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गौ रक्षा, आजादी की लड़ाई

त्रेता में रावण राम की एक रास करते विद्वान
कलियुग में जिन्ना जुहार का वही मेल मिल्या है आन ॥ टेक ।


ब्रह्म जयहिंद राकस जिन्ना रह्या फेर आखिरी माया
हिन्द की आजादी के मांही रोड़ा अटकाया
बजवाया जूत भारत के मांह कटे मरे हिंदू मुसलमान 1॥

राम दलों के हनुमान पायक सुग्रीवादि योद्धा बलदाई
जयहिंद दलों के पायक बने है सरदार पटेल भाई
जब समझ जाग पाई भारत के खड़े हुए नौजवान 2॥

दो टुकड़े कर दिये देश के भारत और पाकिस्तान
जिन्ना करे तै जुल्म घनेरे ना भलाई देगा जिहान
थोड़े ही दिन में मिट ज्यागा घटाने वाले देश की शान 3॥

भारत हित हेत भगवान जन्म लें धर्मग्रंथ बतलाते
भारत भू पर भार बढ़ा गऊ साधु विप्र दुख पाते
आते किसी न किसी रूप मे कहैं महोर सिंह धर ध्यान 4॥

नाक कान स्तन काट बेगुना त्रिया सताई
नग्न कर जलूस काढ़े शर्म तुझे नहीं आई
चंद रोज के मुसाफिर कर लई तैं बादशाही
जगह लई जिल्लाद 2॥

घर कटे बाहर कटे कटा बढ़ी मांच रही
रेल में कटे हैं रक्त से रेलगाड़ी राच रही
विजन सदी चोदहवीं लटूरा खोल नाच रही
जगह जगह गोट में गुटे पड़े हैं बहोत धने
भूखे मरे पिंजर बंध्या अधभाव मिले चने
प्रजा को हलाल कर जिन्हा जो बादशाह बने
मेटा नहीं विषाद 3॥

गोट शाह सिकंदर यहां बादशाही कर गये
अकबर औरंगजेब शहंशाही ताज धर गये
नेकी बदी बाकी रही आखिर वे भी मर गये
तू भी ना रहैगा जिन्हा ना रहै तेरा पाकिस्तान
गरीबों की हाय पड़ै होय जागा छोमान
महोर सिंह करुणा करो टेर सुनो भगवान
पूर्ण करो मुराद 4॥

गऊ माता का खोज हिन्द से जाना वाला है ॥ टेक ।

द्वापर में पंडू कृष्ण थे जब गऊ थी 90 किरोड़
मण के भाव घी था देश म्हारा सिरमोड़
आज गर्दिश में डाला है 1॥

जब भी किरोड़ 50 थी राजा थे पृथ्वीराज
घी 27 सेर था देश था देशों का सिरताज
आज सबसे तंग हाला है 2॥

अकबर शाह के बख़्त में 9 किरोड़ थी धैन
1
सेर का घी था जब प्रजा करती चैन
क़हत अबतो हरसाला है 3॥

मलखा के भी बख़्त में गऊ थी किरोड़ नौ
5 सेर का घी था कहां भाव अब वो
आज भाव निराला है 4॥

गऊ हिन्द का खंभ और गऊ हिन्द का पैर
जीवनप्राण गऊ हिन्द का आज उनसे बंध्या बैर
हिन्द अब तेरा गाला है 5॥

प्राण बचाओ गऊ के जो चाहो कल्याण
महोर सिंह गुनी दे गये ऐतिहासिक परमाण
सार सिद्धांत निराला है 6॥

जीवन परिचय से संबंधित

सूरजगढ़ सूरजवंशी राजाओं की है रजधानी
श्री जयपुरजी माहाराज ताज सिर साज यहां का है बानी ॥ टेक । (ख्याल)


सूरजगढ़ में कायां सेठ हुये लालचंद जी बलदेवदास
इन ही की छतरी में मैंने पांच वर्ष किया विद्या अभ्यास
मुखराम जी यहां अध्यापक थे मैं पढ़ा करता उनके पास
उन दिनों सेठ ठाकरसी दास थे गुरु मुखरामजी थे परकाश
इसी वंश में जोखीराम जी प्रगट हुये थे महादानी 1॥

मेरे बख्त में राज करैं थे श्री जीवण सिंह जी भूपाल
न्यायकारी धर्मधारी सवारी का मोला हाथी था विशाल
रामचंद्र जी विद्वान थे याहां फतेचंद जी जिनके लाल
च्यार मणी थी सूरजगढ़ में च्यारूं प्राप्त हो गई काल
अब भी सभी वस्तु हैं याहां मैं साख्य सुनी अपने कानी 2॥

(बिड़ला कंपनी के लिए)

है आशीर्वाद हमारी
इस बिडला मील की जय हो ॥ टेक । (सांगीत)


प्रेम से बुलाये और प्रेम से ही हम आये यहां
क्वाटर जमादार का बड़े आदर से ठहराये यहां
बतला दई दुकान मन इंछा भोजन पाये यहां
दिन बाईस तेईस कथा भजन गाये यहां

रामलीला आ गई दिलों में कुछ ख्वार हुया
फैसला पंचाती होकै गाना नंबरवार हुया
एक दिन लीला और एक दिन प्रचार हुया
भादू बदी तीज शुभदिन रविवार हुया
मारवाड़ी देशी विदा करने को तैयार हुया
कर लई साकत सारी विदा करन लगे निर्भय हो 1॥

सूरजगढ़िये मिस्तरी रामेश्वरदास परवीन
भेंट के इक्कीस दिये मेरा कुछ स्वरूप चीन
ग्यारा मुख्त्यार सिंह के दश दिये मातादीन
रामेश्वर पुजारी जी नै प्रेम से चढ़ाये तीन

मेघराज रामेश्वर अमीचंद से मिला ग्यारा
सुगनचंद मखनलाल मेघ जी नै छापा मारा
भेंट के तेईस दिये काम किया सबसे न्यारा
जमनादास मिस्तरी दिये च्यार किया सत्कारा
दो-दो चंद्रभान जयलाल बसदेवाल प्यारा
ग्यारा दिये बनवारी
घर बुला गवा सविनय हो 2॥

जाटों की बिल्डिंग में दोय दिन हुया म्हारा गान
एकदिन प्रेम नगर मांय हुये व्याख्यान
सोहनगंज बीच एकदिन हुई रामान
बाकी गायन हुया आन दलायन के दरमियान
बारहवीं और तेरहवीं और चौधवीं लाइन मांय
देशी मारवाड़ी भाई प्रेम सेती आय आय
कोई एक कोई सवा कोई दो गया चढ़ाय
ग्यारवीं तारीख के दिन नेम नंबर रहे नांय
रामलीला भजन होने लगे एक टेम पाय
जो जन परोपकारी
उनका धन धरम में व्यय हो 3॥ जन्मअष्टमी नै कथा विदा हुई चढ़ी भेंट
दक्षिणा के दो सौ दिये म्हारा भर दिया पेट
दान मान गान में रही ना कोई अलसेट
चल्लू रहो मील बने रहो बिडलाजी सेठ
बिडला मील मांय जितने ओहदेदार अहलकार
आशीष हमारी अनधन भरो भंडार
मशीनों में जो जो काम करने हारे कामगार
सबसे आशिखा हमारी बधो वंश परिवार
आशिखा सुनावै गावै महोरसिंह हरबार
जय हो सदा तिहारी
दुख दलदर का क्षय हो 4॥

इस बिडला मील की जय हो ॥

(धींगड़िया गाम का भजन)

धन्य भाग धींगड़िया गाम के
हुया संत समागम मेला ॥ टेक ।


मेले में संत महंत वैरागी
बड़े बड़े आये बड़भागी
इस भूमि की प्रारब्ध जागी
अहोभाग्य इस धाम के
है धन्य आज की बेला 1॥

च्यारूं सम्प्रदा आय रही हैं
वैष्णव धर्म दर्शाय रही हैं
मेले में छवि छाय रही है दर्शन हुये तमाम के
ये अवसर बड़ा दुहेला 2॥

विद्वदवर पंडित विख्याता
आय रहे शास्त्रों के ज्ञाता
माहानुभाव मेले के त्राता
करता सर्बस काम के
आ-आकै होय रहे भेला 3॥

गुनी गवैया आय रहे हैं
गावैं साज बजाय रहे हैं
महोर सिंह गुण गाय रहे हैं
अपने गुरु के नाम के
जिन मोहोर बना दिया धेला 4॥

(धींगड़िया गाम)

धींगड़िया गाम सुहावना
जाहां मंदिर है टीकाई ॥ टेक ।


साल अठानवैं शिस आश्विन मास जी
बुध दिन या थी कुशा ग्यास जी
(01 October 1941 as per Calender)
गद्दी बैठे रामदास जी
पूरी हो गई भावना
आज महंत पदवी पाई 1॥

बड़ी धूम से हुया है मेला
संत महंत बहोत हुये भेला
भाईबंध मित्र गुरु चेला
आये जो जो पावना
सब ही की ख़ुशी मनाई 2॥

अन्नपूर्णा और लक्ष्मी न्यारी
आय रहे कुबेर भंडारी
वैष्णव यज्ञ हुई बड़ी भारी
यज्ञ का पटै चढ़ावना
सत्पुरुषों की प्रभुताई 3॥

मान सन्मान पकवान मिठाई
रसीली तरताजी बनवाई
महोरसिंह देखी सो गाई
हुया कर्म से आवना
अनजल नै सिपत दिखाई 4॥

(डिरोली गांव की महिमा)

बड़भागी राय साहाब नै रोशन करा डिरोली गाम ॥ टेक ।

धन्य वंश पिता धर्मधारी
धन धन माता जननेहारी
शुभ घड़ी जन्म गये अवतारी
सिद्ध हुये सभ काम 1॥

पहले जन्म करी सुफल कमाई
करी हुई सभ आगै आई
दुनिया में बड़ी इज्जत पाई
दिन दिन चढ़े कलाम 2॥

धर्म धुरंधर विद्या सागर
निति निपुण गुणों के आगर
भागधारी नै करे उजागर
बाप दादों के नाम 3॥

गौ ब्राह्मण संतों के त्राता
दयावंत सभका हित चाता
महोर सिंह आशीष सुनाता
बढ़ो वंश धन धाम 4॥

भवपार लंघै तो बांध भजन का सेत ॥ टेक ।

अरे मूढ़ दुनिया के माहीं
वर्ष “पिछत्तर” हो लिए आईं
खर्ची पल्लै बांधी नाहीं
यम मार्ग कै हेत 1॥

बड़ी बड़ी जगह भजन गा लिया
द्रव कमाया नाम पा लिया
सहचारी सब तेरा जा लिया
शत्रु मित्र ढलेत 2॥

गुरु-भाई गुरु पढ़ाने वाले
चले गए सब गाने वाले
तेरे संग साज बजाने वाले
गए मरघट कै खेत 3॥

कोई बदी कोई नेकी कर गया
कोई तो पाप पोट सिर धर गया
कालबली आ सबको चर गया
कंचन काया हुई रेत 4॥

नामी ग्रामी बुरे भले गए
कालचक्र में दले मले गए
तेरा क्या उन्मान चले गए
धीर बीर बानेत 5॥

कोई नरदेह धर नफा कमा गया
कोई गांठ का मूल गंवा गया
महोरसिंह दिन तेरा भी आ गया
चेत्या जा तो चेत 6॥

(प्राचीन कवियों की यादें)

किस किस को करै याद
कालग्रास जग सारा ॥ टेक ।


शंकरदास यहाँ आया करते
झण्डा गाड़कर गाया करते
गुणियों के होते संवाद
खुड़का करता नंगारा 1॥

रतिराम पंडित यहाँ आते
गाते ढोलक तीन बजाते
गायन का जब बंधता नाद
जैसे सिंह ललकारा 2॥

शंभुदास गुनी गा गये
गूढ काव्य के रंग बरसा गये
थे कविराज अगाध
कविता का भंडारा 3॥

सुखीराम यहाँ गाना कर गये
प्रेमीजनों के मन को भर गये
किया ना किसी से विवाद
था गुनी सब का प्यारा 4॥

आया करते मूलचंद जी
तरह तरह के गाते छंद जी
गायन में आता स्वाद
मीठा वचन पियारा 5॥

गा गये दत्तू और भगवाना
कहाँ वे गुनी और कहाँ वो गाना
गये सब टांडा लाद
अब की बार हमारा 6॥

महोर सिंह तुझे चलना जरूरी
दिन दिन होती आवै पूरी
तेरी भी अब मियाद
छुट ज्यागा देश द्वारा 7॥

(क्रमवार कौन कौन से कवि बागेश्वर धाम आए)

शिवशंकर के दरबार में
कितनेक गुणी गा गये हैं ।। टेक ।


पिरथम रतिराम जी आये
देशी भजन तत्काल सुनाये
ताल तीन ढोलक पर लाये
वै हरिजन संसार में
ढोलक से भी नाम पा गये हैं 1।।

पीछै शंकरदास पधारे
बाघेश्वर आ बजे नगारे
भजन पारवा गावन हारे
गा गए बैठ बजार में
गुणी झंडा फरका गये हैं 2।।

पीछै शंभुदास जी आये
दंगल में बड़े रंग बरसाये
चिमटे जीभ पकड़कर गाये
जमनापार और बार में
कविता की छाप ला गये हैं 3।।

पीछै सुखीराम लगे आवन
भक्ति प्रेम से लागे गावन
अद्भुत लागे साज सजावन
इकतारे के तार में गा
दंगल में छा गये हैं 4।।

पीछै आये मूलचंद जी
तरह तरह के गाते छंद जी
गुणी लोग सभ करते पसंद जी
हस्तमुखी रंगचार में
गा दंगल में दरसा गये हैं 5।।

पीछै आये महोर सिंह जी
दंगल में दिखलाये रंग जी
गाने का आ गया ढंग जी
पंडिताई के व्यौहार में
सभके मन भा गये हैं 6।।

दत्तू शिवलाल और भगवाना
इनका हुया एकदम गाना
तभी हुया मुखराम का आना
कवियों के सुम्मार में
ये भी चारों आ गये हैं 7।।

जितने अखाड़ेबंद अताई
आ आ शिव की रात जगाई
छुटभैयों की ना गिनती भाई
ज्ञान गंग की धार में
गुणी महोर सिंह न्हा गये हैं !!8

महोर सिंह आशीष दे जुग जुग जीवो लाला कबूलचंद ॥
आयुष्मान धनवान कुटम्ब वृद्धि लक्ष्मी स्थिर रहो आनंद ॥ टेक । (छंद लावणी)


धन्य कोसली नगर जाहां श्री कबूलचंद नै देह धारी
पिता को अनंत धन्यवाद धन्य धन्य माता जननेहारी
छोटे बड़े हैं बंधु तीन एक ताराचंद एक बनवारी
कबूलचंद सागरमल हैं सभ कामों के आगाकारी
गोपीराम आज्ञापालक सतवादी पति पत्नियों के वृंद 1॥

सेठ के घर में सतयुग आ रहा सतवंती सभ सेठानी
विद्वानों को देती दान सुन-सुन कथा भजन वेदवानी
संतों में रखती हैं प्रेम हरिभक्ति सभके मनमानी
तीर्थ व्रत उद्यापन हरदम करती रहैं बड़ घरियानी
सदाचार आचार भवन में धुप दीप की उठै सुगंद 2॥

साल्हावास गांव की महिमा


साल्हावास नगर है मरदों का घरियाना ॥ टेक ।

नाथु सिंह मूँज तोड़ने आए
आगै दुश्मन सूते पाए
जगा जगा सिर काट गिराए
यहाँ आ रोप्या कम्ठ्याना 1॥

आस पास थे तेरह गाम जी
रजपूतों के बस्ते जाम जी
नाथुसिंह नै फुके तमाम जी
सबसे पहले सुधराना 2॥

नाथुसिंह नै दे दे धाड़ा
कई बार बहु गाम उजाड़ा
मारपीट रजपूत लिकाड़ा
छुटा दिया ठोड़ ठिकाना 3॥

तीनों खाप करकै एक ठोड़ी
झाल गढ़ी भादरसिंह तोड़ी
राणाजी थे लखी किरोड़ी
लूटा धन माल खजाना 4॥

खुडन फूक खुरंपूर फूका
गिना नहीं जन आला सूका
बीर बहादुर कहीं न चूका
था वो मर्द मर्दाना 5॥

ऊबट बाट कुदाकै घोड़ी
जोगा जीत झोलरी तोड़ी
महोरसिंह आयु रही थोड़ी
अब तो हरी गुण गाना 6॥

(चौ. बलराम दानी)

हुये इसी नगर में महादानी बलराम ॥ टेक ।

बल को हरी पाताल पठा गए
बल अवतार बल्ला बन आ गए
दातारों मे उच्च पद पा गए
कल्याण सिंह के जाम 1॥

पारस दान महादानी कर गए
याचकों के दलद्र को हर गए
अमर पटा लिख नाम का धर गए
रोशन कर गए गाम 2॥

नटनी बांस चढ़ी दुहाई घालै
बिन बल्लै हमे कोण संभालै
धान भरी गाड़ी गड़वालै
दे दई सुन कर नाम 3॥

जैसे हुये बलराम महादानी
वैसे ही नारी बड़ घरियानी
जीवदान दे गई महारानी
उस दानी की बाम 4॥

मंगत द्वारे आया करते
मांगते सो फल पाया करते
महोरसिंह जस गाया करते
चारण भाट तमाम 5॥

फिर भी कभी साल्हावास में
तपधारी देह धरैंगे ॥ टेक ।


नाथु सिंह से शूरमा और बलराम से दातार
फेर भी आवैंगे कभी साल्हावास देह धार
कर दिये उजागर नाम ग्राम साखी संसार
धन्य जाखड़ बंश धन्य धन्य पिता महतारी
धन्य कूख जिन कूखों से जन्मे ऐसे मणधारी
ऐसे महापुरुषों की हर बख़्त बनी यादगारी
रहै श्वास दर श्वास में
जिंदगी भर नहीं बिसरैंगे 1॥

बहादर सिंह की बहादरी को देश जानै है तमाम
राजों से गारथ किये गढ़ तोड़े फूके गाम
वीर था बहादर जैसा नाम वैसा किया काम
उसी कुल में पैदा हुये सरदार दान्त राय
सीम काट झाड़ली वाजीदपुर दिया बसाय
गामों के जागीरदार चौधरी पद लिया पाय
मालिक से अरदास में
करूं कद भावना भरैंगे 2॥

इसी कुल में चौधरी हुये लोकराम मोहन लाल
राजों से कर ले बांधी चौधर की टकसाल
यहीं न्याव चूकते रैयत के रहे रखवाल
कुआं जोहड़ बणी बोझा सीम का बंटवारा किया
नामों की धर छाप दो पाना न्यारा न्यारा किया
इंसाफ़ी चौधरी ये गाम तख़्त हजारा किया
देहधर वास सुबास में
भागी निज नाम करैंगे 3॥

चौधरी साल्हा की खूब वंश बेल लहराई
पड़ गया विस्तार बड़ी दूर दूर तक छाई
ऐसे ऐसे फल गये फूलती फलती आई
उसी बेल के होकर कौन थारी करै रीस
करतबों को सुन राजा राणा भी हिलाते शीश
महोर सिंह ऐसे ऐसे काल नै दिये हैं पीस
भूला किस बिश्वास में
जन्मे सो सभी मरैंगे 4॥