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शिव पार्वती विवाह

ख्याल –
पिता के घर जा योग अग्न से रोष भरी हुई दग्ध सती
कामदेव कर भष्म बैठ गये धूणा घाल कैलाश पती ।

तपते वर्ष हजारों बीते मालिक की बड़ी अजब गती
उसी सती नै जन्म लिया हिम घर जन्मी बन पार्वती ।

पांच वर्ष की पार्वती की नारद नै दई फेर मती
तेरे योग्य कैलाश पति वर जोड़ी में ना फरक रती ।

माघ स्नान करन लगी गिरजा कातिग न्हाती रहै व्रती
शिव को वरूं नित्य यही वर मांगै महोर सिंह भरा भाव अती ॥

दोहा –
मैना रानी पति से करन लगी अरदास ।
ब्याहन जोग पुत्री हुई घर बर करो तल्लाश ॥

रानी के सुनकर बैन
भूप नै चारण बुलवाये ॥ टेक ।

भूप कहै पुरियों में जाओ
पुत्री जोग बर देखकर आओ
शासन टेवा टीप मिलाओ
शुभ अवसर पाये 1॥

बैर मित्रता और अश्नाई
बनै बरोबर हो सुखदाई
कहियो संग है ब्याह सगाई
सुन सुन उठ धाये 2॥

कोई अजोध्या मथुरा काशी
कोई करै उज्जैन तलाशी
देख लिये मायापुरी वासी
पसंद ना आये 3॥

घर पावै तो वर नहीं पावै
बर मिलै घर पसंद नहीं आवै
महोर सिंह भाषा पद गावै
उर आनंद छाये 4॥

दोहा –
चारण बोले भूप से आये कई दिन मांह । पार्वती के जोग वर कहीं भी पाया नांह ॥ बैठे हैं सोच विचार में
हिम राजा मैना राणी ॥ टेक । (त्रिभंगी)

जद बोल्या नरनाह, करूं इन्द्र संग ब्याह, बतला दे क्या सलाह, इसमें तेरी
रानी बोली पिया गिन, इन्द्र सहस्र भग चिन, पिया काहाँ तो है दिन, काहाँ अँधेरी
भूप कहै सुन प्यारी, चन्द्र सहस्र कलाधारी, पुत्री पर्ण ले हमारी, इच्छा मेरी
चाँद पुत्री कै ना योग, रह्या कलंक को भोग, लग रह्या छई रोग, रानी न्यू टेरी
भूप सूरज की कही, पुत्री जोग वर सही, सुन कर नहीं नहीं, रानी हेरी
है सूरज में दहन, पिया होता है गहन, कहीं दीखे ना रहन, चलै हरबेरी
कामदेव कै ना अंग, नहीं ब्याहों वा कै संग, अग्नि देव सरभंग
कर जोड़ कहों भरतार नै
बर ढूंढो बड़ै ठिकाणीं 1॥


वरुण देव को बुलाय, पुत्री द्यूंगा परनाय, रानी शीश को हलाय, बोली वाणी
वरुण का है घर बारी, कहीं मीठा कहीं खारी, पुत्री सोहै ना हमारी , नट गई राणी
फेर बोल्या छत्रधारी, पुत्री जोग वर प्यारी, है कुबेर भंडारी, बड़ा खानदानी
वो है पुंश्चली का नोकर, चली जाय मार ठोकर, पुत्री पीहर भाजै रोकर, बिगड़ै जिंदगानी
भूप कहै बर ले यम, रूप रंग में ना कम, रानी बोली एकदम, बहोत बुरी ठानी
पिया बुद्धि तेरी गई, बर बतलाये कई, यम तो है निर्दई, करै जीव हानी
वायुदेव को बुलाऊं, पुत्री अभी परनाऊं, राणी कहै नहीं ब्याहूं
भजड़वे के संग संसार में
लाजैगी सुता घरियाणी 2॥


किसी अवतार का संबंध, तेरै है के ना पसंद, पुत्री भोगैगी अनंद, बैठी मौज करै
राणी बोली नामंजूर, ना अवतार की जरूर, बनै न कछ सूर, मैली देह धरै
आप विष्णु भागवान, पुत्री पर्ण ले ज्या आन, बता क्या तेरा नुकसान , मैना उचरै
बता पुंश्चली पति को, कैसे ब्याह द्यूं सती को, मेरी पुत्री पार्वती को, कोई जती बरै
बर लेगा शिव जोगी, जन्मों जन्मों का है योगी, तेरी सल्हा सोई होगी, मत नाह डरै
शिव तो है सरभंगी, जाके भूतप्रेत संगी, पुत्री देख कै भुजंगी, डर डर कै मरै
धरती बीच आसमान, जितने थे खानदान, दिए सब मैं बखान
सब के सब भरे विकार में
पार्वती हो गई है स्याणी 3॥


पिता घर पुत्री कंवारी, हो ज्या रजस्वला प्यारी, नष्ट सम्पदा हो सारी, बिगड़ जाय धरम
लगता है बज्रपाप, होवै नरक में गरगाप, क्या समझ रही आप, बड़ा भारी अकरम
समरथ पुत्री देख आज, मोहे आंवती लिहाज, नींद भूप कि गई भाज, बिंध रह्या मरम
कोई बर बुलवाय, पुत्री दीजै परनाय, म्हारा धर्म रह जाय, बना रहै भरम
मेरै उठते हलोर, कुछ चलै नहीं जोर, तूं तो हो गई कठोर, नहीं कम्पै बिरम
जितना बर बतलाया, सबकै दोष तैं लगाया, फिरि हरि की क्या माया, गई भाज शरम
कर्म लिख्या फल पावै, कौन लिखे को मिटावै, महोर सिंह गुण गावै
इतने में राज दरबार में
गये पहुँच ऋषि ऋषियाणी 4॥


दोहा –
सप्तऋषिन नै जायकर पल्ला दिया पसार ।
भिक्षा राजन घाल दे हम तेरे जाचनहार ॥

राजन हम तुमको जाचन आये हैं ॥ टेक ।

नारद शारद ब्रह्म प्रजेशा
पार नहीं पाते विधि शेषा
तेरे सों ही गुप्त संदेशा
शिव का ल्याये हैं 1॥

अजन्मा जन्मों जन्म का योगी
भोगहीन सर्वरसों का भोगी
सब देवों का देव शिव जोगी
उसनै पठाये हैं 2॥

सुनकर वचन हिमाचल टेरै
सिर तक टाल नहीं है मेरै
ऋषि कहैं दान जोग पड़ा तेरै
वचन सुनाये हैं 3॥

हम आये म्हारा मान बंधा दे
शिव को पार्वती परणा दे
महोर सिंह कहै लगन लिखा दे
अवसर पाये हैं 4॥

दोहा –
भूप कहै सुनु ऋषि जी मुझको नहीं इन्कार ।
पूछो सुता से जायकर जो करले अंगीकार ॥

गये सप्तऋषि जी पार्वती के पास ॥ टेक । (जंगम)

ऋषियों को देखकर खड़ी हुई पार्वती शीश झुकाती है
चरणों को रही चुचकार नमन हो कै प्रकम्मा लाती है
सती भागी भागी फिरै भवन में आसन ल्याय बिछाती है
ऋषियों को बैठा आसनों के ऊपर भोजन खूब जिमाती है
आतिथ्य कर्म कर कुशल पूछ कर जोड़ कै वचन सुनाती है
हुया किस कारण ऋषियों का आना गिरिजा पूछा चाती है
धन्य भाग हुये दर्श आपके हुया कोई पुण्य प्रकाश 1॥


पुचकार शीश कहैं सप्तऋषि धन्य धन्य हे पुत्री पार्वती
तेरे ब्याहन की इच्छा करता है महादेव कैलाशपति
धूणा घाले तप रह्या दिगम्बर जिस दिन से हुई दग्ध सती
वर तेरे योग्य तो शिव ही है तूं सती है वो है महा जती
जूड़ी संजोग बले बेह्माई जोड़ी में ना फरक रती
शिव पार्वती ब्याह देखन का देवों को चढ़ा है चाव अति
आशा कर हम आय गये हैं मतना खंदाइये निराश 2॥


जद बोली सती पार्वती ऋषि जी थारे वचन मुझको मंजूर
जो वै हूँ ख़ुशी तो मैं बड़ी ख़ुशी नट जाऊं क्या मेरा है मकदूर
पर आप मरूदी कैसे बरूं पिता माता से पूछो जरुर
पिता माता का कहना मानै नहीं सतपुत्री नहीं वा पुत्री है कूर
मैं हां की कहूं ना की कहूं पर शिव का प्रेम मेरै भरपूर
शिव नाम सुनत मेरे हिरदे में प्रीति के उठते हिलूर
नारद के वचनों का मेरै पूर्ण है बिश्वास 3॥


सुन वचन खड़े हुये सप्तऋषि जय जय शब्द उचारते हैं
धन्यवाद और आशिर्बाद दें सती का सिर पुचकारते हैं
म्हारे आयों का रख दिया मान लिखा लग्न कैलाश पधारते हैं
इतनी कहै मुनिवर चाल पड़े राजा से अर्ज गुजारते हैं
सती शिव के प्रेम में भरी हुई वहां शिव भी बाट निहारते हैं
लिख लग्न ब्याह का दिन पर मालिक सबके कारज सारते हैं
महोर सिंह महाशिव पुराण का कथ गावै इतिहास 4॥ शिव शिव

दोहा –
ऋषियों के सुनकर वचन राजा भरे अनंद ।
राणी नै मन मग्न हो शिव वर किया पसंद ॥


दिन धरया फुलेरा दोज का
लगे लिखन ब्याह की पाती ॥ टेक ।

हिम घर बजैं आनंद के बाजा
मंगल गावैं नारी समाजा
कहै कर जोड़ हिमांचल राजा
सुता का फेरा दोज का
सुन मग्न हुई पंचाती 1॥

शिव योगी ब्याहन आवैंगे
पार्वती को पर्नावैंगे
देहधारी का फल पावैंगे
दिन बडेरा दोज का
निमंत्रित किये गोती नाती 2॥

सिद्ध श्री भोला भंडारी
सरवर कौन कर सकै थारी
लिखनी पड़ै है जानू सारी
ब्याह है तेरा दोज का
आवैं संग सज बाराती 3॥

महोर सिंह कहै नाथ त्रिशूली
करिये माफ़ मेरी सब भूली
फिरै गवरज्या फूली फूली
निरखूं सेरा दोज का
दिन की बड़ी खुशी मनाती 4॥

दोहा –
साज बजैं मंगल गवैं रही वेद ध्वनि छाय ।
पार्वती के हाथ से लग्न दिया पुजवाय ॥


लग्न पत्र ले चले विप्र कैलाश पधारे जी ॥ टेक ।

चले ध्यान धर कै शिवजी का
मार्ग शुगन भये अति नीका
पक्षी बोलैं मधुर ध्वनि का
शब्द उचारे जी 1॥

पवन बेग चले बन अक्काशी
दूर से नजर पड़े कैलाशी
अक्षय वट नीचै अविनाशी
आसन मारे जी 2॥

सुर नर मुनि जन और सुरेशा
बैठे सनकादिक दर्बेशा
नारदादि विधि विष्णु महेशा
बैठे सारे जी 3॥

उठी सभा जुड़े देव समाजा
आया लग्न बजन लगे बाजा
महोरसिंह शिव शरणै आजा
हर भज प्यारे जी 4॥

सोहनी –
आया लग्न शिव ब्याह का बड़े मग्न सुर मुनिजन भये
सूत मागध बंदीजन सबके प्रफुल्लित मन भये

गंधर्व गावैं अप्सरा करैं नृत्य शिव के अंगन में
पुष्पों की वर्षा हो रही बजैं देव दुंदभी गिगन में

ब्रह्मा पुजाते लग्न कूं सावित्री ख़ुशी मना रही
करैं वारफेर शची श्रीलक्ष्मी शारदा मंगल गा रही

शिव नै लग्न शिरोपाव ले सावित्रीजी कूं जा दिया
लौकिक रस्म सब कर रहे गुन महोरसिंह नै गा दिया ॥ शिव. शिव.


दोहा –
विधि नै लग्न मंगाय कर दीन्हा बांच सुनाय ।
बंटै मिठाई लग्न की रही अनहद धुनी छाय ॥


हिम के प्रोहत की होती है जीमनवार ॥ टेक ।

शिव योगी नै नाद बजाकै
आवाहन किया ध्यान लगाकै
अनपूर्णा देवी नै आकै
खोल दिये भंडार 1॥

नाद धुनी त्रिभुवन में छाई
स्वर्ग से काम छोड़ चल आई
भक्ष्य भोज्य और चोख्य मिठाई
एकदम हुई तैयार 2॥

छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन
जीमैं विप्र भये मनरंजन
जन्म जन्म के हुये दुःख भंजन
आ शिव के दरबार 3॥

जीमै विप्र कुबेर जिमाता
पार्वती के भाग सराता
महोर सिंह नित उठ गुण गाता
केवल नाम आधार 4॥

रागमारू –
भोजन पाय विप्र जब आये शिव से अर्ज गुजारी
अब मैं घर अपने जाऊं जो आज्ञा हो ज्या थारी ।

सज धजकर अइयो शिव योगी निरखैंगे नर नारी
खूब सजीले ल्याइयो बराती अधिक सैं अधिक सवारी ।
जितनी हम से बनैगी उतनी कर देंगे खातरदारी
पुत्री रत्न एक श्रीफल देंगे जल का लोटा खारी ।
म्हारे हिमाचल कूं ढक ल्यो श्री भोला भंडारी
दोनूं तरफ के आप हो मालिक महोर सिंह बलिहारी ॥ राम. शिव

दोहा –
विदा करण लगे विप्र कूं बैठा देव समाज ।
लीक चुकावैं लग्न की विधि विष्णु महाराज ॥


अजी एजी शिव नै खोली रत्न पिटारी
भिरड़ ततैया मोह मखी एकदम भरणा उठी सारी ॥ टेक । (सांगीत)
दिखा कै जोरात शिव नै कर दई पिटारी बंद
प्रोहत जी से शिव बोले मुस्काय मंद मंद
इनमें से आप कै कोई वस्तु है के ना पसंद
हाथ जोड़ विप्र बोल्या आय लई लग्न लीक
मैं तो बहोत राजी महाराज आज लगी सीख
फेर लग्न लेकर जाऊं नहीं मांग ल्यूंगा भीख
त्राहिमाम त्रिपुरारी 1॥


दूसरी पिटारी खोली बिच्छू भरा काला पीला
तीजी में गुहेरा भरा बड़ा बड़ा जहरीला
चौथी में हैं जहरी नाग शिवजी का पड़ा कीला
शिव कहै इनमें से कोई सी पिटारी राख
दारिद्र हो दूर तेरे म्हारी भी बंधे है साख्य
विप्र कहै लीक मैं मांगू तो तीन तल्लाख
छिमा करो मधुनारी 2॥


पांचवी पिटारी में जोरात भरी बेअंदाज
हीरा पन्ना मोती और मुरासा नीलम पुखराज
खोलन लगे शिव विप्र डरता दूर गया भाज
धड़क धड़क छाती करै थर-थर कम्पै काया
हाथ जोड़ विप्र कहै नेग जोग भर पाया
देव कहैं लग्न ऊपर आछा रंग बरसाया
धन भोला भंडारी 3॥


धीर धोंप दे के विप्र शिव नै बुलाय लिया
अभय दान दे के द्विज का मान सन्मान किया
अचल संपत्ति दई अंत मुक्तिपद दिया
देवतों के दर्शन से पाप सब हुये दूर
घट पट खुल गये हिरदै ज्ञान भरपूर
शिव शिव रटना लगी प्रेम भक्ति अंकूर
महोर सिंह बलिहारी 4॥

दोहा –
बाघम्बर मृग छाल की जहं तहं हुई बिछात ।
जद सुर नर मुनिजनौं की बैठ गई पंचात ॥


सजे दूल्हा अजब सिंगार बने
शिव की लगी होन निकाशी ॥ टेक । (सांगीत)

हुये अल मस्त शिव पीय कै धतूरा भंग
उबटन लाय सब भस्मी लपेटी अंग
जटा जूट बांध लिया जूट में दर्शै गंग
बाघम्बरी पहर लई गल बीच रुंडमाल
चन्द्रमा त्रिपुंड से शोभायमान शिव भाल
कंगन बाजुबन्ध करण कुंडल बनाये ब्याल जी
ब्यालों ही के हार बने छवि निरखैं सुर पुरवासी 1॥

सर्पों का यज्ञोपवित शिव कै कांधे विराजै
सर्पों ही का सेरा और सर्पों का मुकुट साजै
नन्दीश्वर दहूड़ रहा नाद और नक्कारा बाजै
धुन सुन भूत प्रेत पिशाचों की आई धाड़
कोई नाचै कोई कूदै कोई मारै है चिंघाड़
देव सब कहैं इस ब्याह में होगा बिगाड़
बिगड़न के आकार बने
हिमांचल घर होगी हांसी 2॥

  कोई तो हीनांग और कोई तो अधिक अंग
अँधा लंगड़ा काणा कुबजा लोंजा कोई अंग भंग
रूप है भयंकर शीश किंकर सारे हैं निहंग
शेर शार्दूलमुख कोई व्याघ्र भालमुख
उष्ट्रमुख खरमुख सूकर स्वान स्यालमुख
भैरूं कोतवाल कलवा काल बिकराल मुख
बरात के सरदार बने
बड़ परवारी कैलाशी 3॥

गणपति मनाय चढ़े बैल ऊपर भूतराज
जै जै जै जै जै हुई बाजे देवतौं के रहे बाज
शिव कै पीछै चले निज निज वाहनौं को साज
देवऋषि ब्रह्मऋषि शिवजी कै संग चले
शिव सहचारी भूतप्रेत भी उमंग चले
महोर सिंह गावै अवधूत सरभंग चले
शिवजी के सहचार बने
नो नाथ सिद्ध चौरासी 4॥

सोहनी –
गायत्री सावित्री सरस्वती घोड़ी बनड़ा गा रही
दीवला चोमुख सौरण का थाल श्रीलक्ष्मी हाथ उठा रही ।

इन्द्राणी कजरा सारै शिव कै शारदा सींख बगा रही
देवांगना गावैं बधावे शिव के शुगन मना रही ।

शिव मात बनकर आदिशक्ति दूधिन मुख कै ला रही
महोरसिंह बारात शिव की हिमांचल घर जा रही ॥ राम. शिव. राम. शिव.

दोहा –
सबके मान सन्मान कर चूक लई पंचात ।
निकाशी की सब रस्म कर किया कूच परभात ॥


सज धज चली शिव की बरात हिमपुर जाय रही ॥ टेक ।

शिव शंकर की हुई निकाशी उगमते परभात
सनकादिक बिबुधादिक संग में भूत प्रेत गया साथ
घटा सी छाय रही 1॥

बैल चढ़े बजै नाद नक्कारा डमरू बजाते हाथ
देव दुन्दुभी बजैं गिगन में पुष्पन की बरसात
सवारी आय रही 2॥

कीरत करते जा रहे संग चारण भाट कलात
पार्वती के भाग सराहैं ब्याह्वैंगे भोले नाथ
जोगी के मन भाय रही 3॥

सबके मुख से जय जय निकसै और न दूजी बात
महोर सिंह कहै शिव बरात की जोहै बाट पंचात
टिकटकी लाय रही 4॥

दोहा –
इतने में कानी पड़ी धौंसे की टंकोर ।
महलीं चढ़ देखन लगे मचा शहर में शोर ॥


नरनाह कहैं म्हारी हद में शिव की बरात आ रही ॥ टेक । (कमाली)


बिवाणों से बिवाण अड़ रहे
सब में बराती चढ़ रहे
आगे आगे कूं बढ़ रहे
नभ में घटा सी छा रही 1॥

धौंसा नक्कारा बाजैं
धुन से धरा अम्बर गाजैं
झंडे निशान साजैं
साजौं की धुन मन भा रही 2॥

यहाँ से चली पेशवाई
शिव बरात की अगुवाई
हिम घर लगी बजन बधाई
त्रिया आवैं मंगल गा रही 3॥

खड़े नगर बाहर नरनारी
कबसी आवैंगे त्रिपुरारी
हिमपुरी महोर सिंह सारी
बना देखन कूं लुभा रही 4॥

दोहा –
कहैं विधि विष्णु बरात का एक मत राखो तुंग ।
छंट छंट बेग बनाय ल्यो न्यारे न्यारे ढुंग ॥


हिमाचल राजा लेकर भेंट चल्या ॥ टेक । (जंगम)

सजे धजा पताके निशान फरहर बल्यम चंवर उठाय रहे
आनंद के साज रहे बाज भाट चारण बिरदावली गाय रहे
ले भेंट हिमाचल भूप चले कर जोड़ के शीश झुकाय रहे
पुरवासी कुटम परिवारी समट राजा के पीछे जाय रहे
आगे से पितामह ब्रह्माजी सजे हंस सवारी आय रहे
संग मैथुनी सृष्टि बाल खिल्ली ब्रह्म मंडली लाय रहे
हिम नै विधि का चरण पकड़ लिया मिलणी दे कै मिल्या 1॥


इतने में विष्णु आय गये संग पार्षद गरुड़ सवारी जी
देवौं कूं संग लिए मयूर बाहन पहोंच गये ब्रत्रारी जी
यक्षौं के ढुल सुन्दर स्वरूप आये कुबेर भंडारी जी
आये अग्न पवन और वरुण देव रबि शशि देव देहधारी जी
यम राजा भी इतने में आये दया धर्म सहचारी जी
तुम में है कौनसा शिव बतलाओ पूछ रहे नर नारी जी
थारा नोसा वो है जिसकै माथै चंद्रकला 2॥

इतने में डूडे बैल चढ़े शिव शंकर भी चले आते हैं
संग फूटा नगारा बजता आवै डमरू नाद बजाते हैं
गल रुंड माल शशि भाल ब्याल सिर के ऊपर फुंफाते हैं
और भिरड ततैया मोह की मक्खी चहुँ और भर्णाते हैं
संग बिकट रूप बिकराल भयंकर भूतप्रेत चिल्लाते हैं
बाघम्बर भस्म खप्पर त्रिशूल लख पुरवासी भय खाते हैं
डर भागे नरनार कहन लगे आ गई बुरी बला 3॥

बालक डरते हुये रोते कंपते भागे घरों में जाय बड़े
सुबकिन पर सुबकी लेय रहे और होश हवास सबके बिगड़े
पूछैं माँ बाप तुम किन मारे नहीं बोलते हैं मोधे मुंह पड़े
और तरुण युवा सब भाग चले बड़ गये घरों में कपाट जड़े
शिव पार्वती के विवाह कूं बिरला देखैगा कर्म अड़े
कोई धैर्यवान और विचारशाली हुईं के हुईं रह गये खड़े
महोर सिंह कहैं शिव संबंध की नारद दई थी सला 4॥ राम. राम. राम.

दोहा –
जनवासै बैठा दई आदर सहित बरात ।
हेमपुरी में जहं तहं होय रही पंचात ॥


दे बरात को जनवास भूप राणी के पास आया ॥ टेक ।

भूप कहै मेरी चंद्ररेख का
बर ने ज्या है जोगी भेष का
राणी उस बिधिना के लेख का
पार नहीं पाया 1॥

पार्वती रह रहकर बरती
शिव की उग्र तपस्या करती
इस बर के लिए भूखी मरती
सुका दई काया 2॥

  विकट भेष आये कैलाशी
ताली बज रही हो रही हांसी
नगरी में छा रही उदासी
ये क्या फिरी माया 3॥

बोल सलाह अब है क्या तेरी
अकल काम देती ना मेरी
महोर सिंह कहै यही अंधेरी
शिव कै दोष लाया 4॥

दोहा –
हाथ जोड़ राणी कहै सुन मेरे सिरताज ।
हूणी तो बनी हूण को अणहूणी हो आज ॥


जोगीड़ा को मैं तो नहीं पुत्री परणाउंगी
ब्याह की कहैगा कोई तो सौ गाली सुनाउंगी ॥ टेक ।

जोग्यां जोग बर ढूंढ और कहीं ब्याहूंगी
उस नारदिया का मुख देखूं ना अपना दिखाउंगी 1॥

सप्तऋषि कोडी हैं कहती ना शर्माउंगी
उनके कहे क्या मैं पास छला कै बैठाउंगी 2॥

लगनिये ब्राह्मण को देख अभी मैं बुलाऊंगी
उन भी शिव बडीरा उसकै धक्के मैं लगाउंगी 3॥

जुल्म किया तो कुवै जोहड़ मैं पड़ ज्याउंगी
पार्वती को संग लेकर डूब मर ज्याउंगी 4॥

महोर सिंह कहै किये कोल को मैं निभाउंगी
पार ना पड़ी तो बिखा पीहर में बलाउंगी 5॥

दोहा –
सप्तऋषि नारद मुनी इतने में गये आय ।
रोष भरी राणी कहै बोली बचन सुनाय ॥


नारद तेरा जाइयो नाश म्हारै साथ बुरी तैं करी ॥ टेक ।

देवों में देव बताया शिव तैं घरों में घर कैलाश
बूढ़ा जोगी राख रमाईं ल्याय बठाया जनवास
नाग लिपटाये जहरी 1॥

बैठा डमरू नाद बजावै कैसे हो बरदास
पार्वती ना जगह ल्हुकण को बीच धरती अक्काश
जन्मतीये क्यूँ नांह मरी 2॥

सप्तऋषि मठ मार गये देकर झूठा बिश्वास
आज मेरा जलती बलती का पड़ियो इन पर सांस
सातों ने झूठी साख्य भरी 3॥

पार्वती मेरी प्राणप्रिय बैठैगी धूणा पास
महोर सिंह राजा राणी को होय रही महात्रास
जोगी चाहै मेहेरे फिरी 4॥

दोहा –
माता के सुनकर वचन उमा हुई दलगीर ।
कहै मात नहीं मिट सकै विधि की लिखी लकीर ॥

जन्म दाता माता री
सोच मत नाहीं करै ॥ टेक ।

माता तूं रही भूल भरम में
भ्रम से दुःख हो रहा मरम में
भली बुरी जो मेरे करम में
लिखी विधाता री
वो सब भोग्यां ही सरै 1॥

क्यों ऋषियों को बुरा बतावै
क्यों तूं शिव कै दोष लगावै
कर्मों से पत्नी पति पावै
कर्म से नाता री
कर्म से जन्मै मरै 2॥

माता जन्म दे कर्म ना देती
गहन कर्म गति श्रुति कहैं नेती
जिस बर के लिए जन्म जो लेती
वो ही परणाता री
दूसरा कैसे बरै 3॥

महोर सिंह विद्या बुद्धि बल
कर्म आगै सब हो ज्या निष्फल
जिस प्राणी का जहाँ का अंजल
हुईं ले ज्याता री
हूणी टारी ना टरै 4॥

ख्याल –
पार्वती को धन्यवाद दे नारदजी बोले बानी
क्यों तूं राजा बैठा फिकर में क्यों तूं रोष भरी रानी ।

ये पार्वती जगदम्बा है रह्या पुत्री समझ तेरी नादानी
अनादि शक्ति अजन्मा इसके जन्म नहीं हमसे छानी ।

जन्मों जन्म से इसको पर्णता आया है शंकर ध्यानी
ये आदिशक्ति वो पूर्णब्रह्म ज्ञाता कोई ज्ञानी विज्ञानी ।

माया ब्रह्म का अनादि जोड़ा वेद वचन हैं परमानी
महोर सिंह कुछ सोच समझ अंकुर नहीं मिटते ब्रह्मानी ॥


बता नृप सुर मुनि किस किसकी चढैं हैं बरात ॥ टेक । (जंगम)

सुन विष्णु नाभि से कमल कमल से ब्रह्मा की पैदास हुई
ब्रह्मा के अंग अंगों से अमैथुनी सृष्टि परकाश हुई
विधि के अंगुष्ट से दक्ष प्रजापति उतपत भये निकाश हुई
उस दक्ष कै पुत्री साठ हुई साठों में सती गुणरास हुई
वा सती महादेव को ब्याही नृप नै ख़ुशी के साथ 1॥

किसी एक समय देवों की सभा डटी राजा दक्ष पधारे जी
स्वागत किया दक्ष प्रजापति का शिव बिना देव उठा सारा जी
बड़ा कटुक बचन कह्या दक्ष नै शिव कूं तन मन से दुदकारा जी
उस दिन पीछै ना सती बुलाई बैर बंध्या बड़ा भारा जी
प्राण पियारी पुत्री सती को बिसर गये पिता मात 2॥

फेर किसी समय में राजा दक्ष नै विश्वजीत यज्ञ रचाई जी
सुर नर मुनि गोती नाती कुटम्बी भुवा बहन बुलाई जी
सती बिन बुलाई भी चली गई किसी नै नांह बठाई जी
और किसी जगह शिव जी के नाम आहूति ना पाई जी
योग अग्न से सती नै अपना भस्म बना दिया गात 3॥

  अब वाहे सती राजन घर तेरै जन्म गई बन पार्वती
तूं राजी चाहे बेराजी रह पर ब्याहैंगे कैलाशपती
या कोट जन्म से शिव की मांग है क्या तेरी हो रही मूढ़मति
इस ही के सिरों की रुंडमाल कितने हैं रुंड जा कर गिनती
महोर सिंह शिव अलख अजन्मा समझ ले इतनी बात 4॥

दोहा –
नारद के सुनकर वचन भरम हुया सब दूर ।
ऋषि गये जनवास में बाजन लागे तूर ॥


बाजन लगे तूर दमामा ढोल जी
पुरवासी धुन सुन उठे जय बोल जी ।

रोष रंज हुये दूर मेहेर शिव की फिरी
इन्द्रपुरी की समान सजा है हिमरी ।

सज-सजकर नरनार हेम घर आ रहे
बारोठी की त्यारी सभी करवा रहे ।

लेन चले हैं बरात बड़ी धूम धाम से
सबके प्रफुल्लित अंग उमंग शिव नाम से ।

पंडित सौरण थाल सामग्री साज कै
महोर सिंह सब चले हैं गणेश बिराज कै ॥

दोहा –
पंचाती हिम भूप की पहोंच गई जनवास ।
जहाँ देव हुईं स्वर्ग है शंभू जाहाँ कैलाश ॥


पी-पी आक धतूरा भंग भंगड़ होय रहा मतवाला ॥ टेक ।

नन्दीश्वर घोटा ला रहा
श्रृंगी भृंगी गण छनवा रहा
तुंडी भर भर प्याला प्या रहा
शिव योगी है पीने वाला 1॥

सिंगार करै शिव लहरी
भस्मा रमा बाघम्बरी पहरी
अंग अंग लिपटाये जहरी
गल में पहर लई रुंडमाला 2॥

खप्पर त्रिशूल कर ठाये
सज धज कर दुल्हा जी आये
देवों नै आगै बैठाये
बैठा बिछाय कै मृगछाला 3॥

यहाँ बैठे डटे बराती
उधर से आई समट पंचाती
महोर सिंह छवि बरनी नहीं जाती
सोहै नीलकंठ शशि भाला 4॥

दोहा –
सब देवों को नमन कर बैठ गई पंचात ।
कलश गणेश पुजाय कर विधि से लई बरात ॥


कहन लगी पंचात तिलक करो दूल्हा कै ॥ टेक ।

पंडित जी से करैं ठिठोली बांधो रक्षा लेकर मौली माथै तिलक चढावो रोली
करकै लंबा हाथ चावल धरो दूल्हा कै 1॥

पंडित कहै करूं नहीं टीका पहोंची तिलक हैं प्रोहत जी का प्रोहत कहै नहीं काम इसी का
नई करन लगे बात डर डरो दूल्हा कै 2॥

बोले पंच हेम नृप कुल के करो काम दोनूं मिलजुल के मांगो नेग खूब दिल खुल के
उठा कै रस्म परात झोली भरो दूल्हा कै 3॥

उठा उमंग कर टाटी सेवा जो ले गया था ब्याह का टेवा किया तिलक जय जय महादेवा
महोर सिंह अज्ञात चरण परो दूल्हा कै 4॥

झूलना -
शिव हुये बारोठी को त्यार
होकर डूंडे बैल सवार
शिवगण सुर मुनि लारै लार
चले दूल्हा की ख़ुशी मना रहे ॥

छत्र चंवर ढुलैं घुरैं निशान
नभ में जा रहे देव विमान
बाजे बज रहे बेपरमान
अप्सरा नाचैं गंधर्ब गा रहे ॥

विधि विष्णु और इन्द्र कुबेर
मोती माणक करैं बखेर
गलियौं में कंचन के ढेर
करते शिव के संगी जा रहे ॥

द्वारे बिछ रही चन्दन चौकी
कामन खड़ी द्वार कूं रोकीं
महोरसिंह मिल्लत है दिन दो की
मिल ले बिछड़न के दिन आ रहे ॥

दोहा –
दुलहा उतरे बैल से चौकी पर चढ़े जाय ।
वार वार माणक बनी बना पै रही बगाय ॥

चटकीलै नोसै तोरण आ चटकाई ॥ टेक ।

चन्दन चौकी खड़े बना जी कोटि मदन छवि छाई
जिस जिसकी जैसी थी मंशा वैसे देत दिखाई 1॥

फिरै गवरज्या फूली फूली धन्य-धन्य बेह्माई
लाखों बरस के बिछड़े पति की फिर भी जोड़ी मिलाई 2॥

सौरण थाल चौमुखा दिवला ले सास बींद की आई
शिव सालह नणदोई गावैं पीतस सास जमाई 3॥

मैना राणी करै आरता बांटै उमंग बधाई
वार-वार पानी पीवै है महोर सिंह छवि गाई 4॥

दोहा –
कामनगारी कामनी मंद मंद मुस्काय ।
कभी तो गावैं सीठने कभी कामण रही गाय ॥


बनाजी बिन माँ बापन के जाम ॥ टेक । (सीठना)

कौन बनी कूं देगी बैठनायो सास नणद का काम 1॥
किस कै दुलहन पैयां पड़ैगी ना अगड पड़ोसण बाम 2॥
मुंह दिखाई कंगना खुलाई बिगड़ैंगी रस्म तमाम 3॥
आक धतूरा भंग पी पी धरवा लिया भंगड़ नाम 4॥
सर्पों के सिंगार बनाये लाग्या नहीं छदाम 5॥
गल रुंडमाल हाथ में खप्पर भस्म लपेटी चाम 6॥
सज धज आये खूब बना जी सास ससुर कै धाम 7॥
महोर सिंह गावैं कामन मंगल बज रहे ढोल दमाम 8॥

दोहा –
सेहरा माल बाघंबर पै जादू टोना डार ।
कामण गा गा मात हम लेंगी अभी उतार ॥


शिव में कामण रही घाल
कामण गारी कामनी ॥ टेक । (मल्लार)

पढ़-पढ़ राई उड़द बगाया
जादू शिव सेरा पै आया
ओटा शिव नै फेरी माया
रत्नारे भये ब्याल
चकित भई सारी कामनी 1॥

शिव कै गल रुंडन की माला
दूजा जादू उस पर चाला
निरख रही हिमपुर की बाला
भई बैजंती माल
दें बलिहारी कामनी 2॥

  तीजा जादू बाघम्बर पै छोड़ा
आते ही बना जरकसी जोड़ा
तीनों जादू कर इकठोड़ा
खप्पर में लिया घाल
भगी उमा प्यारी कामनी 3॥

शिव नै अपणा जादू छोड़ कै
सन्मुख खड़ी करी उल्टी मोड़ कै
महोर सिंह कर जोड़-जोड़ कै
कहैं धन्य शंभू दयाल
दासी ये थारी कामनी 4॥

दोहा –
नारद बीन बजा रहे दुलहा कै खड़े पास ।
मधुर धुनि गावन लगे सुनै सकल रणवास ॥


कामनगारी कामनियाँ कामन खूब गाया री ॥ टेक । (दादरा)

जादू तुम्हारा ऐसा जैसा चक्र इन्द्र का
थारे जादू नै काला मुख बनाया चंद्र का
थारे जादू के फंदे में मैं भी आया री 1॥

चिड़िया बना कै तुमको अब ही उड़ाय दें
पथरी बना कै मूर्ति घर दर छुड़ाय दें
तुम नै योगी पै जादू कहो क्यों चलाया री 2॥

दुल्हा की ओड़ देखो जगा जोत रही लाग
बाघम्बर रुंडमाल काहां गये काले नाग
शिव योगी की तुमनै लखी ना माया री 3॥

महोर सिंह गावै गुण शिव के हमेश
मेरी क्या असल है गा गा हार लिया शेष
महिमा अगम अपार पार नहीं पाया री 4॥

सोहनी –
3 गाना बजाना भूल गई शिव को निरख धापैं नहीं
पाषाणी मूर्त सी बनी छवि लख पलक झापैं नहीं ।

घूंघट के पट दिये खोल संग ही घटपट भी खुल गये
कर दर्श चरण पर्श किरोड़ों जन्म के अघ धुल गये ।

आई थी कामन घालणे उल्टा कामण घलवा लिया
महोरसिंह तनमय होकै तन मन वारैं परचा पा लिया ॥

दोहा –
टोणा टामण भूल गई जादूगारी नार ।
कर जोड़ैं विनती करैं अद्भुत रूप निहार ॥

हम तो म्हारा नवल बना की छवि निरखन को आई हो राज ॥

अलख अगोचर अंतर्यामी
अंड पिण्ड ब्रह्मंड के स्वामी
भक्त वत्सल भोला भंडारी
मदनारी त्रिपुरारि हमारी
तौरण आ चटकाई हो राज 1॥

कैलाशी काशी के वासी
आगम निगम अगम अविनाशी
जटा भस्म बाघम्बर धारी
भूत प्रेत सहचारी थारी
माया लखी ना जाई हो राज 2॥

नीलकंठ शोभित शशिभाला
सर्प सिंगार हार रुंडमाला
पल में निज माया विस्तारी
शोभा भई रतनारी सारी
नारी देख लुभाई हो राज 3॥

कोटि जन्म की ये सब दासी
थारे दर्शन की थी प्यासी
आज प्यास सब मिट गई म्हारी
महोर सिंह बलिहारी गा री
गा गा मुक्ति पाई हो राज 4॥

दोहा –
शिव की बारोठी हुई किये सब नेगाचार ।
बना पधारे अंगन में मंगल गावैं नार ॥


हिम घर साजन आये री
साजनियाँ री भगत करो ॥ टेक ।

ब्रह्मा भी आये विष्णु भी आये
इन्द्र कुबेर वरुण यम ध्याये
अग्न पवन रवि शशि शिव साथी
नारदादि सनकादि बराती
संग में ल्याये री उठो सब पैयां परो 1॥

धन धन रे उमा भाग बडेरी
धन्य पिता धन माता तेरी
तैं कोई उग्र तपस्या कीन्ही
या सर्ब संपै दान कर दीन्ही
शिव बर पाये री ख़ुशी हो हो कै बरो 2॥

जल्दी उठो सइयो चरण पखालो
देहधारी का आज फल पा लो
अचल सुहाग रहो दुल्हन के
बिन तप यज्ञ दान देवन के
दर्श कराये री जय जय बोलो चाव भरो 3॥

अब उमा शिव की पड़ैगी भांवर
तन मन धन कर दो नोछावर
देव समाज खड़ा शिव अंग नै
बुद्धि हीन मूर्ख महोर सिंह नै
दीन होय द्विज
शिव गुण गाये री शिव का ध्यान धरो 4॥

अरिल –
मंढप है चित्र विचित्र जहं तहं हीरे पन्ने चमकते
बिद्रुम के खंभ खंभों में जड़ित मुरासे मणि गण दमकते ।

रतनारी तन रही चांदनी जरकस चंदोवा भी तना
फरहर निशान ध्वजा पताका चढ़ रह्या हैं अति घना ।

सुबरण रजत बिद्रुममई कलशों का कुछ सुम्मार ना
मणिमाल बंदरवाल तोरण झालरों का बारना ।

विश्वकर्मा नै मंडप रच्या छवि कौन कवि बर्णन करै
महोरसिंह शिव का प्रेमी टूटे फूटे नित काफिये भरै ॥ शिव. राम

दोहा –
ब्रह्मा नै वेदी रची मोतियन चोक पुराय ।
चन्दन चोकी बना जी बैठ गये हैं आय ॥


श्री जगदम्बा जी मंडप नीचै आई ॥ टेक ।

सखी सुहेली संग आ रही गांवती सुहाग बधाई
छत्र चंवर पंखे हाथों में चोकी पै ल्याय बैठाई 1॥

स्वस्तिवाचन पढैं ऋषिमुनि वेदमन्त्र धुनि छाई
देव पितर ऋषियों की पूजा विधि नै विधि से कराई 2॥
शिव पूजन कर कहै हिमांचल धन्य धन्य बेहमाई
शिव-पार्वती की जगजननी तैनैई जोड़ी मिलाई 3॥

गंठजोड़ा कर रहे पितामह ग्रंथी सात लगाईं
महोर सिंह कहै हथलेवा की कामनियें समै पाई 4॥ शिव.राम.शिव.

दोहा –
मंगल गावैं कामनी बाजे बजैं अपार ।
वेद मन्त्र धुनि हो रही उठ रही गुंजार ॥


मंगल गा रही जी
हिल मिल भाग सुहागन नारी ॥ टेक ।

कभी गीत चौंरी के गावैं कभी गावैं हथलेवा
कभी मोड़ी गठजोड़ा गावैं भाग सुहाग का देवा
ख़ुशी मना रही जी श्री गौरां जी की महतारी 1॥

एक बंधन कंगना डोरी का दूजा बंधन गठजोड़ा
तीजा बंधन हथलेवा का बांध किया इकठोड़ा
शिक्षा ला रही जी पार्वती कै गावन हारी 2॥

पति कै पत्नी बाँधी जाती बंधन हो गये तीन
तन-मन वचन के बंधन को नहीं तोड़ैं चतुर परवीन
वै पर्ण निभा रही जी हरदम रहैं पति की प्यारी 3॥

प्रोहत शाखा ले रहे परवर गोत्र बखान
महोर सिंह अब होयगा बिधि से कन्यादान
समै अब आ रही जी दान को ओटेंगे त्रिपुरारी 4॥

शाखाचार –
आदि शक्ति कूं सुमर कै सुमरां उमा महेश जिनके सुमरे ऊपजै हिरदै ज्ञान विशेष ।
पूर्णब्रह्म परमात्मा निर्विकार निराकार पांच तत्व गुण तीन से रचन लग्या संसार ।
सृष्टि आदि सबसे प्रथम रचे विष्णु भगवान विष्णु नाभि चक्र से कमल प्रगट हुया आन ।
कमल फूल से हुई है ब्रह्मा की पैदास विधि भृकुटी से शिव हुया बसा लिया कैलाश ।
तप बल पुन्य प्रताप से हेमांचल के धाम अजन्मा जन्मी आय कै पार्वती धरा नाम ।
पार्वती को दे गये नारद जी उपदेश करन लगी बड़ा उग्र तप शिव शिव रटत हमेश ।
सप्तऋषि हिमपुर गये ल्याये लग्न लिखाय भूत प्रेत सुर नर मुनि चले बरात सजाय ।
शिव शंकर चौंरी चढे जटा भस्म रुंडमाल यो बानक मेरै मन बस्यो नीलकंठ शशिभाल ।
ब्रह्मा कर्म करा रहे विवाह के विधि विधान प्रोहतजी शाखा पढैं पीढ़ी गोत्र बखान ।
गंगा जमना निर्मला ध्रुव धरती असमान या जोड़ी तब तक रहो जबतक शशि और भान ।
जिन यो मंडप छिवाइयो जीवो वर्ष किरोड़ शिव ब्याह की शाखा कथै महोर सिंह द्विज गौड़ ॥

दोहा –
शाखा सम्पूर्ण हुई हथलेवा दिया खोल ।
हवन करैं सनकादि मुनि मन्त्र बेद के बोल ॥


भूप हिमांचल कै घर हो रहे कन्यादान ॥ टेक ।

बैठा सर्वस्व का दानी
बामै अंग बैठा लई रानी
करै गठजोड़ा विधि विज्ञानी
आशिष मन्त्र बखान 1॥

उमा अंगुष्ट पकड़ हेमांचल
संग लिये दुर्बाक्षत गंगाजल
संकल्प हो रहा गावैं मंगल
कामन चितर सुजान 2॥

संकलप कर शिव को दीन्हा
अंगुष्ट ग्रहण शिव कर लीन्हा
फिर दान प्रतिष्टित कीन्हा
गौ दई बेपरमान 3॥

दिये गज बाजी रथ दासी
मणि माणक दें पुरवासी
संकलप ओटैं कैलाशी
महोर सिंह हिम घर आन 4॥

रागमारू –
विधि नै विधि से शिव पार्वती का फेरा करवाया जी
हवन कुंड की दे प्रकम्मा पटौं पर बैठाया जी

सप्तपदी लगे करन पितामह मंडल सा तनवाया जी
शिव कै बामै अंग भवानी आवो अवसर पाया जी ॥

दोहा –
कहै उमा सुनो पितामह सदा रहूं शिव संग ।
सात वचन मोहे और दें तो आऊँ बामै अंग ॥


विधि विष्णु वचन भरवाते हैं
शिव शंकर पार्वती के ॥ टेक । (सांगीत)

बामै अंग आओ उमा कहन लगे पितामहै
विधि का कहन सुन गिरिजा वचन कहै
बामै अंग जब आऊँ एक पत्निब्रती रहै जी
सखियों में बैठी का सदा शिव सन्मान करै
मेरी सम्मति से यज्ञ उद्यापन दान करै
चोरी जारी जुवा मदिरा मांस की आन करै
जन्म भ्रष्ट हो जाते हैं
बिगड़ैं संस्कार पती के 1॥

मेरी सम्मति से पशुओं कि खरीदारी करै
तन मन धन सेती पालना हमारी करै
इतने वचन जो मंजूर त्रिपुरारी करै
बामै अंग आऊँ भोलानाथ के चरण गहूं
तन मन वारूं पतिव्रत का परण गहूं
चर्ण सेवा करूं अविनाशी की शरण गहूं
धर्म बंधन में आते हैं
शिव सुनकर वचन सती के 2॥

शिव के वचन कुल का सनातन धर्म धारण करै
क्रोध और कलह आलस्य का निवारण करै
सत्य और मिष्ट प्रिय वचन उच्चारण करै
मेरी अज्ञा बिना कभी पिता के ना घर जाय
सास और ससुर की सेवा करै मन चित लाय
पतिव्रत धर्म को धारै तो बामै अंग आय
आदर से बैठाते हैं
स्वीकृत किये वचन जती के 3॥

शिवजी नै उमा के वचन किये अंगीकार
शिवरंजी नै शिव के वचन लिये शीश धार
विधि बीच साखी वचन भरवाते बारम्बार
जिस घड़ी शिवजी कै बामै अंग शिवा आई
आरता अभिषेक किया बाजन लगी बधाई
ब्याह बेदी पूरी भई महोर सिंह छवि गाई
हरदम शिव गुण गाते हैं
कथ कथ अनुसार मती के 4॥

सोहनी –
4 पहले दिवस भांवर पड़ी हुई दूजै दिवस बढार जी
कंगना खुलै मंदरी का खेल खिलावैं बैठी नार जी
कंवर कलेवा काज भर भर ल्यावैं थाल मिठाइयाँ
जीमैं हैं शिव के संग जहं शनकादि च्यारों भाईयाँ
शिवशोभा निरख निरख कै पुरवासी प्रफुल्लित मन भये
सबके चुकाकर नेग शिव सहचारी जनवासै गये
ऋषियों का आमंत्रण हुया उसी दिवस सायंकाल में
महोर सिंह नै बरणी बढार गा सोहनी की चाल में ॥

दोहा –
नेगाचार करते रहे दिवस बीत भई रात ।
बने पदार्थ अमीरस जीमण चली बरात ॥

दोहा –
जरिकस पायता बिछ रहा सुर नर मुनि समाज ।
बैठे पंगत ला रहे चौकी बना बिराज ॥

एकदम उठे जिमावनहार
होने लगी परोसागारी ॥ टेक । (सांगीत)

कनक रजतमई प्रथम बिराजे थाल
कर मंडल गिलास बेले बेलियों की लगी माल
छप्पन और छत्तीस भोग व्यंजनों की आई झाल
मोदक फेनी बल्लिका इमरती घेवर बालुस्याही
हेमकंद कलाकंद गुजिया पेठा की मिठाई
बर्फी पेडा नुक्तिदाना सोहन हलवा की सफाई
पाक बने पंचधार
गत है न्यारी न्यारी 1॥

सूत मगद खजला खुरमा मेवापाक मोतीचूर
गुलगचा रसगुल्ला गुलाब जामण रस भरपूर
मेवा खिचड़ी लापी करमर्दन बना जरूर
हव्य बनी कव्य बनी बने पूय संयाव
खुरचन मलाई रबड़ी दूध कै लगैं हैं ताव
जितनी मिठाई आई सबपै वर्कों का चढ़ाव
परसत उठै महंकार
तरताजी रसीली सारी 2॥

मठडी समोसे दाल भुजिया मसालेदार
लुचई कचोरी पूरी साग भाजी बेसुम्मार
रायता बड़े पकौड़े पापड़ चटनी अचार
बाटी कर पटिका परोसे दाल बूरा भात
सुरभी सर्पी दधि और कढ़ी भी परोसी साथ
गंगाजल नीर हिमराजा खड़ा जोड़े हाथ
हुये जीमन को त्यार
पत्तल बाँधन लगी नारी 3॥

चरखा शरीर पंच पैंखड़ी हैं पांच तत्व
नो तार माल नवगुण का है जिसमें महत्त्व
कामनी बेहमाई तार स्वास का है जा में सत्व
पाग कर्मों की जा कूं बाँधन हारा जीव जान
कर्मबंधन सेती बंधे धरती और आसमान
कर्मों से बंधे बराती संग बंधे पकवान
महोर सिंह संसार का
कर्मबंधन बड़ा भारी 4॥

सोहनी – (नारदजी)
तुम्हारे बंधन में बंध रहे विधि विष्णु और त्रिपुरारि जी
श्रृंगी ऋषि से बंध गये बंध गयी थी नाड़ हमारी जी ।

अचरज क्या भोजन बांध दिया दुनिया बंधी पड़ी सारी जी
माया मोह के बंधन में बंधे हुये हैं सब संसारी जी ।

कहने से कुछ बंधता नहीं कहने से कुछ छूटै नहीं
बिन कर्म उपासना ज्ञान के बंधन कभी टूटै नहीं ।

तमीं गा कै पत्तल बांध दई हम गा बजा कै खोलैंगे
जैसे तुम्हारे बोल हैं ऐसे तो हम नहीं बोलैंगे ॥

पत्तल –
मधुर धुनि सुन मुनिजी नारद बीन बजाय
बंधन काटन को लगे पत्तल रहे छुटाय 1॥

पुरुष सदा निर्बंध हैं त्रिया बंधन मांह्य
बिना पतिव्रत धर्म के पुरुष बंधन के नांह्य 2॥

हमको क्या तुम बांधती बंधी पड़ी हो आप
बाल अवस्था में थारे बंधन थे माँ बाप 3॥

तरुण अवस्था में बंधी रही पति के संग
वस्त्र आभूषण से थारे बांध जूड़ दिये अंग 4॥

पुत्रों के बंधन बंधी बिरधापन में आय
उंवर गंवा दई बंध में बंधन काटे नांय 5॥

सास ससुर और पति की सेवा करो हमेश
जिससे बंधन कटै ये पत्तल नहीं उपदेश 6॥

तज कुसंग सत्संग करो लाज शर्म कुलकाण
इस बंधन में बंधो हो ज्यागा कल्याण 7॥

छूटे बराती पायता पत्तल और पकवान
महोर सिंह वै ना बंधे जिनको आत्मज्ञान 8॥

दोहा –
नारद के सुनकर वचन मग्न हुई पंचात ।
गस्सम् गस्सा हो लिये जीमण लगी बरात ॥


अरिल –
आया तीजा दिवस विदा का हुई पहरावनी
हों सबके मान सन्मान सजन मनभावनी

सुर नर मुनियों को देत भूप सिरोपांव जी
समध मिलावा करत हिमाचल राव जी

शिवजी के हाथ तणी मंडप की खुला दई
कुंडल कंकण हार अंगूठी पहरा दई

वाहन दिये हैं सजा रत्नारे साज से
महोर सिंह नृप बिनय है देव समाज से ॥

दोहा –
श्रीफल अर्पण कर दिया प्याया खारी नीर ।
शिव बर पाये सुता का मिल्या समद्रीं सीर ॥


श्री पार्वती को शिक्षा दे महतारी ॥ टेक ।

महलमणि मेरी गोद की शोभा थी कुल की उजियारी
अब तूं पुत्री हुई पराई मानिये सीख हमारी 1॥

सास ससुर की सेवा करिये ननद की रहिये प्यारी
पति को परमात्मा समझकर करिये ताबेदारी 2॥

अगड पड़ोसन द्योर जिठानी कूवे की पनिहारी
सबसे नयकर चलिये पुत्री हल्की बनै ना बनै भारी 3॥

सबकी काण शर्म रखिये जितने हों मर्द परवारी
घर की बात बाहर मत कहिये पूछ उड़ावैं नारी 4॥

टुकड़ा पानी खाइये बाँट कोई आ ज्या भूखा भिखारी इतने काम करने से पुत्री साख्य बंधैगी थारी 5॥ शिक्षा देकर माता नै हिये ला पुत्री पुचकारी
महोर सिंह कहै शैलसुता कै नैनी नीर हुया जारी 6॥

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