दोहा-
महलों में चौसर बिछी आय गया कलिकाल ।
बाजी खेलण लग गये बीरसेन के लाल ॥
रम्माणी पासे आ-आ कै पड़न लगे ॥ टेक । (जंगम)
नल पुष्कल राव, चढ़ गया चाव, जूए का भाव, भर गया आकै
कलियुगी खेल, दिया मिला मेल, रहे पासे ठेल, कर में ठाकै
चलती हैं स्यार, स्यारों को मार, आपा उबार, ले जुग पाकै
जुग जाता पाट, पिटती है टाट, कोई चक्कर काट, पूगै जाकै
भूपन के भूप, हो गये बेकूप, गये पलट रूप, सुरखी छाकै
कड़वे बोलैं अगन पतंगे नैनों से झड़न लगे 1॥
भावी है प्रबल, हूणी है अटल, पासा पुष्कल, नै चुचकारा
नहीं भाईभाव, रहे देख दाव, पुष्कल के डाव, पड़ैं पौबारा
सब राजपाट, फौजों के ठाठ, चौसर कै घाट, नल नै हारा
पासों में लीन, नल था प्रवीन, पड़े काणे तीन, पासा डारा
नल एक बार, और दूजी बार, गया सर्वस हार, जद सिर मारा
बस नहीं चलै लिखंत छठी के आगै अड़न लगे 2॥
नल नै सिंगार, धरे वस्त्र तार, पांचों हथियार, पण पै लाये
लिए पुष्कल जीत, भये नल अतीत, मट्टी पलीत, के दिन आये
कलि नै डबोय, दिया सर्वस खोय, साथी ना कोय, नल घबराये
नगरी के मांय, मची त्राय त्राय, पुरवासी हाय, मारत ध्याये
द्वारै नरनार, रहे आंसु डार, नल को निहार, धोखा खाये
पुष्कल नै दर बंध कराये संकल जड़न लगे 3॥
रहे मंत्री टेर, नल नाम हेर, तुम थोड़ी देर, बाहर आवो
है खोटी घड़ी, दिन दशा चढ़ी, दमयंती खड़ी, इसे समझावो
कर रही विलाप, हो रहा संताप, महाराज आप, आसन ठावो
हो रही दुखमान, त्यागैगी प्राण, द्यो जीवदान, दर खुलवावो
कम्पै है अंग, मती हुई भंग, कहै महोर सिंह, नित गुन गावो
दर खुले दमयंती और मंत्री भीतर बड़न लगे 4॥