दोहा –
पार्थ हांडै खोजता, गौह्वर वन के मांह ।
महती चिंता हो रही, आश्रम दीखै नांह ॥
वार्ता- ऋषि सौभरी कहते हैं
भिनक पड़ी कानी हो रही वेद धुनी ॥ टेक । (जंगम)
वन पर्वतों के बीच, दीखे वाटिका बगीच, नीर बहै मचा कीच, जल झरने झरैं
पक्षी कर रहे किलोल, मधुर वाणी रहे बोल, माच रही रमझोल, आलाप भरैं
आ आ शेर गऊ ठाठ, पानी पीवैं एक घाट, गऊ शेर को रही चाट, बड़ा प्रेम करैं
शस्य अजा और भिडाव, ना किसी का बैरभाव, चिड़िया मूसक बिलाव, निर्भय विचरैं
नकुल गरुड़ और भुजंग, तीनों देखे एक संग, अश्व महिष स्वान कुरंग, जहां खेलते फिरैं
सबकी देखी मित्रताई, ना किसी की दुश्मनाई, पार्थ कहै यदुराई, मेरा कष्ट हरैं
आगै बढ़ा जद आश्रम दीख्या आश्रम में बैठे हैं मुनी 1॥
पहौंचा आश्रम के माईं, जहाँ बेद धुनि छाई, गुरु सेवक सुखदाई, पढैं ब्रह्मचारी
कोई विप्रराज पूत, सोहै अंगों पै विभूत, जटाधारी अवधूत, शाक फलाहारी
नम्र होकै कुंती जाम, किया दंडवत प्रणाम, स्वागत कर पूछा नाम, बोले धनुषधारी
हथनापुर का हूं बासेरा, निज नाम अर्जुन टेरा, यज्ञ करै बंधु मेरा, धर्म अवतारी
भिड़कर शिला कै तुरंग, हुया पाषाणमई अंग, म्हारी यज्ञ हुई भंग बणी लाचारी
अटकी मझ में जिहाज, पार करो माहाराज, शरणै आपकै हैं आज
पठन पाठन करा बंद पारथ की आरतबाणी सुनी 2॥
मुनी बोले धर ध्यान, सुनो शिला का आख्यान, त्याग मन कि गिलान, मिटै दुखदाई
जो निमित हो सो होय, मरै मारै नहीं कोय, दई भावी नै संजोय, भारथ की लड़ाई
जगत स्वपन्न की समान, क्षण भंगुर है जिहान, मनै सुने थे विद्वान, पांचौं भाई
ये क्या विद्वानी तुम्हारी, अश्वमेध बिस्तारी, घर में सदा हितकारी, जादूराई
सुंदर उपवन के बीच, त्याग मलियागर को नीच, रहा अरण्ड को सींच, मूरखताई
जिसकै वैडुर्यमणि पास, करै काचमण की आश, हुया नहीं विश्वास, भ्रमता छाई
शिला का हाल सुनाऊँ सुन एक त्रिया थी जिगर भुनी 3॥
चंडी कर्कसा था नाम, थी वा उद्यालक की वाम, सारा उल्टा उल्टा काम, करने वाली
कही ऋषि नै बहोत, कुटिया कुं लीप पोत, चास देवतौं की जोत, आई ब्याली
कुटी दई तोड़ फोड़, खडे खोदे ठोड़ ठोड़, फिर गई च्यारूं ओड़, लेकर कुदाली
ऋषि बोल्या मीठी बाणी, उठ घर घरियाणी, ल्या समिध कुशा पाणी, बकण लगी गाली
ढाया कुंड का किनारा, तुंबा फोड़ दिया सारा, कहना मान ले हमारा, तेरा ताली
मेरा धर्म गया छूट, तकदीर गई फूट, छाती माथा मूंड कूट, रोई कंकाली
कथा विचित्र अश्वमेध पर्व की कथै महोर सिंह गुनी 4॥