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उषा अनिरुद्ध बाणासुर

ख्याल –
सतयुग में हिरणाकुश कै प्रह्लाद भक्त हुये विज्ञानी
प्रह्लाद कै वैरोचन, वैरोचन कै बल हुये महादानी ।

बल कै बाणासुर, बाणासुर कै शिवभक्ति मनभानी
दो सहस्र भुजबल का घमंडी शंकर से बोल्या बानी ।

मेरी भुजाओं की खाज मेट दे तीन लोक के दरम्यानी
देव दनुज सुर सिद्ध नाग कोई जन्मा नहीं ऐसा प्रानी ।

जब मेरै झाल उठै बल की जा पहाड़ों में शंकर ध्यानी
मार-मार भुज करूँ महोर सिंह पहाड़ों की घूमा घानी ॥

शिव नै एक ध्वजा दई थी बाणासुर का गर्व प्रहारणी ॥ टेक ।

जा इसको ड्योढ़ी में टांकना
गिर ना जाये निगाह राखना
घमंड के भी रस को चाखना
भूलकै नहीं उतारणी 1॥

जब ये ध्वजा टूटकै गिर ज्या
उस दिन आ तेरा गढ़ घिर ज्या
अरि सेना गलियों में फिर ज्या
कुटुंभ तेरा संहारणी 2॥
तेरा शत्रु तेरै घर आ जा
तेरी भुजाओं की खाज मिटा जा
भावी प्रबल बजा रही बाजा
सब के कारज सारणी 3॥

लेकर ध्वजा गया भूपाला
टांक दई बैठा रखवाला
महोर सिंह भज नाम निराला
ज़िंदगी चाहिये सुधारणी 4॥

दोहा –
राजकाज में लग रह्या, बिसर गया भूपाल ।
दरवाजै ध्वजा फरकती, बहु बदीत हुया काल ॥


उस बाणासुर कै थी एक बेटी ऊषा नाम कहाई
मंत्री सुता चित्रलेखा दोनों रहैं एक महल माईं ॥ टेक ।

दोनों की थी युवा अवस्था पर थी वै दोनों क्वांरी
घर बर ना जोगांजोग मिलै थी माँ बापों की प्यारी
गुणवंती रूपवती महलों से ना निकसै शर्म की मारी
पति को चाहती है मंत्री सुता और उषा राजदुलारी
अष्ट पहर पति चितवन में रहै कब हो मन की चाई 1॥

एक दिन पलंग पै सूती हुई उषा को सुपना आया
चित चोर अनूप रूप युवक एक सुपने में दरसाया
पति पत्नी का बर्ताव भाव भरा मन बढ़ा तन लहराया
सुपने में समागम हुया पति का हो गया मन का चाया
इतने में खुल गये नैन चिमक उठी घालण लगी दुहाई 2॥

चित्रलेखा भी जाग उठी ऊषा की ओड़ निहारै
सभ बिगड़े होश हवाश पलंग पर बैठी हुम्मर मारै
कगत पति मैं कगत पति मैं बर बर यही वचन उचारै
मैं ब्याही रही ना रही क्वांरी नैनों से आंसू डारै
मेरे मनमेली नै सुहेली सुपनगत होकै सुरत छिपाई 3॥

जिस पुरुष से समागम हुया सुपन में उसी को ढूंढ वरूंगी
जो नहीं मिल्या तो इसी महल में विष खा प्राण हरूंगी
चाहे देव दनुज सुर सिद्ध भी हो ना किसी पै सुरत धरूंगी
जो सुपन में बन गया पति मेरा मैं उसी की टहल करूंगी
उषा ना समझै महोर सिंह चित्रलेखा नै समझाई 4॥

लगी उषा कहन, चित्रलेखा बहन
मेरे मन की रहन, तनै जानी नहीं ॥ टेक ।


स्वपन में पति मिल गया मनमेली
हुया जो समागम कर गया केली
जाग्रत मैं वोही बरूंगी सहेली
भूल करूंगी नादानी नहीं 1॥

स्वपन सुसप्ति चाहे जाग्रति हो
जो पति बन गया वही जो पति हो
अंत समय पति संग सती हो
क्या जाऊंगी बैठ विमान नहीं 2॥

जो त्रिया एक पति को धारै
पति को ही ईश्वर रूप निहारै
कुली इक्कीश वा पार उतारै
क्या वेदों नै साख्य बखानी नहीं 3॥

मैं नहीं और को पति बनाऊं
परणू तो उस ही को परनाऊं
महोर सिंह नित उठ गुण गाउं
अब मैं बिगाड़ूं जिंदगानी नही 4॥

मेरी बहना री तू जाईये
लाईये चित चोर नै ॥ टेक ।


स्वपन में पति मिल गया मनमेली
हुया जो समागम कर गया केली
जाग्रत मैं वोही बरूंगी सहेली
नहेली तू भरम हटाईये
मिटाईए दिल के जोर नै 1॥

स्वपन सुसप्ति चाहे जाग्रति हो
जो पति बन गया वही जो पति हो
अंत समय पति संग सती हो
बहना हे गति करवाईये
दिखाईए उस दौर नै 2॥

जो त्रिया एक पति को धारै
पति को ही ईश्वर रूप निहारै
कुली इक्कीश वा पार उतारै
प्यारे से प्रेम बढवाईये
चढवाईये चाप पै डोर नै 3॥

मैं नहीं और को पति बनाऊं
परणू तो उस ही को परनाऊं
महोर सिंह नित उठ गुण गाउं
समझाऊं सूं भरम नसाईये
पहुंचाईये सही ठोर नै 4॥

दोहा –
चित्रलेखा कहने लगी , बहन तूं धीरज धार ।
त्रिलोकी का फोटू तेरै , आगै धरूं उतार ॥


जब फोटू लगी उतारने
चित्रलेखा जादूगारी ॥ टेक ।

सुमर कमख्या शारदा मांई
देवों की तस्वीर बनाई
उषा नै जब नाड़ हिलाई
लगी पाताल निहारने
नागों पै सुरती धारी 1॥

चित्रलेखा नै करकै फुरती
खैंच लई नागों की सुरती
आगै धरी बनाकै मूर्ति
उषा लगी सिर मारने
इनमें भी नहीं हितकारी 2॥

यादव बंश पर जादू गेरा
दिख्या द्वारका का बासेरा
उषा कहै इनमें पति मेरा
जय जय लगी उचारने
और देन लगी बलिहारी 3॥

चित्रलेखा कहै उंगली ला तूं
पति कौनसा मोहे बता तूं
महोर सिंह नित हरिगुण गा तूं
तज मानसी विकार नै
नहीं यमपुर में हो ख़्वारी 4॥

दोहा –
कामाख्या को नमन कर, सुमरे योगीराज ।
नभ में चढ़ी खंखाय कर, जिमी खंखा रहा बाज ॥


खग मग में सग गग जाय रही
चित्रलेखा चढ़ी गगन में ॥ टेक ।

पवनवेग हो नभ में ध्याई
चली मन से रफ्तार सवाई
पहूंची पुरी द्वारका माईं
रूप अदृष्ट बनाय रही
बड़ी जा अनिरुद्ध भवन में 1॥

टोणा करकै जादू चलाया
शव समान अनिरुद्ध बनाया
विद्या बल से पलंग उठाया
शोणितपुर को आय रही
आ पहूंची एक ही छन में 2॥

टोणा दूर किया जादू उतारा
जाग उठा है साम्ब कुमारा
उषा नै आ चरण चुचकारा
पति परकम्मा लाय रही
हो रही प्रफुल्लित मन में 3॥

मैं पत्नी तूं पति है मेरा
सुपन में हुया समागम तेरा
महोर सिंह भाषा पद टेरा
पति का भरम मिटाय रही
जिस बिध आया महलन में 4॥

यहां गुप्त भवन में ल्हुक छुप रहना होगा ॥ टेक ।

गुप्त भवन में घोर अंधेरा
वहां निवास करूंगी तेरा
विधि विधान से कभी तो मेरा
कर भी गहना होगा 1॥

दारुण दुख है गुप्तवास का
उससे भी ज्यादा ग्रीष्म मास का
सबसे घणा है भूख प्यास का
सभ दुख सहना होगा 2॥

चौसर बाजी खेल करैंगे
तनमन का हम मेल करैंगे
केली भवन में केल करैंगे
जब तक लहना होगा 3॥

चलूं द्वारका देखूं द्वारा
यादव वंश कुटम्ब परिवारा
महोर सिंह जब कभी हमारा
मालिक दहना होगा 4॥

दोहा –
चित्रलेखा से विनयकर, बोला साम्ब कुमार ।
ये विद्या सीखी कहां, कहां तेरा गुरुद्वार ॥


कामरू देश में जन्म हुया मेरा बंगालै नानेरा
बाणासुर राजा का मंत्री पिता आन हुया मेरा ॥ टेक ।

उस कामरू देश में योगीराज का अखंड जगता धूणा
वहां नारी सारी जा जा सीखैं जादू टामण टूणा
जादू से लेती बना मर्द का जल्दी खेल खिलूणा
कर खेल मार दें लड़की जन्मै मुश्किल लड़का हूणा
उस देश में मर्द कोई नहीं जा सभ भाग गया बासेरा 1॥

देव आराधन योग का साधन बंगाले में जाकै
मैं यंत्र तंत्र सभ सिद्ध किये एक तांत्रिक गुरु बनाकै
फिर योगाभ्यास मैं करण लगी एक योगी की आज्ञा पाकै
मैं आठों अंग कर लिये सिद्ध पढ़ पढ़कै और पढ़ा कै
उस जादू योग के बल से मैं पलंग उठा ल्याई तेरा 2॥

जद बोली चितरणी वचन तूं सुन ले उषा बहन सहेली
हम तुम दोनों मेरी प्राण प्यारी संग रही संग खेली
अब खेल तूं अपने पति के संग में मिल गया मन का मेली
मैं तो अपने घर जाती हूँ तूं कर महलों में केली
गुप्त भवन में रहना गुप्त ना पटै किसी नै बेरा 3॥

अब मैं जाती हूं घर अपने तूं कर विलास यहां बहना
अनिरुद्ध कंवर का शुभागमन मत किसी कै आगै कहना
अपनी सुरत मत दिखाइये किसी को महल में अदृष्ट रहना
कोई आपत्ति पड़ै तो बहना आपत्ति को भी सहना
कह महोर सिंह भज रामनाम हो दिल का दूर अंधेरा 4॥

चित्रलेखा तो चली गई उषा और अनिरुद्ध कुमार
दोनों रहैं महल के अन्दर दरवाजै खड़े पहरेदार ॥ टेक ।

रात दिवस का भेद रह्या ना केली भवन में केल करैं
कभी हांसी करैं कभी करैं ठिठोली हंस हंसकर मन का मेल करैं कभी तो चौसर बाजी खेलैं कभी शतरंज का खेल करैं
कभी केशर किस्तूर तनों पर कभी तो अतर फुलेल करैं
कभी हार फूलों के कभी बस्त्र आभूषण करैं सिंगार 1॥

भोगैं भोग जोड़ी संजोग वै चतुर्धा विषय विलास करैं
केली भवन में रहैं गुप्त नहीं आपा बाहर निकास करैं
विषय आनंद से तृप्त हुये नहीं रहते निडर निवास करैं
कामदेव के पंचसरों को हरदम अपने पास करैं
भावी प्रबल टरै नहीं टारी कोटि विधि करो जतन हजार 2॥

एक दिन पहरेदारों कै उषा राजदुलारी नजर पड़ी
गृहस्थ धर्म की शरीर ऊपर झांई सारी नजर पड़ी
रूप रंग आकृति बदल रही बनी वा नारी नजर पड़ी
संशय हो गया प्रतिहारों कै नहीं क्वांरी नजर पड़ी
राजा को दें खबर या नहीं दें करैं पहरवे सोच विचार 3॥

प्यारा हो प्यारे का दुख सुनले देखले कहै नहीं
प्यारा नहीं वो दुश्मन है जो प्यारे के दुख से दहै नहीं
उषा तो हो गई कलंकित यहां सैं जागी रहै नहीं
महोर सिंह इस महाकलंक को नृप बाणासुर सहै नहीं
कर कै मसोरा चले पहर वे पहूंचे राजा कै दरबार 4॥

दोहा –
बाणासुर से जायकर, बोले पहरेदार ।
कलंक कुल कै लग्या, दूषित कुल बेकार ॥


  महाराज आज उषा का देख्या दूषित हुया शरीर ॥ टेक ।

हूणी आय महल में बड़ गई
न्यू उषा की बुद्धि बिगड़ गई
तकदीर आगै झूठी पड़ गई
राजन सभ ततबीर 1॥

ताले संकल पहरेदारी
करणी निष्फल हुई हमारी
भावी प्रबल टरै नहीं टारी
बह्या कर्म का तीर 2॥

चार मास गये महल के माईं
रही गुप्त ना दई दिखाई
आज नजर पड़ी मिटती नाईं
बिधि की लिखी लकीर 3॥

शिवकेतू को गया बिसर तूं
मुड़ रही शिव शिव नाम सुमर तूं
महोर सिंह किया जा तो कर तूं,
राम भजन में सीर 4॥

दोहा –
प्रतिहारों के सुन वचन, भूप गया रणवास ।
राणी पास बैठायकर, सुना दिया इतिहास ॥


सोहनी –
सुनकै पति के वचन राणी उठ चल पड़ी
दाई ले रही संग जाय महलीं बड़ी ।

देख सुता का ढंग राणी जद दुःख भरी
दुख भरे बोली बैन क्यूं ना जनमत मरी ।

कुल कै लगा दिया दाग अभागण कुचलणी
ऐसी किसी में ना बणी जो हम में बणी ।

पिता का काट लिया नाक उतारी पाग हे
पुश्तैनी तैं लगा दिया कुल कै दाग हे ॥

दोहा –
बड़े बड़ों कै लग रह्या, माता देख कलंक ।
मेरा क्या उनमान है, विधि के अणमिट अंक ॥


सोहनी –
उषा होय निराश श्वास भर मारती
उठत कलेजै हिलूर हूर हुंकारती ।

लाज शर्म सभ त्याग भागकर चल पड़ी
कंपैं अधर आरत बैन नैनी अंसुवन झड़ी ।

पिता नै दई धमकाय हाथ शीश मारती
करने लगी अपघात मात पुचकारती ।

पड़ैगी हाय मेरी मांय तेरे रणवास में
महोर सिंह पड़ा भंग उषा के विलास में ॥

दोहा –
कुछ तो सेना मार दई, कुछेक दई भगाय ।
पकड़ लिया है साम्बसुत, बाणासुर नै जाय ॥


नागफांस में बाँध लिया बैठा उषा कै पास ॥ टेक ।

आरत वचन उषा नै टेरा
मैं पत्नि यो पति है मेरा
छोड़ दे नहीं छोड़ा तो तेरा
जागा सत्यानाश 1॥

बाणासुर नै धमकी लाई
खो दई सारी बनी बनाई
तैं ला दई मेरे मुख कै स्याई
दुष्टा तूं बदमाश 2॥

खुई नहीं है और खुवैगी
हूणी की आ बेल बुवैगी
उस दिन मुख की स्याही धुवैगी
रोवैगा रणवास 3॥

रस्ता घेरै आगै पड़ती
शीश झुकावै चरण पकड़ती
महोर सिंह आवै समय बिगड़ती
कलि का हुआ पैगास 4॥

पिता के घर में रजोधर्म से हो ज्या बेटी क्वांरी
उषा कहै वो बाप कलंकी महापापन महतारी ॥टेक।


चन्दा कै लग्या कलंक कालमा अबतक देत दिखाई
सूरज का हो ग्रहण कलंकी हो रहे दोनों भाई
इंद्र कै लग्या कलंक जद गया गौतम के घर माईं
अंजनी कै लग्या कलंक क्वांरी जणिये बिन परनाईं
इस कलंक से बन गई शिला अहल्या गौतम की नारी 1॥

  इस कामदेव के चक्कर में एकदिन ब्रह्माजी आया
वाचा कै पीछै भाग चला वो जरा नहीं सकुचाया
इस कामदेव नै पूजा कर शिव योगी का ध्यान डिगाया
मोहनी कै पीछै होय लिया था जरा नहीं शर्माया
जालंधर कै घर काम नै विष्णु बना दिया व्यभचारी 2॥

इस कामदेव में साठ हजार ऐरावती का बल बरणा
वो कामदेव मेरे स्वप्न में आया हुया ईश्वर का करणा
उस कामदेव नै पास मेरै पति भेज दिया बिन परणां
साधन तिन वश में रहै नहीं मेरी मात अवस्था तरणा
जो बननी थी सो बन गई माता अब है ख़ुशी तुम्हारी 3॥

इतने में सजी धजी अजब गजब चतुरंगी फौज चढ़ आई
तश्कर को ल्यो पकड़ जकड़ धुनी अनिरुद्ध कंवर सुन पाई
ले परिघ महल से बाहार हुया अनिरुद्ध कंवर बलदाई
बल विद्या में भरपूर शूरमा करने लग्या लड़ाई
कहै महोर सिंह हुया तुमल युद्ध हूणी तो टरै ना टारी 4॥

दोहा –
एक तरफ तो एक है, एक तरफ हजार ।
कैसे सरवर हो सकै, हुया अनिरुद्ध लाचार ॥


अनिरुद्ध कंवर को पकड़ जकड़ ले गये राजा कै पास ॥ टेक ।

भूप कहै मोहे मुख न दिखाओ
बेड़ी हथकड़ी तोंक पहराओ
कैद करो मत देर लगाओ
द्यो इसको महात्रास 1॥

हो गया हुकम हथकड़ी घाली
तोंक बेड़ी दई ठोक निराली
वहां रोको जहां रुकैं कुचाली
चोर जार बदमाश 2॥

इसकी बहोत घणी बदमाशी
उम्रकैद चाहे चढाओ फांसी
कौन देश कुल कहां का वासी
खूब करो तल्लाश 3॥

फोटू ले देशों में जाओ
जल्दी शौर पाड़कर आओ
महोर सिंह कहै हरिगुण गाओ
पूर्ण हों सभ आश 4॥

दोहा –
शयन स्वप्न में बीत गई, चार पहर की रात ।
पुरवासी जागन लगे, होय गया परभात ॥


जागे अनिरुद्ध कुमार नहीं
सभ जाग उठे पुरवासी ॥ टेक । (सांगीत)

भानु उदय हुया नरनारी आय जाय रहे
सहचरी खड़े अनिरुद्ध को जगाय रहे
नाम ले पुकारैं बाहर खटखला खडकाय रहे
द्वारका में हल्ला मच्या अनिरुद्ध जागै नहीं
क्या अज वो कुमार निद्रा को त्यागै नहीं
होय गये मध्यान्ह अब सूता अच्छा लागै नहीं
जवानी में बुद्धि विचार नहीं
है बदमाशी क्या हांसी 1॥

सीढ़ी चढ़ महल में नरनारी प्रवेश भये
शयन भवन सूना पड़ा देख महक्लेश भये
ऊपर नीचै ऊणै कूणै देख दुःख बिशेष भये
  अटखला और अर्गला सभ बंध खुलवाई नहीं
हूणी ठा पलंग को ले गई मिटती मिटाई नहीं
खोज ना प्रतीत होता शयन शैया पाई नहीं
अपनै बस संसार नहीं
कर्मों की घल रही फांसी 2॥

रोष रंज सिवाय द्वारका में दूजी बात नहीं
सबर नहीं आवै धीर धरैं तात मात नहीं
अनिरुद्ध बिना खाते पीते बंधु भ्रात नहीं
कृष्ण जी कहैं हैं मत चित को उदास करो
आवैगा अनिरुद्ध मेरे वचन का विश्वास करो
जल्दी दूत जाओ अनिरुद्ध की तल्लाश करो
निकसा खोज बाहार नहीं
ले गया कोई देव अकाशी 3॥

द्वारका के वासी सभ घरों में पुण्य दान करो
यज्ञ जाप हवन ब्राह्मणों का सन्मान करो
उद्यापन उपवास करो मतना गिल्यान करो
धर्म की जड़ हरी और धर्म से ही होती जय
रोष रंज फिकर का भी धर्म से ही होता क्षय
महोर सिंह राम भज यम का ना रहै भय
जिनको हरि नाम आधार नहीं
वै भोगैं लख चौरासी 4॥

दोहा –
पुरवासी सभ कर रहे, उद्यापन उपवास ।
लुप्त हुये अनिरुद्ध को, बीत गये दश मास ॥


  इतने में बैन बजाते आते देखे नारद जी ॥ टेक ।

अव्याहत गति इच्छाधारी
ब्रह्मऋषि संयम व्रतधारी
हरि का प्रेमी पवन आहारी
ज्ञान बिसारद जी 1॥

साम्ब पुत्र अनिरुद्ध कुमारा
बाणासुर नै कैद में डारा
छुटाओ चल नहीं जन्म तुम्हारा
है नदारद जी 2॥

तोंक हथकड़ी बेड़ी जड़ी हैं
बांधी मस्क जंजीर पड़ी हैं
दर कै आगै अड़ी खड़ी है
पुलिस की गारद जी 3॥

इतनी कह संत सैलानी
उठकर चले गये विज्ञानी
महोर सिंह सभी सुन लिया कानीं
मुनि का हारद जी 4॥

दोहा –
हलधर कृष्ण कहने लगे, यादूवंश तमाम ।
शोणितपुर जल्दी चलो, देरी का नहीं काम ॥


  अजी एजी शूरमा लगे हैं खुशी मनावन
उत कट भट रण धीर धनुर्धर सज धजकर लगे आवन ॥ टेक । (सांगीत)

रण बाजे बजन लगे साथ में अलार्म बाजे
धुन सुन सूरवीर आप रहे भाजे भाजे
कृष्ण बलदेव दोनो भाइयों नै रथ साजे
हाथी घोड़े रथ पदाती चतुरंगी सजे दल
द्वारका से बाहर हुये लाग रही तलामल
कूँच का नक्कारा बज्या होय रही चलाचल
लागे शंख बजावन ॥1


तुमल शब्द हुया धरती अंबर रहे धर्राय
शोणितपुर को चल्या लश्कर गणपती मनाय ध्याय
गरद के गुब्बारे उठ उठ नभ लिया छाय
हलधारी चक्रधारी तीन खोहण सेना संग
लहराये शरीर धीर वीरों कै चढ़ी उमंग
कबसी वो बख़्त आवै बाणों से मंडैगा जंग
लगे वाहन दौड़ावन 2॥


धर कूच धर मजल सरहद में जाय बड़े
नदी नाले दरियाव बन पर्वत अड़े खड़े
आगै बढ़े शोणितपुर के महलावत नजर पड़े
पंचायण शंख बज्या शब्द हुया बड़ा भारी
सुन कै आवाज़ गाज चकित भये नरनारी
मोर्चों पै डटे ललकारैं वीर धनुर्धारी
लागे बान बर्षावन 3॥


यदुवंशी घोर घटा चहूं और छाय रही
शोणितपुर कै ऊपर झड़ी बाणों की लगाय रही
ध्वजा और पताका टूट टूट नीचै आय रही
होय कै तैयार दैत्य दानवदल लेकै ध्याया
मोर्चा लगाय दिया रणबाजा बजवाया
पुरी की शोभा बिगड़ी देख दैत्य दहलाया
महोर सिंह लगे गावन 4॥


दोहा –
हलधारी कहने लगे, करो युद्ध आरंभ ।
शिव नै पहले आयकर, गाड दिया रणखंभ ॥


  शिष्य के मददगार शिव नै आ गाड दिया रणखंभ
यादव शिव अनुचर लड़न लगे हुया युद्ध आरंभ ॥ टेक । (बड़ा ख्याल)


जब धर्मयुद्ध लग्या होन बंट गई बीडी न्यारी न्यारी
श्रीकृष्ण संग शिव लड़न लगे गणनायक से हलधारी
षणमुख प्रद्युम्न जुटे दोनों श्रंगी भृंगी रणचारी
शिवगणों का यादवकुल से आ मंड्या जंग बड़ा भारी
गणना नहीं हो सकै जिन्हों की दल अड़े खड़े असंभ 1॥


जब अमोघ अस्त्र पाशुपत शिव नै पिनाक पर धारा
नारायण नै नारायण अस्त्र से शिव अस्त्र तेज संहारा
कभी अंधकार कभी चमत्कार कभी नभ से पड़ैं अंगारा
कभी वायुवेग पाषाण घात कभी वर्षा बेसुम्मारा
कहीं उलमुक कहीं पड़ैं पलीते कहीं बरस रहे बम्ब 2॥


जब शिव का त्रिसिरा अग्निज्वर चल कृष्ण दलों में आया
श्रीकृष्ण ने शीत ज्वर छोड़ा शिव ज्वर आगै को ध्याया
श्रीकृष्ण के जाकर चरण गहे स्तूति करी विनय सुनाया
कहै त्राहि-त्राहि शरणागत का प्रभु चहिये प्राण बचाया
एक मोहन अस्त्र छोड़ कृष्ण ने गिरा दिया रणथंभ 3॥


त्रिपुरारि मुरारी लड़े खूब रण फतह कृष्ण ने पाई
ब्रह्मादिक देखैं देव तमाशा शिव नै शिकस्त खाई
जब मोहन अस्त्र श्रीकृष्ण नै छोड़ा सारी सेना घबराई
मोर्चा छोड़ शिव दूर चले गये कुछ ना पार बसाई
कहै महोर सिंह जद बाणासुर नै किया रण का प्रारम्भ 4॥


दोहा –
दोनों तरफ व्यूह रच रहे, धनुषों की टंकार ।
बाजे झुझाऊ बज रहे, हो रही मारोमार ॥


अबसो कृष्ण बाणासुर का आकै मंडा घोर जंग ॥ टेक ।


ज़ोर बांध रह्या खल, लग रही तलामल, कई क्षोहणों का दल, बल ले रह्या संग
गाड़ दिया रणखंभ , हुया रण का आरंभ, दोनों तरफ दल असंभ,
अड़े खड़े चतुरंग 1॥


लड़ैं पलटन रिसाले, बहैं रफल कृच भाले, भिड़ैं मंड रहे पाले, मतवाले मतंग
रथियों के बरसैं तीर, मानो बरस रह्या नीर, आगै आगै बढैं धीर
उमंग उमंग 2॥


हलधारी हल पसार, खैंच हजारों हज़ार , ऊपर मूसल मार-मार, करै छिन भिन अंग
बाणासुर बलवान, अर्धसहस्र बान, करने लग्या घमशान,
यदुदल हुया तंग 3॥


दल हुये छिन भिन, कोई भुजा शीश बिन, कोई नाक कान छिन, कोई पड़ा अपंग
पड़ी ल्हास ऊपर ल्हास, नहीं जीवने की आस, महोर सिंह इतिहास,
गावै बजा मृदंग 4॥


दोहा –
जृंभास्त्र लिया कृष्ण नै, दुश्मन दल गये हाल ।
बाणासुर सुर कहने लग्या, कर द्यूंगा पैमाल ॥


  जृंभास्त्र कृष्ण मुरारी नै
धरया सारंग चाप चढ़ाया ॥ टेक । (सांगीत)

एक समय बाणासुर नै तांडवी निरत कर
साज भी बजाया मुख से गाया शिव हर हर
खुशी होकै शंकर बोले मांग्या जा सो मांग वर
बाणासुर कहै मेरे पुर की रक्षा कीजिये
और कुछ माँगूँ ना बस ये ही वर दीजिये
मैं हूं दास आपका निज जान शरणै लीजिये
वर दे दिया त्रिपुरारी नै
इस कारण लड़न आया 1॥


श्री कृष्ण बाणासुर के अस्त्र शस्त्र चलने लगे
भिड़ भिड़ अगन झड़ैं दल जलने बलने लगे
घूमा घाणी कटा बढ़ी मांची घाव घलने लगे
परिध तोमर गदा बाजैं बह रहे सेल भाल
खड़ग खाँड़े खुड़क रहे माच रह्या भोंचाल
आगै आगै बढैं दल समुंद्री लगत झाल
हलधर मूसलधारी नै
दल बहोत सा मार गिराया 2॥


अपने दल की रक्षा करै दुश्मन का संघार करै
पीछै ना हटै है आगै बढ़-बढ़ वार करै
कहीं हाय होय मची कही मारो मार करै
श्रीकृष्ण नै बाणासुर का रथ तोड़ मारा रथवान
घोड़े भी क़तल करे काट दिये धनुष बान
हो गया विवश सब भूल गया ओसान
बखत पै आ महतारी नै
पुत्र का प्राण बचाया 3॥


  नगन नारी देख श्रीकृष्ण मुख मोड़ गये
वृद्ध बाणासुर भागे मोर्चा को छोड़ गये
नया रथ साज आये फेर उसी ठोड़ गये
आकै जद मोर्चा बाणासुर नै दिया लगाय
अस्त्र शस्त्रों सेती फेर विरथ वो दिया बनाय
उठाया सुदर्शन चक्र दैत्य गया घबराय
भय हो गया बलकारी नै
पद महोर सिंह कथ गाया 4॥


दोहा –
चक्र सुदर्शन नै करे, अरिदल बारा बाट ।
खुजा मेट दई दैत्य की, भुजा दई हैं काट ॥


आ बीच में पड़गे शिव भोले भंडारी ॥ टेक ।

भुजा असुर की काट दई थी
बाकी में कुल चार रही थी
शिवशंकर की शरण लई थी
पहूंच गये त्रिपुरारी1॥

शिव कहै अभय दान प्रभु दीजै
निज जन जानकै कृपा कीजै
दीन जान कै शरणे लीजै
त्राहि त्राहि गिरधारी 2॥

घमंड इसको था भुजबल का
इससे घना गर्व था दल का
हड़ लिया गर्वप्राण इस खल का
बख्शो कुंज बिहारी 3॥

जन प्रह्लाद से है ये चौथा
उसी वंश का पोता पड़ोता
महोर सिंह दिन वृथा क्यूं खोता
राम भजन की बारी 4॥

ख्याल
श्रीकृष्ण से मुक्त होयकर बाणासुर पुर को ध्याया
बेड़ी काट अनिरुद्ध कंवर की स्नान ध्यान जद करवाया ॥ टेक।

अतर फुलेल लगा अंगों पर वस्त्राभूषण करे सिंगार
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन जिमाये अपने महल मंझार
मस्तक तिलक किया राजा नै भेंट दई कीन्हा सत्कार
मंगल गावैं बैठी कामनी न्योछावर कर रहे नरनार
हंस हंसकर करैं बात कंवर से पुरी में अति आनंद छाया 1॥


अनिरुद्ध का सिंगार करकै उषा की करैं तैयारी
सोलह सिंगार बत्तीस आभरण करकै उषा सिंगारी
पुत्री का पिता सिर पुचकारै गलै लगा रही महतारी
भाई बहन भोजाई उषा से आ-आ मिलन लगी सारी
भाजन वसन आभूषण दीन्हे धरी भेंट अतुलित माया 2॥


फुलमाला ले उषा नै अनिरुद्ध कंवर को पहराई
ग्रंथि योजन कर विधि विधान से दिव्य यान में बैठाई
साज आनंद के बजने लगे नभ गाजै मधुर धुनि छाई
चारण भाट कलात मागध बंदीजन कीर्ति गाई
ध्वजा पताका फरहरे फरकैं रथ चल्या संग लश्कर लाया 3॥


प्रथम भेंट दई बलभद्र को पीछै कृष्ण की भेंट करी
समध मिलावा हुया आपस में जनता सारी चाव भरी
गुनाह माफ करियो समधीजी बार बार कह रहे हरी
बाणासुर चरणों में गिर गया शिवशंकर की मेहेर फिरी
नमन आशिखा हो रही परस्पर महोर सिंह नै जश गाया 4॥


दोहा –
प्रेम बढ़ा आनंद भये, रोष रंज हुये दूर ।
यादवदल में गमन के, बाजन लगे तूर ॥


जय बोल चले हैं द्वारापुरी को ध्याये ॥ टेक ।

पुरवासी पुर को चले जाते
उषा के सभ भाग सराते
भाग बिना घर बर नहीं पाते
जोगां जोग बर पाये 1॥
जैसा पीहर था घरियाना
वैसा ही सासरा मिला ठिकाना
यादव वंश मर्द मर्दाना
लड़े पौरष दिखलाये 2॥

उषा की सभ सखी सहेली
याद करैं हैं बहन भनेली
हमको छोड़ चली गई अकेली
दृग अंसुवन सैं छाये 3॥

भावी वश हो बिन परणाईं
उषा गई द्वारका मांई
पीहर सासरै बाजैं बधाई
महोर सिंह जश गाये 4॥

--------- इति श्री --------