


सत्संग करकै नरनारी तिर गए
जम के दूत देख मुख फिर गए
लाख दोजगी दोजग से गिर गए
डगर गही जन जंग की
लड़ आपस में ताने दें 1॥

झगड़े में कुछ हाथ नहीं आता
उल्टा ज्ञान गांठ का जाता
तू कविजन बड़ा गुणी कहाता
कर बात कोई हरी रंग की
अब लड़ीबंद आने दे 2॥

क्यूं तू हाल बेहाल करै है
क्यूं जी को जंजाल करै है
क्यूं तू नैना लाल करै है
सुध रख अपने अंग की
चहे किसी को कुछ गाने दे 3॥

बार बार तुजको समझाया
उल्टा चढ़ा शीश पर आया
महोर सिंह कथ छंद बनाया
क्यूं ज्वाला जगी अनंग की
विष तज अमृत पाने दे 4॥

तजकर इस वाद विवाद को
सत्संग का बांध ले बाना ॥ टेक ।


धन्य भाग धन्य आज की वेला
हुया कर्म से दर्शन मेला
सज्जन समागम बड़ा दुहेला
मतना बिगाड़ै स्वाद को
दे ताना और उल्हाना 1॥

इन बातों से रिस बढ़ जाता
अवसर गया हाथ नहीं आता
बिन विचार नर धोखा खाता
पहले कर बकवाद को
फिर पीछै हो पछताना 2॥

तर्क कुतर्क और कुटलाई
इनसे पैदा हों बुराई
होते होते होत सवाई
मत सिर धर विषाद को
लगता है नाम कै लाना 3॥

होकर शुद्ध तज मन की गिलानी
मुख से बोल सुधारस बानी
महोरसिंह कहै गुनी ज्ञानी
मत त्यागै मरजाद को
जरा समता से पद गाना 4॥

दोहा –
सरसाई कविजन की, हुई जगत में आय ।
गाने का बाना बंध्या, बोध हरफ का नांय ॥

अबतो इस संसार में
कवियों की हुई सरसाई ॥ टेक ।


ऊँटवाल गडवाले हाली
करते अपनी कार निराली
जब धंधे सैं होज्यां ठाली
जा किसी शहर बजार में
बन बैठे कूड अताई 1॥

ऊंट चराये पीपल काटे
सूधे कई कराये नाटे
पूरे नहीं पेट के पाटे
कोई सी भी कार में
भाई जब खटताल ठाई 2॥

धरती सारी गिरवी धर लई
झूठी कई सगाई कर लई
सब कामों में बंथी भर लई
इकतारे के तार में
पाई तो दो कोडी पाई 3॥

भेंट रुपैये रुमाल लेले
दुष्ट ही दुष्ट बना लिये चेले
महोरसिंह कहै हठी हठेले
भूले फिरैं अहंकार में
शठ करते गाल बजाई 4॥

दोहा –
गुरु शिक्षा पाई नहीं, पढ़े नहीं चटसाल ।
मूरख गुणी कहा दिये, इकतारे खटताल ॥

था गुणी नाम गुणवान का
मूर्ख कैसे गुनी कहाया ॥ टेक ।


हलिया टोरा गाडी बाही
प्याऊ दई क्या गऊ चराई
विद्या नहीं गुरु से पाई
बिन पढ़े वेद पुराण का
कहो कैसे छंद बनाया 1॥

गावै कथा बजावै हुक्के
धर-धरकै मारै है रुक्के
सुल्फों के उड़ते हैं बुक्के
माहाभारथ रामान का
देखो कैसे नाम लजाया 2॥

बोली चलन पहरान गंवारी
पंडतजी कहते नरनारी
बदसूरत मूरत भयकारी
जैसे भूत मसान का
लोगों को डरावन आया 3॥

मूरख झूठे झगड़े झोवै
डूबै आप औरों को डबोवै
महोरसिंह कहै थूक बिलोवै
लेस नहीं हैं ज्ञान का
नाहक गुनी नाम धराया 4॥

दोहा –
हरदी जरदी ना तजै, षटरस तजे ना आम ।
शीलवंत गुण तजे नहीं, ना औगण तजे गुलाम ॥

शठ ओछे बचन मुख बोलता
है खता असल तेरी में ॥ टेक ।


ओछा ओछी बात से राजी
क्यों सिर मारै पंडित काजी
बचन तुला पर धर-धर पाजी
तीन लोक कूं तोलता
फिरै अक्ल की अन्धेरी में 1॥

कमसलभी नर वोही कहाता
सभा में ओछी बात सुनाता
कूड़ी कहता नहीं शर्माता
अमृत में विष घोलता
दिन जा हेराफेरी में 2॥

चलने लग्या अब चाल कुचाली
सभा में ओछी बात निकाली
मतना करै पैदने वाली
हांडैगा जग टिटोलता
ल्हुकने को थोड़ीये देरी में 3॥

सूकर स्वान की वृत्ती धारी
काक चेष्टा मन में विचारी
महोरसिंह कहै ठोंठ अनारी
क्यों अब डांवा-डोलता
शठ आय गया घेरी में 4॥

दोहा –
पता न अपने जोर का, कहते बेउनमान ।
पीठ दिखाकै चल पड़ैं, समै सधे जब आन ॥

मूसा बन गया पंसारी
पा गई गांठ हल्दी की ॥ टेक ।


चौरे चकोरे मांगे भीखे
मर पचकै दो चार पद सीखे
इतनेई गुण में गुनी नहीं दीखे
हो गये अहंकारी
बन बैठे पूंछ कवि की 1॥

मिलाकै आई काई भाई
सारी सासू बनी आताई
गुणियों से करते कुटलाई
नुगरों की मति मारी
नहीं खैर मनाते जी की 2॥

थोथे पिछोड़े उड़ उड़ जाते
थोथे थोथी बात बनाते
हमसे ही वाद लगाया चाते
विद्या ले रहे म्हारी
अब म्हारे ही बने शरीकी 3॥

ठोक-ठोक तुम्बों में लाठी
बांध अखाड़े बन गये ठाठी
महोरसिंह पै घाली चाहैं काठी
होगी जूत पुजारी
जब जात पड़ैगी फीकी 4॥

दोहा –
किसी समै हम एक, भूसन सिखाय स्वान ।
अब हमको ही पाड़न लगा, स्वान हुया बेईमान ॥

अब हमको ही पाड़न आता है
हमनेई तो भूसन सिखाया ॥ टेक ।


भूस नहीं सीख्या था जब तो
पूंछड़ को फरकाता तब तो
थोड़ा बहोत कुछ आ गया अब तो
देख देख गुर्राता है
नहीं अच्छी तरह तो आया 1॥

छोटा पिलूरा था जब डरता
पैरों में पड़ा लोटा करता हो
गया जवान धीर नहीं धरता
वृथा घौरकी लाता है
म्हारा झूठा टुकड़ा खाया 2॥

क्या तेरै ऐसा अक्ल अंधेरा
अपने पराये का नहीं बेरा
हमतो करैं मुलाजा तेरा
तू हमें डाढा चाता है
तेरा जांगा दांत तुड़ाया 3॥

भूंस भूंस अरे स्वान कपाली
क्यूं कपाल को करता खाली
महोरसिंह इस बात से काली
तुझको नहीं धमकाता है
म्हाराये स्वान कहाया 4॥

दोहा –
ज्ञानी से ज्ञानी मिलै, करै ज्ञान की बात ।
मूरख से मूरख मिलै, क्या मुक्का क्या लात ॥

मूरख मन मस्त गंवार तूं
क्या जानै सार गाने की ॥ टेक ।


बाप तेरे नै गऊ चराई
महंतारी नै बीत्य उघाई
तूं कद पीछै बना अताई
कल तक करता कार तूं
गाड़ी हलिया बाने की 1॥

बिना जोर करै बहसा बासी
ये ही ठोंठ तेरी बदमाशी
गया नहीं कभी मथुरा कांशी
पढ़ा नहीं दिन चार तूं
क्या वस्तु वाद लाने की 2॥

विद्याहीन शठ फिरै लुंगाड़ा
गुणियों सेती मारता आड़ा
महा अनाड़ी रचकर खाड़ा
होता फिरै ख्वार तूं
न्यू प्रभुता नहीं पाने की 3॥

बार-बार कहता हूं नंग से
गावै है तो गा तूं ढंग से
बेमतलब गुणी महोरसिंह से
करने लग्या तकरार तूं
मन में सिर पिटवाने की 4॥

दोहते के इक्कीस बान हुये
नानी मर गयी कंवारी ॥ टेक ।


पिता मूर्ख महामूरख दादा
प्याऊ दई ऊंट जनी लादा
नानेरा उनसे भी ज्यादा
पुत्र कहां से गुणवान हुये
थी फूहड़ जननेहारी 1॥

तुखम पलट तासीर पलट जा
बीज पलट हुये से कुलकट जा
कुलहीनों का मान सब घट जा
फिरैं दुनिया में बेईमान हुये
शठ करते गिल्ला गुजारी 2॥

बड़े वचन छोटे मुख बोलैं
वचन तुला से त्रिभुवन तोलैं
अमी सुधारस में विष घोलैं
फिरे क्रूर शैतान हुये
तोफान पै सुरती धारी 3॥

कुलकट कवि हुये घर-घर में
कविता पूर गई दर-दर में
समझ पकड़ कहता बर-बर मैं
महोरसिंह नादान हुये
तुच्छों पै कड़गती मारी 4॥

मन चंचल गोडे गार में
क्या हो जी ललचाये से ॥ टेक ।


मन करै रोज जनेती जाऊं
घी शक्कर से रोटी खाऊं
घोड़े चढूं टका नहीं लाऊं
बसूं शहर बाजार में
मिलै क्या दिल बहकाये से 1॥

कभी मन चाहै बनूं अताई
सभ गुणियों से बात सचाई
साज पै जा नहीं दमड़ी लाई
इकतारे के तार में
क्या होता मुख बाये से 2॥

कभी मन करै बनूं पंडित भारी
बिन पढ़े सभा जीतूं सारी
कभी चाहै बनूं बणज व्योपारी
बन बैठूं साहूकार मैं
बनै क्या नहीं मंगवाये से 3॥

झूठा सांग भरे से क्या हो
रीस पराई करे से क्या हो
महोरसिंह अब डरे से क्या हो
भूल्या शठ अहंकार में
समझै सिर पिटवाये से 4॥

दोहा –
सुगरे का गुरु ज्ञान है, नुगरे का गुर जूत ।
जबतक सिर लगै नहीं, मानै नहीं कपूत ॥

नुगरे का गुर जूत है
सिर पिटे बिना मानै ना ॥ टेक ।


भेड़ बिनौले खा नहीं जानै
गज नाल घाला नहीं जानै
नुगरा ज्ञान को गा नहीं जानै
लड़ने को मजबूत है
पय पानी को छानै ना 1॥

भैंस को बीन से कौन रिझाले
जोंख पत्थर कै कौन लगा ले
उसको सपूत कौन बना ले
जो जन्म से ही कपूत है
सत असत को पहचानै ना 2॥

अहि विष तजै ना दूध पिलाईं
नीम मिष्ट नहीं हो गुड़ सिंचवाईं
दुष्ट स्वभाव पलटते नाईं
उत गुरु महाऊत है
जो बुरी भली जानै ना 3॥

महोरसिंह कहै वृति हमारी
नुगरों से है बिलकुल न्यारी
गाली गलोज जूता पजारी
यह जिनकी करतूत है
शठ समता कै बानै ना 4॥

दोहा –
थी कवियों की पहोंच जहां, तक ना पौंचे भान ।
कलियुग के कवि चोरटे, हुये खद्योत समान ॥

कई छन्द बिगाने चोर के
बन गये गुणी के साले ॥ टेक ।


घर में देखो तेल न ताई
मर गई नार गुलगला आई
माँज माँज नित धरै कढ़ाई
देख गुलगले और के
दो घड़ी जी को ललचाले 1॥

टूटी छान में दिन जाते हैं
महलों के सुपने आते हैं
बे उनमान टूक खाते हैं
पता न अपने ज़ोर के
शठ फिरैं मारते फाले 2॥

गुड़ खाते पच गुड़ियानी के
ये ही काम हैं बेईमानी के
बदपरहेज दुश्मन प्रानी के
धिक उस जन्म चटोर के
जो जाण झूठ को खाले 3॥

शोभित तुरंग तोबर होता
छेली के मुख कभी न सोता
महोर सिंह क्यूं उमर को खोता
अपने साज टकोर के
नित राम हरिगुण गा ले 4॥