Loading...

कृष्ण जन्म

दोहा:-

द्वापर युग के अंत में, बध्या भूमि पर भार ।
धरा चली गऊरूप धर, विधि से करन पुकार ॥


धरा का थर-थर करत शरीर नीर नैनों से जारी है ॥ टेक ।

त्राहि-त्राहि-त्राहिमाम विधाता
प्रजा का भार सहा नहीं जाता
हे अज अभय दान के दाता
शरण तिहारी है


पापण प्रजा पाप नै घेरी
पाप से शक्ति हत हुई मेरी
आज पितामह पुत्री तेरी
महा दुखियारी है 2॥

अब दराड़ खाने वाली हूँ
या रसातल जाने वाली हूँ
दुस्सह दुख ठाने वाली हूँ
अर्ज गुजारी है 3॥

सिर झुकाय कहै रोय रोय कै
अश्रुपात से चरण धोयकै
महोर सिंह कहै दीन होय कै
धरा पुकारी है 4॥

दोहा:-

विधि ने सिर पुचकार कै, पोंछे अश्रुपात ।
इतने ही में आ गई, देवो की पंचात ॥


पितामह आये हमतो शरण तुम्हारी जी ॥ टेक ।

राजा हुये अन्याई दंड खाक्तई प्रजा सारी जी
स्वाहा स्वधा शब्द बिसराये
पीवैं शराब हुये मांसाहारी जी 1॥

सर्वभक्षी हो गये ब्राह्मण शुद्र हुये वेदाचारी जी
वैश्य गांठ काटैं गरीबों की
लूटैं खसोटैं छल कपट व्यापारी जी 2॥

सदाचार आचार रहे ना रह गई चोरी जारी जी
दीन ईमान बहे प्रजा के
बेटी बिकैं गौओं पै चालैं कटारी जी 3॥

जती सती निर्बीज हुये रही ना पतिव्रता नारी जी
दानी और हरि भक्त रहे ना
किस बिध होवै हमरी पार निवारी जी 4॥

क्या तो रक्षा करो तात ना यही प्रतिज्ञा धारी जी
क्षीर समंद में डूब मरैंगे
महोर सिंह देवों पै आपत्ति भारी जी 5॥

दोहा:-

सुरभि आगै कर लई, संग देवों का वृन्द ।
विधि विष्णु शिव चल पड़े, पहूंचे क्षीर समंद ॥


जा क्षीर समंद पै विनती करन लगे ॥ टेक ।

हे निर्विकार निराकार अलख सर्व जगदाधार अंतर्यामी
हे अजर अमर अदैत अगोचर अगम अनादि निष्कामी
हे आविनाशी निर्द्वंद निष्प्रही निर्विकल्प जग के स्वामी
हे हिरण्य गर्भ सूक्ष्म विराट परिपूर्ण ब्रह्म बहुधानामी
नाम नेती कह थक गई वाणी मन से स्मरन लगे 1॥

प्रभु अण्ड ब्रह्मंडों के मालिक हे अनंत शक्ति वाले
रचे धरण गगन और अगन पवन वन पर्वत सागर नदी नाले
महाघोर तिमिर में उडुगण रच दिये चाँद सूरज दो उजियाले
रची लख चौरासी जीवाजून दे दे कण मण आहार पाले
तेरी दया से राजा रंक के कारज सरन लगे 2॥

घन बीच गर्जना तेरी धुनि दामन में ज्योति दमक रही
रवि में प्रकाश शशि में उजास तेरी ही सत्ता चमक रही
धरनी में महक वायु में वेग नभ बीच श्यामता रमक रही
जल में शीतलता दहन अग्न में थारी ही ज्योति झमक रही
विश्वम्भरी है नाम आपका विश्व को भरन लगे 3॥

राजाधिराज महाराज आज हम शरण आपकी आये हैं
भूमि के भार को हरो नाथ असुरों ने भक्त सताये हैं
धर्म मर्यादा भंग करी सभी को मलेच्छ कर्म मनभाये हैं
गरीबों पै महा आपत्ती पड़ी गुण महोर सिंह नै गाये हैं
इतनी कह सुरभि देवों कै आँसू झरन लगे 4॥

दोहा:-

खिन्नमना सुरभि खड़ी, त्राहि-त्राहि रही टेर ।
विनय करैं सब देवता, क्यों प्रभु ला रहे देर ॥


लई चढ़ा कपाली विधि नै समाधी लाई ॥ टेक ।

पद्मासन बैठे बन फक्कर
शुन्य खोज खोजे षट चक्कर
गोते लाय मार लई टक्कर
उस घर की थाह ना पाई 1॥

ध्यान बीच बैठे हैं ध्यानी
चारों वेदों के विज्ञानी
समाधी में हुई अक्काशवाणी
ब्रह्मा नै सुन पाई 2॥

मतना डरो देह धारूंगा
आय भूमि का भार तारूंगा
भक्तों के कारज सारूंगा
मेटूंगा दुखदाई 3॥

कहै देवों से ब्रज मण्डल में
देह धारूं गोपों के कुल में
जाओ मत नहीं डूबो जल में
विधि की धीर बंधाई 4॥

नभ धुनि सुन विधि खोले नैना
आये प्रभु अब देरी है ना
समाधी में जो जो सुने बैना
सारी ये कथा सुनाई 5॥

सुनकर वचन देवता सारे
सुरभि सहित निज भवन सिधारे
महोर सिंह कहै बजे नगारे
सबको खुश्बख्ती छाई 6॥

ख्याल:-

मथुरापुरी जादूवंशी राजाओं की है रजधानी,
उग्रसेन जहां राज करै है हरि भक्त और महादानी ।

उग्रसेन का छोटा भैया देवक युवराज है बानी ,
अतिप्रेम दोनों भाइयों का हरिभक्ति मन में ठानी ।

उग्रसेन कै पुत्र कंस था दुराचारी और अभिमानी ,
देवक कै थी पुत्री देवकी, पति से यूं बोली रानी ।

समरथ पुत्री हो गई बलमा तन में झलक रही जवानी ,
क्वाँरी कै रज होय महोर सिंह बिगड़ जायगी ज़िंदगानी ॥

दोहा:-

समरथ पुत्री हो गई, नीति निपुण नरनाह ।
जल्दी घर वर ढूंढकर, करो सुता का ब्याह ॥

रानी के बैन सुन देवक आया उग्रसेन के पास ॥ टेक ।

चोताला-
जद बोल्या देवक बैन बंधु उग्रसेन अरज है मेरी
ब्याहण कै जोग हो गई सुता अब तेरी,
घर वर विद्या गुण रास करो तल्लाश चाहिये ना देरी
दिन-दिन पुत्री होती जा रही बडेरी
चोपैया –
रजो धर्म से हो ज्या क्वाँरी
लगैगा दोष बड़ा भारी
हों पतित पिता महतारी
मर्जी अब रही तुम्हारी
उठत -
सूरसेन का अंश, है यादू वंश, बोल उठा है कंस
मनै घर वर कर लिया तल्लाश 1॥

चोताला-
घर वर में कसर है नांह मथुरापुर मांह नाम वसुदेवा
भगनी के ब्याह का भेजो वहाँ लिख टेवा
चाचा जी देर मत करो ब्याह दिन धरो पार हो खेवा
जितनी मेरे से बनै करूंगा सेवा ॥
चोपैया-
जुड़ मिल आ गई पंचाती
लिख दई ब्याह की पाती
सब न्योते गोती नाती
आ गई ब्याह की राती
उठत -
कर दिया कन्यादान, मान सन्मान, भावी नै आन
कंस के घट में किया निवास 2॥

चोताला -
चार सौ हाथी दिये शुशोभित किए कनक अंबारी
सोलह सौ दिये रथ पालकी न्यारी
दिये पंद्रह हजार तुरंग करी अंग सजावट सारी
दो सौ दासी वस्त्र आभूषण सिंगारी
चोपैया –
मणि माणक द्रव्य खजाने
दिये दान में बेपरमाने
आभूषण भेष जिनाने
दिये सिरों पाँव मर्दाने
उठत –
बहना को लगाकै गला, कंस जब मिला, पहूंचावन चला,
गाज उठा इतने में अक्काश 3॥

चोताला-
घोड़े की पकड़े बाग भगनी अनुराग चला अगवानी
इतने में धुन बंध हुई अक्काश से वाणी
जिसको समझ रहा बहन ये भगनी है ना अज्ञानी
बन बहन प्रगट हो गई तेरी मोत निशानी
चोपैया-
जब अष्टम गर्भ देहधारै
निश्चय तुझको संघारै
भूमि का भार उतारै
भक्तों के कारज सारै
उठत –
महोर सिंह नभ गाज, सुन कै आवाज , बनी क्या आज,
पुरवासी हुये उदास 4॥

दोहा:-

नभ सेती वाणी हुई, बिसर गये रंगचार ।
चोटा पकड़ा बहन का, सूंत लई तलवार ॥

चिंडाली तेरा शीश उतारूंगा ॥ टेक ।

बहन नहीं तूँ दुश्मन मेरी
खैंच अरथ से नीचै गेरी
चन्दन वन में जमी कटेरी
जड़ से उखारूंगा 1॥

रोवै देवकी करै विलापा
सबको होय रहा संतापा
कंस कहै मैं अपना आपा
आप उबारूंगा 2॥

बरजैं सभी नहीं मानै ओर की
धर्म का देवता दे दे घोर की
चोर नै के मारूं चोर की
माँ नै मारूंगा 3॥

सब नै सुनी जो नभ टेरा
तेरी देह में काल है मेरा
महोर सिंह कह इस कारण तेरा
प्राण बिसारूंगा 4॥

राजाधिराज संसार में
कर्म फल भोगे जाते हैं ॥ टेक ।

भासा है प्रपंच जगत स्वप्न की समान जान
कोई ना किसी को मारै ऋणानूबंदी जहान
कर्मों सेती मिलै आयु विद्या धन संतान
जन्म मरण देह का है जीव कभी मरता नाहीं
भूल स्वरूप अपना अविद्या की पड़ी झाई
कर्मों के अनुसार जीव मरते चौरासी माहीं
मोह माया अहंकार में
बंधकर जाते आते हैं 1॥

भावी है प्रबल एजी होनहार टलै नहीं
कुछ सेती कुछ बनै ज़ोर कुछ चलै नहीं
भगवान के हुक्म बिन तरू पत्ती भी हिलै नहीं
था सर्बस का दानी बल पत्ताली दिया पठाई
सहस्र गऊ दानी नृग गिरगट की देह पाई
थी राज की तैयारी वनवास गये रघुराई
सुर मुनि इस विचार में
रहैं पार नहीं पाते हैं 2॥

दैव की गति का कोई पार नहीं पाय सकै
विधि विष्णु शिव कोई थाह नहीं लाय सकै
महिमा अभेद वेद भेद नहीं गाय सकै
बसे को उजाड़ै और उजड़े को बसाय देता
रीते को भरै और भरे को रिताय देता
राजा को रंक करै राजा रंक को बनाय देता
आकर मोह की मार में
कभी सुख कभी दुख ठाते हैं 3॥

आकाशी वाणी नै अष्टम गर्भ रिपु बतलाया
देवकी गर्भ से जिस वक्त धारण करै काया
आय कै अर्पण करूँ भूपाल नै प्रण ठाया
जन्मत बालक को उठाय तेरे पास ल्याऊं
वचनहारी हूँ तो घोर नरक बीच वास पाऊँ
होय कै अनाथ नाथ देवकी को छुटवाऊँ
करूँ विनती बारम्बार मैं
पद महोर सिंह गाते हैं 4॥

मेरे बीर छोटी बहन का
किस कारण शीश उतारता ॥ टेक ।

बहन को भाई से प्यारी ओर कोई वस्तु नहीं
हर घड़ी चाहती भला
तू क्यूँ नहीं समता धारता 1॥

कस कै चोटा गह लिया चमकै सिरोही शीश पै
यह है वही सिर जिसको हरदम
हित से तूँ पुचकारता 2॥

अव्वल तो मैं दीन हूँ दूजे विवाह का पर्व है
तीजे मैं अबला बली
तूँ कुछ भी नहीं विचारता 3॥

जितने मेरे गर्भ हों ल्या तेरै अर्पण करूँ
महोर सिंह कहै बंधु मेरे
क्यूँ नहीं क्रोध बिसारता 4॥

दोहा:-

कंस कहै इस शर्त पर, बख्शूं तेरे प्राण ।
ल्या मेरै अर्पण करो, जन्मत ही संतान ॥


वसुदेव देवकी रोष भरे निज भवन पधारे जी ॥ टेक ।

जब से वाणी सुनी अक्काशी
सारे शहर में छाई उदासी
विधि अंकुर कहैं मथुरा वासी
टरै नहीं टारे जी 1॥

देवकी समय पै आकै
प्रथम गर्भ धारया ऋतु पाकै
जन्म पुत्र वसुदेव बुलाकै
वचन उचारे जी 2॥

जल्दी पिया पुत्र ले जावो
कंस राजा कै पास पहूंचावो
मोह ममता में मत नहीं आवो
वचन हमारे जी 3॥

उठा पुत्र वसुदेव नै लीन्हा
कंस राजा को जाकै दीन्हा
महोर सिंह नै सुमिरण कीन्हा
नाम सहारे जी 4॥

दोहा:-

सत्यव्रती वसुदेव तूँ, पुत्र को ले घर जाय ।
जन्मत अष्टम गर्भ को, मेरे पास पहूंचाय ॥

वसुदेव पधारे नारद जी आये ॥ टेक ।
उठकर कंस नै प्रणाम कीन्हा
चरण धोय चरणोदक लीन्हा
आशीष वचन ऋषि नै दीन्हा
आसन बैठाये 1॥

लगे कंस से कहन मुनिजी
हुई गगन से काल धुनि जी
गुप्त नहीं सभी सुनी जी
हम भी सुन पाये 2॥

ऋषि नै आठ कंकरी उठाकर
गिनती रख दई माल बनाकर
जन्म गया हो पहले ही आकर
कन तुम भरमाये 3॥

जितने शिशु ब्रज में देह धारे
देव अंश ये समझो सारे
महोर सिंह कर चेत पियारे
काल शीश छाये 4॥

दोहा:-

गुप्त मंत्र दे गये मुनि, भेज कंस नै दूत ।
मंगवाकर शिला पृष्ट पर, हत्या बहन का पूत ॥


अजी एजी कंस की ब्रज में फिरी दुहाई
वसुदेव देवकी कैद किये सुन सबको हुई दुखदाई ॥ टेक ।

प्रथम पिता उग्रसेन गद्दी से दिया उतार
मंत्री जो पुराने थे वो राज से किये बहार
सभासद पंडितों का कर दिया तिरष्कार
राजा कंस पापी महापापी आ बने वजीर
महापापियों के बज्रपापी हुये सलाहगीर
धरती को तोलैं अपराधी नहीं धरैं धीर
धर्म से बाजी लाई 1॥

असुरों नै बैठ सलाह मिलाकै किया अहैद
साधुओं को मारो पीटो ब्राह्मणों को करो कैद
चुन-चुन ब्रज बालकों को करो नापैद
जती और सतियों के धर्म सब भ्रष्ट करो
ऋषि मुनियों को किया जाय उतना कष्ट करो
तीर्थ व्रत दान पुण्य यज्ञ जाप नष्ट करो
धर्म की करो सफाई 2॥

षट पुत्र देवकी के जन्मे समय पाय-पाय
कंस नै सब मार दिये शिला ऊपर लाय लाय
ब्रजवासी हाथ मलैं करैं सब त्राय त्राय
आदिशक्ति योगमाया बड़ी चतुर प्रवीन
सप्तम योग बल से कला रोहणी में कर लीन
सब कहैं सप्तम गर्भ देवकी का हुया क्षीन
कंस को दई बधाई 3॥

अष्टम बाकी रह्या गर्भ कंस जब घबराया
देवकी वसुदेव बेड़ी हथकड़ियों में जकड़ाया
सात ड्योढ़ियों के भीतर कैद दोनों करवाया
वज्र के किवाड़ ताले संकल जड़वाय दिये
ड्योढ़ी दर ड्योढ़ी पहरेदार भी बैठाय दिये
खड़े पहरा देवो सख्त हुक्म भी सुनाय दिये
महोर सिंह छवि गाई 4॥

दोहा:-

गर्भवती सुन कै गया, बंधु बहन के पास ।
चमत्कार को देखकर, हो गया कंस उदास ॥

चमत्कार को देख कंस कै गई उदासी छाय,
अब क्या जतन बनाऊँ दुश्मन रह्या गर्भ में आय ॥ टेक ।

भावी है बलवान बैरन टरै नहीं टारी
निकल गया वक्त हाथ से मैंने देवकी नहीं मारी
अब गर्भवती को मारूं तो लगैगा दोष भारी
वचन हारी हो ज्यां तो निंदा करैं जगत में नर नारी
बलकारी कहै भावी नै दई देवकी छुटवाय 1॥

ड्योढ़ी दर ड्योढ़ी पहरेदारों से कंस नै हुक्म सुनाया
पहरा सख्त लगा दो दुश्मन अबके गर्भ में आया
और बालक तो यूं ही मारे नाहक पाप कमाया
अब वो अवसर आय गया जो अक्काशवाणी बतलाया
आया वोह गर्भ में जन्मत देना मोहे बतलाय 2॥

मास मास पै आवै कंस बन्दीघर दरम्यान
वसुदेव देवकी को देख देखकर होता कंस हैरान
अणहूणी होने की नहीं हूणी है बलवान
कैसा मरना कैसा मारना वो वक्त साध गया आन
दो-दो दिन के महमान या दुनिया हो हो कै रही जाय 3॥

चिंता कंस को खाने लगी वो वक्त कब सी आवै
दुश्मन जन्मने की बधाई आकै मोहे सुनावै
देव वृंद धर वायुरूप बन्दीघर को ध्यावै
जल्दी धरो अवतार प्रभु पद महोर सिंह कथ गावै
हो जावै भव पार जो कृष्ण कृष्ण रह्या गाय 4॥

भादोबदी रैन अंधेरी माधो जन्मे आधी रात ॥ टेक ।

तिथि अष्टमी वार बुधवार
बन्दी घर जन्मे कृष्ण मुरार
देव दुंद गिगन मँझार
बजैं करै पुष्पों की बरसात 1॥

वसुदेव देवकी बतलावैं
किसविध इसे भगवान बचावैं
घने चिंतातुर हो जावैं
चतुर्भुज रूप धरया यदुनाथ 2॥

शंख चक्र गदा पद्म धार
दिखाया विराट रूप करतार
बोले वचन उचार
सुन रहे तात और मात 3॥

नन्द घर मनै पहुंचाओ
यसोदा के पास लिटाओ
महोर सिंह योगमाया को ल्याओ
सब खुल गई हवालात 4॥


---- जय श्रीकृष्ण ----