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नल दमयंती स्वयम्बर

ख्याल:-

निषधपुर नृप बीरसेन के पुत्र कहाए दो नल पुस्कल
आधा आधा राज बांट तपोवन को भूपति गया निकल ।

पुस्कल था जूए का खिलारी अश्वविद्या में निपुण था नल
रति पति का अवतार वेद विद्या का जिसमें पूर्ण बल ।
गुणों में स्वयांभू मनु की सम कई क्षोहणी का था बल
महोर सिंह कह नल राजा का तपै था धर्म का राज अचल ॥

दोहा:-

नल राजा ऐसे तपै, जैसे तपै दिनेश ।
बल विद्या के ज़ोर से, जीत लिए सब देश ॥

एक राजा विदरभ देश में,
हुया भीम नाम कहलाया ॥ टेक ।

धर्मधारी भूप विद्या निधि बड़ा बलवान,
बहुत से यत्न किए हुई नहीं संतान,
भाग का उदय हुआ दम्य ऋषि पहुंचे आन,
चतुर्मास वास किया ऋषि दिया बरदान,
बोल्या हस्त रेख देख चार संतति का लेख,
तीन पुत्र पुत्री एक,
बस और क्या कहूं विशेष मैं
इतना ये लेखा पाया ।1॥

दे कै वरदान ऋषि वन को गए सिधार,
समय पाय भूप कै संतान पैदा हुई चार,
दम, दमन, दांत पुत्र देवतों के अवतार,
दमयंती नाम पुत्री लक्ष्मी के उणिहार,
निरख दमयंती का रूप पुत्री रत्न है अनूप,
बोल्या रानी सेती भूप
मालिक नै महाक्लेश में,
सर्वसुख हमको दरसाया ।2॥

नल की प्रसंशा करती आवै जन समुदाय,
दमयंती तेरे जोग वर निसध देश मांय,
नल से कहैं हैं जाकै दमयंती परनाय,
रति का अवतार सती गुण नहीं बरण्या जाय,
खान पान दिये त्याग परस्पर लौ गई लाग,
दमयंती का बैराग,
भर गया इस कदर नरेश में,
घर तज बणखंड को ध्याया ।3॥

रात दिन वनों बीच रहने लग्या भूपाल,
सुनहरी पंखों के हंस एक दिन आए चाल,
राजा नै पकड़ लिए अपना बिछा कै जाल,
त्राहि त्राहि करते डरते भूप से बोले मराल,
ज्यान बख्स दे नरेश, तेरा पुगावैं संदेश,
बीच साखी हैं दिनेश
तेरा जस रह ज्यागा शेष में,
पद महोर सिंह नै गाया ।4॥

दोहा:-

हंसो के सुनकर वचन , काट दिया है जाल,
छोड़ दिया निज जान कर , बोल्या नल भूपाल ॥


संदेशा ले कै जाना हो बिदरभ देश ॥ टेक ।

जहा भीम भूप, पुत्री अनूप, दमयंती रूप की है धाई
जाकी सुन कै साख, लग गया फिराक सर्वस है खाक बिन परनांई
दिया राज त्याग, ले लिया वैराग, होकै बेलाग, फिरूं बन मांई
लगती ना भूख, गया अंग सूख, करनी में चूक, है जब तांई
बन में बैठ देह को गालूं सहूंगा कोट कलेश 1॥


सुन उड़े हंस, देवो के अंश, पक्षिन के वंश, में देहधारी
उड़कर खगेश, गए विदर्भ देश, पुत्री नरेश, की है प्यारी
दमयंती जहां, उतरे हैं वहां, सखी कहैं गहां, इनको सारी
लिए पक्षी घेर, कर लिए जेर, दे रहे टेर, जब नभचारी
गुप्त संदेशा ले कै आये भेजे हैं निसिध नरेश 2॥


देकर विश्वास, गए बैठ पास, नल का इतिहास, बरण्या सारा
है तुल्यरूप, जोड़ी अनूप, भूपन का भूप, दल बल भारा
जद बोली सती, मेरा नल हो पति, कौन कर्मगति, मेटनहारा
मैं तो नल को वरूं, नहीं प्राण हरूं, विष खाकै मरूं, यही प्रण धारा
बन बन ढूंढ बरूंगी नल को करकै जोगन भेष 3॥


हंसो की डार, का किया सत्कार, दिये पंख पसार, नभ में ध्याये
मोतियन की माल, गल में विशाल, फिर पक्षी चाल, नल पै आये
दिये समंचार, नृप की कुमार, रही प्रण धार, सुन हर्षाये
दुख हुया दूर, चढ़ गया नूर, आनंद भरपूर, उर में छाये
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी लग रहा ध्यान हमेश 4॥

दोहा:-

दमयंती का मन खिंचा, बसा है नल में जाय ।
खाना पीना छूट गया, रही उदासी छाय ॥



दमयंती का हाल महल में पूछ रही माता ॥ टेक ।

छूट गया तेरा खाना पीना
अब पुत्री मुश्किल है जीना
कृष शरीर रहै बदन मलीना
देख्या नहीं जाता 1 ॥

जागृत रहै कभी ना सोती
अष्ट पहर चितवन में खोती
कभी ना हंसती दीखै रोती
कौन याद आता 2॥

हरदम रहै उदासी छाई
बता पुत्री क्या है दुखदाई
तेरे रोग की करूं दवाई
जो तुझको खाता 3॥

जिगरी रोग लगा क्या तेरै
जल्दी बता भ्रम है मेरै
महोर सिंह भाषा पद टेरै
कथ कथ कै गाता 4॥

दोहा:-

सखियों से सब सुन लिया, दमयंती का हाल ।
रानी पहुंची जायकर, जहां भीम भूपाल ॥



घर समरथ पुत्री कंवारी नींद पिया कैसे आती है ॥ टेक ।

हर दम सहेलियों में बसती
ना कभी इनसे बोलती हंसती
महलों से भी बाहर निकसती
हुई शर्माती है 1॥

रजो धरम हो ज्या कुंवारी कै
लगै दोष पिता महतारी कै
काम कला बालम प्यारी कै
अंग दर्शाती है 2॥

अब कहना मानो देर मत लाओ
रचो स्वयंबर दूत पठाओ
भूप बुला पुत्री परनाओ
पर्वी जाती है 3॥

जो अब पुत्री परनावोगे
कोट यज्ञ का फल पावोगे
महोर सिंह फिर पछतावोगे
धर्म संगाती है 4॥

दोहा:-

रानी वचन प्रमाण कर, सभासद लिए बुलाय ।
शुभदिन धर दे पत्रिका, दीन्हे दूत पठाय ॥


अजी एजी राजा रानी का कह्या मान
रच्या स्वयंबर दमयंती का शुभ अवसर में आन ॥ टेक ।

गणपति मनाय ध्याय देवी भैरूं हनुमान
देवतों की पुजा करकै मंडप दिया है तान
यज्ञ वेदी रची ऋषि मुनियों नै आन आन
राजों का निवास खास बना एक पिंडाल
आसन बिछाए ल्याये बहुत घने धनमाल
छप्पन और छत्तीस भोग ब्यंजन भीम भूपाल
बनवाये पकवान 1॥

पढ़ पढ़ परवाना राजा चढ़ चले बेसुम्मार
करहों की कतार और हाथियों की आवैं डार
घोडों का सुम्मार नहीं रथ हज़ारों हज्जार
धोंसों की टंकोर घोर शूरवीर गाज रहे
जहां देखैं वहीं बाजे आनंद के बाज रहे
चक्रवर्ती राजा निज वाहनों को साज रहे
गड़वाये आय निशान 2॥

इसी अवसर बीच चलकर नारद मुनि स्वर्ग गये
कुशल पूछ इन्द्र आदि देव चरणों बीच नये
नारद मुनि बोले भूप विदर्भ में इकट्ठे भये
रच्या है स्वयंबर दमयंती बड़ी शुभदायक
शची की समान जान मांग इन्द्र तेरे लायक
वाको परनाओ कहकर देवों के सदा सहायक
हो गये अंतर्ध्यान 3॥

मुनि के वचन सुन इन्द्र, वरुण, धर्मराज
चांद, सूरज, वायु. अग्नि वाहनों को साज-साज
ज़ोर बांध चढ़े कहैं दमयन्ती को परणो आज
मार्ग बीच आते नल देवतों की नज़र पड़े
देखकै अनूप रूप देव सब हुये खड़े
महोर सिंह पद गावै भाषा बीच छंद जड़े
भारत का आख्यान 4॥

दोहा:-
कहां सेती आना हुया, और क्या है आपका नाम ।
कौन देश के भूप हो, और जा रहे किस काम ॥


राजा मैं निसिध देश का नल है मेरा नाम ॥ टेक ।

निसध देश से आय रहा हूं
बिदरभ को अब जाय रहा हूं
दमयंती बरूं चाह रहा हूं
और ना दूजा काम 1॥

तुम हो कौन वेग बतलावो
मेरे मन का भ्रम मिटावो
कहां से आए कहां तुम जावो
कौन तुम्हारा धाम 2॥

बोले देव सुन नल की बानी
हम हैं देव स्वर्ग रजधानी
दमयंती बरणे की ठानी
उसमें बंधी है माम 3॥

सुनकर वचन गहे नल चरणा
मैं हूं दास आपका शरणा
दमयंती को चलकर वरणा
आ रहे भूप तमाम 4॥

सुनकर वचन देवता सारा
नल राजा से बचन उचारा
तू म्हारा बन ज्या हलकारा
बीरसेन के जाम 5॥

दमयन्ती के पास तू जाईये
देव आ रहे जा सुनाईये
महोर सिंह नित उठ गुन गाईये
सुध लेंगे सियाराम 6॥

दोहा:-

सत्यव्रती तेरा नाम है, बीरसेन के पूत ।
वचनों का पालन करो, बनो हमारे दूत ॥


वर दे दिया जा रणवास में, नहीं रोक टोक हो तेरी ॥ टेक ।

दूत बनकै नरेश, चला लेकै संदेश, हुया पुरी में प्रवेश, महलीं ध्याया
होती नहीं रोक टोक, चरणों में सिर झोक, नर नारी मारैं धोक, कोई देव आया
सातों ड्योढ़ियों को लांघ, गया जहां खड़ी मांग, देख्या देव कैसा सांग, चित हुलसाया
हो गई मति भंग, उठैं काम की तरंग, रोम रोम में अनंग, देख प्रगटाया
नहीं झांपती हैं नैन, चित को ना पडै चैन, हाथ जोड़ बोली बैन, कंपै काया
तुम हो कौन महाराज, यहाँ आए किस काज, मेरा नल सरताज
बैठी हूं उसकी आश में, कब पूर्ण आश हो मेरी 1॥

तेरी सुनी करतूत, भेजा देवतों नै दूत, बीरसेन का हूं पूत, नल नाम मेरा
तेरी पूर्ण हुई आश, होगा स्वर्ग में निवास, कर देवों से विलास, धन भाग तेरा
माया हरी की प्रबल, बर सकै नहीं नल, देव आय गए चल, सिर साज सेरा
अब बैठकै विमान, चल स्वर्ग दरम्यान, समय सध गई आन, तज अंधेरा
जहां अमीरस भोग, कोई रोग नहीं शोग, बैठा आयकै संजोग, नल न्यू टेरा
चल फुलमाला गेर, मत नहीं लावै देर, बार बार रह्या टेर
सुन खड़ी हुई आ पास में दमयंती की सहचेरी 2॥

दमयंती नाय माथ, दोनों जोड़ लिए हाथ, तुम सुनो प्राणनाथ, मोहे तेरी शरण
प्राण प्यारे तेरे हेत, कंचन काया करी रेत, मेरे लागे राहू केत, देव आ गए बरण
मैं तो आपको वरूंगी, नहीं प्राणों को हरूंगी, घात आत्मा करूंगी, मेरा यही परण
दमयंती अकुलाय, नैनी नीर रहया छाय, कर रही त्राय त्राय, लिए पकड़ चरण
सखी लाओ फुलमाल, अभी गल में द्यूं डाल, सभी देव जांगे चाल, आए पैज हरण
जैसे चाँद को चकोर, घन गर्जना को मोर, निरख निरख चहुं और
चितवूं थी श्वास दर श्वास में
आप ही को मैं हर बेरी 3॥

देख दमयंती का भाव, चित भर गया चाव, जद बोल्या नल राव, सुन प्राण प्यारी
मेरी और कर ख्याल, दूत बनकै आया चाल, जो मैं पहरुं फुलमाल, हो ज्यां धर्महारी
चोरी दावै किए काम, तू भी होज्या बदनाम, भूप आ रहे तमाम, छत्तर धारी
उनके बीच बैठूं जाय, जब माला पहराय, तोहे ले ज्यां परणाय, देखैं नर नारी
बस अब तो मैं जाऊं, हाल देवों को सुनाऊं, फिर उनके संग आऊं, कर कै त्यारी
इतने बैन कह नल, गया महलों से निकल, भावी सबसे प्रबल
पाई जो लिखत इतिहास में
कथ महोर सिंह नै टेरी 4॥

दोहा:-
महलों से नल चल पड़ा, गया देवों के पास । कुछ अंतर रखा नहीं, सुना दिया इतिहास ॥

चलो स्वयंबर में महाराज आज दमयंती आवैगी ॥ टेक ।

जम्बू द्वीप के अदना आला
स्वयंबर में आ रहे भूपाला
देखैंगे किस कै फुलमाला
गल पहनावैगी 1॥

एक रूप एक उमर बना ल्यो
चल स्वयंबर में आसन ला ल्यो
किसी प्रकार चलकर अजमा ल्यो
नल परनावैगी 2॥

बात बात का उत्तर देती
बर बर नाम दास का लेती
देखैं किस विध नल कै सेती
ब्याह रचावैगी 3॥

जैसे देव वैसा ही नल है
एक उमर और एक शक्ल है
महोर सिंह भावी प्रबल है
मेल मिलावैगी 4॥

दोहा:-

मंडप कै नीचे गए , हो कर एकाकार ।
आसन पर बैठा दिये , किया भीम सत्कार ॥


अबसो लेकै फूलमाल दमयंती चली ॥ टेक ।

बाजे बज रहे आपार
होय रही जय जयकार
सारे साज कै सिंगार
उठी भीम लली
सखी सुहेली हैं साथ
छत्र चंवर लिये हाथ
नवा देवतों को माथ
घर से निकली 1॥

आगै भीम की कुमार
सखी चली लार लार
जैसे कुंजन की डार
बन कै अदली
रंग रूप में ना चूक
निरख निरख भागै भूख
रही कोयल सी कूक
गावैं राग मंगली 2॥

चंद्ररेख की भलक
आवैं पड़ती झलक
भूप झापैं ना पलक
लगी तला मली
टकटकी रहे लाये
गुप्त रहे बतलाय
इसे ले जा परणाय
वो है भाग बली 3॥

भूप गए है दमक
सही गई ना झमक
मानो रही है चमक
घन में बिजली
कहै महोर सिंह कवि
कैसे गाय सकै छवि
मानो उदय हुया रवि
खिली कमल कली 4॥

ख्याल:-

सुमर शारदा दमयंती नै सुमरी दुर्गा मांई जी
पिता अपने की आज्ञा पाकै कर जयमाल उठाई जी ।

सारी सभा को करकै नमन राजों के सन्मुख ध्याई जी
नल राजा को फिरै ढूंढती देता नहीं दिखाई जी ।

जहां बैठी देवों की सभा चलकर दमयंती आई जी
एक सी सूरत एक सी मूरत निरख निरख घबराई जी ।

नल कै धोखै और किसी को गई माला पहनाई जी
धर्म नष्ट हो ज्यागा मेरा महोर सिंह छवि गाई जी ॥


दोहा:-

सतवंती का सभा में, सत रखियो भगवान ।
ऐसी बुद्धि दीजियो, नल को ल्यूं पहचान ॥



देवों के बीच बैठा नल दमयंती नै लिया पहचान ॥ टेक ।


शुद्ध आत्मा सत की ग्रंथि
देव-देव को शीश नमन्ती
देवों नै देखी दमयंती
भर दिया घट में ज्ञान 1॥

कभी इधर कभी उधर को टलके
उसी जगह आ खड़ी हो चलके
थोड़ी देर में राजा नल के
भासन लगे निशान 2॥

नल धरणी से पर्श रह्या है
भाल पसीना दर्श रह्या है
छाया तन आकर्ष रह्या है
पलक झपैं हैं आन 3॥

नल निश्चय कर गह लिए चरणा
नैसिध लिया मैं आपका शरणा
महोर सिंह पूरा हुआ परणा
दया करी भगवान 4॥

दोहा:-

दमयंती निश्चय किया, यही है नल भूपाल ।
सकल सभा से विनयकर, पहरा दई फुलमाल ॥


अजी एजी नल कै गल फुलमाल पड़ी
देवों के आगै दमयंती जोड़े हाथ खड़ी ॥ टेक ।

शरण हूं तुम्हारी तुम शरणागत के हो मां-बाप
जानकै अनाथ नाथ दया दृष्टि करो आप
नल में है प्रेम मेरा आप मत दियो श्राप
दमयंती का देवों नै शुद्ध भाव लिया जान
होय कै प्रसन्न जद देने लगे वरदान
दूजा ओर देव नहीं सती पति के समान
सत की बात बड़ी 1॥

इन्द्र का वरदान उत्तम गति लोक मिलै तोय
यज्ञ बीच साक्षात देवतों का दर्श होय
धर्मराज नल को वरदान देने लगे दोय
धर्म में हो बुद्धि तेरी भोजन अमी रस होय
वरुण का वरदान चितवत्त अस पस होय
दई पहराय जग बीच तेरा यश होय
माला रत्न जड़ी 2॥

अग्नि का वरदान भय मेरा तुझे होगा नाय
जहां याद करैगा वहां प्रगट हूंगा आय
देवतों नै आसन तजे आशिखा दई सुनाय
साज कै विमान देव स्वर्ग को गए सिधार
अनहद बाजे बजन लगे होए रही जय जयकार
भूप सब खड़े हुए चलने को तैयार
मच गई तड़ा भड़ी 3॥

आये हुए राजाओं का भीम सत्कार करै
छप्पन भोग छत्तीस व्यंजन खूब जीमनवार करै
जाते हुए राजाओं से उमंग उमंग प्यार करै
जाते हुए देवतों से मग में मिला कलिकाल
देवतों से सुन लिया स्वयंबर का सारा हाल
महोर सिंह कली कोपा हूणी की ना होती टाल
कर्मों की रेख अड़ी 4॥

दोहा:-

विवाह की तैयारी हुई, मंगवाए सामान ।
मंडप नीचै बैठ गए, ऋषि मुनि सब आन ॥


भूप ने ब्याह रचाया जी
नल संग दमयंती का ॥ टेक ।

मंडप नीचै बैठ गए नल दमयंती आय
स्वस्ति वाचन कर रहे ऋषि मुनि धुनि लाय
देव पूजन करवाया जी 1॥

कुलों की शाख सुना रहे ऋषि मुनि महाराज
मंगल गावैं कामनी साज रहे हैं बाज
आंगन में रंग बरसाया जी 2॥

बंदीजन वंशावली बंश की रहे बखान
भीम भूप शुभ लगन में कर दिया कन्यादान
बहोत सी दे दई माया जी 3॥

दास और दासी दिये पनस पालकी साज
गज बाजी करहे दिये रथ दिये बे अंदाज़
सभी पै साज सजाया जी 4॥

पतिव्रत नारीव्रत के हो गए पक्के नेम
नल दमयंती का बढ़ा हद से ज्यादा प्रेम
परस्पर वचन भराया जी 5॥

ब्याह बेदी पूर्ण भई बटन लगी है भूर
ऋषि मुनि दें आशिखा बाजन लागे तूर
महोर सिंह पद कथ गाया जी 6॥

है यही प्रतिज्ञा मेरी,नल को बर्बाद करूंगा ॥ टेक ।

मिल ज्या बखत बाट हेरुंगा
जब अपनी माया फेरुंगा
नल राजा में बिखा गेरुंगा
देकर त्रास घनेरी
उसका मद मान हरूंगा 1॥

सब देवों का किया निरादर
गये भूप करवाय अनादर
नल राजा का कीन्हा आदर
गल फुलमाला गेरी
दमयंती मैं नहीं टरूंगा 2॥

दमयंती मेरै मन मानी
बरने की मैं मन में ठानी
वा नल की बन गई पटरानी
करकै हेरा फेरी
मैं अपने घाव भरूंगा 3॥

नंगे पैर घर से कढ़वाऊं
तो मैं कलि नाम कहाऊं
महोर सिंह कह अब मैं जाऊं
गैल रहूं हर बेरी
नल से ना दूर बिसरुंगा 4॥

दोहा:-

कलियुग के सुनकर वचन, बोल्या देव समाज ।
नल दमयंती हैं बेगुनाह, तुम कोपे किस काज ॥


वो सत्यव्रती भूपाल है
मत नल पै बुरी विचारै ॥ टेक ।

ऐसी कौन त्रिया जग मांई
नल को देख बरया चाहवै नांई
विधना नै वा जोड़ी मिलाई
तूँ मूर्ख कलिकाल है
निज कर्म को नहीं निहारै 1॥

तू कहै नल का कीन्हा आदर
देवों का कर दिया निरादर
भूप गये करवाय अनादर
ये तेरा झूठा ख्याल है
जचती ना एक हमारै 2॥

स्वयंबर में आई सतवन्ती
हाथ जोड़ती शीश नमन्ती
राजा घने एक दमयंती
एक ही कर में माल है
सब के गल कैसे डारै 3॥

स्वयंबर नाम वो ही कहलाता
स्वयं आप वर ढूंढा जाता
महोर सिंह जो रची विधाता
उसकी तो नहीं टाल है
क्यूं बिरथा पैज तूं धारै 4॥

मैं कभी नहीं चुकूंगा बाजी लग गई नल से ॥ टेक ।

दमयंती तो मांग थी मेरी
क्यूं नल कै फूलमाला गेरी
द्यूंगा उसको त्रास घनेरी
अपने छल बल से 1॥

विधि ने नाम धरा कलिकाला
सब कालों से काल निराला
नल दमयंती की फुलमाला
कढ़वाऊं गल से 2॥

नंगे पैरीं शीश उघाडीं
घर से काढूं दे कै साड़ी
सबर ना आवै बिना लिकाडीं
मिलूं ना अन्न जल से 3॥

लाख कहो नहीं माफ करूंगा
बिखा गेर संताप करूंगा
महोर सिंह कहै आप करूंगा
प्रीति पुष्कल से 4॥

कलिकाल टालकर मान कही
मत नल से वाद लगावै ॥ टेक ।

इसमें दशों धर्म के लक्ष्ण
वेदपाठी विद्वान विचक्ष्ण
हित से करै प्रजा का रक्षण
ध्वजा धर्म की फरक रही
सत्यवादी नाम कहावै 1॥

सदाचारी यज्ञों का करता
हरि का नाम कभी ना बिसरता
गौ द्विज संतजनों का भरता
शोभायमान हो रही मही
उसको भी त्रास दिखावै 2॥

औरों को दुख कोई देगा
दिये दुख का फल आप पा लेगा
तै लिया बांध बदी का सेगा
कलियुग तेरी बुद्धि बही
बेमतलब बात बढ़ावै 3॥

इतनी कहकर नल के प्यारे
चले देवता स्वर्ग सिधारे
महोर सिंह कथ छंद उचारे
अनहोनी होने की नहीं
हूणी को कौन मिटावै 4॥


ख्याल:-

पहुंचे देव स्वर्ग और जाते ही परवाना लिखवाया जी,
जल्दी देने को नल विषय देवों नैं दूत पठाया जी ।

मन का है वेग दूत का चल निसिद्ध देश मे आया जी,
नल को दई पत्रिका आन महोर सिंह गुण गाया जी ॥