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हंसध्वज कथा

चला होकर मुक्त पाषान से
बाजी चंपापुर आया ॥ टेक ।

हंषध्वज नगरी का राजा
एक पत्निव्रत सकल समाजा
दल हैं नृप कै बेअंदाजा
लड़कर रण मैदान से
कभी पराजय नहीं पाया 1॥

दश हैं पुत्र नृप कै पणधारी
सुरथ सुधन्वा आगाकारी
वृद्ध अवस्था बड़ परवारी
मग्न रहै हरि ध्यान से
आ दूत नै वचन सुनाया 2॥

पारथ तुरंग म्हारे पुर माहीं
आय बड़ा घिर रहा सभ राहीं
पकड़ैं या उसे पकड़ैं नाहीं
सुरपति सुत बलवान से
रण मंडै पटा पढ़वाया 3॥

राजा नै जब हुकम दिया है
तुरंग जाकर पकड़ लिया है
दलबल सभ तैयार किया है
जैमिनी के आख्यान से
महोर सिंह नै छंद बनाया 4॥

दोहा –
हुई मनादी भूप की, बजैं ढ़ोल और भेर ।
जो पीछै रह ज्यायगा, दें तप्त तेल में गेर ॥


अजी एजी भूप नै भरवा तेल कढ़ाया
भट्ठा ऊपर चढ़ा दिया है नीचै अगन जलाया ॥ टेक ।(सांगीत)

शंख लेखक राजप्रोहत भट्ठा में लगावैं खूंढ
हो गयी प्रचंड अग्नि तेल में उठै झगूंड
आये नहीं आये की दलौं में होय रही ढूंढ
राजा की हिदात सुण भगे दौड़े आय रहे
तप्त तेल देख-देख बीर घबराय रहे
पारथ के मुकाबले पर मोर्चा लगाय रहे
दल का व्यूह बनाया 1॥


पुत्र मित्र भाईबंध रिश्तेदार सगा सोई
मामा फूफा साला सठना जमाई चाहे हो भनोई
पीछै जो रह जायगा इस तेल में पड़ैगा वोई
सुधन्वा नै तलबी से जा माता के चरण गहे
शीश पुचकार दिया आशिखा वचन कहे
पीठ मत दिखाइये बेटा प्राण रहो जावो चहे
क्षण भंगुर है काया 2॥


सुधन्वा की बहैन कुबला मार्ग मेँ खड़ी पाई
भैया आगै कहैन लगी सासरा की दुखदाई
धीर धोप देकै आगै बढ़ा बीर बलदाई
आगै बढ़ा सुधन्वा नै देखी खड़ी निज नार
हो रहे सुशोभित आभरणों से सोलहों सिंगार
हाथ जोड़ बोली थोड़ी देर डटो भरतार
चरणों में शीश नवाया 3॥


प्रथम रजोधर्म हुया ऋतुवती नार तेरी
शुद्ध हुये सोलवां दिन इच्छा पूर्ण करो मेरी
तुम हो मेरे जीवन मैं हूँ आपके चरणों की चेरी
मनुष्य का ना धर्म दिन में पशु पक्षी करैं भोग
धर्मशास्त्रों में दिन का कहीं ना लिखा संजोग
महोर सिंह छंद कथै बुढ़ापा का लगा रोग
अब नहीं जाता गाया 4॥


दोहा –
मेरा पहला ऋतु है, रण में जा रहे आप ।
ऋतुदान दिये बिना, लगैगा बज्रपाप ॥


अब तक नहीं हुया मिलाप आस इस दिन की लाग रही थी
मैं पति पत्नी वाला नाता तन और मन से त्याग रही थी ॥ टेक ।(ख्याल)


मैं इस दिन के लिये आपसे मेरे माँ बापीं परणाई
परणी हुये छह मास पास कभी आपकै मैं ना आई
आई तो भाई बहैन ज्यूं रहे देता रहा धर्म दिखाई
आज बख़्त मिला जब प्राणनाथ करने लगे आँख मिंचाई
इस दिन की बाट जोहूं थी मैं मन को बैराग रही थी 1॥


रण में जा रहे हो आप श्राप द्यूंगी फिर पछताओगे
इस बात को जानै कौन उल्टा आवो या नहीं आवोगे
भ्रूण हत्या का महापाप भार अपने सिर पर ठाओगे
आशा पूर्ण करे बिना गये तो नर्कवास पाओगे
कुछ दर्शन से हुई शांत कामाग्नि तन मेँ जाग रही थी 2॥


हो पितृ श्राद्ध दिन ज्ञास का हो ऋतुवंती हो ज्या नारी
तीनों कामों को इस प्रकार कर सकते हैं देहधारी
रात्रि नै अन वासना ले व्रत पारण करै निराहारी
अर्धरात्र तक पितृ काल फिर ऋतूदान की बारी
सुपना मेँ ये सबरी बात बणी मैं उठ उठ भाग रही थी 3॥


जो जत सत में रहते हैं वै ना अगन से जलते
चहे कितनेई तप्त तेल मेँ गेरो तेल से नहीं उबलते
बेहमाई नै अंकुर घाल दिये वै ना किसी तरह बदलते
ब्रह्मा भी उन्हे ना बदल सकै जो छठी रात नै घलते
ईश्वर की दया सैं दंगलों में महोर सिंह की पाग रही थी 4॥

दोहा –
बारंबार बिनती करै, चरणी शीश नवाय ।
अश्रुपात जारी हुये, अधर रही कंपाय ॥

सती जती के गल का हार हुई
गई लिपट चिपट गई गल कै ॥ टेक ।

वृक्ष कै बेल लिपटती जैसैं
पत्नी पति कै लिपटी ऐसैं
अब पीछा छुटवावौं कैसैं
कर्मों की ये मार हुई
कर्मवश याहां आया चल कै 1॥

बणन हार बणकै रहती है
वेद श्रुति ऐसैं कहती है
दिन में ऋतूदान चहती है
काम कै वश या नार हुई
जा सकूँ न अब मैं टल कै 2॥

अर्जुन से लड़ने नहीं पाया
कृष्ण नहीं दृग गोचर आया
कभी न होता मन का चाया
तेल कडाह तैयार हुई
बस मेरे लिये उबल कै 3॥

ऋतूदान दिया पति नै
गर्भ धारण कर लिया सती नै
महोर सिंह त्रिया बोली जती नै
सगर्भा मैं भरतार हुई
जावो लड़ो खूब संभल कै 4॥

अरिल –
वीर सुधन्वा कै यवन हथकड़ी लाय कै
गये राजा कै पास खड़ा करा जाय कै ।

तप्त तेल का दंड तैने जाना नहीं
किया अदूल हुकम तैं मेरा माना नहीं ।

छत्रीकुल में जनम पारथ से डरे गया
अरे ल्कीव पुत्र जनमत ही क्यौं ना मरे गया ।

माता के सोत लजाये लजा दिया वंश रे
भीरू कायर तूं है नहीं मेरा अंश रे ।

लेखक शंख पुरोहित अगन जला रहा
हो गया अगन प्रचंड तेल खलभला रहा ।

कहना हो सो कह ले ना देरी का काम है
तेल में तुजको गेर फेर संग्राम है ॥


दोहा –

हाथ जोड़ करी वंदना, चरणीं शीश नवाय ।
जिस बिध से देरी हुई, दिया सभ हाल सुनाय ॥


राजा नै दूत पठाये आये शंख लेखक कै पास ॥ टेक ।

आज्ञा भंग कर दई मेरी
धर्म संकट में ला दई देरी
पीछै आया हुई अबेरी
किस बिध हो बरदास 1॥

सुनकर वचन दोनूं उठ चाला
परपूतौं के लिये तेल उबाला
वचन भूप हरिचंद नै पाला
दई सो सभ सही त्रास 2॥

दशरथ नृपति बचन नहीं हारा
पुत्र नार धन प्राण बिसारा
बचन हारी हुया भूप हमारा
हो नरकों में वास 3॥
जाकर कहो उस नृप अन्याई नै
करै अपने मन की चाई नै
महोर सिंह इस प्रोहताई नै
करा धरम का नाश 4॥

(झूलना)

जो कुछ था राजा का रूल
सब ही नै कर लिया कबूल
बेटा नै कर दिया अदूल
निर्भय हो गया जा रणवास में 1॥

जो वोह आया करकै देर
क्यों नहीं दिया तेल में गेर
इस राजा के घर अंधेर
हम ना रहैंगे इसके पास में 2॥

दिया रजा नै धरम बिसार
इसका करैं नहीं इतबार
अंजल करैंगे राज बहार
उमर को बिता देंगे बनोवास में 3॥

बचनहारी का स्वप्नै मुंह माथा
हमको दिखावै नहीं विधाता
महोरसिंह वृथा क्यों उंवर गंवाता
भज हरि नाम श्वास दर श्वास में 4॥

दोहा –

दूतौं नै आ भूप से, दिया सभ हाल सुनाय ।
दुष्ट पुत्र को तेल में, जल्दी द्यो गिरवाय ॥


अब भोग करे कर्मौं का फल
मेरी आज्ञा भंग करी थी ॥ टेक ।

मैं प्रोहतों को जाय मनाऊँ
हर सूरत से लेकर आऊँ
बचनहारी ना नाम धराऊँ
दुष्टपुत्र पापी महाखल
जननी जन चाव भरी थी 1॥

भूप गया सुमती वजीर नै
तन सिंगारा सलाहगीर नै
हो तैयार सुधन्वा बीर नै
लिया गंगाजल तुलसीदल
हरि चरणों में सुरत धरी थी 2॥

छोड़ दिए सभ और जिकंदर
कूदा बीर तेल के अंदर
भट्ठै ठंडा हुआ बसंदर
कडाहै तेल हुया शीतल
सारी जनता देख डरी थी 3॥

तेल में कभी अदृष्ट हो ज्याता
कभी उफण ऊपर को आता
महोर सिंह जिनके हरि त्राता
वै जां कैसैं तेल में जल
पर भावी नहीं टरी थी 4॥

दोहा –

दोनूं प्रोहत संग ले, आय गया भूपाल ।
तप्त तेल में तिर रहा, हंसध्वज का लाल ॥


प्रोहत अचरज देख कुटल्ली करण लगे ॥ टेक ।

भट्ठा बड़े जोर से जल रहा
तेल कडाहे माहीं उबल रहा
जपत हरि का नाम सुधन्वा तिरण लगे 1॥

कहैं सुधन्वा जादूगारा
तेल में इसने जादू मारा
रिता दिया वो तेल तेल और भरण लगे 2॥

इसनै बूंटी जड़ी दवाई
जरुर अपने तन कै लाई
मंगवा लिये नारियल तेल में गिरण लगे 3॥

जल बल तेल में श्रीफल फूटे
भड़क उठे ऊपर को उठे
प्रोहतों के सिर दिये फोड़ खून जब झरण लगे 4॥

उफण तेल ऊपर को आया
कड़ाहा में उबला नहीं समाया
प्रोहतों के तन दिये फूक निडर थे डरण लगे 5॥

प्रोहतों नै कर लई अप आई
फल मिल गया सिर धरी बुराई
महोर सिंह नित ध्यान हरि का धरण लगे 6॥

दोहा –

त्राहि त्राहि जनता करै, सिर धुन करैं विलाप ।
देख्या जा ना सहा जा, सुधन्वा का संताप ॥


प्रोहतों के माथे फूट गये जब खूनधार बह चाली
जनता नै ख़ुशी मनाई ख़ुशी की बजन लगी हैं ताली ॥ टेक ।(ख्याल)


ब्राह्मण होते दयावंत ये तो हैं निर्दई कर्म कसाई
निर्दोष सुधन्वा गेरा तेल में जरा दया ना आई
प्रोहत तो डूब रहे थे भूप कुं ले डूबी प्रोहताई
ना सुधन्वा का हुया बांका बाल करी राम नै पहौंच सहाई
खड़ी प्रजा दुहाई घाल रही प्रोहतों को दे रही गाली 1॥


जल कमल ज्यूं बीर सुधन्वा तप्त तेल के ऊपर डट रहा
हरे कृष्ण गोविन्द दामोदर माधव नामावली को रट रहा
मिचे नयन ओष्ट रहे फ़रक देख प्रोहतों का हिरदा फट रहा
दुर्वचन प्रजा रही बोल हुया अपमान मान सब घट रहा
अपणी लई आप बिगाड़ वै ब्राह्मण थे दोनूं टकसाली 2॥


श्रीकृष्ण के दर्शन करूं पारथ लडूं मैं जा कै रण में
इन दोनों कामों की हे दयाल मेरै रह गई मन की मन में
फूलों की सेज पर पोढ़ रहा छा रही श्रद्धा इस तन में
चलै शीतल मंद सुगंध हवा तेरी दया से तेल अगन में
तैं दया करी निज दास ऊपर हे मुरलीधर बनमाली 3॥


सुणा अंत समै नारायण स्मृति से मुक्तिपद पाता है
फिर जन्म मरण चौरासी चक्कर में कभी नहीं आता है
तेरा दास करै अरदास नाथ द्यो दर्शन पाना चाता है
तेरी यादगार नित बणी रहै गुन महोर सिंह गाता है
प्रोहतों की छाती धड़क रही चेहरों पै रही ना लाली 4॥


दोहा –

अपआई सभ कर लई, प्रोहत हुया लाचार ।
सुधन्वा को धन्यवाद दें, आपे को धिक्कार ॥


मैं हुया अपराधी हरि का भगत सताया ॥ टेक ।

जुलम असुर हिरणाकुश कीन्हा
प्रह्लाद को दुःख दारुण दीन्हा
कर्म का फल जल्दिये पा लीन्हा
मैंने भी परचा पाया 1॥

अब मैं तन बलिदान करूंगा
तेल में त्यागन प्राण करूंगा
नारायण का ध्यान धरूंगा
आज अकीदा आया 2॥
शंख नै पाय लिया अजमूदा
राम राम रट तेल में कूदा
प्रजा कहै यो विप्र बेहूदा
बखत चूक पछताया 3॥

सुधन्वा को दें देव बलिहारी
बोला शंख धन्य पणधारी
कुली इक्कीस भव पार उतारी
परम भक्त नाम धराया 4॥

उठ बेटा चल रण के दंग में
जाकर लड़ पार्थ के संग में
दिखा बीरता बीर जंग में
होगा मन का चाया 5॥

शंख का दूर हुया भ्रमजाला
सुधन्वा तेल से बाहर निकाला
आये जहां हंस भूपाला
महोर सिंह जस गाया 6॥

ख्याल –

पुत्र नै जा पिता के चरण गहे सविनय कुशल सुनाया जी
दे आशीष सिर पुचकार कर राजा नै ह्रदय लगाया जी ।

रोष रंज सभ दूर हुया मन उमंगे तन लहराया जी
तीर्थोदक से स्नान करा राजा नै हुकम चढ़ाया जी ।

पारथ से जा मांड जंग मुश्किल से अवसर पाया जी
मोर्चै चढ़ दे दई पीठ तो जायगा बंश लजाया जी ।

सुबरण रथ सुबरण रंग घोड़े सुवर्ण कवच सजाया जी
सुबर्ण धनुष तूण सुबरणमई महोर सिंह गुण गाया जी ॥


दोहा –

आज्ञा पाकर पार्थ से किया वृषकेत प्रस्थान ।
शंखध्वनि कर पद्मव्यूह जा पहुंचा बलवान ।।


सुधन्वा कहै यह कौन वीर चल्या व्यूह में आय रहा है ॥
बृष चिन्ह रह्या दीख धजा पर बतलाओ यह कौन है वीरवर अभिमानी कर हमरा अनादर
मौत बुलाय रह्या है 1।।


गरज रह्या सुव्रत बलकारी परिचय द्यो अपना धनुधारी कौन तुम्हारी जननेहारी
भेद बताय रह्या है 2।।


बड़भागी पंडवों का वंश जी मैं बृषकेतू कर्ण का अंश जी सावधान अब हे सुत हंस जी
चाप उठाय रह्या है 3।।


सुव्रत कहै सावधान हो बृषकेतू बचा निज प्राण हो गुरु महोर सिंह का ध्यान हो
राजेश गुण गाय रह्या है 4।।


दोहा –

बृषकेतू नै धनुष पर किया बाण संधान ।
सुधन्वा के दलौं में करन लग्या घमस्यान ।।


अबसो बृषकेतू के लागे तीर चलन ।।टेक।

बृषकेत बलवान तीर छोडे बेपरमान घाल दल में घमस्यान लगा सिंहनाद करन
हाथी घोड़े रथी मारे पैदल सैनिक संहारे कर छिन्न भिन्न सारे लग्या आगै बढ़न 1।।


घायल सारथी किया फेर पांच बाण लिया धजा काट दिया किया वीर हतन
कोप उठा बलकारी सुधन्वा धनुर्धारी किया घात प्रतिकारी लगे सर बर्षन 2।।


लग तीक्ष्ण प्रहार मूर्छित बलकार बृषकेत हो लाचार जा पड़ा धरन
कुछ देर रह अचेत जाग उठा बानेत ललकारा रण हेत लाग्या गर्जन 3।।


सुबरण धनुष लिया हाथ असंख्य तीर एकसाथ छोड़ किया प्रतिघात वीर कर्णनन्दन
गुरु महोर सिंह विद्वान रचे प्रामाणिक आख्यान राजेश नित ध्यान रखिये चरणन 4।।

समर देख बृषकेतू का सुधन्वा दल घबराया
विकट भयंकर अस्त्र उनीं फेर शत्रु पै बरसाया ।।टेक।


तोमर भाल भिंदीपाल और मुगदर तलवार ।।
नाराच भूसंडी परिघ पट्टिश और गदा प्रहार
अयोमुख करपत्र शक्ति और त्रिशूलों की मार
महाबली बृषकेतू झेल रह्या ये सारे वार
बही खून धार बीर नै माधव का ध्यान लगाया 1।।

इतने में रथ ले कै वृषकेतु का सारथी आया
रथ पर हो सवार वीरवर बाणधार झड़ी लाया
सुधन्वा को घायल करा दल सब मार भगाया
इसी बीच सुव्रत नै वृषकेतु पै बाण चलाया
पहुंचाया आघात भारी वृषकेतू मूर्छा खाया 2।।

वृषकेतु को मूर्छित देख प्रद्युम्न आ ललकारा
'खड़ा रह' 'खड़ा रह' ध्वनि करी चाप टंकारा
क्रुद्ध हो कै प्रद्युम्न ने तीक्ष्ण बाण प्रहारा
इक्कीस टुकड़े घोड़ों के करे गर्द का उठा गुबारा
हुंकारा बली सुधन्वा जोश में धनुष उठाया 3।।

जतन करकै सुधन्वा नै प्रद्युम्न पै वार किया
रथ तोड़ा घोड़े मारे सारथी भी मार दिया
युद्ध कौशल दिखला रहे अस्त्रों का सहारा लिया
गुरु महोर सिंह कहैं युद्ध देख कायरों का कंप्या हिया
पीया गुरुज्ञान रस राजेश का हुया मनचाया 4।।

दोहा

कभी धरती कभी नभ में लड़ें वीर बलवान ।
मूर्छित देख प्रद्युम्न को कृतवर्मा पहुंचे आन ।।


दोहा

कृतवर्मा फेर अनुशाल्व कीन्हा घोर संग्राम ।
सुधन्वा ने तत्काल ही जीते सुभट तमाम ।।


अजी एजी पार्थ आए रण मैदान
वीर सुधन्वा देख सामने करने लगे सावधान ।।टेक।

अर्जुन कहै वीरवर धनुष को उठाओ हाथ सुव्रत कहै पार्थ आज कहां गए यदुनाथ
श्रीकृष्णजी नै किस कारण छोड़ दिया साथ जी
कोप गए कुन्तीनन्दन शरचाप लिया चढ़ाय सैकड़ों हजारों शर पार्थ रह्या बरसाय
सुधन्वा ने दिव्य अस्त्रों से दिए काट गिराय जी
किया आग्नेयास्त्र संधान 1।।


अग्नि अस्त्र देख वीर सुधन्वा बलदाई वरुणास्त्र छोड़ निज दल की ज्वाला बुझाई
चातकों मयूरों की होय गई मनचाई जी
वायव्यास्त्र महाबली पार्थ नै धरा चाप तेज अंधियार नै आसमान किया साफ
रथों के ध्वज टूट गिरने लगे आप आप जी
घाल रहे घमस्यान 2।।


अर्धचन्द्र शस्त्र वीर सुधन्वा दिया चलाय अर्जुन का धनुष और प्रत्यंचा दई काट गिराय
तीन बाण छोड़ सारथी को यमपुर पहुंचाय जी
तेही काल अर्जुन नै सुमर लिए गिरधारी आयके विराजमान रथ पर हुए सहचारी
साक्षात देख बोला सुधन्वा धनुर्धारी जी
आप सर्वव्यापक भगवान 3।।


श्रीहरि संग देख पण लिया कुन्तीनन्दन तीन बाण सेती करुं तेरे मस्तक का विखंडन
बचा जा तो बच लीजे हे वीरवर सुधन्वन जी
हरिभक्त सुधन्वा शपथ ले बोला वाणी श्रीहरि चरणों मे होगी नहीं मेरी हानी
प्रेरणा दई कथन की गुरु महोर सिंह ज्ञानी जी
राजेश अबोध नादान 4।।

दोहा –
वीर सुधन्वा पुरुषार्थ कर एक सो बाण दिए छोड़ ।
अर्जुन कृष्ण रथ तुरंग संग घूमन लगे तेही ठोड़ ।।


ख्याल

श्रीकृष्ण कहन लगे हे पार्थ बल पौरुष दृष्टिपात करो
महाबली है वीर सुधन्वा प्रतिज्ञा मत कोई तात करो ।

एकपत्नीव्रत धर्म का फल इस सत्य को आत्मसात करो
बिन विचारे रणभूमि में प्रतिज्ञा जैसी बात करो ॥

दोहा

महाघोर संग्राम में दलौं का हुया घमस्यान ।
युद्ध भयंकर देखने देवता भी पहुंचे आन ।।


हो प्रचंड सुधन्वा करन लग्या संग्राम ॥टेक।(जंगम)

अर्जुन नै दसों दिशा में छोड़े तीर बेपरमान
सुधन्वा नही घबराता है बाणों सेती काटै बान
श्रीकृष्ण से कहै पार्थ रक्षा करो करुणानिधान
फेर तीर एक छोड़ा पार्थ कालानल के समान
गोवर्धन का पुण्य उसमे जोड़ दिया श्रीभगवान
अर्जुन सुधन्वा युद्ध देखने देवता भी पहुंचे आन
हरिभक्त ने बाण मार उस सर को किया नाकाम 1।।


कुपित होय पार्थ नै फेर दूजा बाण संधान किया
श्रीकृष्णजी पुण्य जोड़ा जो कुछ पृथ्वीदान किया
धन्य धन्य हे पार्थ कोई कारज तुमने महान किया
तेरे बाण में श्रीहरि स्वयं पुण्य प्रदान किया
चला धनुष से छूट बाण ज्वाला दीप्तिमान किया
सुधन्वा ने कर पुरषार्थ वो बाण शून्य समान किया
कटा बाण और कांपी पृथ्वी बोल उठे घनश्याम 2।।


श्रीकृष्ण कहैं पार्थ अब मैं पंचजन्य शंख बजाऊंगा
तुम भी देवदत्त को फूंको सकल जगत कंपाउंगा
तुम तीजे बाण का संधान करो युक्ति मैं बनाऊंगा
उस बाण के अगले भाग में ब्रह्माजी को बैठाउँगा
मध्यभाग में साक्षात अब काल को पैठाऊंगा
बाण की नोक के ऊपर मैं अपना आसन लाऊंगा
चला छूटकर बाण वो तैसे ही मांच गया कोहराम 3।।


सुधन्वा कहै हे गोविंद करतूत थारी मैं जान गया
मेरे मारण हेत आपने आसन खुद जमाय लिया
अग्नि उगलता हुआ बाण वो पार्थ ने संधान किया
सुधन्वा ने वो काट गिराया भावी का बड़ा खेल भया
कटे बाण ने सुधन्वा के मस्तक को जा उड़ाय दिया
हाहाकार मची रण में चहुं और अंधकार छया
गुरु महोर सिंह जी के सत्संग में रट राजेश हरिनाम 4।।


ख्याल

कटा शीश सुधन्वा का केशव राम नरसिंह उचारै है
चरणकमल में जाय पड़ा श्रीकृष्ण उठा पुचकारैं है

कबंध वेग से चक्कर काट रिपु सेना को संहारै है
दिव्य ज्योति प्राण सुधन्वा के प्रभु से अर्ज गुजारै है

भक्त की दिव्य ज्योत को भगवन निज में धारै है
गुरु महोर सिंह वो मरै नही जो राम नाम सहारै है ।।

दोहा

सुव्रत के शीश को मुरलीधर दिया बग़ाय ।
पिता हंसध्वज के चरणन में गिरा आय ।।


नृप उठा शीश को करन लग्या संताप ॥टेक।

पुत्र बता क्यूं बोलै नाहीं नैनों को भी खोलै नाहीं वाणी अमृत घोलै नाहीं
क्यूं हो गया चुपचाप 1।।


बेटा तू था आज्ञाकारी धीर वीर जोध्या बलकारी साक्षात श्रीकृष्ण मुरारी
से करवाया मिलाप 2।।


पुत्र पुत्र कहै राजा रोवै मुख चूमै कभी आपा खोवै हुनी तो होय सोई होवै
शेष रहै प्रलाप 3।।


फेंका शीश मारत श्वास जी हंसध्वज श्रीकृष्ण पास जी केशव पहुंचाया कैलाश जी
राजेश करै हरि जाप 4।।

दोहा

सुधन्वा का बड़ा भ्रात सुरथ नाम कहाय ।
रोष भरा जा पार्थ से दिया मोर्चा लाय ।।


डटे शूरमा आय होन लग्या संग्राम ।।टेक। (जकड़ी)

सुरथ कहै हे कृष्ण मुरारी पार्थ की करो रक्षा गिरधारी ।
बालचेष्टा ये आप करी है पुण्य की जो बाजी धरी है ।
मोती दानकर बेर लिया है सुव्रत को मुक्तिफल दिया है ।
सुधन्वा के प्राणों का मोल जी दिया आप निज पुण्य तोल जी ।
अर्जुन को तब ललकारै है वीर धनुष को टंकारै है ।
कृष्ण कहैं हे कुन्तीनन्दन भेजो रण में प्रथम प्रद्यूम्न ।
है पुण्य आत्मा महान ये हंसध्वज का जाम 1।।


प्रद्युम्न संग ले वीरों को चले लहराते शमसीरों को ।
अर्जुन रण मैदान से हट गए बारह कोस दूर जा डट गए ।
सुरथ ढूढ़े अर्जुन कृष्ण भागा फिरै नहीं होते दर्शन ।
मारै गदा प्रहार करै है शूरवीरों के प्राण हरै है ।
कभी बरसाता सर भयंकर सेना को करै तीतर बीतर ।
छिन्न भिन्न सेना कर डाली प्रद्युम्न की पेश नहीं चाली ।
त्रि-योजन व्यूह भेद दर्शे पार्थ घनश्याम 2।।


  वासुदेव पर बाणधार जी प्रथम बरसाये सुरथ कुमार जी ।
पारथ को भी घायल कीन्हा गहरे घाव दोनों को दीन्हा ।
पार्थ अस्त्र चलावै भारी विकट भयंकर प्राणहारी ।
धजा पताका धनुध भी काटा सुरथ का गति रथ है डाटा ।
महाभयंकर युद्ध हो रह्या अगणित वीर प्राणों को खो रह्या ।
सुरथ नै कर जतन मतन जी घायल करे कृष्ण अर्जुन जी ।
पार्थ के प्रयास कर दिए विफल तमाम 3।।


श्रीकृष्ण संग शिवजी रथ पर बैठे आन बन पार्थ हितकर ।
वीर सुरथ के प्रहार लगकर रथ पृथ्वी पर काटै चक्कर ।
रथ को पैरों सेती दबावैं शिव केशव दोनूं जोर लगावैं ।
रोके नहीं रुकै बलबीर जी घायल करा अर्जुन गंभीर जी ।
पार्थ रोष भर बाण चलाया सुरथ का रथ तोड़ बगाया ।
मारुतिनंदन चलकर आए पार्थ रथ पर आसन लाए ।
गुरु महोर सिंह करो ख्याल राजेश रटता नाम 4।।

दोहा –

सुरथ नै पुरषार्थ कर अर्जुन कृष्ण भगवान ।
रथ समेत उठा लिया वीर बली बलवान ।।


सुरथ वीर बलकार पै पार्थ नै सर बरसाया ।।टेक।(सांगीत)

मूर्छित हुया रथ हाथ सेती गया छूट आरूढ़ हो सुरथ लगा करने प्रहार अटूट
शूरवीरों के सिर गिरने लगे टूट टूट जी
अर्धचंद्र नाराच नालीक वराहकर्ण कंटकामुख शिलीमुख अस्त्रों से पाटै धरण
पार्थ नै फेर सुरथ को मारने का ठाया परण जी
हंसध्वज कुमार पै अर्धचंद्र तीर चलाया 1।।


लगते ही तीर कटा सुरथ का दायां हाथ बायें से युद्ध कर प्रसन्न करे कोसलनाथ
बाण मार मार अर्जुन शिथिल कर दिया गात जी
पार्थ ने अस्त्र छोड़ सुरथ का दिया शीश काट चम्पापुर की सेना में मच गया करलाट
कटते ही शीश उछला लगा जा अर्जुन ललाट जी
नगाड़े मोधे हार पै नृप हंसध्वज करवाया 2।।


कटे हुए शीश नै जा कृष्ण के चरण गहे ज्योति में ज्योत मिली होय गए मन चहे
शुभकर्म फल पाया माधव की शरण लहे जी
गरुड़ को बुलाय शीश त्रिवेणी दिया पहुंचाय कृष्णजी की सेवा से मुक्तिपद लिया पाय
देवकीनंदन बोले नृप को वचन सुनाय जी
मत बहाओ नैन धर्मधार पै वो शुभगति को पाया 3।।


अश्व को छोड़ो राजन अर्जुन के बनो सहचार शोक का त्याग करो नृप अब धीर धार
शरण मे आओ मेरी निश्चय होगा बेड़ा पार जी
चरण गहे कृष्ण के गले से लगाय लिया भक्तों के सहाई भगवन शुभाशीष दिया
गुरु महोर सिंह जी ने राजेश पै उपकार किया जी
जो पा ले विजय अहंकार पै वो हरिभक्त कहलाया 4।।


-- इति श्री –