दोहा –
दोनों तरफ व्यूह रच रहे, धनुषों की टंकार ।
बाजे झुझाऊ बज रहे, हो रही मारोमार ॥
अबसो कृष्ण बाणासुर का आकै मंडा घोर जंग ॥ टेक ।
ज़ोर बांध रह्या खल, लग रही तलामल, कई क्षोहणों का दल, बल ले रह्या संग
गाड़ दिया रणखंभ , हुया रण का आरंभ, दोनों तरफ दल असंभ,
अड़े खड़े चतुरंग 1॥
लड़ैं पलटन रिसाले, बहैं रफल कृच भाले, भिड़ैं मंड रहे पाले, मतवाले मतंग
रथियों के बरसैं तीर, मानो बरस रह्या नीर, आगै आगै बढैं धीर
उमंग उमंग 2॥
हलधारी हल पसार, खैंच हजारों हज़ार , ऊपर मूसल मार-मार, करै छिन भिन अंग
बाणासुर बलवान, अर्धसहस्र बान, करने लग्या घमशान,
यदुदल हुया तंग 3॥
दल हुये छिन भिन, कोई भुजा शीश बिन, कोई नाक कान छिन, कोई पड़ा अपंग
पड़ी ल्हास ऊपर ल्हास, नहीं जीवने की आस, महोर सिंह इतिहास,
गावै बजा मृदंग 4॥