दोहा –
विघ्नहरण मंगलकरण, होत बुद्धि प्रकाश ।
नाम लेत गणेश का, होय विघ्न का नाश ॥
(झूलना)
जय जय निर्धारण आधार
जय जग दीनन की दातार
जय जग माता करूं पुकार
भगवती दंगल हू में आन कै 1॥
आवो आवो री वाक बानी
बैठो रसना पै भवानी
कर द्यो कर द्यो मेहेरबानी
माता सेवक अपना जान कै 2॥
माता मैं मूर्ख अनभोल
हैं ना शुद्ध हमारे बोल
मेरे घट के पट दे खोल
हृदय दीपक जोहो ज्ञान के 3॥
सांगीत-
आदशक्ति ज्वालामांई निकसी पहाड़ फोड़
त ड़ ड़ ड़ शब्द हुया शाखा चली चारों ओड़
शिखा गई सत्यलोक जोजन वहाँ से कई किरोड़
कहते की दीवाल दग दगाय उठी चारों ओड़
नौऊ खंड दे प्रकम्मा धवलगिरी लिया मोड़
धोलैगढ़ झूल रही झुला रहे बावन बीर
आरता उतारैं सची कमला उढ़ावैं चीर
चंवर लोकड़िये ढुलावैं भैरूं खड़े दावनगीर
रिद्धि सिद्धि मंगल गावैं आरता साजैं शरीर
त्रिबिध वायु चल रहे इंद्र बरसावैं नीर
धन्य दुर्गे धन्य दुर्गे धन्य दुर्गे है अखीर
कलकत्ते में काली पुजती होय रही पूजाचार
बंबई में मम्मा देवी बैठ गई आसन मार
दिल्ली योगमाया पर्वत बीच रही ललकार
बद्री विशाल चंडी खुले देखे दरबार
कांगड़ै और हिंगलाद बीच होते मनुवार
देवी भीमा बेरी पुजै जाती आवैं नरनार
चढै मेवा और मिठाई
शिखर ध्वजा फर्राई
मेहर करो ज्वाला माई
जन की करिये सहाई
श्रीरामचंद्र गाई
शिला समंदर पै तिराई
हनुमान नै मनाई
लंका छन में जलाई
छत्री भीम अर्जुन ध्याई
फतह भारत बीच पाई
याद करी मीरा बाई
नैया पार तैं लंघाई
लई धानू नै शरणाई
रसना काट कै चढ़ाई
माता देर कहाँ लाई
हाल नौरंगशाह सुन पाया
फौज लेकै चढ़ आया
बन्धा पत्थरों का चिनाया
रेतमट्टी भरवाया
पानी नदियों का छुटवाया
फेरी ज्वालाजी नै माया
बंधा तोड़ कै गिराया
बादशाह थर्राया
देख नंगे पैरीं ध्याया
भवन पर्वत पै बनाया
पंडा पुजारी बैठाया
भोग हाथों से लगाया
मैं हूँ मतिमंद छंदबंदिशें ना कर जाणू
शुद्ध बोल तोल-तोल काफिये ना धर जाणू
गणों की गणना ना अलंकार रस भर जाणू
ग्राम और आलाप लय ताल सुर का भेद नहीं
मुर्छना श्रुति ना जाणू पढ्या गंधर्ब बेद नहीं
अल्प आयु चिरकाल जीने की उम्मेद नहीं
जन पै ऐसी करो मेहेर
हो ज्या दिल का दूर अंधेर
सुनकै महोरसिंह की टेर
माता आवो सिंह पलान कै 4॥