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नल दमयंती कथा

ख्याल –
धर्म का राज तपै था नल का थी सर्वसुखी परजा सारी
रोगी सोगी दुखी दरिद्री नज़र ना आवै नरनारी

काल बबाल अकाल मृत्यु ना हरिभक्ति सब को प्यारी
बैरभाव ना किसी जीव का जीव जीव का हितकारी

उदार और दातार नार नर पर-हितैषी पर-उपकारी
राजा राज प्रजा चैन महोर सिंह ऐसे राज पै बलिहारी ॥

दोहा –
निसध देश में आ गया ल्हुकत छिपत कलिकाल ।
हरदम यही चितवत रहै नल चूकै कर छाल ॥


नित करै धर्म की पारणा
नल राजा सत्यव्रती है ॥ टेक ।

धर्मनीति राजनीति ऊपर भूप चाल रह्या
पुत्र की समान जान परजा को पाल रह्या
हाव भाव चाव सेती ललना को लाल रह्या
नल-दमयंती का जोड़ा इन्द्र शची के समान
जती और सती का संजोग योग मिल्या आन
ऋतुवती रानी भई भूप दिया ऋतुदान
हुई गर्भ की धारणा
दोनों की शुद्ध मती है 1॥

समय पाय पुत्र जन्मा नाम धरया इन्द्र्सेन
नल राजा कर रह्या दान गज बाजी धैन
महलों में बधाई बजैं मंगलाचार दिन रैन
दूजी बार गर्भ सेती पुत्री ने जन्म लिया
नाम इन्द्रसेना धरया विप्र सन्मान किया
अन्न वस्त्र धन याचकों को बेसुम्मार दिया
दिये गौ बाजी वारणा
नृप कै आनंद अती है 2॥

बारह बरस बीते बाग बीच गुप्त कलिकाल
चितवत्त रहै नल कब चूकै कर छाल
कद मेरे हाथ पड़ैं कद सी बिछाऊं जाल
एक दिन नल राजा घोड़े पै होकै सवार
बन हू को ध्याया ल्याया पांचों जन हथियार
सिंहों की शिकार खेल भूप नै किया विचार
चहिये नीर निहारणा ताजी थक्या विषम गती है 3॥

लघुशंका करकै भूप जल के निकट आया
हाथ धोये कुरले करे पैर नहीं धोने पाया
संध्या करने बैठ गया कलि काया में समाया
घोड़े को दौड़ाय आया नगरी मांह नल राव
कलि के प्रताप सेती भूप के पलट गये भाव
महोर सिंह कहैं दीनानाथ अब तो नल की नाव
आप ही पार उतारणा
भावी बस छत्रपति है 4॥

दोहा –
नल राजा के हृदय में कलि ने किया निवास ।
दूत पठाया भूप नै गया पुष्कल के पास ॥


महाराज आज तुम चलो आपका बंधु बुलाता है ॥ टेक ।

म्हारे भूप की यही राजी
खेलै बंधु से चौसर बाजी
जल्दी करो साज लो ताजी
अवसर जाता है 1॥

पुष्कल नै सुनी दूत की बानी
हुया मग्न चलने की ठानी
कहो दूत चलकर अगवानी
पुष्कल आता है 2॥

भूप वचन सुन दूत सिधारा
नल के पास जा वचन उचारा
श्री महाराज अब बंधु तुम्हारा
आया चाहता है 3॥

नल कर लई चौसर की त्यारी
पुष्कल की गई पहूंच सवारी
महोरसिंह प्रभु शरण तुम्हारी
नित गुण गाता है 4॥

दोहा-

महलों में चौसर बिछी आय गया कलिकाल ।
बाजी खेलण लग गये बीरसेन के लाल ॥


रम्माणी पासे आ-आ कै पड़न लगे ॥ टेक । (जंगम)

नल पुष्कल राव, चढ़ गया चाव, जूए का भाव, भर गया आकै
कलियुगी खेल, दिया मिला मेल, रहे पासे ठेल, कर में ठाकै
चलती हैं स्यार, स्यारों को मार, आपा उबार, ले जुग पाकै
जुग जाता पाट, पिटती है टाट, कोई चक्कर काट, पूगै जाकै
भूपन के भूप, हो गये बेकूप, गये पलट रूप, सुरखी छाकै
कड़वे बोलैं अगन पतंगे नैनों से झड़न लगे 1॥


भावी है प्रबल, हूणी है अटल, पासा पुष्कल, नै चुचकारा
नहीं भाईभाव, रहे देख दाव, पुष्कल के डाव, पड़ैं पौबारा
सब राजपाट, फौजों के ठाठ, चौसर कै घाट, नल नै हारा
पासों में लीन, नल था प्रवीन, पड़े काणे तीन, पासा डारा
नल एक बार, और दूजी बार, गया सर्वस हार, जद सिर मारा
बस नहीं चलै लिखंत छठी के आगै अड़न लगे 2॥


नल नै सिंगार, धरे वस्त्र तार, पांचों हथियार, पण पै लाये
लिए पुष्कल जीत, भये नल अतीत, मट्टी पलीत, के दिन आये
कलि नै डबोय, दिया सर्वस खोय, साथी ना कोय, नल घबराये
नगरी के मांय, मची त्राय त्राय, पुरवासी हाय, मारत ध्याये
द्वारै नरनार, रहे आंसु डार, नल को निहार, धोखा खाये
पुष्कल नै दर बंध कराये संकल जड़न लगे 3॥


रहे मंत्री टेर, नल नाम हेर, तुम थोड़ी देर, बाहर आवो
है खोटी घड़ी, दिन दशा चढ़ी, दमयंती खड़ी, इसे समझावो
कर रही विलाप, हो रहा संताप, महाराज आप, आसन ठावो
हो रही दुखमान, त्यागैगी प्राण, द्यो जीवदान, दर खुलवावो
कम्पै है अंग, मती हुई भंग, कहै महोर सिंह, नित गुन गावो
दर खुले दमयंती और मंत्री भीतर बड़न लगे 4॥


दोहा –
जूवा नै मूवा किया राजा से भया रंक ।
दमयंती धोखा धरै मिटैं न विधि के अंक ॥


पिया बैठे हो किस ढंग में
नंगे तन शीश उघाड़ी ॥ टेक ।

सिर के ऊपर ताज नहीं है
कहो पिया किस काज नहीं है
शरीर ऊपर साज नहीं है
थारे वस्त्र धरे इकंग में
तन पर लिपटा रहे साड़ी 1॥

चेहरे ऊपर छई उदासी
स्वास मार ले रहे उबासी
बालम थारे रूप की राशी
ज़रा न भासै अंग में
किसनै यह सिपत बिगाड़ी 2॥

जाहे मोहे शोगे शरापे
बैठे हो किस ताप से तापे
बतालाओ पिया दृग क्यों झांपे
दुख तेरा अर्धंग मैं
बंटवा ल्यूं खड़ी अगाड़ी 3॥

हुमक न दुमक कुरच रहे धरणी
क्यूं गई बिगड़ आपकी करणी
महोर सिंह हो विपता भरणी
यही दशा बनै कुसंग में
जग निंदा होय पिछाड़ी 4॥

दोहा -
हूणहार भावी प्रबल मेट सकै न कोय ।
बननी थी सो बन गई अब रोये क्या होय ॥


जूवे में सर्बस हार दिया
मैं भावी के बस होकर ॥ टेक ।

थोड़ा मेरै रोष नहीं है
बोलन का भी होश नहीं है
पुष्कल का कुछ दोष नहीं है
मैं अपना आप मठ मार दिया
सर्बस को बैठा खोकर 1॥

तन के वस्त्र डाव पर लाये
पासे पड़ गये खेल जिताये
जूए नै तन नग्न बनाये
जूवे में ही हथियार दिया
बैठा मैं तोहे डबोकर 2॥

काया ठाय डाव पै धर दई
बाजी खेल बिगानी कर दई
बंधु हमारा हो गया निरदई
भाई भाव बिसार दिया
चौसर का खेल संजोकर 3॥

जो अंकुर बिरंची नै डारा
उनको कोई नहीं मेटन हारा
महोर सिंह अब चलै ना चारा
दैव नै मोधा मार दिया
लग गई कर्म की ठोकर 4॥

दमयंती धोखा धरै करै पति अपने से अरदास ॥ टेक ।

कर्मगति पति कनी ना जानी
रंक बना दिये राजा रानी
पल में कर दिया खेल बिझानी
हुया सर्वस का नाश 1॥

घाव घाल गया जुवा जालिम
क्यूं खेलो थे मेरे बालम
दरवाजे पर डट रह्या आलम
डट्या खड़या रणवास 2॥

दो बालक नादान हमारे
बाहर खड़े रो रहे बिचारे
मां बापों नै आज बिसारे
रहैंगे किसकै पास 3॥

करतब किया सो आगै आया
आगै बनै सो भोगै काया
महोर सिंह गुरु कथकै गाया
भारथ का इतिहास 4॥

ख्याल –
पुष्कल कहै सुनो दमयंती जितने तेरे हार सिंगार
नल नै जिता दिये बाजी में इनका हूं अब मैं हकदार ।

उतार मेरै आगै रख दे जरा मत नहीं लगावै बार
धर्मादै एक साड़ी द्यूं इनमें नहीं छोडूं तन पै तार ।

घड़ी पलक में धक्के देकै अपने राज से करूं बहार
इतना बख़्त दे दिया है तुझको जा अपने बालक पुचकार ।

दमयंती का जिगर जलै पुष्कल के बोल हो गये दुषार
महोर सिंह कुछ ज़ोर चलै ना सुख दुख कर्मों के अनुसार ॥

दोहा -
जिगर कटै छाती फटै भर-भर मारै श्वास ।
दमयंती उठ चल पड़ी गई बच्चों के पास ॥


बालक करैं दैया दैया मैया बाबल का के हाल ॥ टेक ।

कह नरनार हाथ लगे मलने
सर्वस हार दिया बाबल ने
लूट पीट चाचा पुष्कल ने
बना दिये कंगाल 1॥

माता तूं भी डाव पै ला दई
पासे पड़ गये खेल जिता दई
पीछै अपनी काया हरा दई
करा नहीं कुछ ख्याल 2॥

ये भी सुनी पिता बैठे नांगे
तन के वस्त्र मिले नहीं मांगे
धक्के मार लिकाड़े जांगे
पैरीं बेड़ी घाल 3॥

जल्दी बता सहा नहीं जाता
मतना देर लगावै माता
महोरसिंह महादुख दिया चाता
कोप रह्या कलिकाल 4॥

ख्याल –
सेना नाम एक दासी थी दमयंती नै लई वेग बुलाय
बारसनी रथवान हमारा उसके पास तूं जल्दी जाय ।

अरथ सजाकर जल्दी ल्या पवनवेग घोड़ों को चढाय
कुन्दनपुर तक जाना होगा महोर सिंह कहते पद गाय ॥

दोहा –
बारसनी से कह दिया दासी नै सब हाल ।
अब देरी मतना करो अरथ सजा कै चाल ॥

बेटा राजा से हम रंक भये
पासे पड़ गये कर्मानी ॥ टेक ।

देख बसा उजड़ै उज्जड़ बस जावै
रीता भर दे भरया रितावै
गहन गति कुछ पता न पावै
विधि के सच्चे अंक भये
भिक्षुक बने राजा रानी 1॥

राजपाट सर्वस हरा गया
बाजी खेल पर हाथ करा गया
पति का ज्वारी नाम धरा गया
इतने बड़े कलंक भये
चाहे सो करै बिनानी 2॥

शाम कहीं और कहीं सवेरै
अन्नजल चहे जहां ठा गेरै
तुम दोनों जाओ नानेरै
फिर बस हम निशंक भये
सब हो गया खेल बिझानी 3॥

आज लाल यहां का हमीं जानी
बंद हो गया दाना पानी म
होर सिंह यूं कह रही रानी
आज हम दोनों पंक भये
संकट में आ रहे प्राणी 4॥

चौपाई–
रथ को साज सारथी आया आ रानी से वचन सुनाया । बालक बेग बैठाओ रथ में विदर्भ देश का पकडूं पथ मैं ॥ दोहा -
सौ योजन की मंजिल है मत नहीं लावो देर ।
बालक दोनों रो रहे सुन सारथी की टेर ॥

जननी जन्म की दाता माता लगी बिसारण आज ॥ टेक ।

नौ दस मास गर्भ में पाले
सहे आप हम दुखों से टाले
जन्म समय के कष्ट निराले
सहे थे बेअंदाज 1॥

गीलै आप हम सूखे सुवाये
कभी छाती कभी गोद लिटाये
खान पान बोलने सिखाये
तन सिंगारे साज 2॥

भोजन अपने हाथ जिमाती
पल नहीं तजती लाड लडाती
कर लई आज बज्र की छाती
मैया तैं किस काज 3॥

इतनी कहकर बहन और भैया
करने लगे हाय दैया-दैया
महोरसिंह निज दास की नैया
पार करो महाराज 4॥

सोहनी –
सुनकै वचन माता का कलेजा कट रहा
जिगर में उठत हिलूर हिरदा फट रहा ।

छाती कै लिए लगाय शीश पुचकारती
आसूं पूंछ हिया डाट कै वचन उचारती ।

मत रोवो मेरे लाल यही लिखी भाग्य में
और तरह नहीं सब्र सब्र वैराग में ।

जीवैंगे तो फेर मिलैंगे आय कै
महोर सिंह महादुख सकै नहीं गाय कै ॥


हमको जाना है वनोवास में
तुम तो जावो नानेरै ॥ टेक ।

चढ़ी दशा लग गई करड़ाई
बिगड़ गई सब बनी बनाई
पुष्कल होय रहा अन्याई
रहन न देगा पास में
पक्की जच गई है मेरै 1॥

देख लई जो बनी पिछाड़ी
देखैंगे जो बनै अगाड़ी
तन पै एक लपेट कै साड़ी
लिकड़ैं बुरे लिबास में
दिन छिपते मंद अंधेरै 2॥

बख्त को देख बिसारूं तन से
पलक नहीं बिसरूंगी मन से
पापी पुष्कल बहुत दिनन से
था म्हारी तल्लाश में
मालिक सब फंद गेरै 3॥

मेरे लाल अब देर मत लावो
जल्दी तुम नानेरै जावो
महोर सिंह कहै समय बितावो
खड़े हो किसकी आस में
खड़ा बाहर सारथी टेरै 4॥

दोहा -
धीर धोप दई मात नै बर-बर हिये लगाय ।
पुरबासी देखैं खड़े रथ में दिये बैठाय ॥


माता से बिछुड़ निराधार
दोनों बालक रोते जा रहे ॥ टेक ।

चित को ना पड़ै है चैन जी
माता नै मीच लिए नैन जी
हुम्मर पै हुम्मर रही मार
प्राणी गस खा रहे 1॥

छाई उदासी सारे शहर में जी
दिन डूबे शोक लहर में जी
करी बहुत बुरी करतार
पुरवासी सब नैन बहा रहे 2॥

बालक जां करते विलाप जी
कर रहे हाय माँ हाय बाप जी
सारथी शीश रहे पुचकार
उन दोनों की धीर बंधा रहे 3॥

हूणी नै क्या सैं क्या करे दिया
भरा रिता दिया रीता भरे दिया
मालिक बेड़ा करिये पार
नित उठ महोर सिंह गुण गा रहे 4॥

दोहा -
दमयंती उठकर चल पड़ी बिगड़े होश हवाश ।
हिया बज्र का कर रही पहुंची नल के पास ॥


पिया मुख से बोल, दृग खोल, धर्म रख भ्रम त्याग दे मन का ॥ टेक ।

पुष्कल नै सर्वस हड़ा चौसर बाजी खेल
भाईभाव अब है नहीं क्या है इससे मेल
यहां अच्छा लगा नहीं बसता पकड़ ले रस्ता बालम बन का 1॥

दमयंती के सुन वचन पुष्कल कै लगी आग
पासे पड़ गये जीत के जिनके पूर्ण भाग
क्यों बक-बक कर रही नार दे वस्त्र उतार तूं अपने तन का 2॥

दमयंती कहै माफ कर झुका दिया है शीश
देवर तुझको जाचती एक साड़ी कर बख्शीश
मैं तन अपने लिपटाऊं प्रण पुगाऊं थारे वचन का 3॥

पुष्कल नै मंगवायकर साड़ी दई बगाय
महोर सिंह भावी प्रबल बस्तर लिए कढ़वाय
लगा धक्के मारन पुष्कल पाया फल जुवा खेलन का 4॥

दोहा -
मेरे राज से बाहर हो करिये अन्नजल पान ।
जो ल्हुक छुप कहीं करैगा तो मदिरा मांस समान ॥


घर बाहर दोनों किए पुष्कल नै धक्के मार कै ॥ टेक ।

नंगे पैरीं सिर उघाडीं देखकै पुष्कल कहै
वाह जुवारी वाह खिलारी चाल्या बाजी हार कै 1॥

निरणाबासी चल दिये मार्ग में कहते जा रहे
जूवा कोई मत खेलियो कहै खाक सिर में डार कै 2॥

धोंसे की टंकोर पुष्कल की दुहाई फिर गई
नल से जो कोई बोलै तो धरो पहले शीश उतार कै 3॥

हुकम हांसिल हो गया पुष्कल का नल के राज में
महोरसिंह नल छुप गया बागों में समता धार कै 4॥

दोहा -
नल दमयंती बाग में अनोसन व्रत रहे धार ।
पास कोई आवै नहीं पुरवासी नरनार ॥


चाल्या सतवादी बनखंड की सुरत धरीं ॥ टेक । (जंगम)

तीन दिवस और तीन रात बागों के बीच डेरा लाया
था पुष्कल का बड़ा सख्त हुकम नर नार पास कोई ना आया
वै चौथे दिवस निरणाबासी उठकर दोनूं वन को धाया
दस पाँच कदम चल बैठ ज्यांहि किसी तरुवर की लेकर छाया
भूखे प्यासों को तांवर आवैं डांवाडोल हो रही काया
संकट में आ रहे सतवादी धन्य प्रभु तेरी माया
जैसी नल में करी है ऐसी किसी में नांह करी 1॥

इतने में तीतर तीन सुनैहरी पंखों वाले आय गये
नल दमयंती की नज़र पड़े हैं देख कै चित लुभाय गये
राजा रानी एक साड़ी में दोनूं तन को लिपटाय गये
दूजी साड़ी उन पर फेंकी पक्षी साड़ी को ठाय गये
जा गिगन में कहैं हम वही पासे जो खेल में तुझे हराय गये
अब देख अगाड़ी क्या बनती है नल सुन धोखा खाय गये
पक्षिन की बाणी सुन रानी रो रही दुख भरी 2॥

एक साड़ी को पक्षी ले गये एक दोनवीं लिपटाई
वै नंगे पैरीं शीश उघाड़ी आगे को सुरती ठाई
चले निर्जन बन में जाय बड़े हैं होय रही महा-दुखदाई
नल दमयंती से कह ये रस्ता जाता कुन्दनपुर मांई
दो तीन दिवस की मंजिल यहां से घनी दूर पड़ता नांई
इसी रस्तै तेरे गये हैं बालक सुन दमयंती घबराई
खाय तिवांला जाय पड़ी है सुध बुध सब बिसरी 3॥

तुम विदर्भ देश का रस्ता बालम क्यों मोहे आज बताय रहे
मैं जान गई तुम त्यागोगे बर बर यही वचन सुनाय रहे
है विपत रोग की त्रिया औषधि बैदक वाले गाय रहे
पिया तुम भी चलो और मैं भी चलूं जो विदर्भ देश मन भाय रहे
वहां बैठकै बिखा बलावैं अपनी बालक आगै जाय रहे
धोखा देई मतना करियो सतवादी नाम कहाय रहे
महोर सिंह नित उठ गुण गावै रखियो लाज हरी 4॥

दोहा -
भूली त्रिया बावरी क्या तैं किया विचार ।
पति त्रिया का अर्धंग है और पति अर्धंगी नार ॥


पर तुझको नहीं बिसारूंगा
चाहे प्राण बिसर ज्यां मेरा ॥ टेक ।

निर्जन बन हाथी चिंघाड़ैं
जहं देखैं हूंई शेर दहाड़ैं
जगह-जगह अजगर मुंह पाड़ैं
इनसे तोहे उबारुंगा
बिन मेरे कौन यहां तेरा 1॥

पीहर सेती आंख मिंचा गई
बच्चों से मोह जाल तुड़ा गई
मेरै गैल तू चलकर आ गई
मैं भी नहीं बिडारुंगा
कर दिल का दूर अंधेरा 2॥

विदर्भ देश रंक का बाना
बनै नहीं वहां मेरा जाना
होता अस्त आ रहा भाना
चल कोई जगह निहारुंगा
जहां ले लें रैन बसेरा 3॥

इतनी कहकर राजा रानी
चले सुरत आगे को ठानी
नज़र पड़ी धर्मशाल पुरानी
इसमें रैन गुजारुंगा
महोर सिंह भूप न्यू टेरा 4॥

दोहा -
खुलबिंडल धर्मशाल में जाकर लिया निवास ।
मांसाहारी जीव आ बैठ गये हैं पास ॥


बैठे सुख दुख की बात करैं
संकट में राजा राणी ॥ टेक ।

दोय पुत्र एक जन्मे माता
एक राजा एक रंक कहाता
जो कुछ करै सो करै विधाता
क्यों पुष्कल सिर दोष धरैं
बह गई कलम रम्माणी 1॥

सर्वसुखी महादुखियारे हैं
कैसे संकट में डारे हैं
संचित कर्म के फल सारे हैं
भरे रितैं और रीते भरैं
नहीं कर्मगति कनी जानी 2॥

बनी हुई थी कैसी बिगाड़ी
तीतर उड़ गये लेकर साड़ी
ना जानैं क्या बनै अगाड़ी
अब उनके बचनों से डरैं
क्या बोले बिहंग बानी 3॥

संकट में महासंकट हो गये
आज हमारे मालिक सो गये
महोर सिंह कली कांटे बो गये
पड़े धरण में भूखे मरैं
एक वस्त्र में दो प्राणी 4॥

सो ज्या तूं वरनार
मैं तेरा द्यूंगा पहरा ॥ टेक ।

चार दिवस की भूखी प्यासी
वन वन हांडी निरणाबासी
किया नहीं अन्न आहार
प्राणी किस बिध रहरा 1॥
मांझल रात झुकी अंधियारी
सायुज फिर रहे मांसाहारी
निर्जन बन भयकार
बिकट भवन में ठहरा 2॥

पत्थरों की सुख सेज बना ले
हाथों के तकिये सिरौने ला ले
सो ज्या पैर पसार
मैं तोहे बर बर कहरा 3॥

तूं सो ज्या मैं रहूंगा जागू
झाड़ झाड़ है तेरा लागू
कर महोर सिंह बिचार
बाण कर्म का बहरा 4॥

कैसे सोऊं भरतार
आज मोहे नींद न आवै ॥ टेक ।


मार्ग मै चले आए रहे थे
रस्ता मोहे बतलाय रहे थे
मेरै तो नहीं एतबार
सोये पीछै पति मेरा पावै 1॥

दोनों के पास में एक ही साड़ी
निर्जन बन में करकै उघाड़ी
मत चले जाइयो बिसार
धीर मेरी कौन बंधावै 2॥

राजभ्रष्ट हम महादुखियारे
बिछड़े पुत्री पुत्र हमारे
क्या तुम रहे हो विचार
पिया मेरा चित घबरावै 3॥

भूख प्यास का जिकर नहीं है
मरने तक का फिकर नहीं है
यही है फिकर हरबार
पिया मेरा तज नहीं जावै 4॥

महोर सिंह नल सत्यव्रती है
दमयंती रानी नार सती है
भावी बस नरनार
उनकी ना पार बसावै 5॥

दोहा –
राजा नल दुखित भया सुन रानी के बैन ।
जिगर कटै हिरदा फटै जल भर आये नैन ॥


इस भूल भ्रम को त्याग कर
अब तूं पतिभर्ता सो ज्या ॥ टेक ।

राजभ्रष्ट हो आए वन में
भासी नहीं यह बात सुपन में
क्या से क्या हो गया है छन में
क्या लेगी अब जाग कर
होणी सो आप ही हो ज्या 1॥

त्याग की कहै तेरी बड़ी गलती
बिना हुकम पत्ती ना हिलती
कर्मरेख रानी कभी ना टलती
कर्म की ठोकर लाग कर
एक पल में सर्वस खो ज्या 2॥

मैं जानूं पल नहीं बिसारूं
महादुखों से तोहे उबारूं
जब मैं कर्म की और निहारूं
पति पत्नी का विभाग कर
मझधार में कर्म डबो ज्या 3॥

सुख सब चहैं कोई दुख चहै ना
हूणहार हुये बिना रहै ना
महोर सिंह कहै जिगर दहै ना
अब दिल को बैराग कर
तेरा हट सब माया मोह ज्या 4॥

दोहा –
कुछ निद्रा कुछ थक गई कुछ विवेक गया होय ।
पति का कहना मानकर वा पतिभर्ता गई सोय ॥


अब क्या जतन बनाऊं राजा कर रहा सोच विचार ॥ टेक ।

रानी गाढ़ नींद में सो रही
पत्थरों में पड़ी गाफिल हो रही
काया साड़ी में दबको रही
सकूं नहीं मैं तार 1॥

साड़ी खैंचूं परै हटाऊं
जाग उठै फिर कैसे समझाऊं
साड़ी त्याग नग्न उठ ज्याऊं
भिष्टैगा संसार 2॥

डटै नहीं दिल कैसे डाटूं
किस बिध आधी साड़ी बाटूं
काटूं तो फिर कैसे काटूं
पास नहीं हथियार 3॥

कली नै नृप की बुद्धि हड़ी है
रानी की कर्मरेख अड़ी है
महोर सिंह कहै नज़र पड़ी है
कूण धरी तलवार 4॥

ख्याल–

बज्र हिरदा कर लिया है नल नै कर में तलवार उठाई जी
आधी साड़ी काट लई तन अपने कै लिपटाई जी ।

देख देख रानी को भूप कै होय रही दुखदाई जी
धूप पवन कभी पर्शे नहीं आज पड़ी धरण के मांईं जी ।
खड़ा खड़ा नृप रूदन करै चलने को सुरत उठाई जी
दस पाँच कदम चल उल्टा आ ज्या महोरसिंह छवि गाई जी ॥

दोहा –

कभी तो उठकर चल पड़ै कभी आ बैठै पास ।
रूदन करै धोखा धरै भर-भर मारै श्वास ॥


बेगुनाह त्रिया के त्यागन का महापाप ॥ टेक ।

फुलमाला मुझको पहनाई
फिर रंगचारों से परनाई
चल मेरे संग अकेली आई
तज कै मांई और बाप 1॥

अब सूती प्रभात जागैगी
पति के बिना प्राण त्यागैगी
मूंडी धुन रोवन लागैगी
होगा महासंताप 2॥

हाय दमयंती प्राण पियारी
दशा नै किस संकट में डारी
इतनी कहकर भूप भिखारी
चाल पड्या चुपचाप 3॥

सूती को तज जाय रहा है
नैनी नीर बहाय रहा है
महोर सिंह गुण गाय रहा है
विपत हरोगे प्रभु आप 4॥

दोहा –

त्रिया वियोगी रो रहा आपे की सुध नांय ।
हुया दिवाना भ्रमता फिरै बणों के मांय ॥


दमयंती अनाथ अबला अब शरण है तुम्हारी ॥ टेक ।

वसुधे तूं जग माता है पत्नी है वसुधाधीप की
शोकन समझ मत लेना नल रंक की वा नारी 1॥

चंदा तू चंद्रमुखी की निज जान रक्षा करना
उपमेय है वा तेरी उपमान तूं है नभचारी 2॥

वन व्याघ्र पक्षी तरुवर गिरवर नदी और नाले
थारै भरोसै छोड़ी नल नै वा प्राण प्यारी 3॥

चित्त भंग होय रहा है नल का भ्रमता फिरै वन-वन में
महोर सिंह कंटक लग-लग पैरों से खून हुया जारी 4॥

दोहा –

बड़ गया है भूपति गौहर वन में जाय ।
मुख से शब्द निकसै यही हाय दमयंती हाय ॥


उस दमयंती के वैराग में
राजा हो रह्या दिवाना ॥ टेक ।

महासती कहां कहां भूपाला
बीच पड़े पर्वत नदी नाला
बिछोहा चकवा चकवी आला
लिखा था फूटे भाग में
जुवे का हुया बहाना 1॥

हार कभी नहीं गल से गेरा
पत्नी से अंतर हो गया मेरा
अब अंतर पड़ गया घनेरा
त्रिया विरह की आग में
जलै जिगर भस्म हो प्राणा 2॥

धृक जीवन धृक त्रिया वियोगी
मो सम नहीं जगत में सोगी
जागैगी या जागी होगी
उसी सती के त्याग में
था हक मेरा मर जाना 3॥

दुर्लभ जीवन दुखियारी का
मिलना कठिन प्राण प्यारी का
महोर सिंह कहै उस नारी का
फूट्या भाग सुहाग में
लिखा था दुहाग का आना 4॥

दोहा -

बन में हांडै ढूंढता मिली नहीं धर्मशाल ।
चित भंग कर दिया कलि नै चौंध गया भूपाल ॥


कर लिया सबर भूपाल नै
रानी की छोड़ दई आशा ॥ टेक ।

सूनी पड़ी देख मांसाहारी जीव आए होंगे
सिंह सारदूल स्याल भाल सब ध्याए होंगे
प्राणप्यारी अंग तेरे बांट बांट खाए होंगे
हुई ना सहाय हाय हाय करता चाल पड़ा
बण-बण जाता दिन रात का नहीं ख्याल पड़ा
चलते कई दिन बीते पीछै कलिकाल पड़ा
बीरसेन के लाल नै
एक देख्या अजब तमाशा 1॥

बनचारी जीव पशु पक्षी भागे आय रहे
कोलाहल शब्द मच्या नल चले जाय रहे
बन में अग्निदेव आले सूखे को जलाय रहे
  भाय में से आती हुई नल ने सुनी आवाज
नैषिध कहीं हो तो मेरे प्राणों को बचावै आज
अग्नि में कूदा नल नाम की करी लिहाज
लख संकट में ब्याल नै
कहै किस बिध जाय निकासा 2॥

नल हू को देख जब आरतबाणी बोला नाग
इजगरी शरीर हुया नारदजी का श्राप लाग
करकोटक नाम मेरा उदय होय गया भाग
जल्दी सी उठाओ भूप मतना लगाओ देर
सुक्ष्मरूप धर कहै अग्नि सेती बाहर गेर
राजा नै उठाय लिया कैसी दई मती फेर
विषियर की महाक्राल नै
डसा भूप हुई महात्राशा 3॥

डंक लगते ही गया भूप का पलट रंग
कंचन काया रही नहीं काला काला हुया अंग
राजा नल कहने लगा अच्छी तैं करी भुजंग
सुन कै बचन जब कहन लगा नागराज
डंक मारने से राजा सिद्ध तेरे होंगे काज
महोर सिंह गाय रहे वनपर्व का समाज
सुन राजा इस हाल नै
कहै सुना मोहे इतिहासा 4॥

ख्याल –

दिब्य वस्त्र दे नल को नाग करकोटक राजा से टेरा
जब तूं इनको धारण करैगा वही रूप हो ज्या तेरा

कोई भी नहीं पहचान सकैगा जब तक विष रहैगा मेरा
मोहे चितवत विष दूर होय नृप दिल का दूर कर अंधेरा

जहां ऋतुपर्ण राजा राज करै बन अवधपुरी का बासेरा
वहां मंशा पूर्ण होगी तेरी महोर सिंह नै पद टेरा ॥


दोहा –

परकम्मा दे नाग की दिया है शीश नवाय ।
निसध भूपति चल पड़ा अवध की सुरत लगाय ॥


अब सो अवधपुरी को चाल्या राजा नल ॥ टेक ।

लिया अवध का मग, चाल पड़ा दग-दग, दस दिन गये लग, किया नहीं अन्नजल
हुया पुरी में प्रवेश, जब निसध नरेश, रंक जैसा बना भेष, रही सुरत बदल 1॥


लई भूप की शरण, गह लिये हैं चरण, जद बोल्या ऋतुपर्ण, क्यूं हुया विकल
पड़ै चित को ना चैन, मुख आवै नहीं बैन, जल भर आये नैन, रह्या हिया उझल 2॥

जद बोल्या नल रोय, दिया दशा नै डबोय, मेरे घर का गया होय, महाराज अस्तल
है बाहुक मेरा नाम, पाक बनाऊं तमाम, अश्वविद्या हू के काम, का है पूर्णबल 3॥

शिल्प विद्या छत्रधारी, मैं तो जानता हूँ सारी, सुन साख मैं तुम्हारी, यहां आया चल
भूप नौकर लिया लाय, वस्त्र पेटिया ठहराय, महोर सिंह लिया पाय, जूवे का फल 4॥

दोहा –

बाहुक को ऋतुपर्ण नै घुड़साला दई देय ।
नौकर भी दो दे दिये जीवन बारसनेय ॥


कर दमयंती को याद रात को नल रोया करता ॥ टेक ।

एक दिन जीवन सारथी आया
आ बाहुक से वचन सुनाया
किसको यादकर रुदन मचाया
धीर नहीं धरता 1॥

बाहुक कहै सुनो रथचारी
वन में झूठे पुरुष नरनारी
सूती हुई बेगुनाह बिसारी
थी वा पतिभर्ता 2॥

वा त्रिया वन-वन में दुख पाती
फिरती होगी रुदन मचाती
वन में जीव-जीव के घाती
प्राणों के हरता 3॥

निशि वासर और शाम सवेरै
उसकी भूल पड़ै ना मेरै
महोर सिंह न्यू बाहुक टेरै
नैनीं नीर झरता 4॥

जागी दमयंती होय गया प्रभात ॥ टेक । (जंगम)

वन के पशु पक्षी जाग उठे बोलन लगे रोल मचाई जी
बंध्या नाद भिनक कानों में पड़ी दमयंती भी जाग्याई जी
रही इधर उधर को देख भूप कहीं देता नहीं दिखाई जी
आधी साड़ी का पता नहीं आधी तन पर लिपटाई जी
अघटित घटना को देखकै विदर्भी मन में यूं घबराई जी
पलभर नहीं बिसारा करते आज बनी क्या ये बात 1॥


चिंता भई चितवन करन लगी संकल्प विकल्प में आय रही
शायद पिया शौच गये होंगे बैठी अंदाजा लाय रही
या बन फल लेने गये होंगे कई दिन की भूख सताय रही
ऐसे ऐसे भावों से रानी दिल अपना बहलाय रही
चितवन करते मध्यान हुया नहीं आये नैन बहाय रही
छूटी आश निराश हो गई थर-थर कंप्या गात 2॥


उठ धर्मशाला पै जाय चढी खड़ी चारों तरफ निहारै है
कहीं नज़र पड़े ना निसध पति ले ले कर नाम पुकारै है
हाय प्राणनाथ हाय प्राणनाथ कह-कहकर सिर को मारै है
मूर्छागत होकर जाय पड़ी पड़ी सुध बुध सकल बिसारै है
कई देर में होश हुया रानी को कलियुग जुल्म गुजारै है
हाय पति हाय पति टेर टेर कै करने लगी अपघात 3॥


कोलाहल करती हुई दमयंती धर्मशाला में आती है
आ इधर उधर को देख पति अपने का खोज चलाती है
कभी लेकर खोज को चाल पड़ै कभी उल्टी ऐ आ जाती है
कभी जाती है कभी आती है कभी बैठ कै रुदन मचाती है
महोर सिंह कहै महासंकट में कोई नहीं संगाती है
सुनकै रुदन रानी का वन के पशु पक्षी बिरलात 4॥


दोहा -

पति चरणों की रज उठा लेती शीश चढाय ।
हाय निसधपति प्राणपति कर रही त्राय-त्राय ॥


पिया कौन गुनाह मेरी थी वन में सूती को त्याग गये ॥ टेक ।

ना मैं सुवेरनी नाम कहाई
त्रिया कुलछनी थी भी नांई
पतिभर्ता से आँख मिंचाई
कर कै भाग गये 1॥

कमचोरी और कलहारी को
तजै पुरुष ओगणगारी को
बिन कसूर पतिभर्तारी को
पिया दुहाग गये 2॥

कौन दशा में हो बड़भागी
सूती हुई मैं बन में त्यागी
बंधन काट बने वैरागी
रस्तै लाग गये 3॥

क्या करूं अब किसबिध टोहूं
कब तक बाट आपकी जोहूं
महोर सिंह कह बैठी रोऊं
कर्म मेरे जाग गये 4॥

दोहा -

तैं बालम ऐसी करी ऐसी करै ना कोय ।
घर की रही ना घाट की मझ में दई डबोय ॥


दमयंती उठकर चल पड़ी पि पि पुकारती
बन में भागी भागी फिरै पति को निहारती ॥ टेक ।

वृक्षों से हांडै पूछती करती फिरै विलाप
मेरे पति का पता लगा दो हो दीर्घदर्शी आप
गिरवर गुफा-गुफा में हांडै खोजती चुपचाप
कभी गिरवर चढै कभी तरुवर हो रहा महासंताप
निसधपति निसधपति मुख से उचारती 1॥

बोझै बोझै फिरै ढूंढती नल नाम हेर हेर
मेरे पति का पता लगाओ रही पक्षिन से टेर
कभी भाग कै आगै पड़ै सिहों को लेती है घेर
क्या तो पता बता दो नल का ना मुझको भख जाओ शेर
पति के वियोग में फिरै बन में सिर मारती 2॥

पत्थरों से पैर फूट गये कांटों ने दिये छान
झाड़ों में साड़ी फट गई हो रही है लहु-लुहान
पि पि फिरै पुकारती रानी हुई हैरान
आपे की सुध है नहीं होय गया मध्यान
महाघोर वन में जाय बड़ी है विरह के आसूं डारती 3॥

अजगर से जा पूछती है मति होय रही है भंग
देखा हो तो बतलाय दे मेरा कहां है अर्धंग
दमयंती के सुनकर वचन मुख फाड़ै है भुजंग
वो पैरों को ग्रसन लग्या ये कैसी बनी महोर सिंह
विष ज्वाला दमयंती के जरते तन को जारती 4॥

दोहा -

नाग राज से कर रही दमयंती अरदास ।
अब मुझको मत ना ग्रसै पति मिलन की आस ॥


अब सो नागराज आज मेरी जान दे बकस ॥ टेक ।


झाड़ बोझ झूंड झूंड, मैं तो मारती हूं मूंड, प्राणनाथ को अब ढूंढ, ल्यूं मेट हवस
करकै पति की तल्लाश, फेर आऊं तेरे पास, जद कर जाइये ग्रास, इब मतना डस 1॥


सती रही है भाख, बीच सूरज की है साख, कुछ दिन सबर राख़, फिर जाइये ग्रस
मैं तो नहीं हूं अनाथ, कहूं जोड़ दोनों हाथ, प्रण पाल मेरे साथ, तेरा रह ज्या जस 2॥


अर्धमांस अर्धंग, तनै ग्रस लिया भुजंग, मैं तो होय रहीं तंग, खिंच गई नस-नस
शरण आये को बचाय, नागराज मत खाय, कर रही त्राय त्राय, पड़ैं आंसू टस-टस 3॥


दिया पति नै दुहाग, बेकसूर गया त्याग, अरे निर्दयी नाग, तूं भी दे रह्या त्रस
अरे नीच महानीच, मेरे प्राण रहा खींच, दुख मोह माया बीच, महोर सिंह मत फंस 4॥


आधी खा लई है ब्याल नै नल राज तेरी अर्धंगी ॥ टेक । (सांगीत)


जो तुम कहीं सुनते हो तो प्राणपति वेग आओ
जानकै अनाथ नाथ नाग सेती छुटवाओ
बख़्त है आखरी मेरा आकै दर्श दिखलाओ
औगण भरी हूं तो मेरे औगण को बिसार दो
नाग से छुटवाय अपने हाथ मोहे मार दो
अंत समय दर्शन देकै जन्म को सुधार दो
घेर लई हूं काल नै
धारण कर रूप भुजंगी 1॥


नाग के डसे हुए की मोक्ष कभी होती नांय
स्वर्गवास मिलै नहीं नरक में पड़ैगा जाय
दोजग भोगैगी पतिभर्ता तेरी नल राय
इतनी कहकर रानी ऊंचे स्वर बिरलाई
पशु पक्षी बिरला उठे रुदन सुना जाता नाईं
पारधी फिरै था कोई महाघोर वन मांईं
हाथ लिये सर भाल नै
मांसाहारी सरभंगी 2॥


सुनकै आवाज गाज भागकै आया शिकारी
देखकर अन्याय ध्याया भाल कोंच बीच मारी
अंग भंग करा ब्याल खून नदी हुई जारी
काया काट फांस दई अजगर का मुख पाड़
ब्याध नै वैदर्भि भुजा पकड़ दई लिकाड़
जीवदान देकै बुद्धि नीच नै लई बिगाड़
करी कुदृष्टि चिंडाल नै
रानी खड़ी देखी नंगी 3॥


बोला है शिकारी नारी अपने पलट ख्याल
रोष रंज दूर कर अपना सुना दे हाल
कहां जन्मी कहां परणी कहां से तू आई चाल
ब्याध के वचन सुन दमयंती नै बैठ पास
आदि से अंत तक बरण दिया इतिहास
महोर सिंह कर रह्या प्रभु सेती अरदास
मेट बदी की झाल नै
बन सत्पुरुषों का संगी 4॥

दोहा –

दमयंती के सुन वचन कामातुर हुआ ब्याध ।
भावी के बस होयकर करण लगा बकवाद ॥


पतिहीन नारी का जगत में जीना है धरकार ॥ टेक ।

गर्व गुमान मान सब झड़ ज्या
हाव भाव चित चाव बिगड़ ज्या
पति बिना सब फीका पड़ ज्या
रूप रंग सिंगार 1॥

टुकड़े कारण विधवा नारी
करै ओर की ताबेदारी
गुणवंती हो या औगणगारी
नाम धरै संसार 2॥

  कोई सुवेरनी कोई जारनी
कोई तो कहता है व्यभिचारनी
सुन सुन समता होगी धारणी
विधवा को हर बार 3॥

अंगीकार जो करले मुजको
कोई भी कुछ कहै ना तुजको
महोरसिंह तज मन के रूजको
भावी के अख्त्यार 4॥

ख्याल –

सुन कै ब्याध के बैन विदर्भी हाथ जोड़ कै बतलाई
प्राण दान दिये हैं मुझको मैं तेरी धर्म की पुत्री कहलाई ।

अनाथ हूं पतिभर्ता हूं पति वियोग की महादुखदाई
ऐसे बख़्त का बज्र वचन खाली पड़ने का है नाईं ।

पति प्रेम में हुई दिवानी फिरती हूं वन-वन माईं
महोर सिंह कहै रस्ता छोड़ दे धर्मपिता तेरी शरणाई ॥

दोहा -

पांच दिवस मोहे हो लिये अन्नजल कीन्हा नांय ।
अन्न का व्रत धारण किये फिर रही वन के मांय ॥


अब मतना घनी सतावै
पापी अनाथ अबला को ॥ टेक ।


जिगर मेरे में ज्वाला जग रही
रूप रंग में अग्नि लग रही
सोचले समय आखरी बग रही
गया बख़्त हाथ नहीं आवै
बर बर कहूं तेरे भला को 1॥

हाथ छुवा दिया तो हिया फटज्या
चाँद सूरज गिरैं धरा उलटज्या
हट पापी अलग तूं हटज्या
मेरे हाथ कटवावै
बधक मतनांह गला को 2॥

क्या तू ब्याध मोहे झिड़क रहा है
काल तेरे सिर कड़क रहा है
सती का हृदय धड़क रहा है
देख देख घबरावै
कामी की काम कला को 3॥

दारुण रोष सती नै कीन्हा
हो ज्या भस्म श्राप दे दीन्हा
महोर सिंह कहै फल पा लीन्हा
भस्मी भूत बनावै
दमयंती ब्याध लला को 4॥

दोहा –

छन में ब्याधी ब्याध की दई सती नै मेट ।
वचन बज्र से मारकर किया काल की भेंट ॥


कर कै ब्याध की गति पति को फिर ढूंढन लागी ॥ टेक ।

हाय निसिध पति हाय प्राण पति हाय अनाथ के नाथ
बहुत बुरी करी नाथ तैं ला अनाथ को साथ
नाथ बनखंड के बीच त्यागी 1॥

सतवादी सत्यव्रती सतधारी था नाम
बोली झूठ दगा किया क्या ये ही सत के काम
बोल कर होय गये बागी 2॥

निसधपुरी था सासरा कुन्दनपुर पीहीर
कौन घरों की कुलवधू बन में नग्न शरीर
आज फिर रही है भागी 3॥

पीहर सासरा छूट गया दई पति नै त्याग
घर की रही ना घाट की फूटे मेरे भाग
बिरह अग्नि तन में जागी 4॥

जो कर दई हो हंसी तो हो लई पिया बहोत
महोरसिंह दीज्यो दर्श ना अब मेरी मौत
बने तुम फिरियो बैरागी 5॥

दोहा –

गज कौवे मृग पूछ लिए सारदूल और शेर ।
कोई पता देता नहीं रो-रोकर रही टेर ॥


निर्दयी अनल का किस नै धरा है नल नाम ॥

बिरलाती हुई जाय रही है
वन में टक्कर खाय रही है
महासंकट में आय रही है
निसधपति तेरी बाम 1॥

तन के ऊपर तार नहीं है
निर्जन बन आधार नहीं है
दुखी मेरी सी नार नहीं है
बीरसेन के जाम 2॥

भूख सहूंगी प्यास सहूंगी
तेरा दिया वनवास सहूंगी
घोर वन में महात्रास सहूंगी
यही विधि लिखी थी कलाम 3॥

अब तो बालम आना चाहिए
आकै प्राण बचाना चाहिए
महोर सिंह गुण गाना चाहिए
सुध लेंगे घनश्याम 4॥

दोहा –

शोकहरण गुण समझकर गई अशोक के पास ।
हे अशोक मेरे शोक का जल्दी कर दे नाश ॥

अब तो पिया मेरी करो गुनाह माफ
बहोत घनी दुख पा लई ॥ टेक ।

कल तो पति पत्नी संग थे
एक साड़ी में दो अंग थे
पत्नी का आज उदय हुया पाप
पति ने आंख मिंचा लई 1॥

कल दोनों सायंकाल में
डटे थे आ कै धर्मशाल में
पिया आज कहां मैं कहां गये आप
त्रिया से गैल छुड़ा लई 2॥

जागी उगमते प्रभात में
दिन सारा खो दिया अपघात में
रात बिता द्यूंगी करकै विलाप
तुम नै तो नज़र बचा लई 3॥

तरुवर अशोक को त्याग कै
गई बैठ सिला पर भाग कै
महोर सिंह कर हरि का जाप
गीती तो बहतेरी गा लई 4॥

दोहा –

शिला पै बैठी आय कै अस्त हो गया भान ।
निर्जन बन भयकार है उज्जड़ है बियाबान ॥


मात शिला अब तेरी शरण वैदर्भि चलकर आ गई ॥ टेक ।

भीम नृप की हूं सुता दमयंती मेरा नाम है
नल राजा की हूं वधू तकदीर मेरी बल खा गई 1॥

राज सेती भ्रष्ट हुआ नल आ चौसर के घाट पै
पति को हूणी आयकै चौसर का खेल खिला गई 2॥

  पति नै महाघोर वन में सूती को धोखा दिया
दिन तो खो दिया रोय कै अब रैन अंधेरी छा गई 3॥

मात शिला तेरी गोद में पड़कै बिता दूंगी रात को
महोर सिंह विनती करै जलधार नैन बहा गई 4॥

पिया बिन मेरी कैसे कटैगी या बैरन रात ॥ टेक ।

पति की सेज बिछाया करती
बिछाय सेज पोढ़ाया करती
सुनती और सुनाया करती
जिगर मरम की बात 1॥

पति के चरण दबाया करती
पंखा हाथ हिलाया करती
मंगल गाय जगाया करती
अपने पति को प्रभात 2॥

न्ह्वा पति को नहाया करती
भोजन प्रथम जिमाया करती
दुख-सुख की बतलाया करती
अपने पति के साथ 3॥

बैठी मौज उड़ाया करती
पति के गुण नित गाया करती
महोर सिंह सुख पाया करती
दुख-सुख प्रभु के हाथ 4॥

सोहनी –

बैठी सिला पै भीम तनया चारों तरफ निहारती
पति के विरह में विरहनी चंदा से अर्ज गुजारती ।

चन्दा तू मन्दा होज्या तेरी चमक तन को जारती
जलती हुई को मत जलावै श्वास भर-भर मारती ।

कभी रोती है कभी सोती है कभी पति-पति पुकारती
महोरसिंह कभी मुंडी धुनै कभी चुप हो समता धारती ॥


दोहा –

दमयंती नै रुदन कर बिता दई है रात ।
वन पक्षी बोलन लगे होय गया प्रभात ॥


दमयंती उठकर चल पड़ी पति अपने की तल्लाश में ॥ टेक ।


विरह अग्नि से जला रुधिर मांस का पिंघलकर पानी हुआ
पानी असुवन में गया रह्या प्राण पति की आस में 1॥

निर्बल काया होय गयी बिसरी है सारी वासना
पर पति को बिसरै नहीं चितवै श्वास दर श्वास में 2॥

दिनभर भ्रमती फिरी हुया बख्त सायंकाल का
बांसों का एक बीड़ा था जा बैठी उसके पास में 3॥

संध्या को देख ध्यान वा सती पति का कर रही
महोर सिंह समाधी लग गयी बैदर्भि की बनोवास में 4॥

दोहा -

चार पहर की रात्रि गई ध्यान में बीत ।
जैसा नल का रूप था वैसा हुया प्रतीत ॥


ख्याल –

दिवस तीसरे दमयंती वहां से उठकर ध्याई जी
निराधार निराहार पति ढूंढन को सुरत उठाई जी ।

वन में भ्रमत भ्रमत चलकर ऋषिमण्डल में आई जी
महानदी की धार बहै दमयंती के मनभाई जी ।

जा प्रणाम ऋषियों को करी ऋषियों ने आशीष सुनाई जी
आदर से बैठाय लई है महोर सिंह छवि गाई जी ॥

दोहा –

वैदर्भी वर्णन किया पिछला सब इतिहास ।
सुनत शीश पुचकारकै बैठा लई है पास ॥


बेटी म्हारी आशीष से हो सुफल यहां तेरा आना ॥ टेक ।

समझ सोचकर दमयंती मन में
सर्वसुखी महादुखी हो छन में
निश्चय रख थोड़े ही दिन में
निसिधपति नरेश से
पावैगी आदर माना 1॥

पति के संग देश जावैगी
सर्व राजपाट पावैगी
यहां रही तो दुख ठावैगी
इस बनखंडी आधीश से
पुत्री बाहर टप जाना 2॥

नदी वसाला बालू किनारा
वहां पर है लक्खी बंजारा
आज रात वहां करकै गुज़ारा
कल विनती कर श्रीश से
लीजे कोई देख ठिकाना 3॥

इतनी कह करी शंखध्वनि जी
अंतर्ध्यान हुये ऋषि मुनि जी
गावै महोर सिंह गुनी जी
अर्जी है जगदीश से
मेरी नैया पार लगाना 4॥

ख्याल –

सुपनै कैसी समय देखकै दमयंती घबराई जी
भयभीत होयकर चाल पड़ी आगे को सुरति ठाई जी ।

महादारुण दुख सहती हुई बणखंड से बाहर निकस्याई जी
नदी वसाला नजर पड़ी तट पर बालध दरयाई जी ।
हाथी घोड़े ऊंट खच्चर खोते लगे देन दिखाई जी
कई जूथ बंजारो के हैं महोर सिंह लीला गाई जी ॥


व्यापारी तर्क कुतर्क करैं
ये कौन कहां से आई ॥ टेक ।

कोई तो कहता है राक्षसनी
कोई कहै देवी वनवासनी
कोई योगनी कोई यक्षनी
पर देख-देख नरनार डरैं
टांडे में पड़ी तवाई 1॥

कोई छिप गया कोई भाग गया
कोई वसन धनमाल त्याग गया
कोई-कोई आ निकट लाग गया
कोई पास कोई दूर टरैं
कह तुम हो कौन महामांई 2॥

सुन दमयंती बोली वाणी
भीष्मसुता बिदरभ रजधानी
उस निसिध नल की हूँ रानी
जिसकी सुर मुनि साख्य भरैं
दमयंती नाम कहाई 3॥

आज आज यहा वास करूंगी
थारे निकट निवास करूंगी
कल कोई जगह तलाश करूंगी
महोर सिंह पद कथ उचरैं
सती आदर से बैठाई 4॥

दोहा –

दमयंती बैठा दई कंबल दिया बिछाय ।
विरजिद बंजारे हुये पर भोजन जीमा नांय ।


  पतिभर्ता पति के वियोग में
पति के गुण गाय रही है ॥ टेक ।

बंजारी चल चल आती हैं
बैठ पास में बतलाती हैं
धीर धोप दे समझाती हैं
घर से चली कूजोग में
फल जोग का पाय रही है 1॥

वस्त्र पहर ले भोजन खाले
समझ पकड़ मन को समझाले
निर्दयी पति से आँख मिचाले
क्यू बैठी है शोग मे
नाहक दुख ठाय रही है 2॥

चितवत चित खामोश नहीं है
बोलन का भी होश नहीं है
पति मेरे का दोष नहीं है
रही कर्मफल भोग मैं
विदशा बल खाय रही है 3॥

जब जब मैं जग में देह पाऊं
तब-तब नल ही को परनाऊं
महोर सिंह कहै बिखा बलाऊं
पति विरह के रोग में
मृत्यु मन भाय रही है 4॥

दोहा-

सोई नहीं बैठी रही होय गया प्रभात ।
पति चितवन में बीत गयी च्यार पहर की रात ॥


  लक्खी बंजारा टांडे को लाद चला ॥ टेक ।

हुई मुनादी बज रही भेरी
जल्दी चलो करो मत देरी
आज पहुँचना है चंदेरी
सबकी यही है सला 1॥

लगा नेर बालध जा रही है
उठी गरद नभ में छा रही है
दमयंती पीछै आ रही है
नल नृप की अबला 2॥

लाखों करोड़ों का नहीं ठिकाना
बालध में भरा माल किराना
दिनभर चले अस्त हुया भाना
उगी है चंद्रकला 3॥

चंदेरी की पहूंच सरहद में
बालध ढाल दई है हद में
महोर सिंह कहै गाकै पद में
प्रभु जी करियो भला 4॥

दोहा –

चंदेरी के प्रांत मे निर्मल जल का ताल ।
वहाँ जा डेरा कर लिया बालध दीन्हा ढाल ॥


जलपान करण उस ताल में
वन के गज गजनी आये ॥ टेक । (सांगीत)

वन सेती ध्याई आई मस्त हाथियों की धाड़
ताल में जलपान करकै मारने लगे चिंघाड़
धरती को उधण रहे वृक्षों को रहे उखाड़
टांडे बीच जाय बड़े पहरेदार भाग गये
हाथियों से हाथी जाय जाय लड़न लाग गये
शोर सुन हथियों का सोते हुये जाग गये जी
नरनारी फंसे बबाल में
धनमाल छोड़कर ध्याये 1॥


खहाखस्सी मच रही ऊंट अरड़ाय रहे
खिंचरे खोते आदि सब तुड़ा पड़ा जाय रहे
गऊ भैंस धूजैं खड़े बैल जो डिडाय रहे
आधी रात का बख़्त माच रही घूमाघानी
चिंथ-चिंथ मर गये न जाने कितने प्राणी
हाय होय सिवा और दूसरी ना बोलैं वाणी
महाभयंकर भूंचाल में
बहोती कर पद तुड़वाये 2॥


हाथियों को मार वनहाथी सब चले गये
ऊंट घोड़े रथ बहुत घने दले मले गये
व्यापारी नभके कितनेक घर घले गये
कोई कहै चलती बार गणपति मनाया नहीं
कोई कहै देवी भैरूं हनुमान ध्याया नहीं
कोई कहै ईश्वरी माया उसका पार पाया नहीं
जचै नहीं कुछ ख्याल में
बैठे हैं सब घबराये 3॥


कोई कहै कल एक जादूगरनी नार आई
उसने ये टोना किया जादू की विद्या चलाई
पकड़ो मारो पीटो उसे आज होगी यहांई
हो रही तलाशी सती भाग चली डर की मारी
ब्राह्मणों की शरण लेकै चंदेरी की सुरति धारी
महोर सिंह कहै कर्मरेख टरै नही टारी
जो अक्षर लिखे भाल में
वो मिटते नहीं मिटाये 4॥


दोहा –

ल्हुक छुप वैदर्भी चली विप्रों का संग पाय ।
ब्रम्ह मुहूर्त में सती बड़ी शहर में जाय ॥


  जहां सुबाहु राजा राज करै
बड़ा सुंदर नगर चंदेरी ॥ टेक ।

नीती निपुण भूप धर्मधारी
पतिव्रता है जिसकी नारी
सर्वसुखी है प्रजा सारी
गऊ शेर के पास चरैं
अजा भिड़ाऊ की सहचेरी 1॥

सती देख निष्कलेश हुई है
नगरी में प्रवेश हुई है
विकट भयंकर भेष हुई है
देखै सोई दुख भरै
दिन दशा नै त्रिया घेरी 2॥

बालक पत्थर मारते जा रहे
खाक शीश पर डारते जा रहे
पगली आई पुकारते जा रहे
कर्मरेख टारी ना टरै
सती किस संकट में गेरी 3॥

मारपीट से तड़ी हुई है
पास महल के खड़ी हुई है
दृष्टि रानी की पड़ी हुई है
नारायण का ध्यान धरै
महोर सिंह शरण प्रभु तेरी 4॥

अरिल –

रानी नै दासी भेज महल में सती बुलवा लई
बैठन को दीन्हा बैठना आदर से पास बैठा लई ।

पूछी विखा की बात कही थोड़ी सी घनी दबा लई
सुनकर बिखा का हाल महाराणी नै कंठ लगा लई ॥

दोहा –

रानी की है पुत्रिका सुनन्दा जिस का नाम ।
दासी भेज बुलवा लई कह दिया हाल तमाम ॥


मेरी बहन सुनन्दा इतने करूंगी नहीं काम ॥ टेक ।

रजो वस्त्र मैं ना धोऊंगी
दीपक भूल नहीं जोऊंगी
पर सज्जा पर नहीं सोऊंगी
मैं पतिभर्ता बाम 1॥

झूठा भोजन नहीं खाऊंगी
परपुरूषों से ना बतलाउंगी
परघर कभी नहीं जाऊंगी
रहूंगी तुम्हारे धाम 2॥

अजब से अजब श्रंगार बना दूं
पढै तो स्त्री शास्त्र पढ़ा दूं
गाना बजाना सारा सिखा दूं
पाक बना दूं तमाम 3॥

मेरी मर्जी होगी जबतक
तेरे पास रहूंगी तबतक
महोर सिंह क्या गलती अबतक
शुद्ध ना लई घनश्याम 4॥

दोहा –

भीम भूप नै सलाह कर लीन्हे विप्र बुलाय ।
नल दमयंती को ढूंढने दसों दिश दिये पैठाय ॥


  नल दमयंती को ढूंढन विप्र चले ॥ टेक । (जंगम)

कोई पूर्व को कोई पश्चिम को कोई उत्तर-दक्षिण को ध्याया
कोई ईशान अग्नि नैऋत वायब विदिशाओं को मन ठाया
कोई योगाभ्यासी गया पताल में कोई योगी नभ में पाया
बन पर्वत नदी नाले को ढूंढ चल ग्राम शहर पुर में आया
पूछत पूछत सब हार लिए फिरते फिरते थक गई काया जी
विप्र बृन्द को फिरते फिरते वर्ष कई मास टले 1॥


एक सुदेव नाम का विप्र था चंदेरी मे प्रवेश हुआ
पुछत पूछत पता लगा जा सुनन्दा के घर पेश हुआ
खड़ी देखी दूर से दमयंती ब्राह्मण को महा कलेश हुआ
मुख मलीन दीन अनाथ हुई दुर्बल दासी का भेष हुआ
धन्यवाद लगा देन दिवस को पूरा आज संदेश हुआ जी
जिस घड़ी मे चला कुंदनपुर से हुये थे शगुन भले 2॥


जब दमयंती से बोला विप्र कुन्दनपुर से मैं आया हूं
पुत्री तेरे ढूंढ़न के लिए नृप भीम ने यहां पठाया हूं
खोजत खोजत वर्ष मास बीत गये बहुत घना दुख पाया हूं
सुदेव विप्र है नाम मेरा तेरे बंधु का मित्र कहाया हूं
तेरे माता-पिता और बालक कुशल हैं यह संदेशा लाया हूं
हैं तेरे वियोग में महादुखी इस कारण यहां खंदाया हूं जी
मात-पिता-सुत-सुता-बंधु के पड़े हैं जिगर जले 3॥


सुदेव द्विज की सुन बानी दमयंती नै पहचान लिया
यह मित्र बंधु का पिता का मेली ये भी मन मे मान लिया
मेरे पिता का भेजा आया यहां यह निश्चय करकै जान लिया
जद भाग चरण पकड़े द्विज के कुन्दनपुर चलना ठान लिया
द्विज सिर पुचकारै गले लगावै महोर सिंह बखान किया जी
सुदेव द्विज और दमयंती के नैनों से नीर ढले 4॥


दोहा –

सुदेव द्विज का सुन लिया पिछला सब इतिहास ।
सुनन्दा उठ कर चल पड़ी गई माता के पास ॥


  सुन सुदेव के वचन सुनन्दा माता पै आई ॥ टेक ।

भागी आई बोली बैना
सुनिये माता मेरा कहना
दासी नहीं ये सगी है बहना
मौसी की जाई 1॥

लेन विप्र एक आय रह्या है
घर की कुशल सुनाय रह्या है
हित से गले लगाय रह्या है
मेरे महल मांई 2॥

माता सुन पुत्री की बानी
मन में बहुत घना दुख मानी
जल्दी से पहूंची महारानी
जा हिरदै लाई 3॥

आंसु पूछै सिर पुचकारै
दमयंती की औड़ निहारै
महोर सिंह कथ छंद ऊचारै
हुई महा दुखदाई 4॥

दोहा –

दमयंती धोखा किया मेरे घर में आय ।
पूछ पूछकर हार लई भेद बताया नांय ॥


मेरे घर आकै पुत्री आपा किस बात छुपाया है ॥ टेक ।


जिस दिन मेरे भवन पग धारी
छाती लाय बहुत पुचकारी
पूछ पूछ तेरे सैं हारी
ना भेद बताया है 1॥

दमयंती मैं और तेरी मांई
सगी बहन हैं मां की जाई
बालक थी जब गोद खिलाई
मैं लाड लडाया है 2॥

जो कुछ करै सो करै विधाता
कर्मों का फल भोग्या जाता
गया बख़्त फेर हाथ ना आता
धोखा खाया है 3॥

महोर सिंह सत्य जिकर करने से
इबतक मिल जाती परणे से
गया बख़्त धोखा धरने से
हाथ ना आया है 4॥

दोहा –

जाओ विप्र कुंदनपुरी कहो भीम से जाय ।
दमयंती को नल बिना हरगिज भेजूं नांय ॥


मैं बहुत घनी सुख पाई माता रहकर तेरे पास ॥ टेक ।

मात आशीष वचन है मेरा
भाग सुहाग बना रहै तेरा
सदा अचल रहो सिर का सेहरा
बना रहै रनवास 1॥

सर्व सुहागन भाग बडेरी
सदा रहो बहन सुनन्दा
मेरी सुबस बसियो नगर चंदेरी
पाया बास सुबास 2॥

इब मैं मात पीहर जाऊंगी
मात पिता के दर्श पाऊंगी
फिर कभी मिलने आऊंगी
जो रहे घट में श्वास 3॥

गम ना करो आज्ञा दो माता
बामी भुजा नैन फरकाता
महोर सिंह पद कथ कर गाता

भारत का इतिहास 4॥

दोहा –

दमयंती के सुन वचन रानी भई अनंद ।
सोच समझकर सभी नै कर लिया कहन पसंद ॥


दमयंती का सन्मान करैं
बड़े हित से राजा रानी ॥ टेक । (सांगीत)

रानी देज़ देती पशमीने रेशम जरीदार
मखमली चंदेवा जाली मोती लगे तार तार
सन्नी उष्णी फरसी रंग पांचों दे रहे बहार
हेमकी रजत आभूषण सुघड़ सोने के घड़े
नीलम पुखराज हीरे पन्ने मणियों से जड़े
नख शिख तक के साज वैदर्भी कै आगै पड़े
बिम्ब उडूगन शशी भान करैं
छवि जाती नहीं बखानी 1॥


डिब्बे पेटी पलंग बीठक पिन्नस पालकी सजाय
मेवा और मिठाई भोजन रख दिये लाय लाय
दास दासी दिये सज धज खड़े हुए आय
हाथी घोड़े रथ प्यादे पलटन खजाने दिये
अस्त्र दिये शस्त्र दिये आयुद्ध तोप खाने दिये
राज भी कुछ बख्शा लिख पट्टे परवाने दिये
और बहुत सा दान करैं
बड़े रंगचारों से दानी 2॥


ईतर फुलेल तेल चमेली मंगाय रानी
उबटना लगाय नहाय दमयंती से बोली बानी
सज धज तज अब मन की सब गिलानी
मांवसी के बैन सुन नैन जल भर आई
हंस रहा रोम रोम कर जोड़ बतलाई
पति की वियोगन जोगन भोगै महादुखदाई
बिखा बला गुजरान करै
धृक जन्म जीवन ज़िंदगानी 3॥

बालम बिहूनी सूनी जूनी भोगती हैं नार
पति की दुहागी त्यागी किस पै करै श्रंगार
तन मन धन वसन आभूषण हैं बेकार
सज धज पीहर जाना सतियों का धर्म नहीं
मैले भेष खुले केश देश जाऊं शर्म नहीं
महोरसिंह अंग साजूं कैसे ओटै मेरा ब्रह्म नहीं
जो नित हरी का ध्यान करैं
वो करते नहीं मनमानी 4॥

दोहा –

मांवसी से मांग विदा चरणों में सिर नाय ।
सुबस चंदेरी बसो कंटक लगै ना पाय ॥


अबसो कुन्दनपुर को दमयंती चली ॥ टेक ।

देज दान को अदद, गये वाहनों से लद, ढ़ोल भेरी अनहद, बजैं गली गली
टूट-फूट गये पुल, चले नारियों के ढुल, देता आवै ब्रह्मकुल, आशीष भली 1॥


गलहू के गल लाय, सब मिले आय-आय, नैनीं नीर रहे छाय, गल बांह घली
अधर क्या बोलैं बैन, पड़ै चित को ना चैन, पोंछ-पोंछ कर नैन, पूछैं बात पिछली 2॥


जैसे भोग्या वनवास, सब कहा इतिहास, बोली होय कै उदास, धन्य भीम लली
तैनै धर्म लिया राख़, बांधी जुगांजुग साख, बेद शास्त्र रहे भाख, है कर्म बली 3॥


सब करने लगे प्यार, शीश रही पुचकार, च्यार जुग से होण हार, हूणी नांह टली
महोर सिंह बिश्वाबीस, भली करैंगे जगदीश, सतियों का आशीष, सदा सुफल फली 4॥

दोहा –

सब से मेल मिलाप कर जयती जय मुख से बोल ।
पालकी में बैठी सती बजा कूच का ढ़ोल ॥


  मांवसी से होकर विदा सती पीहर को जाय रही ॥ टेक ।


सब की ओर निहार रही है
प्रेम के आसूं डार रही है
सुंदर शगुन विचार रही है
खुशी मनाय रही 1॥

संग में लस्कर है बड़ा भारा
मार्ग में चले बजत नगारा
उड़ी गरद बन-बन गुब्बारा
नभ में छाय रही 2॥

तुमल शब्द टामक धर्राती
धुन सुन नारी भागी आती
पूछैं नाम संग भागी जाती
शीश नवाय रही 3॥

गांव-गांव में सती अंग की
पूजा होती रंग-रंग की
रसना गुनी महोर सिंह की
हरि गुण गाय रही 4॥

दोहा –

दशों दिशा को ढूंढकर विप्रबृन्द गये आय ।
नल दमयंती का कहीं पता चला नृप नांय ॥


राजा बैठा सोच विचार में नल दमयंती ना पाये ॥ टेक । (सांगीत)


रंज में था राजा सुनी नक्कारों की टंकोर
गर्द के गुब्बारे उठे टामकों की घुरैं घोर
धोसे की धमक सुन नगरी में मचा शोर
शत्रु कोई चढ़ आया बंद हुया बाज़ार
राजा नै हुकम दिया फौज हुई तैयार
भेदभाव लेन अगुवाई भेजे प्रतिहार
उसी अवसर दरबार में
चल सुदेव ब्राह्मण आए 1॥


दमयंती के आगमन का विप्र ने सुनाया हाल
जल्दी से पुत्री की अगवानी चल करो भूपाल
सुनकै वचन द्विज को बहुत दिया धनमाल
आगै आगै राजा रानी पीछै सब परिवार
नगरी में बधाई बाजैं होय रही जय जयकार
दमयंती की बाट जोहैं दरवाजों पै खड़ी नार
कूंचे गली बाज़ार में
घृत के दीपक जलवाये 2॥


दमयंती नै आते देखे मात-पिता-बहन-भाई
पालकी से उतर लई शीश को झुकाती ध्यायी
माता के चरणों पड़ी हित से छाती लगाई
शीश पुचकारै पिता नैनीं जल भर आये
बहन-भाई मिले जुले हृदय जिनके उझलाये
माता-माता करते पुत्र-पुत्री दोनों रोते ध्याये
भये मोह की धार में
माता ने हिय लगाये 3॥


ब्राह्मण स्वस्ति वाचन पढैं बधाई बांटै नरेश
देवतों को पूज सती नगर में हुई प्रवेश
नरनारी चरण गहैं देख के फकारी भेष
मान सम्मान होती महलों में बड़ी है जाय
माता-पिता आगै हाल बिखा का दिया सुनाय
दुख नहीं सहा जाता महोर सिंह कहै गाय
चर्चा भई नरनार में
सुन-सुन सब धोखा खाये 4॥

दोहा –

दमयंती कहने लगी सुनिये ब्राह्मण वृंद ।
जहां जाओ उसी जगह ये गाय सुनाईयो छंद ॥


बेगुनाह त्रिया को त्याग गया
निर्दयी दया ना आई ॥ टेक ।

प्राणनाथ तन पति मन मेली
सलाह लई ना जुवै खेली
धर्मशाला में छोड़ अकेली
साड़ी काट कै भाग गया
किस कारण दूर दुराई 1॥

वन-वन भरमी दुख दिया दारुण
इजगर ग्रसी ब्याध संधारण
सर्व सुहागन को किस कारण
वन में पति दुहाग गया
दे गया महा दुखदाई 2॥

आठ दिवस रही निर्णाबासी
डाकन कहाई बन गई दासी
इब मैं जाकर पीहर निवासी
पति संग भाग सुहाग गया
तन मन की गई सफाई 3॥

दुर्बल भेष फकीरी बाना
धरकार जिंदगी जीवन प्राणा
महोर सिंह कहै जल्दी आना
जो ज्यादा दिन लाग गया
दमयंती मिलन की नांई 4॥

ख्याल–

दसों दिशा में ब्राह्मण ध्याए दमयंती का ले कै संदेश
नल राजा को फिरैं ढूंढते पुरी शहर ग्रामों में हमेश ।

प्रणाद नाम का ब्राह्मण था जा अवध पुरी में हुया प्रवेश
जा दरबार में टेर दई बैठे सभासद ऋतुपर्ण नरेश ।

बाहुक कै लगे आसूं पड़ने सुन कै हो गया महाकलेश
उठ प्रणाद कै पीछै हो लिया श्यामबर्ण है दुर्बल भेष ।

हाथ जोड़ कर बोल्या बिप्र से बाहुक नामी हूं तुरंगेश
वही धुनि मोहे फेर सुना दो महोर सिंह मत रखना शेष ॥

दोहा -

बाहुक के सुनकर वचन प्रणाद ने तेही काल ।
दूजी बार धुनि बांधकर सुना दिया सब हाल ॥

सुनी विरह की धुनि मुनि से कहन लगा रथवान ॥ टेक ।

भावी वश सकल नरनारी
कर्मरेख टरती नही टारी
राजा होते देखे भिखारी
एक पलक में आन 1॥

हूणी प्रबल दशा बल खाकर
बन गये भूप पराये चाकर
पक्षी तन का वस्त्र उठाकर
उड़ चढ़े जा असमान 2॥

दारुण दुख सह धर्म उबारै
वा त्रिया दोनूं लोक सुधारै
सातकुली को पार उतारै
बरणे बेद पुरान 3॥

मिलैं बिछड़े बिछड़ मिल जाते
अशुभ उतर जब दिन शुभ आते
महोरसिंह कथ पद में गाते
भारत का आख्यान 4॥

दोहा –

प्रणाद कै निश्चय होया हो गया दृढ़ विश्वास ।
दमयंती से जायकर सुनाया सब इतिहास ॥


उमंग-उमंग दमयंती द्विज का करन लगी सम्मान ॥ टेक ।


धनमाल वस्त्र और गहना
कहै किसी से मतना कहना
दिन दो चार गुप्त हो रहना
जा अपने अस्थान 1॥

द्विज को भेज सुदेव बुलाया
हित से अपने पास बैठाया
जो उत्तर बाहुक का आया
कर दिया सकल बखान 2॥

अवध के बीच निवास पति का
जा संदेश पुगाओ सती का
कल स्वयंबर है दमयंती का
जाकर करो बयान 3॥

सूर्योदय पर पहुंच जाओगे
तो उसे तुम ही परनाओगे
महोर सिंह फिर पछताओगे
जो अस्त हो जा भान 4॥

दोहा –

दमयंती के सुन वचन किया योग अभ्यास ।
अनहद चक्कर के बीच में डाट लिए हैं श्वास ॥


द्विज चला अवध को लेकर गुप्त संदेश ॥ टेक । (जंगम)

योग अभ्यासी सुदेव ब्राह्मण आकाश मार्ग ध्याया जी
वो उदय अस्त के अंतर में चल अवधपुरी में आया जी
ऋतुपर्ण भूप की गया सभा में जा संदेश सुनाया जी
बाहुक सुन अचरज करन लग्या है मन में धोखा खाया जी
अघटित घटना कभी हो नही सकती आपा आप समझाया जी
मेरै ढूंढ़न के हेत सती नै फिर स्वयंबर रचवाया जी
खबर नहीं दिन बिखा के कितने रहै रहे अवशेष 1॥


सुनकर सुदेव के वचन भूप ऋतुपर्ण कै खुशबख्ती छाई
अश्वपति बाहुक से कहन लग्या जल्दी जा घुड़साला मांहीं
वायुवेगी अक्कासी अगम गति के घोड़े च्यार ल्या दरयाई
जीवन से कह्या रथ साज काम देरी करने का है नाहीं
कुन्दनपुर से दमयंती की लिखी हुई गुप्त पाती आई
कल सुर्योदय स्वयंबर होगा शायद हमको जा परनाई जी
सजधज चलो स्वयंबर माहीं आवैंगे बहोत नरेश 2॥


घोड़े च्यारूं जुड़वाय दिये रथ में बैठा छ्त्तरधारी
रथवान के बसके रहे नहीं नाचैं कूदैं दें किलकारी
है अश्वविद्या में निपुण वीर बाहुक राजा का सहचारी
घोड़ो की पकड़कर बाग जेर किये चलने की करी तैयारी
बारसनी विश्वास करै नल का मन में दुवध्यां हो रही भारी
अश्वविद्या में प्रवीन देख ऋतुपर्ण भूप दे बलहारी जी
अकाश मार्ग ऐसे उड़ रहे जैसे उड़त खगेश 3॥


  मन की रफ्तार पर घोड़ो को बाहुक सारथी दौड़ाय रहे
जब अक्काश में गग्गाट मच्या सग गग गग तुरंग जाय रहे
रथ के चक्करों का चक्र बंध्या धुन सुन बाजी हिण हिणाय रहे
बड़ा अजब तमाशा देख देख ऋतुपर्ण भूप घबराय रहे
राजा का दुपट्टा जाय पड़ा सारथी से रथ डटवाय रहे
रथवान कहै एक योजन रह गया तुरंग ताव पर आय रहे जी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी रटता नाम हमेश 4॥

दोहा -

राजा को रथवान नै अश्वविद्या दई देय ।
बाहुक नै भूपाल से अंक गणित लई लेय ॥


बाहुक के घट सै निकसे गया कलिकाल ॥ टेक ।

मैं कलिकाल शरण हूं तेरी
सविनय अरज आपसे मेरी
दई आपको त्रास घनेरी
बीते बारह साल 1॥

  जबसे आपके हिरदै समाया
मैं भी बहोत घणा दुख पाया
दीन होय शरण आपकी आया
तुम दीनों पै दयाल 2॥

दीन जान दया दृष्टि कीजै
दीनानाथ श्राप मत दीजै
गुना माफ कर जस ले लीजै
सत्यव्रती भूपाल 3॥

दमयंती को दिया दुख भारा
इस कारण मैंहूं हत्यारा
महोर सिंह कह कलि सिधारा
नृप के पलट गये ख्याल 4॥

दोहा –

बाहुक को दे आशिखा आपे कूं धिक्कार ।
बहेड़े में जा छिप गया कलयुग थोड़ी बार ॥


बाहुक नै तुरंग टकोरे झननन उठी रथ की झनकार ॥ टेक ।


तुरंग तेज़ कर चाबुक मारी
बाग सहार दई सिसकारी
उठे अश्व हो गये नभचारी
भागे बेसुम्मार 1॥

सौ जोजन का करकै सफर जी
अस्त समय गये कुन्दनपुर जी
चर्चा फैल गई दर-दर जी
पूछ रहे नरनार 2॥

मधुर ध्वनि घोड़े हिणहिणाते
दमयंती कै सुख प्रगटाते
नाचते कूदते हुये चले जाते
राजा कै दरबार 3॥

रथ से उतरा ऋतुपर्ण राजा
गया सभा में बाजैं बाजा
महोर सिंह कहै सकल समाजा
करने लग्या जुहार 4॥

दोहा –

स्वयंबर का आरंभ नहीं ना मंडप पिंडाल ।
चुपका होकर बैठ गया ऋतुपर्ण भूपाल ॥


भीम भूप ऋतुपर्ण से बोले कर सेवा सत्कार ॥ टेक ।

घुडसाला भेजे तुरंग जी
बाहुक गये घुडलों के संग जी
भीम भूप नृप से इकंग जी
बोल्या बचन उचार 1॥

पूछूं भूप सत्य बतलाना
किस कारण हुया आपका आना
ऋतुप्रण कहै अन्नजल बलवाना
ले ज्या समुद्रों पार 2॥

आपसे थी इच्छा मिलने की
मिल लिये आज्ञा द्यो चलने की
भावी अटल नहीं टलने की
भावी बस संसार 3॥

हारे थके दूर से ध्याये
अभी चले और अब ही आये
महोर सिंह ऋतुपर्ण ठहराये
कहकर बारम्बार 4॥

दोहा –

एक दूती बड़ी चतुर थी केशनी जिसका नाम ।
दासी भेज बुला लई सती नै अपने धाम ॥


  जल्दी बाहुक के पास जा
केशनी धरम की भैना ॥ टेक । (सांगीत)

घुड़साला माहीं एक रथवान आय रह्या
बाहुक है नाम रूप रंग को छिपाय रहा
मेरै शक नल का है चित भरमाय रह्या
नाम पूछ गाम पूछ खूब पता पाड़ आइये
बोल चाल चलन देख देखकै तराड़ आइये
नहीं पता दे तो पीछै बाट भी तू हाड़ आइये
न्यू मेरा विश्वास जा
करूँ सबर पड़ै चित चैना 1॥

दमयंती की आज्ञा पाकै दूती जब चाल पड़ी
घुड़साला माहीं आई बाहुक के ख्याल पड़ी
राजन कहकर बोली सारथी कै कानीं फाल पड़ी
त्रिया मैं तो राजा नहीं बाहुक है नाम मेरा
अश्वविद्या खूब जानूं पाक का है काम मेरा
चाकरी करूं पराई रूस रह्या राम मेरा
मन की कभी ना त्रास जा
दिल की तपत बुझैना 2॥

धोखादेई करना सतपुरुषों का धर्म नहीं
कहै कुछ करै कुछ ये भी सत्यकर्म नहीं
झूठे बेईतबार होते जुवारियों कै शर्म नहीं
दशा सिर चढै पक्षी वस्त्र लेकै भाग जाय
सूती हुई पत्नियों को प्राणपति त्याग जांय
छत्रधारी राजा रंक बनकै चाकर लाग जाय
जती सती बनोबास जा
दारुण दुख सहैं दिन रैना 3॥

इतने में बाहुक अपनी विद्या दिखलाने लगा
अग्नि पैदा करकै पाक घोड़ों का बनाने लगा
पानी उत्पन करकै घोड़ों को पिलाने लगा
  देखकै सब हाल दूती दमयंती के पास आई
कह दिया वृतंत सारा बाहुक को तलाश आई
महोर सिंह गुण गावै तोड़ भी निकास आई
अब बहना तूं रनवास जा
गुण मिलते रंग मिलै ना 4॥

दोहा –

रो-रो दमयंती कहै मार मारकै श्वास ।
दोनों बालक संग ले जा बाहुक के पास ॥


दोनों बालक ले संग में दूती गई बाहुक के पास ॥ टेक ।

बालक देखत ही मोह जागा
अश्वकर्म तज उठकर भागा
हिये लगाकर रोवन लागा
हुई नहीं बरदास 1॥

दूती कहै बाहुक क्यूं रोता
देख परपूत दुखी क्यूं होता
देख देखकर तेरी मोहता
हो मेरे बिश्वास 2॥

सुनकै बचन जब बाहुक टेरा
ऐसा ही था दो बालक मेरा
दुखी हैं कि सुखी हैं नहीं बेरा
इस कारण हुई त्रास 3॥

ले जा बालक फिर मत आना
बर-बर आय कलंक ना लाना
महोर सिंह हरि के गुण गाना
पूर्ण होगी आश 4॥

दोहा –

दूती वहाँ से चल पड़ी बालक संग लगाय ।
बीती सो सब कह दई दमयंती से जाय ॥


  दमयंती नै माता से जाकर सुनाया सारा हाल ॥ टेक ।


प्रथम पता प्रणाद ने लाया
दूजी बार सुदेव पठाया
स्वयंबर बहाने से बुलवाया
ऋतुपर्ण भूपाल 1॥

ऋतुपर्ण संग सारथी आ रहा
बाहुक अपना नाम बता रहा
रूप रंग और जात छिपा रहा
बीरसेन का लाल 2॥

दूती भेजी निश्चय कर लिया
बालक भेजकै मन में भर लिया
क्या तो उसको मेरै घर लिया
क्या मैं जांगी घुड़साल 3॥

पिता से जाकर कह दो माता
लाओ खबर क्या करना चाता
महोर सिंह क्यूं नहीं गुण गाता
तज संसारी ख्याल 4॥

दोहा –

रानी ने जा पति से दिया सब हाल सुनाय ।
सुनकै भूप कहने लग्या बाहुक बेग बुलाय ॥


रानी नै भेजकर दूत महल में बाहुक बुलवाया ॥ टेक । (चित्रमुकुट)


बीरसेन सुत जिस घड़ी महलीं हुया प्रवेश
दमयंती देखी खड़ी मैले भेष खुले केश
विकल दुर्बल हुई कृषकाया 1॥

वैदर्भी को देखकर नैसिधपति नरेश
दुख भर-भर रोवन लग्या हो रह्या महाकलेश
भूप का हिरदा उझलाया 2॥

क्यों रोते धर्मात्मा क्यों रोते दयावंत
दमयंती पूछन लगी कहो सकल बिरदंत
आपकै कौन याद आया 3॥

दारुण दुख मैं सह रही फूटे मेरे भाग
साड़ी काट पिया भग गये दे गये मोहे दुहाग
ढूंढ लिया पता नहीं पाया 4॥

नल के बिना ऐसी बुरी और कर सकै कौन
आपा कहीं छिपा लिया मैं हो रही बिरोन
कर्म फल ईश्वर की माया 5॥

इतनी कहकर गिरगई मुख से निकसी हाय
महोर सिंह बेसुध हुई गई मूर्छा आय
सती का जीव गोत खाया 6॥

दोहा –

मुर्छागत को देखकर भूप गया भोंताश ।
रोता आंसू पूंछता गया सती के पास ॥


पति पा गया तेरा मतना तजै सती प्राण ॥ टेक । (जंगम)

पति पा गया कानी भिनक पड़ी पड़ते ही भिनक जाग्याई जी
पति-पति पुकार कै रोवन लागी बिरही ज्यूं बिरलाई जी
मैं दिक्पालों का किया निरादर नल को माल पहराई जी
वो मेरे ऊपर कोप गये दे रहे महा-दुखदाई जी
मेरा निर्दयी पति सूती को छोड़ गया निर्जन बन के मांई जी
जो मैं दारुण दुख सहे वो दुख सहे ना और से जांई जी
सिर कै साटै धर्म रह्या है साखी सूरज भगवान 1॥


दुख भरे बैन सुन दमयंती के कहन लग्या है निसिधपति
दुख में सुख सुख में महादुख होज्या कर्मों की बड़ी गहन गति
अनहोनी आजतक हुई न हो हुनी तो टारी ना टरै सती
दिन दशा चढ़ी सिर के ऊपर कलयुग ने दई थी मार मती
साड़ी भी काट दई सूती भी छोड़ दई इसमें है ना झूठ रती
निर्दयी पति ने बेकसूर पत्नी को दीन्हे महादुख अति जी
सोच समझ सतवंती सब दिन होते ना एक समान 2॥


मैं निर्दयी हूं और झूठा हूं दगाबाज मैं ही मैं ही हूं ज्वारी
कलयुग ने धब्बे लगा दिये किया राजभ्रष्ट छत्तरधारी
राजा रानी मे बिखा गेर दिया नित उठ त्रास दई भारी
दिये रंगरूप और नाम पलट करवाय दई ताबेदारी
मैं वही हूं नल जिसके गल में वैदर्भि फुलमाला डारी
अब राजपाट सम्पदा मिलैगी दशा उतर गई है म्हारी
इतने वचन कह धरा है नल नै करकोटक का ध्यान 3॥


जब दिव्य वस्त्र धारण किये तनपर वोही रूप हो गया नल का
दमयंती उठ चरणों में पड़ी गई लिपट हार हो गई गल का
नल कहन लग्या सुन दमयंती तेरा पतिव्रत धर्म है छल का
तेरे पुनर्विवाह की धूम पड़ी इस बात धर्म हो गया हल्का
मैं दैव योग से पहुँच गया नहीं तेरा स्वयंबर था कल का
सुन प्राणपति का बैन सती का नैन भर आया है जल का जी
महोर सिंह नित उठ गुण गावै भाषा छंद बखान 4॥


दोहा –

दमयंती कहने लगी प्राणनाथ कर ख्याल ।
जो स्वयंबर होता यहां तो आते सब भूपाल ॥


यहां बुलवाने थे आप पिया स्वयंबर के बहाने से ॥ टेक । (चित्रमुकुट)


प्रथम विप्र प्रणाद नै आपकी करी तल्लाश
दूजी बार सुदेव मैं भेजा आपके पास
गया गुप्ती परवाने से 1॥

पांचों मे ये ज़िकर है और न जानै कोय
चाहे आप कुछ भी कहो जन्म सुफल गया होय
प्राणपति आपके आने से 2॥

भूमि फटै अंबर गिरै सात समंद मिल ज्यांय
चाँद सूरज भी टूटकर पड़ैं जमी के मांय
मेरा पतिव्रत धर्म जाने से 3॥

जाग्रत सुप्ति स्वप्न में हुया हो पतित शरीर
भस्मी मेरी बनाय दे सूरज अगन समीर
जो निंदित हुई जमाने से 4॥

जब तक पवन पानी रहैं रवि शशि असमान
जन्मों जन्मों नल पति हो मेरा तो यही ध्यान
डिगै ना दोष लगाने से 5॥

इतने में अकाश से धुन बंधकर हुया नाद
दमयंती निर्दोष है पूरी हुई मुराद
महोर सिंह पति के पाने से 6॥

दोहा –

रानी ने भूपाल से दई बधाई जाय ।
आपके पुण्य प्रताप से जामाता गया पाय ॥


रानी ने राज दरबार में
जा नल की दई बधाई ॥ टेक । (सांगीत)

सुनत बधाई भूप करने लगा जय-जयकार
आनंद के बाजे बजे धुन सुन नरनार
महलों को सजाय रहे आप भी करैं सिंगार
बांटत बधाई नरनारी चाव भर रहे
यज्ञ के समान हवन दान पुण्य कर रहे
घृत दीपक जला कलश द्वारों आगै धर रहे
कुन्दनपुर बाजार में
दे रहा स्वर्ग दिखाई 1॥


भीम भूप कर रह्या अन्न वस्त्र गौ दान
ब्रह्मभोज होय रहे याचकों के सन्मान
सूत मागध बंदीजन आशिखा दें आन आन
नारी मंगल गाती हुई जाय रही राजपोल
अप्सरा नृत्य करैं बधाई के बाजैं ढ़ोल
भजनानंदी भजन गावैं माच रही रमझोल
जय धुन द्वार द्वार में
बड़ी देर से देत सुनाई 2॥


सुन कर आकाशवाणी भ्रम सब दूर हुया
निसधपति पत्नी के प्रेम में भरपूर हुया
दमयंती के बोल कोल किया सो मंजूर हुया
बामै अंग आई सती चरण चुचकार रही
तन मन बारंबार पति ऊपर वार रही
मानसी पूजा करै है आरता उतार रही
प्रेम नदी की धार में
गोते ला तपत बुझाई 3॥


पति की आज्ञा पाकै दमयंती रणवास गई
व्रत उजमन लगी बोले जद बनवास गई
बाग बाग हो रही बिखा की सब त्रास गई
इतने में नल हू को लेन पेशवाई आई
बड़ी धूम धाम सेती गया राजमहलों माहीं
आनंद बधाई बाजैं महोर सिंह लीला गाई
दशा विदशा संसार में
यूं ही चढ़ती उतरती आई 4॥


दोहा –

ऋतुपर्ण कहने लग्या बिनऊं निसध नरेश ।
दगा किया महाराज तैं गुप्त बनाकर भेष ॥


दोहा –

सबसे मेल मिलाप कर भीम से आज्ञा पाय ।
ऋतुपर्ण चल्या अवध को नल को शीश नंवाय ॥


कुछ बन गई हो तो करनी पड़ैगी गुना माफ ॥ टेक ।


रूप पलट और जात छिपाकर
बाहुक अपना नाम बताकर
मेरे घर में बन गया चाकर
यही चढ़ रहा है पाप 1॥

जो गलती होय गई हो मेरी
पड़ैगी करनी भूल भुलेरी
जल्दी बताओ करो मत देरी
बैठे हो क्यों चुपचाप 2॥

सुनकै वचन नल राजा टेरै
सुख पाया नृप रहकर तेरै
यूं शुभदिन अब आ गया मेरै
फिर से हुया है मिलाप 3॥

बचनों से कर दिल की सफाई
फिर दोनों बने धर्म के भाई
महोर सिंह नै लीला गाई
मिट गये सब संताप 4॥

दोहा –

कहते और सुनते रहे दुख सुख का इतिहास ।
नल को रहते ससुराल में बीत गया एक मास ॥


राजा नल को ससुराल में रहते बीत गया एक मास ॥ टेक ।

सती पति को दिन और राती
बैठी बिखा की बात सुनाती
नल राजा से सुनना चाती
दुर्दिन बन की त्रास 1॥

कभी सुनै कभी अपनी सुनाता
कहन सुनन में दिवस बिताता
कहते सुनते दिन निक्स्याता
हरदम वही इतिहास 2॥

अपनी कहती सुनती सारी
सुनते रहैं सकल नरनारी
एक दिन मन में यही बिचारी
चलैं बंधु के पास 3॥

वहां चलकर बाजी खेलैंगे
भाइ से फिर हाथ मेलैंगे
महोर सिंह सुख दुख झेलैंगे
अब नहीं है बरदास 4॥

नल राजा चल्या स्वदेश को
बजवाकर ढ़ोल दमामा ॥ टेक ।


पचास घोड़े सोलह हाथी
एक रथ एक बारसनी साथी
छस्सो जवान संग चढ़े हिमाती
ले नहीं चलैं विशेष को
काफी है इतना ही सामां 1॥

हक पराया लेकर पाजी
पुष्कल मन में हो रहा राजी
उससे फेर मांडैंगे बाजी
जीतकर लेंगे नरेश को
यश राजपाट निज धामा 2॥

जो नहीं हमसे बाजी खेलैगा
तो वो दुर्दिन दुख झेलैगा
जो अब ना वो हाथ मेलैगा
सहैगा महाक्लेश को
हम मांडैंगे संग्रामा 3॥

इतने में बज्या कूंच नंगारा
लेंगे राज शुभ शगुन बिचारा
महोर सिंह कहै ये प्रण धारा
दें नहीं छिपन दिनेश को
धुर पहोंच करैं विश्रामा 4॥

दोहा –

निसध देश में पहोंच कर भेज दिया है दूत ।
पुष्कल से कह्या आ रह्या बीरसेन का पूत ॥


राजन राजा नल आपसे
बाजी खेलन आया है ॥ टेक । (सांगीत)

सुनकै वचन दूत के भेज दिया प्रतिहार
नल बुलवाया आया पुष्कल के दरबार
देखते ही बोल्या अभिमानी भरै हुंकार
वही मैं और वही तू है वही चौसर वही पासे
दुख देकै मारे काढ़े घर से भूखे प्यासे
होते बर्बाद फिरे जाय कहीं बनवासे
मैं अपने पुण्य प्रताप से
सर्व राजपाट पाया है 1॥


इतने वचन कहकर चौसर लई बिछवाय
नल सेती पुष्कल बोला मंद-मंद मुस्काय
पहली बार सर्वस को जुवे में गया जिताय
पासे पड़े हार के खाली दाव जाते रहे
दमयंती को छोड़ सब दाव मेरे आते रहे
सुनकै वचन नल खड़ग हाथ ठाते रहे
डरकर बज्रपाप से
नहीं खड़ग शीश बहाया है 2॥


क्रोध अग्नि शांत करकै नल नै पासा चुचकारा
पुष्कल के तीन काणे नल के पड़े पौबारा
दो चार दाव खेल राजपाट लिया सारा
अपना और उसका नल नै सर्वस जीत लिया
अपना हक आप रख्या उसका हक उसको दिया
धक्के मार-मार पुष्कल राज से बाहर किया
चाल पड़ा चुपचाप से
धोखा धर पछताया है 3॥


नल की दुहाई फिरी घी के दीपक चस गये
बरबादी आबाद हुई उज्जड़ खेड़े बस गये
प्रजा दर्शन करन आवै दुख सब नस गये
दमयंती भी आय गई पुत्री पुत्र इंद्रसेन
महलों में बधाई बाजैं मंगलाचार दिन रैन
महोर सिंह खुश हुया राजा राज प्रजा चैन
बांध धुनि आलाप से
नल का जसगान गाया है 4॥

---शुभम मंगलम भू नाथ ---