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राजा चंद्रहास कथा

दोहा

जन्मेजय से जैमिनी, ऋषि अनूप इतिहास ।
सुना रहे सुनो भूपति, होय तिमर का नाश ॥

हुया कुंतलपुर में चंद्रहास भूपाल ॥ टेक ।

धर्म समुद्र दया की नैया
विष्णु-भक्त बली जंग खिलैया
अजा भिडाव शेर और गैया
जल पीवैं एक ताल ।।1।

महादानी वेदों का ज्ञाता
नीति निपुण प्रजा का त्राता
राज में कोई नजर नहीं आता
रोगी सोगी कंगाल ।।2।

एकादशी के व्रत का प्रेमी
पखवाड़ै करता नित नेमी
शालगराम की पूजा टेमीं
करता तीनौं काल ।।3।

कुंतलपुर में घोड़ा आया
पट्टा बांच पकड़ मंगवाया
महोर सिंह बंदोबस्त कराया
बांध दिया घुड़शाल ।।4।

दोहा

दोनों दल उमड़े खड़े, दीखै नहीं तुरंग ।
पार्थ को चिंता भई, होय गई मति भंग ॥

इतने में घन बीच नभ में झट दामिनी सी दमकी ॥ टेक ।

सभ करने लगी तरकना
दूजा कोई और अरक ना
है ये अग्निदेव फरक ना
ऊपर कूं चोटी चमकी ।।1।

कोई कहै यह चमक उजासा
दशौं दिशाओं का परकाशा
इतने में नारद ऋषि पासा
कर बीच वीणा झमकी ।।2।

मुख से गोविंद गोविंद भजै हैं
महती कर में बीन बजै है
तन्मय हुया पर नहीं तजै है
मुनि धारणा पारबिरम की ।।3।

नारद मुनि जद दिये दिखाई
दल में खुशबख्ती सी छाई
महोर सिंह नै छवि कथ गाई
कथा शशिहास जन्म की ।।4।

दोहा

पार्थादि भट मुनि को, कर दंडवत प्रणाम ।
कहन लगे इस देश का, बरणो हाल तमाम ॥

द्यो छोड़ तुरंग की आशा पारथ घर कूं जाओ जी ॥ टेक ।

यहां का राजा चंद्रहास है
महाबली बिष्णु का दास है
कई क्षोहणी सेना पास है
प्राण बचाओ जी ।।1।

इस नृप कै सामनै पड़निया
दल में दीखै नहीं लड़निया
जो कोई तुम में होय भिड़निया
मोहे दिखाओ जी ।।2।

सारे दल कूं संघारैगा
चुन चुनकर सभको मारैगा
सौ बरस लड़ो नहीं हारैगा
फेर पछताओ जी ।।3।

नारद की सुनकर बानी
सारे दल में छाई गिलानी
महोर सिंह जा रही ज़िंदगानी
हरिगुण गाओ जी ।।4।

ख्याल

पारथ कहै मुनि चंद्रहास की अब मोहे कथा सुनाओ जी
इतना गौरव किस कारण से दिल का भरम मिटाओ जी ।

यज्ञ सम्पूर्ण हो चाहे मत हो अश्व पाओ मत पाओ जी
चाहे मर्द नामर्द कोई हो चाहे ब्रत लाओ जी ।

मुनि कहै नहीं बख़्त कथा का भगो क्या शस्त्र उठाओ जी
सिर पै बाजे बजैं झुझाऊ बजै तो तेग बजाओ जी ।

पार्थ कहै मुनि नारद जी क्यो मोहे भरमाओ जी
एसे ही अवसर गीता सुनी थी महोर सिंह गुण गाओ जी ॥

दोहा

कथा सुने बिन मनुष का, जीवन जन्म धरकार ।
बिना सुने ठाउं नहीं, मुनि जी मैं हथियार ॥

नहीं मानै बहोत समझा लिया
हठ पकड़ लिया पारथ नै ॥ टेक ।


केरल देश सुधार्मिक नामा

हुया भूप केरलपुर धामा
ऋतुवती हुई जिसकी बामा
अंश पति से पा लिया करुणा करकै आरत नै ।।1।

नों दश मास पिया प्यारी नै
पाल गर्भ पति भर्तारी नै
मूल नक्षत्र भागधारी नै
जन्म भूप घर आ लिया मूलामय कुल गारत नै ।।2।

बामै पैर उंगली छठी है
बाजैं बाजा भूर बंटी है
राजद्वार पै प्रजा डटी है
भूप नै द्रब लुटा लिया जातक शिशु के हितारथ नै ।।3।

जन्मा पुत्र मिटे संतापा
नृप नै सुखी समझ लिया आपा
महोर सिंह आ गया बुढ़ापा
बहुतेरे दिन गा लिया हरी भज अब तज स्वारथ नै ।।4।

ख्याल

केरलपति सुधार्मिक राजा पै शत्रुदल चढ़ आया जी
आय अचानक से गढ़ घेरा जंग मोर्चा लाया जी ।

जबरदस्त दुश्मन केरल का कुल सभ मार खपाया जी
मर गया भूप सुधार्मिक राजा स्वर्ग लोक कूं धाया जी ।

सती हुई पति संग राणी जिन मूला बेटा जाया जी
थोड़े ही दिन का बालक था माता नै दूर दुराया जी ।

शत्रु की फिर गई दुहाई अपना तहत बैठाया जी
भावी प्रबल टरै नहीं टारी महोर सिंह पद गाया जी ॥

दोहा

कुटम्ब सहित खपा जंग, में केरल पति नरेश ।
नाम लेन को रह गया, मूला बालक शेष ॥

अजी एजी धात्री बालक कूं ले भागी
प्राण बचैं बालक के धाय नै पुरी केरला त्यागी ॥ टेक । (सांगीत)


कुंतल देश कुंतलपुर कुंतल नरेश जहां
स्वाहा स्वधा शब्द ध्वनि होता है हमेश जहां
बालक छुपाय धाय हुई है प्रवेश जहां
करै है गुजारा धाय दासियों का काम करै
चाकी चूल्हा चरखा कीरत ध्यान हर धाम करै
बालक का पोषण करै प्रगट नहीं नाम करै
दुखिया दीन दुहागी ।।1।

कुंतलपुरी में जाय गुप्त रही तीन साल
हित चित सेती करी बालक की पृथपाल
रोग उत्पन्न होकै निकट आय गया काल
कालवश होकै सती मृत्यु को प्राप्त हुई
पर उपकार करने सेती स्वर्गलोक गई
बालक रोवै ल्हास धाय की उठाय लई
जा मरघट में दागी ।।2।

गलियों मे रोता हुया करता फिरै हाय हाय
घर घर पूछता है कहां गई मेरी मांय
सुबकिन पै सुबकी लेता नैनी नीर रह्या बहाय
बालक कूं रोता देख त्रिया भी आंसू डारैं
छाती कै लगावैं आंसू पूंछ सिर पुचकारैं
माखन मिश्री आगै धरैं बालक की धीर धारैं
तन सिंगारन लागी ।।3।

लोरी दे दे त्रिया उस बालक को हेरती हैं
आजा दूध पी ले बेटा बेटा कहकर टेरती हैं
खिलूना देती हैं भूल माताहू की गेरती हैं
थोड़े ही दिनों में भूल माताहू की पड़ी आय
बालकों में दिल रम्या मग्न रहै खेलै खाय
महोर सिंह चूकै मत राम नाम गुण गाय
हो प्रभु पद अनुरागी ।।4।

दोहा

मूरत बड़ी सुहावनी, सूरत बड़ी कबूल ।
सभ ही कूं प्यारा लगै, पड़ी मात की भूल ॥

त्रिया नित नये लाड लडाती हैं
हित से अनाथ बालक के ॥ टेक ।

किस से पूछै यो बालक किसका
नाम ग्राम नहीं जानैं जिसका
रूप अनूप भूप सब इसका
देख देख हुलसाती हैं
लक्षण हैं भू पालक के

लम्बी भुजा विशाल भाल है
गौर वर्ण लालों का लाल है
फिरै बिहूना कर्म चाल है
निरख निरख पछताती हैं
ये दिये दिन हैं मालक के

कोई उबटन तेल लगावै
कोई जल से स्नान करावै
कोई वस्त्र आभूषण सजावै
भोजन दूध पिलाती हैं
शुभ दिन आए घर घालक के

अनाथ बालक मात बिहूना
सतियों नै लिया बना खिलूना
महोर सिंह कहै दूना दूना
शिशु में प्रेम बढ़ाती हैं
कर सिर धर रखवालक के

ख्याल

एक दिन किसी विप्र के घर में बंच रह्या था भागवत पुराण
छंगा भी वहां जा कै बैठ गया कथा सुणन लग्या लगा कै ध्यान ।

राम नाम की महिमा का उस दिन की कथा में था अख्यान
बालक कै पुट बैठ गई बस राम नाम है जीवन प्राण ।

एक दिवस कुंतलापुरी में वैष्णव साधु पहूंचा आन
शालग्राम की पूजा करैं थे सर के तटपर कर अस्नान ।

उस प्रतिमा को उठा कै भाग्या छंगिया बिचित्र खिलूना जान
छुप गया यह कथा भक्तमाल की महोर सिंह नै दई बखान ॥

दोहा

छंगा प्रतिमा पूजता, नाम सैं लो रही लाग ।
विप्रन संग रहने लगा, खेलकूद दिये त्याग ॥

नृप के मंत्री का धृष्टबुद्धि है नाम ॥ टेक ।

पर्व का दिन जब आया करता
मंत्री हवन कराया करता
ब्राह्मण न्योत जिमाया करता
बुला कै अपने धाम

एक दिन ब्राह्मण न्योत बुलाया
विप्र वृंद जीमण को ध्याया
विप्रों के संग जीमण आया
केरलपति का जाम

दक्षिणा पाकै ब्राह्मण टेरा
मंत्री क्या यह बालक तेरा
धृष्टबुद्धि कहै मोहे ना बेरा
है किसका यो ठाम

विप्र कहै मंत्री यो बालक
तेरी सम्पदा का है मालक
महोर सिंह जिसके प्रभु पालक
रूठो जगत तमाम

दोहा

मंत्री सुन व्याकुल हुया, पड़ैना चित को चैन ।
विप्रों की कही होयगी, मिथ्या हों नहीं बैन ॥

निर्दई धृष्टबुद्धि वजीर नै
झटपट जल्लाद बुलाये ॥ टेक । (सांगीत)

शस्त्रधारी मांसाहारी जीवघाती जल्लाद
आये हैं समट मंत्री सेती करैं फरियाद
हुकम हजूरी पूरी आपकी करैं मुराद
मंत्री कहै गलियों में बालक जो फिरै अनाथ
पकड़ जकड़ कै ले जाओ मतना कुछ पूछो बात
घोर वन में ले जाकै उसका जल्दी करो घात
कर दो कत्ल शरीर नै
सुन बचन बधक हर्षाये

अंग की निशानी कोई काटकै जरूर ल्याइयो
शत्रु के कत्ले बनाकै मिट्टी में मिलाय आइयो
बीस तीस भैंस द्यूंगा बधाई आकै सुनाइयो
सुन कै बचन बधक गलियों में लिकड़ लिया
पांच बर्ष का अनाथ जाय कै पकड़ लिया
ऊंचे स्वर में रोवण लग्या कस कै जकड़ लिया
काटै कौन जंजीर नै
जो आये सो धमकाये

घोर बन में जाकै काढ़ी कर्द और छुरी कटारी
चमक रही धार जिनकी बध्यकों नै चुचकारी
देख कै घुघाया बालक त्राहि त्राहि गिरिधारी
ऐसे ही मोके पर तैं प्रह्लाद को उभार लिया
गज की अरज सुन ग्राह तैनै मार लिया
द्रोपदी की टेर सुनी दुस्सासन हार लिया
खैंच खैंचकर चीर नै
नहीं अंग उघड़ने पाये

तात नहीं मात नहीं भ्रात नहीं परिवार
आप बिना अब मेरी कौन सुनैगा पुकार
आपका भरोसा भारी मतना दियो बिडार
इतने वचन कह थर-थर कंपी काया
टस-टस आंसू पड़ैं बालक जद घबराया
महोर सिंह टेर सुन प्रभुजी नै फेरी माया
ज़ोर किया तकदीर नै
बध्यक मोहता में आये

ख्याल

मोहता छा गई जल्लादों कै भगवन की फिर गई माया
अनाथ बालक बेकसूर है मंत्री चाहै मरवाया ।

पहिले जन्म किया नीच कर्म किये कर्मों का यह फल पाया
जो अब इस बालक को हतैं हो सहस्र जन्म कुष्टि काया ।

अनाथ बालक की महाहत्या बज्रपाप यह कहलाया
महाप्रलय तक नरक कुंड इस हत्या सैं जा भुगताया ।

बांये पैर में छठी उंगली देख बधिक जब हर्षाया
छेदन करी छोड़ दिया बालक महोर सिंह नै गुन गाया ॥

दोहा

मंत्री आगै धर दई, छठी उंगली जाय ।
धृष्टबुद्धि राजी हुया, महिषी दई मंगाय ॥

बणखंड में हांडै रोंवता जी
बालक हो रहा लोहू लुहान ॥ टेक ।

कटी उंगली दर्द हो रहा बहै खून की धार
उस बालक का विलाप सुनकर आई मृगन की डार
मृगियों कूं छा गई मोवता जी

मृगी कहै म्हारे पति का पति है इसकी करो टहल
बालक के लगी चरण चाटने हो लई इसकी गैल
म्हारे पति कूं हांडै टोंवता जी

पखेरू पंखों की करैं छाया बालक ऊपर आय
अतिथि जान मोह की मक्खी शहत रही टपकाय
बालक फिरै जीव ल्हकोंवता जी

आरत बाणी पक्षी बोलैं बालक करै विलाप
मेरी उम्र के ध्रुव प्रह्लाद थे हड़ा जिनका संताप
मेरी बरियाँ कहां सोंवता जी

पाहि पाहि करुणा के सागर त्राहि त्राहि गोविंद
इतने में गया पहूंच बालक से बोल्या भूप कुलिन्द
बालक क्यूं जी कूं खोंवता जी

क्यौं रोवै किसकूं ढूंढै क्यूं तात मात दिया त्याग
महोर सिंह कर याद जिगर में कितने लग रहे दाग
तू क्यूं नहीं इनको धोंवता जी

दोहा

कृष्ण हमारी मात है, कृष्ण हमारा तात ।
उस जीवन के खोज में, फिरता हूं दिन रात ॥

कुलिन्द भूप नै उतर तुरंग से बालक हिये लगा लिया ॥ टेक ।

आंसू पूंछै सिर पुचकारै तन मन धन अर्पण करै
धीर धोंप दे अनाथ बालक घोड़े पर बैठाय लिया

बेटा मैं था निपुत्रा आज पुत्र दिया भगवान नै
आत्मा शीतल हुई देहधारी का फल पा लिया

ऐसे कहता हुया राजा पुरी में पहूंचा जाय कै
राणी कै पास बैठकर बालक का हाल सुना लिया

राणी नै लिया गोद में मुख चूमै सिर पुचकारती
महोर सिंह भावी प्रबल माता नै मेल मिला लिया

दोहा

पुत्रोत्सव करने लग्या, हित से भूप कुलिंद ।

बंटै बधाई नगर में, पुत्र दिया गोविंद ॥

घर कुलिन्द भूप कै हो रहे मंगलाचार ॥ टेक । (जंगम)

शुभ घड़ी मुहूर्त सबसे पहले चंदनावती पुरी सजाई जी
मेधावती रानी दूत भेज दई घर घर पुत्र बधाई जी
सुन अनहद बाजे बजन लगे सभ कै खुशबख्ती छाई जी
सज धज अबला महलों में आय गावन लगी बैठ बिहाई जी
आ चारण भाट बंदीजन नै बंश की बिरदावली गाई जी
वेदों के मंत्र पढैं हवन करैं द्विज यज्ञ बेदी रचाई जी
भूषण बसन भाजन अनधन के खुल गए हैं भंडार

विप्रों का मान सन्मान करै नृप ब्रह्मभोज करवाता है
संग नामकरण संस्कार करै बालक का नाम धराता है
दैवज्ञ गणक ज्योतिषियों से संग यह भी पूछा चाता है
यह कैसी घड़ी में मिला है बालक कैसा भाग दर्शाता है
शशि की समान हंसिका देख दैवज्ञ वृंद बतलाता है
चन्द्रहास नाम इस बालक का सभी विप्रों को मन भाता है
कई देशों का भूप बनैगा गुणों का नहीं सुम्मार

ब्राह्मण याचक सब विदा करे अध्यापक बेग बुलाया जी
प्राणाधिक प्रिय सुत चन्द्रहास को विद्या पढ़ण बिठाया जी
वर्णावली लिख लिख देता गुरु नहीं पढ़ता शीश हिलाया जी
मेरे मतलब के दो अक्षर हैं वो तो इनमें नहीं आया जी
मैं वृथा परिश्रम करूं नहीं अध्यापक नै धमकाया जी
धमकाया भी पर नहीं माना विप्र आ नृप कूं वचन सुनाया जी
बिन ताड़ना नृप इस बालक का होगा नहीं सुधार

राजा कुलिन्द कहै अध्यापक सैं मौंजी बंधन करवाऊंगा
मौंजी बंधन करवाय शाल में पुत्र कूं पढ़न बैठाऊंगा
अभी बाली उमर पढ़ने के बहोत दिन ताड़ना नहीं दिवाऊंगा
तुम जाओ गुरुजी पाठशाला में सुत को मैं समझाऊंगा
धीर धोंप दे प्रिय सुत कूं घर ही अक्षर सिखलाऊंगा
कहै महोर सिंह पढ़ो मतना पढ़ो हरिनाम तो नहीं छुटाऊंगा
हरिनाम सैं ध्रुव प्रह्लाद की सात कुली हुई पार

ख्याल

अध्यापक जी मेरे पुत्र के गुणों का कुछ नहीं है सुम्मार
सत सेवक वृद्धों का भगत है विद्वानों से रखता प्यार ।

एकादशी को जल नहीं पीता करता नहीं है अन्न आहार
हरि-हरि इसके मुख सेती आवाज आती है हर बार ।

शालग्राम की पूजा करता बड़े प्रेम ला पंचोपचार
हरिभगत कै धड़ै चढै ना चाहे पुत्र कोई जनो हजार ।

आठ बरस का होने पर मौंजी बंधन का हो हकदार
महोर सिंह गुण गाय हरि के स्वपन समान समझ संसार ॥

दोहा

पालन पोषण करन में, आठ बीत गए साल ।
मौंजी बंधन कराय कर, बैठा दिया चटशाल ॥

राजा कुलिन्द नै चटशाल भेज दिया पढ़न हरि का प्यारा ॥ टेक ।

पट्टी पर वर्णों की माल
स्वर व्यंजन लिखा दिये संभाल
गुरु कहै पढ़ अब मेरे लाल
तेरे घट में हो उजियारा

मेरे घट का गुरु दयाल
दो वर्णीं दिया तिमर निकाल
जो काढ़ोगे मुख से फाल
करूंगा याद यह धर्म हमारा

लगे पढ़ावन गुरु कृपाल
वेद वेदांगों की परनाल
बालक कुशाग्र बुद्धि विशाल
थोड़े ही दिन में पढ़ लिया सारा

चोदह विद्या कला कुशाल
हो गया कुलिन्द नृप का बाल
अब तो महोर सिंह कर ख्याल
बजन वाला है कूच नगारा

दोहा

परमपिता परमात्मा, वेद हैं इसके श्वास ।
इस आशय से पढ़ गया, वेदों को शशिहास ॥

हित सैं धनुर्वेद चन्द्रहास गुरुकुल में जा कै पढ़न लगे जी ॥ टेक ।

शस्त्रों के साधन सीखे अस्त्रों के सीख लिए अंग
धारण करने सीख लिए हैं उनाह चाप निषंग
गुणवंता में गुण बढ़न लगे जी

इनकी भी कर लई पढ़ाई ओट चोट अणी धार
चन्द्रहास नै पास किए हैं पढ़ पांचौं हथियार
ऊपर ऊपर कूं चढ़न लगे जी

ह्रदय का मैदान बनाया ब्रह्म का किया निशान
भक्ति डोर किया सत का मन के बनाये बाण
प्रकृति तूणी से कढ़न लगे जी

निर्गुण सगुण दोनों पक्षों के जान लिए सभ भेद
महोर सिंह लड़ चन्द्रहास नै अरिदल किये नापेद
ज्ञान आत्मय दृढ़न लगे जी

दोहा

पंद्रह साल का हो गया, उठा लिया धनुबान ।
पिता से अर्ज गुजारता, चन्द्रहास बलवान ॥

तुम हुकम करो महाराज आज मैं धनुष उठाया है ॥ टेक । (सोरठ)

जा राजौं से जंग मचाऊं
जीत जीत धन उनका ल्याऊं
धन्वी विजयी नाम धराऊं
अवसर पाया है

सौ गामों के भूप कहाते
मंत्री का दिया टुकड़ा खाते
सालाना हम कर पहुंचाते
सुत समझाया है

राजा कहै है शत्रु घनेरा
मेरे राज कै लग रहा घेरा
मौका देख राजधन मेरा
लूटा खाया है

जो बेटा चाहता प्रभुताई
अरिकुल में जा मांड लड़ाई
महोर सिंह ले लई शरनाई
हरिगुण गाया है

दोहा

पाँच रथी लिए संग में, करी धनुष टँकोर ।
अरिकुल पै धावा किया, चढ़ा बांध कै ज़ोर ॥

अबसो चन्द्रहास विजयी चढ़ा विजय करण ॥ टेक ।

रन बाजे रहे बाज, वाहनौं कूं साज साज, चढ़े शूरवीर गाज, बांध बांध कै परण
रन बाजौं की घोर, और धनुषों की टँकोर, सुन सुन मच्या शोर, लगे शत्रु डरण

दुश्मन समट समट आवैं, आ आ मोर्चा लगावैं, चन्द्रहास पै बरसावैं, बाणों की भरण
शशिहास धनुष तान, शस्त्र छोड़े बेपरमान, करने लग्या घमस्यान, लग्या प्राण हरण

बींध दई नस नस, घाव करैं चस चस, हड्डियों से टस टस, लग्या खून झरण
बाण पड़े आय आय, मच रही त्राय त्राय, कोई ल्हुक गया जाय, कनी लई है शरण

फौज हुई खिन भिन, कोई भुजा शीश बिन, कोई कर्ण नाक छिन, शीश धुनै धरण
चन्द्रहास की दुहाई, फिरी रण फतह पाई, महोर सिंह लीला गाई, किया हरि सुमरण

दोहा

अरिकुल का दमनकर, नृप कुलिंद का लाल ।
शंखधुनि करकै चल्या, संग लिया धनमाल ॥

ख्याल

राजौं कूं जीत कई भार कनक छकड़े गाडौं में भरवाया
जवाहरात हीरे पन्ने मणि माणक अरबों की माया ।

गज बाजी रथ कई हजार अगणित गणना में नहीं आया
गऊ महिषी बेसुमार पार करहों का भी कुछ नहीं पाया ।

बसवाभूषण भाजन चुन चुन कर लिया अपना मन चाया
कपूर चन्दन मृगमद केशर करहों ऊपर लदवाया ।

दल बल लेकर संग बली नै कूच नगारा बजवाया
भक्ति विद्या बल से महोर सिंह जंग जीत घर कूं ध्याया ॥

दोहा
कुलिंद से कहने लगे, जा अगवानी दूत ।
जंग जीत लस्कर लिये, आ रहा तेरा पूत ॥

अजी एजी पुत्र की सुनकर विजय बधाई
जल्दी पुरी सजावो हुकम दे चल्या भूप अगुवाई ॥ टेक । (सांगीत)

गज बाजी पालकी ले चल्या भूप पेशवाई
आनंद साज बजैं बल्यम चौंर धजा फर्राई
जै जै ध्वनि वेदध्वनि चन्द्रहास सुन पाई
तात सन्मुख आते देखा रथ से उतर आया
शीश को झुकाये अपने पिता के सन्मुख ध्याया
चंरणों में लेट गया पिता नै हिरदै लगाया
आशीर्वाद सुनाई

पालकी बैठाने लगे कर गया इन्कारी
विष्णुरूप पिता और लक्ष्मीरूप महंतारी
पिता तो पैदल चलै मैं कैसे सजूँ सवारी
द्वार पै खड़ी है माता बाट पुत्र की निहारै
पुत्र नै आ चरण गहे माता शीश पुचकारै
आशिखा बधाई गावैं माता आरता उतारै
जयति जय धुनि छाई

पुरी तो विचित्र सजी सजे सभ नरनार
घरों में बधाई बाजैं होय रहे मंगलाचार
भूप नै विचार किया पुत्र कूं द्यूं राजभार
माघ शुक्ला पंचमी बसंत ऋतु सिद्धयोग
विप्रवृंद बोला ऐसा फेर ना मिलैगा जोग
मुहूर्त अबूज दिन आज का बड़ा निरोग
विजय पुत्र नै पाई

तीरथों के जल सैं चन्द्रहास नै स्नान किया
करकै अस्नान ध्यान दान बेपरमान किया
देव पितृ पूजा करकै सम्मानित महान किया
सभा को नमनकर गद्दी पर गया बिराज
राजतिलक कर दिया शीश ऊपर धरा ताज
जै जै धुनि होय रही आनंद के बाजैं साज
महोर सिंह छवि गाई

ख्याल

चन्द्रहास की फिरी दुहाई ताजपोशी दरबार किया
समट समट सभ परजा आई दे दे भेंट जुहार किया ।

आई हुई जनता का भूप नै यथायोग्य सत्कार किया
कर सत्कार व्याख्यान देन लग्या प्रजा का चाहै सुधार किया ।

चारौं वर्णों के धर्म का राजा नै प्रथम प्रचार किया
हरिभक्ति और एकादशी व्रत का ऐलान बारंबार किया ।

चोर जार डाकू ठग निंदक झूठा राज बाहर किया
महोर सिंह कहै हुकम भूप का प्रजा नै अंगीकार किया ॥

दोहा

हुक्म अदूली जो करै, भोगैगा महात्रास ।
प्रजा से बर-बर कह रहा, नृपति चन्द्रहास ॥

राजा कहन लग्या चन्द्रहास सुनू प्रजा सारी ॥ टेक ।

हरिनाम है जीवन मेरा जीवनप्राण है ग्यास
जो इस व्रत कूं नहीं करैगा होगी नहीं बरदास
हो नर चाहे नारी

दसवीं को रहै एकाहार ग्यारस कूं उपवास
हरिभजन जागरण रात कूं श्रद्धा भक्ति बिश्वास
राख करै निराहारी

काम क्रोध मद लोभ का तन में हो नहीं परकाश
वै नर मेरा मित्र हैं जो इसबिध बारा मास
ग्यास करैं पखवारी

  महापाप आ ग्यारस नै अन्न में करै निवास
महोर सिंह ग्यारस नै अन का जैमिनी वेदव्यास
दोष लिख गये भारी

इतने कर्मों के करने से व्रत भंग हो जाता है
देखम देख भूखा मरने से मुक्तिपद नहीं पाता है ॥ टेक । (ख्याल)

व्रत करै नहाये गरम नीर से साबुन तेल लगाते अंग
नख छेदन और केश बंधन से भी ब्रत हो जाते भंग
दूध दही घी खाने सैं शरीर में प्रगटैं हैं अनंग
कटु अक्षर तीक्ष्ण ग्रीष्ट भोजन सैं ब्रत का बिगड़ै हैं ढंग
ब्रत करै और चाबै पान वो बरत काम नहीं आता है

दातुन करै अबेरी नहाते त्रिया से करते भोग विलास
दिन और प्रदोष में सोते हैं उनका जाय अकारण नाश
सुल्फा भंग अम्ल पोश्त सभ नशे बताये वर्जित खास
व्रत में प्याज तंबाकू के सेवन सैं होय नरक में वास
व्रती रह भोजन करना कृतघ्नी कहलाता है

व्रत राख़ करै निंदा पराई मेरी तेरी करते हैं
ऐसे व्रत करने वाले नाहक भूखे मरते हैं
चोरी जारी झूठ को व्रत के दिन भी नहीं बिसरते हैं
ऐसे व्रत करनिये जग में पाप पोट सिर धरते हैं
व्रत राख़ जा खेल तमाशों में बैठ मखौल उड़ाता है

सीसा सुर्मा काजल एकादशी के दिन हैं मना
चिलम तमाखू हुक्का पीना इनका भी है दोष घना
सभ ही को कहै व्रत करने की बाल वृद्ध आतुर के बिना
सुकरत हेत भारथ भू पै आये मनुष्य शरीर जना
महोर सिंह तूँ भी कर ग्यारस जो मुक्तिपद चाता है

दोहा

राजा नै दरबार में जो, कुछ किया प्रचार ।
प्रजा नै बड़े प्रेम सैं कर, लिया अंगीकार ॥

राजा सैं कर जोड़ कै अर्ज गुजारै हैं ॥ टेक ।

कोई तो चाहता धर्मशाला
कूप बावड़ी कोई सरताला
कोई कहै मठ मंदिर शिवाला
नहीं हमारै हैं

कोई कहै म्हारे नगर के माहीं
श्री महाराज विद्यालय नाहीं
सारी प्रजा राजा के ताहीं
खड़ी पुकारै है

कोई कहै संत हमारै आते
आश्रम बिना महादुख पाते
कोई कहै ग्राम उठाया चाते
नदी किनारै है

कोई कहै पड़ै काल बवाला
हमसे भरा जाय नहीं हाला
महोर सिंह हरिनाम की माला
पार उतारै है

दोहा
भूप कहै प्रजा अब, जाओ निज निज धाम ।
थोड़े दिनों में होंयगे, सिद्ध तुम्हारे काम ॥

हो गया हुकम भूपाल का
बंदीघर कर द्यो खाली ॥ टेक । (त्रिभंगी)

बोल्या प्रजा से भूपाल, मैंने तीन चार साल, थारा माफ किया माल, जाओ मौज करो
कहो मंदर ग्राम ग्राम, बनवाऊँ धाम धाम, जहां बिराजैं शालग्राम, पूजा रोज करो
आया पर्व का दिन जान, यथाशक्ति करो दान, अपनी श्रद्धा समान, ब्रह्मभोज करो
हरिनाम के प्रताप, से मिट ज्यांय तीनूं ताप, नित इस ही का जाप, खोज खोज करो
जो मेट दे हिदात, वा की करकै पंचात, इकट्ठी हो सब जात, जमींदोज़ करो
मानौ राज हदीस, राजगद्दी कूं ना शीश, खड़े दे रहे आशीष
आयूष पा कुलिंद लाल का
जय बोल प्रजा उठ चाली

खूनी डाकू चोर जार, जीतने सजा के हकदार, किए राज से बाहार, अत्याचारी
सत्यव्रती चन्द्रहास, किया धर्म बिल पास, सभ की पूरता है आश, छत्तरधारी
सदाव्रत दिये लाय, छत्र दिये खुलवाय, प्याऊ दई हैं बैठाय, पास में न्यारी
छतरी मंदर धर्मशाल, बापी कूप तत्काल, बनने लगे सरताल, मदद हुई जारी
गढ़ कोट किले खाई, जो थे पुल दरियाई, सभ की मरम्मत कराई, कहैं नरनारी
इसका जुगांजुग राज, स्थिर करो सरताज, अपनी रैयत के काज
किया माफ हाला कई साल का
प्रजा की देख तंगहाली

जहां देखी बियाबान, हुई प्याऊ जलदान, मुसाफिरों के स्थान, वहीं बनवाये
शतग्राम दर ग्राम, एक एक विष्णुधाम, ल्याय ल्याय शालग्राम, जिनमें पधराये
पूजा होती तीनूं काल, बाजैं शंख घड़ियाल, चन्द्रहास महिपाल, के जां यश गाये
घर घर हवन होते, हरि भजैं पाप धोते, सभ सुख नींद सोते, दुख बिसराये
राज माहीं नरनारी, करैं ग्यारस पखवारी, विधि सिद्धि करैं सारी, जो जो सुन आये
राजा राज प्रजा चैन, सुख सेती दिन रैन, बीतते हैं दुख हैन
भय रहा ना काल बवाल का
मृत्यु ना रही अकाली

पूर्व पुण्य के परकास, राजा हुया चन्द्रहास, सभ की पूरता है आश, भूप महादानी
विप्र वेद प्रचारी, छत्री हुये धनुषधारी, वैश्य कंचन व्योहारी, बड़े विज्ञानी
जती सती नरनार, पुत्र पिता हितकार, भाइयों का हुया प्यार, बेपरमानी
भाट चारण कलात, कीरत करैं दिन रात, बोलैं आय परभात, आशीष बानी
पुरी करै झिम झिमाट, सुख सम्पदा के ठाठ, शेर गऊ एक घाट, पीवैं पानी
रह्या भूप का यश छाय, शोभा बरणी नहीं जाय, महोर सिंह गुण गाय
सिर बज रह्या बाजा काल का
खड़ी मौत बजा रही ताली

दोहा

राजधर्म का तप रहा, प्रजा में अमन चैन ।
हित के वचन पुत्र से, लग्या कुलिंद कहैन ॥

कुंतलपुर को बेटा कर पहूंचाओ जी ॥ टेक ।

दस हजार निष्क सौरण के छकड़ों में भरवाओ जी
तीन बस्त्र आभूषण नजराने के
देकर मेरे लाल जल्दी दूत पठाओ जी

कुंतल के दिये सौ गामौं का तुम भी भूप कहाओ जी
राजौं में सुम्मार हो गये
गद्दी पर बैठ बेटा मौज उड़ाओ जी

चन्द्रहास कहै बाबल मेरा अब क्यौं देरी लाओ जी
जितना कर देना कुंतल कूं
उससे भी सवाया भेजो कौल पुगाओ जी

गज बाजी नै त्यार करो प्रतिहार बेग बुलवाओ जी
महोर सिंह कहै निष्क कंकण कूं
करहों ऊपर बाबल बेग लदवाओ जी

ख्याल

मोतियन की माल, सौरण के थाल, उष्णीक दुशाल, धरवाये हैं
चंदन कपूर, केशर कस्तूर, व्यंजन बिनूर, भरवाये हैं

मेवा अपार, निष्क दस हजार, करहों पै भार, करवाये हैं
श्री कुलिंद माहाराज, धर्म की लिहाज, कुंतल कै काज, सरवाये हैं ॥

दोहा

कुशल पत्र भी लिख दिया, लिखे सभी सामान ।
प्रतिहारों से नृप कहै, जल्दी करो पयान ॥

कर कुंतल नृप का ले प्रतिहार चले ॥ टेक । (जंगम)

आज्ञा पा नृप चन्द्रहास की बोल कै जय प्रतिहार चले
गज बाजी रथ छकड़े करहे सभ हो होकै लार पतार चले
उस धन के रक्षक शूरवीर संग ले लेकै हथियार चले
है कोश चौबीस कुंतलपुर वहां सैं ग्यारस के दिन निराहार चले
नदी किनारै बरती बासी पहूंचे दोपहर ढले

स्नान ध्यान तुलसी पूजन में करते काल विशेष हुया
गीले वस्त्रीं जा अस्त समय में मंत्री के भवन प्रवेश हुया
मंत्री कहै गीले वस्त्र देख क्या मृत्यु प्राप्त नरेश हुया
किस दिन कुलिंद का अंतकाल हुया बिन राजा का देश हुया
धृष्टबुद्धि का वचन भयंकर सुन प्रतिहार जले

प्रतिहार कहैं म्हारे राजा की बुरी चिंतनिया बुरीगार मरो
अन्यायी भूप कुमति वजीर दगाबाज मित्र और यार मरो
झूठे निंदक चोर जार ठग संग व्यभचारिणी नार मरो
ले लोटा सभी बणजोटा मरो और बेईमान साहूकार मरो
म्हारे भूप के पूर्व जन्म के सुकर्म आज फले

म्हारे राजा कै हरिभक्त दिग्विजयी पुत्र चन्द्रहास हुये
जिस दिन गद्दी बैठे राज में सभ सुख परकाश हुये
कोई दुखी दरिद्री रहा नहीं लक्ष्मी के आय निवास हुये
कहै महोर सिंह दूतों के वचन सुन मंत्री कूं बिश्वास हुये
धृष्टबुद्धि के सभासदों नै सुन सुन हाथ मले

दोहा

कर के हिस्से कर दिये, गाल्व ऋषि नै आय ।
राजा राणी वजीर कै, घर दीन्हे भिजवाय ॥

सूदों से मंत्री कहै पाक तुम शीघ्र बनवाओ जी ॥ टेक ।

सुने वचन बोले प्रतिहारा
आज अन्न जीमैं नहीं थारा
म्हारे लिये चल्लू भंडारा
क्यूं करवाओ जी

करकै क्रोध जद मंत्री टेरा
कुलिंद तो मतेह है मेरा
राज दिया क्यूं नहीं किया बेरा
हमें बताओ जी

कुलिंद कूं अब ल्याऊं पकड़ कै
बेड़ी हथकड़ियों में जकड़ कै
वो हमसे लग्या चलन अकड़ कै
कर्म फल पाओ जी

राज की बुरी विचारी
भोजन की कर गये इनकारी
आये गीले बस्तर धारीं
रहो चाहे जाओ जी

कुलिंद कूं राजभ्रष्ट करूंगा
सकल सम्पदा नष्ट करूंगा
प्रजा कूं महाकष्ट करूंगा
जाय सुनाओ जी

कुलिंद की भई उमर बडेरी
छा गई उसको अक्ल अंधेरी
महोर सिंह प्रभु नैया मेरी
पार लंघाओ जी

दोहा

हाथ जोड़ कहने लग्या, मंत्री से प्रतिहार ।
गुना माफ म्हारी करो, अरज सुनो सरकार ॥

हो जी सरकार सुनियो अरज हमारी जी ॥ टेक ।

भोजन कैसे करैं आज हम ग्यारस करैं पखवारी जी
ब्रत तोड़े होते हैं कृतघ्नी
आठों पहर हमतो रहैं निराहारी जी

कल हम भोजन करैं आपका करैं नहीं इनकारी जी
गुस्ताखी कोई नहीं हमारी
बिना ही कसूर इतनी बुरी क्यूं बिचारी जी

नदी किनारै स्नान ध्यान किया करी भावना सारी जी
तलबी सैं चलकर आये
भवन तुम्हारै गीले बस्तर धारीं जी

राजभ्रष्ट क्यूं करो कुलिंद कूं क्यों परजा की ख़्वारी जी
गद्दी तिलक राजा रजधानी
थारे दिये हुये सभ सभा दरबारी जी

बे अपराध बालक कूं मारैं पिता और महतारी जी
किसकै शरणै जा वो बालक
कौन पुचकारै बताओ आप मणधारी जी

रौब आपका सौ गामों में रहीं ना चोरी जारी जी
खुले किवाड़ीं नर और नारी
सुख की नींद सोवैं बदोलत थारी जी

मंत्री कै कुछ हुई शांति प्रतिहारैं अर्ज गुजारीं जी
महोर सिंह कहै भावी प्रबल है
लाख जतन करो चाहे टरै नहीं टारी जी

दोहा

बिता दई जागरण में, चार पहर की रात ।
स्नान ध्यान भोजन किया, उगमते परभात ॥

मंत्री जी चले हैं संग में
विदा हो प्रतिहार पधारे ॥ टेक । (सांगीत)

धृष्टबुद्धि की है पुत्री विषिया नाम कहलाई
पिता का गमन सुन महलों से उतर आई
रस्ता घेर लिया पिता आपने करी चढ़ाई
बालापन में पिता मैं शाल का एक वृक्ष लाया
हो गया पर्वस्त पिता वह भी फल फूलीं आया
पुत्री कूं गये हो भूल ऐसा क्या अंधेरा छाया
करकै कैद इकंग में
हुये नचीते पिता हमारे

पुत्री के हारह कूं धृष्टबुद्धि मंत्री पाय चले
राजा से मसोरा करकै सलाह भी मिलाय चले
धर कूंच धर मंजल मारोमार धाय चले
सरहद पै पहूंच दूत भेज दिया अगवाई
पाय कै खबर पिता पुत्र चल्या पेशवाई
भेंट दे जुहार कर मंत्री की खुशी मनाई
स्वागत किया उमंग में
बजैं धोंसे ढ़ोल नगारे

कुलिंद से मंत्री पूछै कौन है यह बैठा पास
भूप कहै पुत्र मेरा नाम इसका चन्द्रहास
वन में मिलने तक का सुनाया सारा इतिहास
पुत्र ज्ञानी ध्यानी महादानी पर उपकारी
विद्या का भंडार हरिभक्त बड़ा बलकारी
दिग्विजय कर लाई जीतने थे भूप छत्रधारी
जीत जीतकर जंग में
कर दिये मातहत तुम्हारे

सुनकै बचन मांटेरी जी नै मन में ठान लई
राज कूं जरूर लेगा निश्चय कर जान लई
बायें पग छ्ठी कटी उंगली भी पिछान लई
जल्लादों नै जुल्म किया शत्रु नहीं हत्या जब
दुश्मन कूं मार ल्यूंगा अनजल करूंगा तब
महोर सिंह राम भज दुख दूर होंय सब
दिल कूं रंग उस रंग में
निर्मूल पाप हों सारे

अरिल

कटे पै नमक जले पै मिर्च जिमी ज्वलंत अगन में घृत धार हो
वैमनस्य हो गया मंत्री जिमी भस्म लपेटा अंगार हो ।
सुनहरी मूठ सैं म्यान सुचिक्कण भीतर दुधारी तलवार हो
भीतर घाट बाहर हंस हंस बात करै है सुप्यार हो ।
जो इसका यहां हत्न करूं तो मेरा भी यहां संहार हो
विष देकर मरवा दूं तो नहीं किसी तरह की तकरार हो ।
विष से विप्र वचन हूं मिथ्या मदन अमल का उभार हो
महोर सिंह कहै भावी प्रबल फिर क्यूं नहीं ऐसा विचार हों ॥

दोहा

कर विचार मंगवा लिया, कागज कलम दवात ।
गुप्त पत्र लिखने लगा, मंत्री अपने हाथ ॥

कुबुद्धि मंत्री लिख रहा परवाना ॥ टेक । (जंगम)

स्वस्ति श्री आयुष्मान मदन हित समाचार लिख्या जाता है
विषमस्ये प्रदीयताम बेटा जो लेकै पत्रिका आता है
देरी करने का काम नहीं जो भली भलेरी चाता है
ऐसा अवसर बारम्बार मेरे मदनलाल नहीं आता है जी
जो अवसर कूं चूक गये तो हो पीछै पछताना

सुत जाति जन्म गुण कर्म रूप आयु का विचार करना नहीं
किसी राजकाज कै हेत पुत्र कागज कूं चाहे जहां धरना नहीं
लख काम त्याग सबसे पहले यो करना काम सुत डरना नहीं
एकबार लिख्या सौ बार समझकर निज का काम बिसरना नहीं जी
जैसा आज का शुभदिन आया है ऐसा फेर नहीं आना

परवाना लिखकर बंद किया चन्द्रहास पास बुलवाया जी
बेटा कुंतलापुरी जाना होगा काम याद एक आया जी
कोई राज संबंधी काम जरूरी चाहता तुझे पठाया जी
वह काम तेरे सैं बनै पुत्र नहीं और सैं जाय बनाया जी
और ना जाना कहीं घर मेरै सीधा चल्या जाना

मंत्री का बचन बड़े आदर सैं शशिहास नै अंगीकार किया
धन्यवाद देने लग्या धृष्टबुद्धि सिर पुचकारा और प्यार किया
वह गुप्त पत्र दे दिया कुंवर कूं नेम हजारौं हजार किया
कहै महोर सिंह भावी नै पवन बेगी घोड़ा तैयार किया
यहां से चल कुंतलपुर में जा रोप्या कम्ठ्याना

दोहा

अंगन्यास किया मात नै, पिता दई आशीष ।
गुरु गणपति ध्यायकर, चले सुमर जगदीश ॥

अबसो कुंतलपुर कूं चन्द्रहास चले ॥ टेक ।

साज साज कै तुरंग, सहचारी लिए संग, पांचौं उमंग उमंग, घर बाहर निकले
सिद्ध योग शुभ लग्न, चित चाव मन मग्न, आगै पीछै सभ शुगन, हुये भले भले

मंत्री शूल दिये बोय, शूल फूल जांगे होय, मेट सकै नहीं कोय, जो अंक घले
विषिया का कर्म भोग, चन्द्रहास का संयोग, जिनका जोड़िया संजोग, बेहमाई बले

बुरा और का जो चाता,बुरा उसी का हो जाता, गला वोही कटाता, काटै और के गले
कर्म करै चुपचाप, प्रगट हो जाते हैं आप, रहैं नहीं पुण्य पाप, बिन फूले फले

जिन राम की सहाय, वै ना मरैं विष खाय, डूबैं नहीं जल मांय, नहीं अग्न जले
महोर सिंह हरिदास, परम भक्त चन्द्रहास, पहूंचे सरवर के पास, दोपहर ढले

सोहनी

सर्वर सजल निर्मल सलिल अलीकुल कमल दल छा रहे
चौतरफा साल तमाल ताल रसाल तरु लहरा रहे ।
घन सुमन वन खिल रहा चमन केली भवन मन भा रहे
हवा मंद शीतल सुगंध परंद आनंद शब्द सुना रहे ॥

दोहा

रसाल तरु तले कर लिया, चन्द्रहास विश्राम ।
सहचारों से क़हत है, डटो यहां दो याम ॥

स्नान ध्यान भोजन कर पांचों सो गये पैर पसार ॥ टेक ।

मंत्री पुत्री विषिया कहलाई
चलकै राजसुता पै आई
मसौरा कर सहचरी बुलाई
बोली राजकुमार

तनौं में युवा अवस्था आ रही
बैठी क्वांर कोटड़ा छा रही
सखियो ऋतु बसंत दर्शा रही
देखो बाग बहार

अब सहेली तुम घरों को जाओ
जा जा सभ श्रंगार बनाओ
कर श्रंगार बेग तुम आओ
मत नहीं लाइयो बार

चम्पकमाला राजदुलारी
के सुन वचन मग्न हुई सारी
महोर सिंह सभ सखी सिधारी
अपनै अपनै द्वार

ताबील

चार हो चतुर्पग, चार ही सुभग, चार फूल, फल चार, यह सोलह श्रंगार हैं
सोलहों के आवरण जो कहैं बत्तीस को ऋषि बर्णे पद्मिनी कोई हसानी कोई च्यात्रग कुमार है
एक सौ सहेली सज धज चली अलबेली देखैं वनकेली जहां अजब बहार है
मृगनैनी पिकवैनी कामिनी नसैनी सारी महोर सिंह कथै जैसे कुंजन की डार है ॥

दोहा

सज धजकर सभ आ गई, जरा न लाइ वार ।
विषिया चम्पकमाल नै, साज लिये श्रंगार ॥

भेली हो सहेली केली वन कूं चली ॥ टेक । (सवैया)

छु छु छुम छु छु छुम नुपुर बजन लगे झन न न न न न पायलों कि झंकार
दामन की दमक शशिभान की चमक उडुगन की झमक दे रहे गलहार
कोई गयंद की चाल कोई चलै ज्यूं मराल ताता थेई करैं ख्याल जाय कुंजन की डार
एक एक से अनूप मदन सदन काम कूप जती सती लख रूप खाय जाते मार
अधिक धुप और छांह जिनसे सही नहीं जांह पहूंची केलीवन मांह बाग़ खिला गुलजार
केतकी तारों का सा झूमका जिमी चम्पाकली

कूजत विहंग संग विहंगनी कूक रही शीतल सुगंध मंद मंद हावी रही चाल
भ्रमर गुंजार करैं बर्ज के आलाप भरैं कोकिला पंचम बैठी बोल रही डाल डाल
नृतत मयूर हूर जैसे नृत्य कर रही स रि ग म प ध नि सो गाती हैं बजाती ताल
देख सारस संग चकवा चकवी इकंग देख उठत तरंग अंग अंग में अनंग झाल
सेब और संतरे अनार हाड़ू बेल फल म्हारे स्तन एइसे जैसे दे रहे मिसाल
पुष्प वाटिका में जा पहूंची बन-बन कै अबली

केतकी चमेली चंपा मालती हैं लाजवंती काहे को गुमान भरी तुम हम दुकसार
म्हारे फल थारे फूल फूलों की महक तुम में म्हारे माहीं छट रही यौवन की महकार
इतने वचन कहे धर्म की भाईली बन चुन चुन फूल गूंथ लिये हार
आगै को बढ़ी हैं देखैं मोतिया मोगरा हजारी गैंदा मरवा देखे कसुम्बी केसरिया क्यार
आम नींबू जामण जमोणे जहां तहां खड़े नारियल खजूर फूले पलासोव नहीं पार
अहि लिपटे मलियागर देखे फूले फले कदली

  काम को चिताने वाले खेलती अनोखै खेलैं सभ से बड़ा खेल रास मंडल दिया रचाय
वट तरू शीतल छांह कर गह करन से गोपी बन बन नांच रही बन मांय
राधेश्याम कृष्ण कृष्ण गोपीनाथ ब्रजनाथ विश्वनाथ धुन बांध रही गाय
झीना स्वर माधुरी आवाज़ लय धुन सुन वनपक्षी डाल डाल बैठ गए आप आय
वनकेली कर चुकी जलकेली करने चली महोर सिंह भावी उस सरोवर पै लिये जाय
स्नान ध्यान भोजन किये जिसपर सोता था भाग बली

ख्याल

वनकेली कर चली सहेली भेली हो हो आय रही हैं
वन वन टोली गावैं होली ठिठोली करती जाय रही हैं ।
गाती ताल बजाती हुई मदमाती फूल बगाय रही हैं
भरी जवानी हुई दीवानी मस्तानी धूम मचाय रही हैं ॥

दोहा

दांये वायस बोलता, बैठा हरियल डाल ।
बायां चख लख फरकता, बोली चम्पक माल ॥

विषया भागण आज तुझे
कोई भागी पुरुष बरैगा ॥ टेक ।

हे बिम्बोष्ठी हे पिकवैनी
विल्वफल स्तनी हे मृगनैनी
विपुल नितंबे काम नसैनी
आती होगी लाज तुझे
आज लाज को कोई हरैगा

वायस शुगन पड़ैं नहीं खाली
चेहरे ऊपर छा रही लाली
बाईं आँख फरकने वाली
आज मिलै सरताज तुझे
तेरा कर ग्रहण करैगा

  जैसे निर्धन कूं धन पाया
कुष्टि की कंचन हो काया
कहै विषिया इतना सुख छाया
दे दूं सरबस राज तुझे
मन जद भी नहीं भरैगा
लख-लख छवि विषया के अंग की
लज्जित हों त्रिया अनंग की
हे प्रभु द्विज महोरसिंह की
लंघानी होगी जहाज तुझे
तुम बिन नहीं काज सरैगा

दोहा

जो कोई होय रजस्वला, मत नहीं बड़ियो ताल ।
जल दूषित हो जायगा, कह रही चंपकमाल ॥

अजी ऐजी सहेली हिलमिल नहाण चली
वस्त्र उतारे चमकै अंग मानूं तेग म्यान निकली ॥ टेक । (सांगीत)

देख कै अनूप रूप पवन गति बंद हुई
सरोवर की शोभा देख देख सभ अनंद हुई
जल देख स्थिर रहा भानूकिरण मंद हुई
आभूषण धुन सुन सुन हंस सब भाग गये
सरोवर का वास तज्या आल्हणों को त्याग गये
भूरा बादल जान पिक पी पी करने लाग गये
सकुची कमल कली

रत्नाकर की शोभा सरोवर पै छाय रही
रत्नसागर निधि यहां कन्यारत्न न्हाय रही
जलक्रीडा करने लगी फाग सी मचाय रही
  जल कूं बिलोवन लगी ऊपर कूं उछालती हैं
धर्मभाण बन गल बीच बांह घालती हैं
कोई सीखै तैराकी कोई गोता खाय चालती हैं
ज्यूं कछवीं मछली

जलक्रीड़ा कर चुकी अंगवस्त्र धारती हैं
सरोवर की शोभा चारों तरफ से निहारती हैं
आओ घर चलो कई ऐसे भी पुकारती हैं
विषिया नै देखे पांच पुरुष पांच ही तुरंग
चार तो इकट्ठे सोये एक सोय रहा इकंग
ल्हुकती छिपती पास गई मानूं सोया है अनंग
लग रही तलामली

आयल पायल बिछुए काढ़ काढ़ कै बगाय गई
पैरों को दबाती हुई फेर हूंईं आय गई
देख कै अनूप रूप विषया लुभाय गई
बरूं तो इसी को बरूं नहीं त्याग दूँगी प्रान
मेरे जोग बर आज भेज दिया भगवान
अणहूणी होती नहीं महोर सिंह निश्चय जान
हूणी नांह टली

दोहा

कंचुक निसत पत्र इक, पड़ा धरण के मांह ।
विषया ठाय बांचन लगी, मनचाही हुई नांह ॥

विधि नै लिख दिया लेख रेख कूं कौन मिटावै जी ॥ टेक । (चित्रमुकुट)

विष देना लिखा पत्र में विषिया नै लिया बांच
विष विषया कैसे बनै बैठी कर रही जांच
समझ में कुछ नहीं आवै जी

विष की भरी है पत्रका विषया विष की बेल
दैव योग से मिल गया विष विषिया का मेल
मेल कूं कर्म मिलावै जी

विषयस्ये लिख्या पत्र में गई समझ में आय
साल रस में नख भरा म य दिया बनाय
य कूं फिर या बनावै जी

विषयास्ये हो गई लिखत में लेख बिगाड़ा नांय
लिखी चतुर्थी विभक्ति दान पात्र के मांय
पाणिनि ऋषि गावै जी

विषिया नै ब्याह पत्रका दीन्ही दई ल्हकोय
भावी के प्रताप सैं विवाह पत्र गया होय
भावी वश जगत कहावै जी

अक्षर घटा बढ़ा नहीं मात्रा बढ़ी है एक
महोर सिंह पद कथ रहा अश्वमेध पर्व देख
जैमिनी ऋषि दर्शावै जी

सोहनी

लिख पढ़कै विषिया चल पड़ी फूली ना अंग समांवती
मुड़ मुड़ पीछै कूं निरखती हुई आगे कूं चली आंवती ।
हो रही मग्न लग रही लग्न शुभदिन की ख़ुशी मनांवती
भरा भाव चढ़ रहा चाव हंसै मन मन मंगल गांवती ॥

दोहा

लपक झपक विषया चली, सखियों में मिली आय ।
पीछै किस कारण रही, विषया सांच बताय ॥

पूछैं सहेली इतनी देर कहां लगाई ॥ टेक ।

संग आई संग रही बाग़ में संग ही सरवर न्हाई जी
वस्तर पहरे जद भी संग थी
पीछै ना दीखी कर गई आँख मिंचाई जी

क्या कोई मित्र मिल्या मनमेली तुझ कूं बन के माईं जी
आयल पायल बिछुए भैना
सांच बता दे किसकूं देकर आई जी

जैसा चमन तेरा आज खिल्या ऐसा तो खिल्या कभी नाईं जी
फूली अंग में नहीं समावै
पीछै कूं रहकर विषया क्या देख्याई जी

क्या कहीं गुप्त निधि मिल गया क्या अतुल संपदा पाई जी
महोर सिंह ऐसे कहती हुई
पहूंच गई पुरी में अपने घरों मांह जाईं जी

दोहा

चंद्रहास बैठा हुया, निद्रा दई बिसार ।
सायंकाल हुया देखकर, जगा लिये सहचार ॥

उठो तुरंग पलानो हो गया सायंकाल ॥ टेक । (जंगम)

सुन वचन तुरत उठे करकै फुरत चलने को सुरत जद लाई है
सज रहे साज रहे तुरंग गाज खर की आवाज सुन पाई है
ताज़ी तैयार कर हुये असवार मिरगों की डार जद आई है
नगरी की ओड़ दिये तुरंग छोड़ घुडलों की दौड़ हवाई है
पुर में प्रवेश हो गया नरेश मुख पै राकेश छवि छाई है
कहैं त्रिया खड़ी कैसी मुरत घड़ी कारीगर बड़ी बेह्माई है
मदन सदन कूं पूछत पूछत आये दरवाजै चाल

खड़े मध द्वार पांच असवार झट पेशगार बुलवाया जी
मंत्री का दास मैं तो हूं ख़ास नाम चंद्रहास कहलाया जी
मदन कै निवेश कर द्यो प्रवेश लेकर सन्देश यहां आया जी
मंत्री है तत्र मैं भेजा अत्र लिख गुप्त पत्र पहूंचाया जी
ड्योढ़ी अनेक छठी पै विवेक श्रद्धा पष्टि टेक कर धाया जी
मदन का दरबार देख्या गुलजार प्रतिहार नै बचन सुनाया जी
गुप्त संदेशा लेकर आया भूप कुलिंद का लाल

सुन बचन मदन चला त्याग सदन देखा चंद्रबदन खड़ा अगवानी
मंत्री कुमार दई भुजा पसार मिले करकै प्यार उमंगे प्रानी
करैं प्रेमी बात रहे मिला हाथ ले आया साथ सभा दरम्यानी
डटीं आमखास पाती निकास दई चंद्रहास बोल्या बानी
मित्र मदनलाल पाती का हाल मत दिये घाल सभ कै कानी
मंत्री महाराज कही आज ही आज करो काज सुफल हो जिंदगानी
पत्री देख मदन हुया राजी बांच सुनाया सब हाल

सुन समंचार हुई जै जैकार ख़ुशी बारम्बार मनाय रहे
बर योगां योग विषया के जोग शुभकर्म भोग फल पाय रहे
पंडित बुलाय साहा सधाय दीजे परनाय पुल जाय रहे
रहे रंग राच विद्वान् बांच साहा कूं जांच बतलाय रहे
जरवे स्थान पड़ा शशि आन गोधुली प्रमाण सुनाय रहे
सुन चढ़ी उमंग कहै महोर सिंह फूले ना अंग समाय रहे
भावी नै क्या क्या किया आगै क्या क्या रचै ख्याल

दोहा

विद्वानों नै कर लिया, गोधुली परमान ।
शुद्ध लग्न निर्दोष है, ये निश्चय कर जान ॥

बैठी विषया भवन में गणपति गौरी कूं ध्याय रही ॥ टेक । (कमाली)

मंगल मूरत मंगल कारक मंगल के भंडार हो
मंगल के दातार कूं याचक बन जाचन आ रही

विघ्न हरण मंगल करण है नाम अनादि आपका
विघ्न हरो करो दूर दुविधा जो कुछ मेरै छा रही

गवर्ज्या पति हेत कातिक न्हाती तुजकूं पूजती
मंशा पूर्ण कर दई मैं अप देख्या बर पा रही

इतनी किरपा और करो वरदायनी यह बर कहूं
महोर सिंह तन मन धन से विषया गौरी मना रही

दोहा

करी मुनादी पुरी में, बजवा भेरी ढ़ोल ।
नरनारी आवन लगे, जयति जयति जय बोल ॥

रचे मंडप बेदी गालव ऋषि नै आय ॥ टेक ।

बनै ना कुछ तन मन धन बल से
भली बुरी जो हो कर्मफल से
चंद्रहास तीर्थों के जल से
दुश्मन के घर न्हाय

न्हाकर चंद्रहास तन साजे
मंडप नीचै आय बिराजे
भेरी ढोल दमामे बाजे
जै जै धुनि रही छाय

तीर्थोदक से विषया न्हाई
सजधज मंडप नीचै आई
कर्म करन लगे वेद धुनि छाई
त्रिया रही मंगल गाय

भावी भगवती मेल मिला गई
विष की विषया आप बना गई
महोरसिंह कहै ब्याह रचा गई
मंत्री के घर मांय

दोहा

गणपति लक्ष्मी पूजकर, दिये कुलदेव पुजाय ।
पित्रों की पूजा करी, सामग्री चढ़वाय ॥

गाल्व ऋषि विधि विधान से
विवाह कर्म करवाय रहे हैं ॥ टेक । (कवित्त)

कवित्र मंडप विचित्र जा में ऋषि मुनी डटे बैठे स्वस्ति वाचन पढ़ रहे वेदध्वनि छाय रही
सजधज भागण सुहागण सहेली सारी कौतुक आगार में सुहाग बैठी गाय रही
चारणी और भाटणी कतरनी मंगलमुखी चौंरी हथलेवा गावैं साज कूं बजाय रही
श्रीधरी विवाह वेदी चतुरस्त्र अग्निकुंड कनक कलश खूंटी वेदी दम दमाय रही
प्रथमाभ्युदई श्राद्ध करवाया गणपत्यादि देव पुजवाया रक्षाबंधन तिलक चढ़ाया
अड़े विमान विमान से
नभ में दर्शाय रहे हैं

पाद्भाग विमोचन च वरुण वाचार्चनम् च विष्टरं च पाघ पुनर् विष्टर धरवाते हैं
अर्ध और आचमन मधुपर्क न्यास गौ दान अग्नि स्थापन करैं मोड़ी मुकट भी बंधाते हैं
हस्तलेपन शाखोचार नाम गोत्र परवर बोल कन्यादान हू का ऋषि संकल्प कराते हैं
ग्रंथि योजन हवन अंतरपट फेरा परिक्रमा सप्तपदी अभिषेक ध्रुव दिखलाते हैं
भूर सी दक्षिणा दोष निवारैं कर्म क़रा आरता उतारैं ऋषि मुनी आशीष उचारैं
सम्मानित हुये मान से
विवाह दक्षिणा पाय रहे हैं

कन्यादान प्रतिष्ठा में गज बाजी रथ दिये साज साज पालकी पीनस दिये बेसुम्मार
धौरी बैल हेमकरनी रौठन खुरी पयस्वनी सवत्सा सुशीला ध्वनि हुई हजारों हजार
दास और दासी दई बेश बसन भाजन दिये हार सिंगार दिये आभरण अलंकार
मोती और मुरासे हीरे पन्ने मणि माणक दिये मोहर अशर्फी दई कनक रजत भार
बिद्रुममई शैय्या रंगभीनी साज सजाय शुशोभित कीनी दान प्रतिष्ठा में दे दीनी
सुरभूमि के दान से
दुन्दुभी बजाय रहे हैं

सूत मागध बंदीजन चारण कलात भाट दरवाजै खड़े बंश बिरदावली गाय रहे
धोंसे ढ़ोल भेरी नाद तुहियों की धुन सुन याचक जै जैकार करते हुये चले आय रहे
ड्योढ़ी दर ड्योढ़ी पै उमंग की नोबत झड़ैं बाजैं हैं नफीरी रंच्वाय दर्शाय रहे
अन धन भोजन वस्त्र याचकों को बांट रहे भाग और सुहाग की आशीष देते जाय रहे
इस विधि से विवाह बेदी पूरी हुई बटण दक्षिणा भूरी महोर सिंह लई बजा तम्बूरी
पीछा छुटा जहान से
चलने के दिन आय रहे हैं

चंदनावती पुरी में गया हुया था निर्दई धृष्टबुद्धि वजीर
बेड़ी हथकड़ी तोंक गेर लई कुलिंद का लिया जकड़ शरीर ॥ टेक । (ख्याल)

अरे दुष्ट अरे नीच राज का बरबाद तैं कर दिया धनमाल
बना बना मठ मंदर शिवालय रैयत सभ कर दई कंगाल
आप ही राज दिया बेटा कूं वो अख्त्यार हुया चिन्डाल
करणी फल भोग लाल चिमटे कर उतराऊँगा तेरी खाल
कर लेकर प्रतिहार पैठाये तूं नहीं आया हुया अमीर

सख्त हुकम दिया भेज दूत सारी रैयत को बुलवाता है
सभ कै आगै कुलिंद भूप कूं ठोकर से ठुकराता है
गरम तेल करवाय नाक कानों के बीच घलाता है
हाहाकार कुलिंद करै निर्दई दया नहीं लाता है
चाबुक मार उडावै चमड़ी हुये भयभीत मर्द और बीर

कुलिंद कूं दे त्रास प्रजा कूं महात्रास दिखलाय रहा
तेल रुई लिपटा अंगुली अगुलियों में अग्न लगाय रहा
वस्त्र कढाय कढाय चमड़ी चाबुक से मार उड़ाय रहा
सिरों पै अतोल पत्थर धर चिमटों से खाल चुंटाय रहा
त्राहि-त्राहि करै जोड़ै हाथ मंत्री जी माफ़ करो तकसीर

कुलिंद कूं दारुण दुःख प्रजा कूं दे रहा महात्रास
जिसकै बोझ मरो थे आज गया कहां तुम्हारा चंद्रहास
सौ गामों कै अग्नि लगाऊँ धन संपै का करूंगा नाश
महोर सिंह कहै धृष्टबुद्धि नै कुबुद्धि बिल कर लिया पास
धृष्टबुद्धि की भ्रष्ट बुद्धि करी भावी मिला रही तदवीर

दोहा

कैद किया भूपाल को, बेड़ी दई गिराय ।
धृष्टबुद्धि प्रधान नै, परजा लई बुलाय ॥