दोहा –
उलटे सैं सुलटा करै, करै जो अर्थ विचार ।
ऐसे गुनी महाराज के, हम हैं ताबेदार ॥
कोई अर्थ हमारे छंद का
नुगरा क्या समझ सकता है ॥ टेक ।
धरा बरषै भीजै अकाशा
जल बिन मरै पपैया प्यासा
अजब और एक देख्या तमाशा
खद्योत रवि और चंद का
नित प्रकाश हो ढकता है 1॥
भिडाव से करै अजा लड़ाई
स्याली नै सिंघनी दबाई
चूहे नै लई पकड़ बिलाई
चीटी को देख गयंद का
सब बल पराक्रम थकता है 2॥
बहरा राग सुनै बिन कानीं
गूंगा बोलै अमृतवानी
अंधे से नहीं परजा छानी
नकटे को स्वाद सुगंध का
मुर्दा भोजन चखता है 3॥
छोलै वृक्ष कुल्हाड़ा छुलता
तोलै तराजू बनिया तुलता
महोरसिंह कहै अर्थ ना खुलता
अब गुण गावो गोविंद का
क्यों आल-बाल बकता है 4॥