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चंडी कथा

दोहा –
अश्व नै घर्षण करया, शिला त्रिया तस्वीर ।
भिड़ते ही यज्ञ तुरंग का, हुया पाषाण शरीर ॥


शिला भिड़ते ही यज्ञ तुरंग की
बण गई देह पाषाणी ॥ टेक ।

पार्थ को हो रही दुखदाई
अचरज करैं देख अनुयाई
विंध्याचल पर्वत के माईं
बात बणी बेढंग की
सब बोले आरत बाणी 1॥

अर्जुन कहै हिम्मत मत हारो
बिगड़ा काम सुधरै तो सुधारो
जाय तुरंग कै चाबुक मारो
करो परीक्षा अंग की
काया में हैं कि नहीं प्राणी 2॥

अब तुम वीरो वन में जाओ
तापस का कहीं पता लगाओ
पता लगा के जल्दी आओ
सिलामई अर्धंग की
चल पूछैं कथा कहाणी 3॥

जो कोई पता ऋषि का लावै
आते ही ऊच्चासन पद पावै
महोर सिंह नित हरि गुण गावै
यह महिमा सत्संग की
सत्संगी मिलैं ठिकाणीं 4॥

दोहा –
अश्व जुमस खाया नहीं, कर लिया मुष्टि प्रहार ।
पार्थादि भूपाल सभ, कर रहे सोच विचार


मैं अब क्या जतन बनाऊँ पार्थ कर रह्या सोच विचार ॥ टेक ।


यज्ञ हमारी भंग हो गई
बात बड़ी बेढंग हो गई
सेना सारी तंग हो गई
अश्व का रूप निहार 1॥

भले शगुन भये झूठे पड़ गये
कर्म भोग आगै आ अड़ गये
हाव भाव चित चाव बिगड़ गये
भावी के अखत्यार 2॥

सिद्ध योग में करा पयाना
निष्फल हुया तुरंग संग आना
बिन दिग्विजय करे घर जाना
सब तरियौं बेकार 3॥

वन में ऋषि तल्लाश करूंगा
श्रवण शिला इतिहास करूंगा
महोर सिंह बनवास करूंगा
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
पार्थ हांडै खोजता, गौह्वर वन के मांह ।
महती चिंता हो रही, आश्रम दीखै नांह ॥


वार्ता- ऋषि सौभरी कहते हैं

भिनक पड़ी कानी हो रही वेद धुनी ॥ टेक । (जंगम)

वन पर्वतों के बीच, दीखे वाटिका बगीच, नीर बहै मचा कीच, जल झरने झरैं
पक्षी कर रहे किलोल, मधुर वाणी रहे बोल, माच रही रमझोल, आलाप भरैं
आ आ शेर गऊ ठाठ, पानी पीवैं एक घाट, गऊ शेर को रही चाट, बड़ा प्रेम करैं
शस्य अजा और भिडाव, ना किसी का बैरभाव, चिड़िया मूसक बिलाव, निर्भय विचरैं
नकुल गरुड़ और भुजंग, तीनों देखे एक संग, अश्व महिष स्वान कुरंग, जहां खेलते फिरैं
सबकी देखी मित्रताई, ना किसी की दुश्मनाई, पार्थ कहै यदुराई, मेरा कष्ट हरैं
आगै बढ़ा जद आश्रम दीख्या आश्रम में बैठे हैं मुनी 1॥


पहौंचा आश्रम के माईं, जहाँ बेद धुनि छाई, गुरु सेवक सुखदाई, पढैं ब्रह्मचारी
कोई विप्रराज पूत, सोहै अंगों पै विभूत, जटाधारी अवधूत, शाक फलाहारी
नम्र होकै कुंती जाम, किया दंडवत प्रणाम, स्वागत कर पूछा नाम, बोले धनुषधारी
हथनापुर का हूं बासेरा, निज नाम अर्जुन टेरा, यज्ञ करै बंधु मेरा, धर्म अवतारी
भिड़कर शिला कै तुरंग, हुया पाषाणमई अंग, म्हारी यज्ञ हुई भंग बणी लाचारी
अटकी मझ में जिहाज, पार करो माहाराज, शरणै आपकै हैं आज
पठन पाठन करा बंद पारथ की आरतबाणी सुनी 2॥


मुनी बोले धर ध्यान, सुनो शिला का आख्यान, त्याग मन कि गिलान, मिटै दुखदाई
जो निमित हो सो होय, मरै मारै नहीं कोय, दई भावी नै संजोय, भारथ की लड़ाई
जगत स्वपन्न की समान, क्षण भंगुर है जिहान, मनै सुने थे विद्वान, पांचौं भाई
ये क्या विद्वानी तुम्हारी, अश्वमेध बिस्तारी, घर में सदा हितकारी, जादूराई
सुंदर उपवन के बीच, त्याग मलियागर को नीच, रहा अरण्ड को सींच, मूरखताई
जिसकै वैडुर्यमणि पास, करै काचमण की आश, हुया नहीं विश्वास, भ्रमता छाई
शिला का हाल सुनाऊँ सुन एक त्रिया थी जिगर भुनी 3॥


  चंडी कर्कसा था नाम, थी वा उद्यालक की वाम, सारा उल्टा उल्टा काम, करने वाली
कही ऋषि नै बहोत, कुटिया कुं लीप पोत, चास देवतौं की जोत, आई ब्याली
कुटी दई तोड़ फोड़, खडे खोदे ठोड़ ठोड़, फिर गई च्यारूं ओड़, लेकर कुदाली
ऋषि बोल्या मीठी बाणी, उठ घर घरियाणी, ल्या समिध कुशा पाणी, बकण लगी गाली
ढाया कुंड का किनारा, तुंबा फोड़ दिया सारा, कहना मान ले हमारा, तेरा ताली
मेरा धर्म गया छूट, तकदीर गई फूट, छाती माथा मूंड कूट, रोई कंकाली
कथा विचित्र अश्वमेध पर्व की कथै महोर सिंह गुनी 4॥

दोहा –
ऋषिजी धोखा धर रहे, उदय हो गये पाप ।
योग समाधी छुट गये, छुटे जज्ञ और जाप ॥


तकदीर मेरी बल खा गई
किसकै सिर दोष धरूं मैं ॥ टेक ।

पाप उदय हुये चंडी ब्याही
हो गई मोहे महा-दुखदाई
कर्म रेख ना मिटै मिटाई
भावी मेल मिला गई
फिर कैसे नहीं वरूं मैं 1॥

कह्या न मानै स्वतंत्र रहै है
उल्टा वचन कुबाच्य कहै है
बिनाग्नि काष्ट शरीर दहै है
कलहा घर में आ गई
नित नये नये दुख भरूं मैं 2॥

छूट गये सब योग समाधी
बिन षटकर्म करै अपराधी
उंवर सधि लग चुकी है ब्याधी
बुद्धि मेरी बौरा गई
फांसी खा प्राण हरूं मैं 3॥

नारद नै मेरी मति मारी
करी कराई खो दई सारी
महोर सिंह को चिंता भारी
मौत शीश पर छा गई
जानै किस बिध मरूँ मैं 4॥

ख्याल-
उसी अवसर को कौडिन्य मुनी उद्यालक के आश्रम आये
कर स्वागत सनमान ऋषि जी आसन ऊपर बैठाये ॥ टेक ।


कुशल पूछी कौडिन्य नै उद्यालक के जल भर आये नैन
गदगद वाणी होय गई मुख से नहीं बोला जाता बैन
पूछै मुनी क्या दुख है आपको उद्यालक जी लगे कहन
तापी में तेल तपै है जैसैं उसी तरह तापूं दिन रैन
नित्य नैमित्तक कर्म मेरे चंडी कलहा नै छुटवाये 1॥

उल्टी बोलै उल्टी चालै उल्टे उल्टे सब करती काम
संध्यावंदन छूटे फिकर चिंता में जाते आठों याम
जो मैं कहूँ कुटिया में सो ज्या कुटी बाहार करै विश्राम
सोवै ना बैठी बैठी कलहा वदीत कर दे रात तमाम
जीवन जन्म बिगड़ गया मेरा संचित कर्म के फल पाये 2॥

परसूं तरसूं पिता का दिन चंडी नहीं करने देगी श्राद्ध
जांगे पित्र निराश मेरे किसी तरह क्षमा नहीं हो अपराध
स्वास खींच कपाली चढ़ा बैठूँगा लगाकर ब्रह्म समाध
प्राण त्याग कर दूंगा जिस घड़ी को तपकाल दिन की हो आध
सारा दुख वर्णन करा तब कौडिन्य मुनी नै समझाये 3॥

उल्टे बोलो आप चंडी से उल्टी उल्टी बात करो
उल्टे हुये वा सुल्टी होज्या आनंद फिर दिन रात करो
सुल्टे वचन भूल नहीं कहना तबदील सब ख्यालात करो
बिगड़े काम सब सुधर ज्यागें तुम क्यों आत्मा का घात करो
शिक्षा दे उठ चले मुनी जी महोर सिंह नै गुण गाये 4॥

दोहा –
दिनभर कुछ बोला नहीं, होय गई जब रैन ।
चंडी से कहने लगे, मुनिजी उल्टे बैन ॥


ना कुटी में सोने द्यूंगा चंडी बाहर तूं कर विश्राम ॥ टेक ।

कुटिया में नहीं बड़ने द्यूंगा
सेज पै तुझे ना चढ़ने द्यूंगा
तन से तन नहीं भिड़ने द्यूंगा
है तूं कुटिल कुजाम 1॥

सुनकर वचन कर्कसा टेरी
अर्धम अर्धा शैया मेरी
तूं पति मैं पत्नी हूं तेरी
सत्य बादिनी नाम 2॥
चंडी सेज पतिपास सो गई
मुनी के गल का हार हो गई
लहराया तन मन को मोह गई
बंधी परस्पर माम 3॥

मुनी कहै भोग विलास करूं ना
ब्रह्मचर्य का नाश करूं ना
सन्तान की पैदास करूं ना
कुटम्ब में नहीं आराम 4॥

चंडी कहै भोगौंगी भोग जी
जोड़ी मिली है जोगां जोग जी
बिन कुटम्ब है शुष्क योग जी
भाषैं वेद तमाम 5॥

हाव भाव देखे नारी के
बिसर गये दुख तपधारी के
महोर सिंह दुनियादारी के
करने पड़े सभ काम 6॥

दोहा –
केली क्रीड़ा में गई, च्यार पहर की रात ।
उलटे वचन बोले मुनी, उगमते परभात ॥


कल श्राद्ध पिता का करूं नहीं करने द्यूंगा ॥ टेक । (जंगम)

जद सुने ऋषि के बैन चंडिका भड़क उठी बोली बाणी
तूं कौन श्राद्ध का नहीं करणिया मैं हूं घर की धणियाणी
मैं सास ससुर का श्राद्ध करूं पोषूँगी पित्र द्यूंगी पाणी
श्रद्धा समान दिछणा द्यूंगी ना छोडूंगी कसर अपणै जाणी
मेरा करा कराया निष्फल हो जो तुम करोगे खींचाताणी
मुनी कहै मरजी हो सो कर पिंड नहीं भरने द्यूंगा 1॥

तूं विप्र जिमावै तो ऐसे जिमा लंगड़ा लौंजा अँधा काणा
गंजा खंजा कुष्टि क्रोधी स्तेयी निंदक एंचा ताणा
अनपढ़ मलीन कुलहीन कलंकी जाती पतित चुन चुन लाणा
सुल्फई शराबी सर्वभक्षी ल्या जाहां तक बजैं तेरा बाणा
संध्या गायत्रीहीन जुवारी वेश्यांगामी और हड़खाना
जैसे मैंने बतलाये विप्र ऐसा ब्राह्मण मुश्किल पाणा
सदाचारी ल्याई तो कुटी में पग नहीं धरने द्यूंगा 2॥

पति श्राद्ध का भंग करणिया आपनै अच्छा ब्राह्मण बतलाया
चले जाते पित्र निराश श्राद्ध में जो इनकी पड़ ज्या छाया
मैं उन विप्रों को जिमाऊँगी जिनमें नवगुण हों दर्शाया
सदाचारी वेदपाठी षटकर्मी जिसनै महर्षि पद पाया
ऐसे विप्रों को न्योत जिमाऊँ करूं अपने मन का चाया
मैं श्रद्धा भक्ति से श्राद्ध करूं बरस दिन में पितृदिन आया
मुनी कहै वेदमंत्र कुटिया में ना मैं उचरने द्यूंगा 3॥

  पाक बना ऋषियों को बुला विध सिध से श्राद्ध तर्पण कीन्हा
भूले बिसरे पितरों का आवाहन कर चंडी नै जल दीन्हा
ब्रह्मभोज करा दक्षिणा दे परकम्मा ला ऋषियों का चरण लीन्हा
परमानंदित हो मुनी कहन लग्या मेरी त्रिया है चातुर परबीना
कहै पिंड परोया गंगा में हो गया ऋषि जी मतिहीना
महोर सिंह बुढापै घेर लिया अब तो है तेरा बिरथा जीना
मैं नित मरना मांगू काल कहै अभी नहीं मरने द्यूंगा 4॥

दोहा –
ऋषि सौभरी कह रहे, हूणी हो सो होय ।
विधि की वर्णावली को, मेट सकै ना कोय ॥


उस चंडी नै बड़ा जुलम करा
उठा पिंड अगन में गेरा ॥ टेक ।

मुनिवर कै ब्रह्माग्नि जागी
देख कर्कसा कांपण लागी
इधर उधर फिरै भागी भागी
दृग लख उल्टापन बिसरा
जब बचन मुनीजी टेरा 1॥

जिगर जलाकर राख बना दिया
तपधन मेरा खाख बना दिया
कर्कसा कूं बचन भाष बना दिया
श्राप देता हूं दुख भरा
अब कर्म बाज गया तेरा 2॥
पति नै श्राप त्रिया को दीन्हा
कोमल तन पत्थर का कीन्हा
पाप किये का फल पा लीन्हा
कर्कसा का मदमान हरा
आंखीं छा गया अंधेरा 3॥

  हाथ जोड़कर चंडी टेरी
प्राणनाथ पत्नी मैं तेरी
कद या जूण छुटैगी मेरी
महोर सिंह नै पद उचरा
गुरुओं के चरण का चेरा 4॥

तब जून छुटैगी तेरी
जब पंडू जज्ञ करैंगे ॥टेक।


अर्जुन का घोड़ा आवैगा
भिड़ते ही पत्थर बन जावैगा
अर्जुन आकै हाथ लावैगा
लाते ही भाग बडेरी
तेरे सभ कष्ट हरैंगे 1॥

जो पतियों से वाद लगाती
कह्या ना मानै जिगर जलाती
वा त्रिया ऐसे ही दुःख पाती
जो हैं भली भलेरी
उनके मनोकाम सरैंगे 2॥

इतने में फिरी हरि की माया
चंडी की बनी पत्थर काया
कर्म करा वैसा फल पाया
जो हैं मूह ठठेरी
उनपर जम दण्ड धरैंगे 3॥

अहिल्या गौतम ऋषि की नारी
शिला बनी पति नै दुदकारी
महोर सिंह पतियों की प्यारी
स्वर्गौं की बासेरी
उनकी सुर साख्य भरैंगे 4॥

दोहा –
चरण गहे जा पारथ नै, जून गई है छूट ।
चंडी सुरपुर को गई, शिला गई है टूट ॥


---- इति श्री ----