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हरिश्चन्द्र

दोहा –
कर्म रेख टलती नहीं, हूणी है बलवान ।
धोम्य ऋषिजी दे रहे, धर्मपुत्र को ज्ञान ॥शिव॰


एक दिन ऋषियों की होने लगी तकरार ॥ टेक ।
हो कै खड़ा वशिष्ठ मुनि बोला
क्यों ऋषियों नै मचाया रोला
मेरी सुनो मैं सभी टिटोला
दुनिया के दातार 1॥

बल बैरोचन देखत आया
शिवि दधिची सब अज़माया
हरिचन्द सा एक ना पाया
जत सत का भंडार 2॥

मदनावती भूप की रानी
सुत रोहतास बड़ा विज्ञानी
सतवादी हैं तीनों प्राणी
साख्य भरै संसार 3॥

विश्वामित्र कहै अभी मैं जाऊं
हरिचन्द को जा अज़माऊं
महोरसिंह कहै नित गुण गाऊं
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
ऋषि मण्डल से चल पड़ा, विश्वामित्र महाराज ।
हरीचन्द का जायकर, सत देखूंगा आज ॥


बड़ गया बाग में जाय कै
मुनि धरकै रूप सूकर का ॥ टेक ।

भीषण रूप विकट है काया
घुर घुराय बागों में आया
बड़ कै बाग में शोर मंचाया
बागवान घबराय कै
भाग्या सब मारा डर का 1॥

बड़कर बाग उजाड़न लाग्या
कुसुमित विरवे पाड़न लाग्या
बागवान उसे ताड़न लाग्या
मारै दंड बगाय कै
करकै ओल्हा तरवर का 2॥

बागवान सुकर नै डाढ़े
घायल बना बाग से काढ़े
भाग चले मन में रिस बाढ़े
हरीचन्द से जायकै
दिया हाल सुना वनचर का 3॥

सुन राजा नै धोखा खाया
सूकर आज काहां से आया
ये क्या फिरी हरि की माया
महोर सिंह कह गाय कै
नहीं पता लगै उस घर का 4॥

दोहा –

बागवान के सुन वचन, हो घोड़ै असवार ।
हरीचन्द राजा चल्या, ले पांचों हथियार ॥


सूकर को फिरै निहारता
राजा चलकै बाग में आया ॥ टेक । (सांगीत)

घोड़े को दौड़ाये आया बाग बीच भूपाल
कपट सूकर नजर पड़ा रूप जाका विकराल
पैनी पैनी जाड़ और लंबे लंबे कंधवाल
धरती को उधण रह्या मारता फिरै करछाल
चहूं दिश घेरा बाग
सूकर जाय नहीं भाग
उठी हरीचन्द कै आग
शर भाल धनुष पर धारता
माहाक्रोध नृपति कै छाया 1॥


आगै आगैसूकर राजा पीछै पीछै लिया होय
घोड़े को दौड़ाये नृप बाग बीच रह्या टोय
देता है दिखाई कभी रूप को लेता ल्हकोय
बाग में भरमाया हरिचन्द घड़ी सवा दोय
सूकर कर कै छल बल
गया बाग से निकल
आगे हो के दिया चल
करछाल भरे भर मारता
सीधा वनखंड को धाया 2॥


सूकर हू कै गैल घोड़ा राजा नै दिया लगाय
बेसुम्मार भागो भाग वन में बड़ा है जाय
सूकर सेती मृग बना रूप लिया पलटाय
मृग सेती मुनि बना माया दई फैलाय
संग कन्या एक क्वाँरी
जल तलैया भरी न्यारी
नृप को प्यास लगी भारी
आया घोड़े को फटकारता
डट मुनी से वचन सुनाया 3॥


वन हू में कौन बैठा ऋषियौं के आकार
मृग आया किधर गया जल्दी करना निरधार
प्यास मोहे लग रही घोडा भी हुया लाचार
अंजल करूंगा जब मृग को लेऊंगा मार
बतला क्या तेरा नाम
यहां बैठा किस काम
नृप नै घोडा लिया थाम
हूणी को कोई नहीं टारता
पद महोर सिंह नै गाया 4॥

दोहा –
आ घोड़े से उतर तूं, बताऊँ अपना नाम । जिस कारण बैठा यहां, सुनिये मेरा काम ॥ जै शिव॰

नृप मैं ब्राह्मण धनहीन हूँ
तुम सुनियो बचन हमारा ॥ टेक ।

कौशिक नाम विप्र षटकर्मी
शमी दमी यमी शुची गृह्य शर्मी
सती सत्यवादी सतधर्मी
विद्या में परवीन हूँ
पढ़या वेद शास्त्र सारा 1॥

पुत्री मेरै सामरथ क्वांरी
ब्याहण जोग हुई पिता प्यारी
धन बिन होय रही लाचारी
इस कारण मैं दीन हूँ
धन बिन कुछ चलै न चारा 2॥

अब मैं अवध पुरी को जाऊं
हरीचंद को जा अजमाऊं
द्रव्य जाच राजा से ल्याऊं
मैं सतपात्र कुलीन हूं
है पर्व आज बड़ा भारा 3॥

घड़ी दोय मावस सोमारी
बीत्या जाय पर्व बड़ा भारी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी
चरणों कै आधीन हूँ
करो दीन जान निस्तारा 4॥

दोहा –
कपट मुनि के सुन वचन, हरीचंद माहाराज ।
नरपति उतरा तुरंग से, सत बाने की लाज ॥

हरीचंद तो मेराई नाम है
पर अब मैं जतन करूं क्या ॥ टेक ।

मैं शिकार खेलन को धाया
मुनिजी मुझको जाचन आया
थोड़ी देर महापर्व बताया
पास में नहीं छदाम है
संकल्प करूं हाथ धरूं क्या 1॥

पुरी अयोध्या दूर हमारी
थोड़ी देर मावस सोमवारी
घर मेरे की सम्पदा सारी
धर्म कै हेत तमाम है
अब खाली वचन भरूं क्या 2॥

उजड़ा बाग मरा सुना माली
तलबी कर चल्या घर से खाली
जेब में एक लोहे की ताली
मुनिजी वा किस काम है
बज्र दान दे धर्म हरूं क्या 3॥

आप मुनिजी कोई जतन बतावो
अटकी नैया पार लंघावो
महोर सिंह कह हरि गुण गावो
निज मंतर श्रीराम है
इसे त्याग और सुमरूं क्या 4॥ राम. राम. राम.

दोहा –
प्रथम पात्र मिलना कठिन, कन्या का उपकार ।
तीजे ति सोमावती, मत चूकै दातार ॥


ऐसा संजोग मिलै ना
राजन जल्दी कर कुछ दान ॥ टेक ।

एक घड़ी मावस रह रही है
लख गुण पुण्य श्रुति कह रही है
तिरवेणी धारा बह रही है
मत चूकै कहा मान
या माया संग चलै ना 1॥

यहां नृपति संकल्प ले लीजै
घर चल द्रव्य मोहे दे दीजै
परबी जाय देर नहीं कीजै
समै सधी है आन
इस बखत का दान रलै ना 2॥

खाली हाथ संकल्प नहीं करना
कुछ ना कुछ तो हाथ पै धरना
दान हाथ खाली का बरना
मुर्दे की समान
ऐसा दिया दान फलै ना 3॥

दातारों की यही परनाली
संकलप कभी न करते खाली
महोर सिंह धरी हाथ पै ताली
हूणी है बलवान
टारी किसी तरह टलै ना 4॥

दोहा –
बल नै सर्बस दे दिया, बैरोचन सिर तार ।
दधीचि नै अस्थि दिया, कीन्हा पर उपगार ॥


अजी एजी राजा देने लग्या है दान
कपट मुनी संकलप करवावै कुल की साख बखान ॥ टेक ।

विष्णु विष्णु हरि हरि कहै कै मुनि तीन बार
मन्त्र पढ़ जल हू के छींटे नृप कै दिये मार
शील संतोष श्रद्धा राजा नै लिये हैं धार
एक हाथ ताली और एक हाथ में लगाम
दान जब करने लग्या घोड़े को भी रह्या थाम
संकलप करवाय रह्या हो कै राजा निष्काम भावी है बलवान 1॥


कपट मुनि कहने लग्या सुन ले राजा कर कै कान
मेरे तेरे बीच पौन पानी धरती आसमान
गंगा जमना अठसठ तीर्थ साखी सूरज भगवान
दान देना कर कै राजा उल्टा मत जाइये हट
मांगूँ सो देना पड़ैगा नटै है तो अभी नट
वचन भरवाय लिये मुनि नै किया कपट
दई धर्म की आन 2॥


भर कै वचन बोल्या हरीचन्द दातार
विप्रौं कै निमित मेरा राजपाट भंडार
मांगा जा सो मांग ऋषि मेरै नहीं इन्कार
सुन कै वचन मुनि देने लग्या धन्यवाद
थारे बिना ब्राह्मणों को और कौन करै याद
आये होते सन्मान 3॥


कपट मुनि बोल्या राजा सौरण ल्यूंगा सौ भार
इतना खर्च मेरै परणाऊं कन्या च्यार
करा जा तो कर दे सत्यवादी मेरा उपगार
दान कर मंजूर बोल्या सत्यव्रती भूपाल
सौरण मैं सौ भार द्यूंगा अवधपुरी को चाल
महोर सिंह पद गावै बजैं तंबूरा खटताल
भारथ का आख्यान 4॥

दोहा –
कपट मुनि कहने लग्या, सुन राजा अज्ञान ।
राजपाट धन धाम तै, कर दिया सर्वस्व दान ॥

सर्बस दे दिया संकलप में बाकी कनक रहा सो भार ॥ टेक ।

जब तुम लगे संकलप करवाने
ताली संग दिये गये खजाने
तेरे नहीं हो गये बेगाने
धन के सब भंडार 1॥

जब संकलप की दई हिदात मैं
घोड़ा था तेरे बामे हाथ में
फौज भी गई घोड़े के साथ में
धर्म की नीति विचार 2॥

दान प्रतिष्ठा में भूमि सारी
तेरी नहीं हो गई हमारी
जो राजन तुझे है इनकारी
जा वचनौ को हार 3॥

बाकी कनक करज सो भारा
तेरै सिर रह रहा हमारा
महोर सिंह कथ छंद उचारा
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
सर्बस संकल्प कर दिया, रहा कनक सो भार ।
इस बिध पूरा करूंगा, कहन लगे दातार ॥

मैं इस बिध करज चुकाऊंगा
तुम सुनियों अरज हमारी ॥ टेक ।

बेशर राणी के सिंगार की
मोल कनक चालीस भार की
घर चलते ही पतिभर्ता नार की
नक बेशर कढ़वाऊंगा
अर्पण करूं नहीं इनकारी 1॥

बाकी साठ भार रहा सोना
पूरा और तरह मुश्किल होना
वचन हारना जन्म डबोना
ऐसी बिधि बनाऊंगा
तुम सुनो बचन तपधारी 2॥

एक तो मैं एक सुत एक रानी
बाकी तीन रहे हम प्रानी
साठ भार मैं ए मुनि ज्ञानी
बेचो वहां बिक ज्याऊंगा
ले चलो जहां खुशी तुम्हारी 3॥

बल नै दान बावन को दीन्हा
ऊं भी देह से पूरा कीन्हा
महोर सिंह नै शरणा लीन्हा
जन्म जन्म गुण गाऊंगा
प्रभु करियो पार निवारी 4॥

दोहा-
घोड़ा ताली दे दिये, कपट मुनि कै हाथ ।
अवधपुरी को आये नृपति, मुनि को ले कै साथ ॥


राजा नै रानी बुलवाई
महलों से बाहर खड़ा होके ॥ टेक ।

देखी खड़ी मदनावती रानी
बोल्या वचन हरीचंद दानी
प्रभु की माया कनी ना जानी
हाण लाभ सुख दुखदाई
रानी भोग जोग कर्मों के 1॥

मैं सर्बस का संकल्प कीन्हा
इस ब्राह्मण को दान दे दीन्हा
सो भार कनक करज कर लीन्हा
ऋण हत्या सिर पै छाई
तजो सुख सेज महलों के 2॥

नक बेसर सतवंती तेरी
तोली हल्की मोली घनेरी
भार चालीस की ऋण हत्या मेरी
दे दे काढ़ उतार ज्याई
रानी सत में सुरत संजोय कै 3॥

बाकी कनक रहया साठ भार में
हम कहीं चल बिकैगें बाजार में
इस बिध करजा दूं उतार मैं
महोर सिंह लीला गाई
घर बड़ूं ऋण हत्या धो कै 4॥

दोहा-
रानी नै सुन कर वचन, बेशर धरी उतार ।
अर्पण कर दई मुनि कै, बोली वचन उचार ॥


सर्वस का दान कर दिया पिया लिया जीवन जन्म सुधार ॥ टेक ।

जब यो जीव जगत में आता
पोट बांध नहीं धन की लाता
पूर्व जन्म फल भोग्या जाता
कर्मों के अनुसार 1॥

अब कुछ करै सो आगै पावै
वेद शास्त्र ऐसै गावै
जो कोई करज राख़ मर जावै
पड़ै वो नरक मंझार 2॥

बाकी दान करज रहया तुझको
हर तरह देना चहिये दुज को
चाहे जहां बेच लो मुझको
मत जाइयो सत हार 3॥

सत हारे सेपत जाती है
सत प्राणी का संगाती है
महोर सिंह रानी समझाती है
पति को बारंबार 4॥

दोहा-
राजा नै बुलवा लिया, अपना पुत्र रोतास ।
सर्वस दान जिस विध किया, सुनाया सब इतिहास ॥


पिता अंजल नहीं करैंगे जबतक पूरा हो नहीं दान ॥ टेक ।

जन्म धर्म के कारण लीन्हा
धर्महीन का विरथा जीना
बिन दिये दान पिता जल पीना
मदिरा के सामान 1॥

जब से पिता धर्म किया धारण
सतवादी लगे नाम उचारण
सत नहीं तजै धरम के कारण
बेशक जावो प्राण 2॥

पिता जी उदक्या दान दिये बिन
ब्राह्मण का सनमान किये बिन
अंजल करै आशीष लिये बिन
पड़ैं नरक की खान 3॥

चाहे जहां शरीर बिकावो
पहले विप्र का करज चुकावो
महोर सिंह कहै हरिगुण गावो
सत राखैं भगवान 4॥

दोहा-
कपट मुनि कहने लग्या, सुन राजन दातार ।
क्या तो करज चुकाय दे, क्या वचनों को हार ॥


सुना था मैंने सतवादी तेरा नाम ॥ टेक ।

जाचण आया करकै आश मैं
अब जांगा होकर निराश मैं
मुझको तो नृप तेरे पास मैं
दीखै नाहीं छदाम 1॥

तेरे घर दीखै कंगाली
जांचक्षा पड़ी मेरी खाली
वचनहार ले अपनी ताली
घोड़े की पकड़ लगाम 2॥

वचन हार क्या पूरा कर तूं
साठ भार का पेटा भर तूं
अब चलने की सूरती धर तूं
लिये फिरूँ गाम ही गाम 3॥

साठ भार कोई मोल जो लावै
वो खरीद तुमको ले जावै
महोर सिंह नित उठ गुण गावै
सत रखियो घनश्याम 4॥

दोहा-
हरिचंद कहने लग्या, सुनो मुनि महाराज ।
ताबेदार आगै खड़ा, कहीं ले चलो आज ॥

ले चलो जहां खुशी तुम्हारी
आगै खड़े तीनों प्राणी ॥ टेक ।

राजा कहै सत नहीं हारूंगा
साठ भार को नहीं मारूंगा
बह-बह तेरा कर्ज तारूंगा
मैं बिन करज उतारीं
अन खाऊं ना पीऊं पानी 1॥

रानी कहै मैं देह बिकाऊं
देह बेचकर कर्ज चुकाऊं
पिया पहले नहीं अंजल पाऊं
मैं पतिभर्ता नारी
सतवादी भूप की रानी 2॥

कहै रोताश सुत वही कहावै
पिता अपने का कर्ज चुकावै
जो या मेरी देह बिक ज्यावै
ऋण हत्या धोऊं सारी
कर कर कै टहल बिगानी 3॥

सुन सुन वचन रोवैं पुरवासी
सारे शहर में छाई उदासी
महोर सिंह कह सर्ब सुखरासी
हरीचन्द सतधारी
सत हेत तजी रजधानी 4॥

दोहा-
तीनों प्राणी चल पड़े, मुनि के पीछै होय ।
मन में धोखा धर रहे, पुरवासी रहे रोय ॥


अयोध्यावासी रूदन करैं नरनार ॥ टेक ।

सर्वस राजपाट रजधानी
तज राजा हो लिया अगवानी
सत के कारण तीनों प्राणी
छोड़ चले घरबार 1॥

सर्वसुख तजे धर्म नहीं त्यागे
काशी जी कै रस्तै लागे
पुरवासी पीछै हो भागे
करते हा-हाकार 2॥

भूप कहै सुनो सारी परजा
उल्टी अपने अपने घर जा
मेरे सिर पर रह रह्या करजा
साठ कनक के भार 3॥

जो फसै मोह की फांसी
पड़ै भोगनी लख चौरासी
कहै महोर सिंह सकल पुरवासी
उल्टे हुये सिर मार 4॥

दोहा -
पुरवासी सब आ गये, करते हा-हाकार ।
काशी कै रस्तै लगे, हरीचन्द दातार ॥


चलते हुये नृप को होय गये मध्यान ॥ टेक ।

आगै राजा पीछै रानी
पीछै कंवर उमर है यानी
लग रही प्यास तड़प रहे प्राणी
तपै गिगन में भान 1॥

पड़ै धूप धरा अंबर जलते
पैंड पैंड पर बैठते चलते
इधर उधर मार्ग से टलते
होय रहे हैरान 2॥

पड़ा फांसला चलते आते
ना वै आपस में बतलाते
पग जलैं अंग पसीने जाते
अग्नि बेपरमान 3॥

कपट मुनि कर आँख मिचाई
आगै चल माया दरशाई
महोर सिंह नै लीला गई
सत रखियो भगवान 4॥

दोहा-
कपटमुनि नै छल किया, लिया रूप पलटाय ।
सत देखन के कारनै, प्याऊ दई बैठाय ॥


आ बैठ यहाँ आराम कर
जल पीकर मुसाफिर जाना ॥ टेक ।

शीतल छाया मीठी प्याऊ
आ जल पी ज्या पंथ बढ़ाऊं
एक मुसाफिर गया अगाऊ
मेरे पास विश्राम कर
चहिये तुझको भी आना 1॥

कपट मुनि की सुनकर वाणी
हरिचंद कहै पीऊं ना पानी
मेरे पास नहीं कोडी कानी
क्या लेगा मोहे थाम कर
अन्न जल बुरी वस्तु समाना 2॥

मेरा कर्ज विप्र का ताजा
सोरण साठ भार अंदाजा
मैं हूँ अवधपुरी का राजा
नृपति हरीचन्द नाम कर
सर्वस का कर दिया दाना 3॥

अब मैं अवधपुरी को जाऊँ
देह बेचकर कर्ज चुकाऊँ
महोर सिंह कहै उल्टा आऊं
कर्जा दूर तमाम कर
जब करूंगा यहाँ जलपाना 4॥

दोहा-

इतनी कहकर चल पड़ा, हरीचन्द दातार ।
देखी रानी आवंती, बोला वचन उचार ॥

राजा तो पी गया पानी रानी तुम भी करो जलपान ॥ टेक ।

बड़ी दूर से चली आती है
पड़ै धूप काया जली जाती है
जो कदाचित शर्माती है
मेरी तो पुत्री समान 1॥

जल पी ले मदनावती रानी
यहीं पी गया हरीचन्द दानी
आगै दूर मिलैगा पानी
है उजाड़ बियाबान 2॥

धूप पड़ै अंग पसीना दर्शै
जल बिन तेरा प्राणी तरसै
जिस घड़ी बिकन चली तू घर सै
हो चुका पूरा दान 3॥

जलाधार प्राणी कहलाता
जल बिन जीव तड़फ मर ज्याता
महोर सिंह उठ गुण गाता
सत रखियो भगवान 4॥

दोहा-
मदनावती कहने लगी, सुनो मुनि महाराज ।
उदक्या दान दिये बिना, जल नहीं पीऊं आज ॥


मैं कहो कैसे जलपान करूं
पतिभर्ता नाम है मेरा ॥ टेक ।

मैं पति की आज्ञा पाये बिन
अंजल करूं नहीं न्हाये बिन
सवा पहर आसन लाये बिन
रवि का कैसे ध्यान धरूँ
पति पहूंच्या दूर घनेरा 1॥

धर्मादे का बिप्र तेरा पानी
पीवै नहीं मदनावती रानी
मेरे पास नहीं कोडी कानी
काहे से सन्मान करूं
जल हेत बिप्र मोहे टेरा 2॥

साठ भार हमारे सिर सोना
बिना दिये पानी पीवो ना
धर्म हारना जन्म डबोना
धर्म हित त्यागन प्राण करूं
पर जल पीऊँ नहीं तेरा 3॥

इतनी कह पतिभर्ता नारी
पति अपने की गैल पधारी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी
नित नये छंद बखान करूं
हुया दिल का दूर अंधेरा 4॥

दोहा-
इतने में प्याऊ निकट , पहोंचि गया रोताश ।
जल का लोटा बिप्र ले , गया कंवर के पास ॥

राजा रानी तो पी गए तुम भी जल पीवो रोताश ॥ टेक ।

बड़ी दूर से चलकर आया
सारै अंग पसीना छाया
हुया विकल कुमला रही काया
लग रही होगी प्यास 1॥

शीतल छाया ठंडा पानी
पीवो कंवर सुख पावै प्राणी
अभी गये हैं राजा रानी
डटकर मेरै पास 2॥

जिस रस्तै तुमको है जाना
कांशी तक फिर जल नहीं आना
पड़ै धूप हो रहे मध्याना
जलै धरती अक्काश 3॥

जो कोई इधर मुसाफ़िर आता
इसी जगह जल पी के जाता
महोर सिंह कथ कथ के गाता
भारत का इतिहास 4॥ जय शिव॰

दोहा-
दानीसुत कहने लगा, किसबिध हो जलपान ।
उदक्या दान दिये बिना, जल मदिरा की समान ॥


कैसे जल पीऊँ पूरा हुया नहीं दान ॥ टेक ।

समरथ पिता और महतारी
जल पी गये भली बात बिचारी
सामरथा मुनि नहीं हमारी
किस बिध हो जलपान 1॥

मुनि जी मेरा पिता जती है
पतिभर्ता मेरी मात सती है
जती सती कै ना दोष रती है
साखी बेद पुराण 2॥

हूँ नादान मति मेरी यानी
समरथ हुया नहीं मुनि ज्ञानी
बिन दिये दान पीऊं ना पानी
बेशक जाओ प्राण 3॥

द्यो आशीष ऐसी तपधारी
जल्दी बिक जा देह हमारी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी
पत्य रखियो भगवान 4॥

दोहा-
तीनों प्राणी मुनि संग, चले जो दिन और रात ।
काशी पहुंचे जायकर, उगमते परभात ॥


जा काशी बीच बाज़ार कै
खड़े कर दिये तीनों प्राणी ॥ टेक ।

बीच शहर चौसर बाज़ार
वहाँ खड़ा हो रुक्का मारा
प्राणी तीन बिकाऊ हमारा
चाहत हो किसी साहूकार कै
तो चहिये कीमत करवानी 1॥

अवधपुरी के हम व्योपारी
करै मालकी कोई ख़रीदगारी
फिर ऊंचे स्वर आवाज मारी
बाज़ार बीच नरनार कै
जब भिनक पड़ी है कानी 2॥

सुनी आवाज़ खरीदा आये
चौतरफा खड़े घेरा लाये
देख देख सब धोखा खाये
सुंदर रूप निहार कै
नैनो में भरण लगे पानी 3॥

कौन ये तीन पिरानी बिचारे
तुम हो कौन इन्हे बेचन हारे
महोर सिंह कह न्यारे न्यारे
कह दो दाम बिचार कै
कितने में बेचन की ठानी 4॥

दोहा-
कपट मुनि कहने लगा, सुनो सकल बाज़ार ।
इनके सिर कर्जा मेरा, साठ कनक के भार ॥


प्राणी है महंगे मोल के
कोई लेगा लेने वाला ॥ टेक ।

ज्वान पुरुष बल में भरपूर है
हृष्ट पुष्ट बलि रण में शूर है
विद्या नीति निपुण जरूर है
देखो तो सही दृग खोल के
कैसा सुंदर रूप विशाला 1॥

सर्वगुण पूरण है या नारी
इसको भी देखो परजा सारी
रूप की मानो खराध उतारी
बेहमाई नै घड़ छोल के
अनुपम शशी बदनी वाला 2॥

बालक की भी देखो सूरत
गौर वर्ण माधुरी सी मूर्त
तीनों की जिसे होय जरूरत
साठ भार द्यो तोल के
द्यूँ बेच इन्हे तत्काला 3॥

जो कोई खरीदै न्यारा न्यारा
एक एक सिर बीस बीस भारा
महोर सिंह हरि नाम सहारा
ग्रंथो में लिखत टटोल के
कथै भाषा छंद निराला 4॥

दोहा-
उल्टे ग्राहक हट गए, सुने साठ कनक के भार ।
तीनों प्राणी रो रहे, खड़े वै बीच बाज़ार ॥


लगी मोल करावन राणी का
इतने में एक वेश्यां आ कै ॥ टेक ।

मुनि कहै या तिरिया अनमोली
बीस भार की इस पर बोली
ल्यूंगा माया तराजू तोली
फरक न कोडी काणी का
ले जाइयो दाम चुका कै 1॥

वेश्यां कहै धन इतनाईं द्यूंगी
इतने काम मैं इससे ल्यूंगी
चाहे जाहां बाजार भेजूंगी
बना कै वेश दीवानी का
अपना सा रूप सजा कै 2॥

ईतर फलेल रमाया करिये
पान मिठाई खाया करिये
बैठी मौज उड़ाया करिये
सुख लहो जीवन ज़वानी का
नित नये नये पति बनाकै 3॥

निवार के पलंगौ पर सोना
तकिये तोशक करो बिछोना
मैं तेरे सैं करवावौं ना
धंधा रोटी पानी का
पद महोर सिंह कह गाकै 4॥

दोहा-
वेश्यां ने मँगवा लिये, बीस कनक के भार ।
आगै रख दिये मुनि कै, बोली नृप की नार ॥


वेश्यां को मत नहीं बेचो मुनि जी मैं पतिभर्ता नार ॥ टेक ।

जात वशवां करनी खोटी
इसकी बिरति जा नहीं ओटी
और मुनी जी छोटे से छोटी
कर लूंगी सब कार 1॥

वचनो को मैं नहीं हारूंगी
चरण आपके चुचकारूंगी
बह-बह तेरा करज तारूंगी
मेरा भी धर्म उबार 2॥

बिकने से मोहे ना इनकारी
बेचो जहां मरजी हो तुम्हारी
पर वेश्यां कर्म पतिभरता नारी
किस बिध लेगी धार 3॥

बीस भार जहां मिल ज्या तुझको
धर्म भी रहै बेच वहां मुझको
महोर सिंह न्यू राणी दुज को
कह रही बारंबार 4॥

दोहा-
वेश्यां नै अर्पण किये, बीस कनक के भार ।
राणी का कर गह लिया, बोली वचन उचार ॥


मैं नहीं छोडूँ तुझे मुझे सर्बस देना मंजूर ॥

जितना ऋषि ने मांगा सूना
दे दिया और द्यूं इससे भी दूना
तिगुने चौगुने तक भी हटूं ना
हूं धन में भरपूर 1॥

बीस भार दिया आगै तेरै
हमसे काहे को मुख फेरै
अब तूं चलै नहीं घर मेरै
क्या तेरा मकदूर 2॥

ना मैं वेश्यां कर्म कराऊं
न कहीं शहर बाज़ार खंदाऊं
करा जाय उतना करवाऊं
घर का काम जरूर 3॥

जो सौदे को नटै व्योपारी
लगैगी राज में अर्जी हमारी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी
गावै बजा तंबूर 4॥

दोहा-
कपट मुनि कहने लगा, सुन पतिभर्ता नार ।
क्या वेश्यां कै संग जा, क्या वचनौ को हार ॥


मैं तो इस वेश्यांई कै संग जाऊंगी
महाराज वचन नहीं हारू ॥ टेक ।

द्रग भर पुत्र मांत नै जोया
माता को देख पुत्र भी रोया
होने लगा माँ पूत बिछोया
कह भटक-भटक मर जाऊंगी
आ लाल तुझे पुचकारूं 1॥

रोहित पुत्र भाग के आया
माता नै छाती कै लाया
दोनों का हिरदा उझलाया
फिर कब देखन आऊंगी
आगे सै आज बिसारूं 2॥

बिछड़त देख पुत्र और रानी
भर रह्या नैन हरीचंद दानी
हाथ जोड़ रानी बोली बानी
फिर कब दर्शन पाऊंगी
पिया आवो चरण चुचकारूं 3॥

वेश्यां मोल ले चली हमको
कोई ना कोई खरीदैगा तुमको
महोर सिंह डाटियो धरम को
जन्म-जन्म गुण गाऊंगी
आज्ञा दो सजन सिधारूं 4॥ राम शिव.

दोहा
पति की आज्ञा पायकर, चली पतिभर्ता नार ।
हिया बज्र का कर लिया, दिये पति पुत्र बिसार ॥


पति पुत्र को छोड़ गयी वेश्यां कै संग रानी ॥ टेक ।

मात मात रोतास पुकारै
नैन भरे भर आँसू डारै
खड़ा खड़ा चहुं ओर निहारै हरीचंद दानी 1॥

इतने में चलकै सेठ एक आया
बैजनाथ वो नाम कहाया
बीस भार की ले रह्या माया
संग है सेठानी 2॥

यो बालक मुनि हमको दीजै
निपुत्रों ऊपर किरपा कीजै
बीस भार सौरण ले लीजै
तरस रहे प्राणी 3॥

बिना पुत्र कुल में अंधेरा
सर्वस फ़ीका पड़ गया मेरा
महोर सिंह भाषा पद टेरा
अवगति ना जानी 4॥

दोहा-
बीस कनक के भार दे, लिया खरीद रोताश ।
एकला राजा रह गया, भर भर मारै श्वास ॥


बर्बाद किया घर मेरा
तैं कैसी करी विधाता ॥ टेक ।

राजा सेती रंक बनाया
ल्या काशी कै बीच बिकाया
दारुण दुख हम पै बरसाया
बिखा तैं हम में गेरा
कहां कंवर कंवर की माता 1॥

मेरा भी गाहक बेग खंदाओ
पापण काया को बिकवाओ
घणी देर मोहे मतै सताओ
मैं हरिजन हूं तेरा
चरणों का दास कहाता 2॥

इतने में एक गाहक ललकारा
बीस कनक के ले रह्या भारा
है चिंडाल वर्ण मुनि हमारा
नाम कालिया टेरा
तेरा माल खरीदा चाता 3॥

भंगी की है जाति हमारी
इससे कार करवाऊंगा सारी
महोर सिंह प्रभु शरण तुम्हारी
चरण कमल का चेरा
हरदम तेरे गुन गाता 4॥

दोहा-
मुनि कहै ले लीजिये, चुका के मेरा दाम ।
कालु कहै जब ल्यूं इसे, इतने ओटै काम ॥


मैं इतने काम कराऊंगा
तुम विरति सुनो हमारी ॥ टेक ।

प्रथम उठना होगा सबेरी
देनी पड़ैगी हाजरी मेरी
जब मैं कार बताऊंगा तेरी
जहां जहां तुझे खंदाऊंगा
कर सकैगा नहीं इनकारी 1॥

मेरा सा बाना होगा धारना
नित उठ काशीपुरी बुहारना
मुर्दौं का हो कफन उतारना
दिन भर पानी भराऊंगा
और रात की चौकीदारी 2॥

मुरदघाट से महसूल ल्याना
तीन बख़्त तुझे होगा जाना
दुकान से कर खाना पाना
बनियां तुझे बताऊंगा
जीमों जो खुशी तुम्हारी 3॥

इतने काम हो मंजूर तुझको
सोच समझ दे जवाब मुझको
बीस भार दे सोरण दुज को
घर अपनै ले ज्याऊंगा
दे महोर सिंह बलिहारी 4॥

दोहा-
हरीचंद ने कर लिए, सभी काम मंजूर ।
बीस भार सौरण दिया, हुये साठ भार भरपूर ॥

हरीचन्द राजा को मोल ले गया कालू चिंडाल ॥ टेक ।

सुख दुख हाण लाभ जग माहीं
कर्मों के फल भोगे जाहीं
अणहूणी होने की नाहीं
हूणी की नहीं टाल 1॥

विप्र का सूकर रूप बना कै
हूणी बड़ी बाग में जा कै
जाच्या भूप ऋषि नै आकै
क्या कुछ था कंगाल 2॥

राजा टहल रंक की करता
वेश्यां की बाँदी पतिभर्ता
पल में देता पल में हरता
राजपाट धनमाल 3॥

था पुत्तर प्राणों से प्यारा
माँ बापों से कर दिया न्यारा
महोर सिंह नै लिया सहारा
करो हरी प्रथपाल 4॥

दोहा-
विश्वामित्र नै कनक सब, वहां से लिया उठाय ।
जा काशी के बीच में, सदाबरत दिये लाय ॥


दोहा-
कालूनै ले ज्याय कर, बतला दई दुकान ।
हरिया यहां से लीजिये, चाहिये सो सामान ॥


करने लगे तीनों अपनी अपनी कार ॥ टेक ।

कर लिए बरत अन्न नहीं खाते
अपनी अपनी टहल बजाते
कालू का जल भर भर ल्याते
हरीचन्द दातार 1॥

जितनी ओटी कार गुजारी
करैं और भी करते सारी
हो गयी पतिभर्ता नारी
वेश्यां की पनिहार 2॥

उगत भानू जल भरने लागै
सतवंती सत को नहीं त्यागै
सुत रोताश खड़ा रह आगै
बणियां कै हरबार 3॥

बैजनाथ हरि भगत कहाता
सुत रोताश पुष्प नित लाता
महोर सिंह नित उठ गुण गाता
राम नाम अधार 4॥

दोहा-
तीन दिवस नृप को बहे, किया न अन-जलपान ।
खाय तिवाला गिर पड़ा, उस दिन चढ़ा दुकान ॥


लालाजी जल्दी दीजै मुझको मांगू सो समान ॥ टेक ।

मैं हरिया कालु का चेरा
तेरी बही में नाम मेरा गेरा
आज भूख का मारा मेरा
निक्स्या जां हैं प्राण 1॥

क्या तो दीजै चना चबीना
क्या पाव भर मोहे सत्तू दीना
इसका दाम मेरे सैं लीन्हा
लिखो उधार बयान 2॥

जो जिसका ले माल उधरा
सहस्त्र जन्म भी जा नहीं मारा
जो अबकै नहीं गया उतारा
तो अगले जन्म द्यूं आन 3॥

बणिया कै निश्चय कर दीन्हा
सत्तू तुला पाव भर लीन्हा
महोर सिंह नै सुमरण कीन्हा
सत रखियो भगवान 4॥

दोहा-
सत्तू ले श्रीगंग तट, नरपति पहौंचे जाय ।
पहौंचे विश्वामित्र जी, मंगत रूप बनाय ॥


कुछ बांट कै खाइये खुध्या सतावै महाराज ॥ टेक ।

काशीपुरी में मैं फिर लीन्हा
नहीं किसी नै भोजन दीन्हा
तीन दिनों से नहीं अंजल कीन्हा
प्राण मुक्त हुये आज 1॥

सुनकर वचन भूप सुख पाया
मौके पर अभ्यागत आया
आधा सत्तू बांट जिमाया
सत बाने की लाज 2॥

जीम कै बोल्या कपट भिखारी
अधजीमे का दोछण भारी
जो या पत्रावली देदे सारी
भूख हमारी जा भाज 3॥

सतवादी नै सत नहीं हारा
सत्तू जिमा दिया हैं सारा
महोर सिंह प्रभु दास तुम्हारा
करियो पार जिहाज 4॥

दोहा-
भोजन सकल जिमा दिया, किया गंगाजल पान ।
निराहार नृप रह गया, कालू के अस्थान ॥


  जल भरे चली आ रही थी एक दिन मदनावती रानी ॥ टेक ।

इधर से बैजनाथ जी लाला
श्रीगंगा जी न्हाने चाला
दिख्या पुत्र खरीदन वाला
नैन भरे पानी 1॥

डट कै सेठ पूछन लग्या बाता
क्यों तेरा हिरदा उझला आता
बोलै है बोला नहीं जाता
हुई गद गद बानी 2॥

रानी का जब सिर पुचकारा
धीर धार कै वचन उचारा
था पुत्तर प्राणों से प्यारा
तरस रहे प्रानी 3॥

कहो किस तरह पुत्र है मेरा
जिसने लिया आसरा तेरा
महोर सिंह चरणों का चेरा
अवगति नहीं जानी 4॥

दोहा-
रानी के सुनकर बचन, बैजनाथ साहूकार ।
सिर पुचकार कहने लग्या, मन में धीरज धार ॥


पुत्री तेरा पुत्र आनंद में
हरदम मेरे पास रहै है ॥ टेक ।

है वो पूत सपूत तुम्हारा
मोहे लगै प्राणों से प्यारा
उस सपूत के पीछे थारा
मिल गया सीर समंद में
क्यों नैनीं नीर बहै है 1॥

गंगा न्हा आने दे मुजको
दूर करूं मैं तेरे रुजको
मैं पुत्री छोड़ू नहीं तुजको
उस वेश्यां के फंद में
बोल और क्या बात चहै है 2॥

जल्दी न्हाय गंग से आऊं
आते ही वेश्यां के घर जाऊं
बीस भार सौरण दे ल्याऊं
कटवा द्यूं तेरी बंध मैं
फिर भी क्यूं जिगर दहै है 3॥

अब पुत्री मत नैन बहावै
तेरा पुत्र तुझको मिल जावै
महोर सिंह सत कथा सुनावै
कथ भाषा के छंद में
सतगुरु के चरण गहै है 4॥

दोहा-
सात दिवस मोहे हो लिये, बैठी हूं निराहार ।
जल पी पीकै कर रही, उस वेश्यां की कार ॥


मैं जन्म जन्म गुण गाऊंगी
जो बंध कटा दो मेरी ॥ टेक ।

तुम हो सेठ धर्म अवतारी
करो धर्म की पार निवारी
जीऊं जब तक पिताजी थारी
कहो सो टहल बजाऊंगी
खड़ी आगै रहूं हरबेरी 1॥

दिनभर तो पाणी भरती हूं
रात को पगचंपी करती हूं
सात दिनों की मैं बरती हूं
पतित अन्न नहीं खाऊंगी
कर द्यूं हाडौं की ढ़ेरी 2॥

नारी का पति पुत्र बिछरना
यही महादारुण दुख बरणा
मैंने लिया आपका शरणा
और किसे विपत सुनाऊंगी
धर्म पिता मैं पुत्री तेरी 3॥

जल्दी न्हाय गंग से आइयो
धरम पिता मत देर लगाइयो
महोर सिंह धीर बंधाइयो
भटक भटक मर जाऊंगी
जो ला दोगे तुम देरी 4॥ राम॰

दोहा-
रानी वेश्यां घर गयी, गंगाजी साहूकार ।
जल्दी न्हाकर आ गया, जरा न लाई बार ॥


बीस भार ले माया वेश्यां के घर गया साहूकार ॥ टेक ।

बोला वचन सेठ धर्मधारी
सुनले अर्ज पिंगला प्यारी
हमको मोल देदे या नारी
जो तेरै पनिहार 1॥

जितना तैने कनक दिया है
उतना मैं तैयार किया है
वेश्यां कहै सेठजी या है
निमक हरामण नार 2॥

ना या मेरै काम करती है
ठाली पड़ी पेट भरती है
ना इससे कुछ भी सरती है
मेरे घर की कार 3॥

इसे सेठजी तुम ले ज्यावो
छूटै तो मेरी गैल छुटावो
महोर सिंह कहै नित गुण गावो
सुध लेंगे करतार 4॥

दोहा-
वेश्यां कै अर्पण किए, बीस कनके भार ।
रानी को संग लेय कर, घर आया साहूकार ॥


मिले पुत्र और माता जिनके आनंद भरे शरीर ॥ टेक ।

सात दिनों में पुत्र की प्यारी
फिर भी आन मिली महंतारी
नैनी नीर हो गये जारी
रोवैं धरैं न धीर 1॥

पुत्र कहै माता से रोकर
पिता हुया भंगी का नौकर
तैने माता बांदी होकर
भरा वेसां का नीर 2॥

माता नै जब सिर पुचकारा
धीर धारकर वचन उचारा
कोई नहीं सुत मेटन हारा
जो लिख दिया तक़दीर 3॥

आज पुत्र मुख देखकै तेरा
सर्वदुख दूर हो गया मेरा
महोर सिंह भाषा पद टेरा
राम भजन में सीर 4॥

दोहा -
रामलाल पूजा करै, सेठ मंदिर के मांय ।
पुष्प लावै रोताश नित, रानी जल दे ल्याय ॥


रोहित सुत राजा राणी को
बिके हो लिया एक महीना ॥ टेक ।

राजा नित उठ सत्तू ल्याता
गंगघाट पर चलकर जाता
मौका देख मुनिजी आता
अजमावन उस दानी को
सत्तू दिया सत नहीं दीन्हा 1॥

विश्वामित्र नित आसपास में
हरदम रहता है तलाश में
सतवादी नृप महात्रास में
बिगाड़ै नहीं ज़िंदगानी को
तज्या अन, जल ही जल पीना 2॥

तीस दिवस भूपति को बीता
निराहार जल ही जल पीता
सातों स्वर्ग भूप नै जीता
भय इंदर इंद्राणी को
कभी स्वर्ग जाय नहीं छीना 3॥

पेट बांध जल भरने जावै
गोडीं धर धर घड़ा उठावै
महोर सिंह नहीं पार बसावै
हुई महात्रास प्राणी को
नहीं उठै घड़ा पच लीना 4॥

दोहा-
घड़ा उठै नहीं भूप से, होय गया लाचार ।
मणिकणिका घाट पै, देखैं सब नरनार ॥


नहीं घड़ा उठता जल का राजा होय रह्या लाचार ॥ टेक ।

राजा बैठ घड़े को ठाता
ठाकै गोडौं पर ठहराता
सिर ऊपर नहीं ल्याया जाता
पच हारा कई बार 1॥

कभी उठावै नीचे उतारै
कभी नीर धरणी में डारै
कभी खड़ा हो रुक्के मारै
हरीचंद दातार 2॥

हमको घड़ा उठा दो भाई
भला करैगी गंगा मांई
जरा घड़े कै हाथ लगाईं
हो मेरा उपकार 3॥

सुन सुन नरनारी चले जाते
नीच घड़ा हम नहीं उठाते
महोर सिंह नित उठ गुण गाते
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
इतने में मदनावती, गई जो भरने नीर ।
धर दिया घड़ा उतारकर, गंगाजी कै तीर ॥


खड़ी खड़ी रानी पति को निरख रही ॥ टेक ।

तेरी गति प्रभु कनी ना जानी
रंक बना दिये राजा रानी
छठी को ढले पासे रम्माणी
कर्मों की कलम बही 1॥

वही है या मदनावती रानी
वेश्यां का भरती है पानी
देता दान हमेशा दानी
नृप हरीचंद वही 2॥

होती ना कभी मन की विचारी
हूणहार तो टरै न टारी
और बात हैं झूठी सारी
कर्मों की लिखत सही 3॥

पल में उजड़ करै पल में बसावै
राजा सेती रंक बनावै
महोर सिंह कुछ पता न पावै
तेरा पार नहीं 4॥

दोहा –
दृष्टि पड़ी हरीचन्द कै, मदनावती निज नार ।
अधोदृष्टि नृप नै करी, बोला वचन उचार ॥

नहीं घड़ा उठता जलका रानी मेरा निर्बल हुया शरीर ॥ टेक ।

जिस दिन से हम आए काशी
दिन हुये तीस मोहे अनग्रासी
पेट बांधकर निरणाबासी
दिनभर भरता नीर 1॥

  अन्न नहीं खां जल ही जल पीता
जल कै सहारे फिरता हूं जीता
आज मोहे आधा दिन बीता
गंगाजी कै तीर 2॥

आज मोहे कालू मारैगा
मारे सै भी नहीं सारैगा
नौकरी से भी मुजको तारैगा
पोच मेरी तकदीर 3॥

रानी मेरा घड़ा उठा दे
उठा के सिर ऊपर धरवा दे
महोर सिंह कहै कौन बंधा दे
डिगी में हरि बिन धीर 4॥

दोहा –
मदनावती कहने लगी, जल भर आये नैन ।
बिगड़ी में बलमा मेरे, अपणा कोई भी हैन ॥

तेरे पास घड़ा चिंडाल का
मैं कैसे हाथ लगाऊं ॥ टेक ।

बिगड़ी में पुत्र अर्धंगी का
भरोसा नहीं साथी संगी का
तेरै पास घड़ा ...... का
मैं ब्राह्मण रामलाल का
पूजा हेत जल ले जाऊं 1॥

ना मैं पिया पास थारै आऊं
ना मैं हाथ घड़ा कै लाऊं
पर मैं खड़ी खड़ी जत्न बताऊं
सतवादी भूपाल का
बुद्धि सैं घड़ा उठाऊं 2॥

ठोड़ी सीवाना जल में जाकै
घड़ा भरो नीचे कूं आकै
धरो शीश पर गोता खाकै
सहारा ले जल झाल का
इस बिधि से सिर पुचाऊं 3॥

घड़ा ठाय सतवादी राजा
शनै शनै जल बाहर आजा
महोर सिंह कहै बजा कै बाजा
तम्बूरा खड़ताल का
नित सत की कथा सुनाऊं 4॥

दोहा –
शिक्षा निज भरतार कूं, रानी दई सुनाय ।
उसी रीत से भर घड़ा, नृप नै लिया उठाय ॥

चाल्या सतवादी धर कै शीश घड़ा ॥ टेक ।

उठा कै घड़ा हरीचंद चाला
देही भीगी शरीर हाला
ठोकर लगी खा गया तिंवाला
रस्ते जाय पड़ा 1॥

पड़ते ही घड़ा नीर का फूटा
सारे अंग पसीना छूटा
हाथ टेक मुश्किल सैं उठा
नृपति हुया खड़ा 2॥

धीरज धर हरीचंद उठ ध्याया
चला-चला कालू घर आया
कालु रोष भर बचन सुनाया
हरिया तूं बिगड़ा 3॥

जल भरने को गया सवेरै
हुया मध्यान्ह बड़ा है मेरै
महोर सिंह भाषा पद टेरै
नित नया छंद जड़ा 4॥

दोहा –
नमक हरामी हो गया, तूं हरिया बेईमान ।
बोल तेरा अब क्या करूं, खा गया लूट दुकान ॥

हरिया नमक हरामी तूं मेरे आगे सैं हट ज्या ॥ टेक ।

हरिया हरामी ऊत कपूता
गंगाघाट पै जा रहै सूता
जो तेरे सिर लगैगा जूता
तुझे बेरा पट ज्या 1॥

क्या भली बुरी टेरे सैं
घर का काम ना हो तेरे सैं
क्यूं सिर पीट रह्या मेरे सैं
अब हरिया मरघट जा 2॥

मुर्दघाट का कुडवि गिराना
पांच टका कफन का लाना
उस मुर्दे का कफन उतराना
जो टके को नट जा 3॥

अब तूँ जल्दी छोड़ दे काशी
हो जा मुर्द घाट का वासी
महोर सिंह कहै यम की फांसी
राम नाम से कट ज्या 4॥

दोहा –
वचन कालू के श्रवणकर, कहन लगा दातार ।
तुम मेरे सरकार हो, मैं थारा ताबेदार ॥


अब इस ताबेदार की
है जान आपकै आगै ॥ टेक ।

गंग घाट मैं पल नहीं सोया
घनी वार ना न्हाण संजोया
घड़ा उठाने में दिन खोया
हुई बात लाचार की
कहते भी मुझे डर लागै 1॥

आज घड़ा जल का नहीं उठा
नीर बस अंग हो गया झूठा
ठोकर लाग घड़ा भी फूटा
खुशी रही सरकार की
नौकर नहीं हटकर भागै 2॥

चाहे हरिया कूं जूती मारो
गाली दो चाहे दूर बिसारो
चाहे ठाय कूवें में डारो
चाहे मारो तलवार की
हरिया ना पण कूं त्यागै 3॥

शमशानौं की करूं चढ़ाई
ल्यूं चुकाय जो काण बताई
महोर सिंह क्या गति बनाई
हरीचंद दातार की
नित नई नई हूणी जागै 4॥

दोहा –
इतनी कह नृप हरीचंद, बस गया जा शमशान ।
हिसाब जोड़न कै लिए, कालू पहूंचा दुकान ॥


हरिया का जोड़ हिसाब सेठजी क्या क्या उठा सामान ॥ टेक ।

आटा घी मीठा मसाला
तरफ हमारी कितना चाला
न्यारा न्यारा बतला लाला
सब चीजों का बयान 1॥

खर्च उठते हुया सवा महीना
अबतक मैं हिसाब ना कीना
क्या सामान हरिया कूं दीना
मुझको नहीं है ज्ञान 2॥

सेठ कहै जो तेरा बही खाता
उसमें हरिया कुछ नहीं ठाता
सत्तू पाव अलग ले जाता
दुकान सेती आन 3॥

इतनी सुन कालू चल ध्याया
जा हरिया से वचन सुनाया
महोर सिंह नित हरिगुण गाया
सुध लीजो भगवान 4॥

दोहा –
कालू जा कहने लगा, हरीचंद कै पास ।
चालीस दिन हुये तुझे, अन बिन रहै निराश ॥


  जो रहना हो घर मेरे
हरिया खुराक खाया कर ॥ टेक ।

बनिया की तुझे दुकान बताई
फिर भी शहर में निंदा कराई
क्यौं ना तैने खुराक खाई
क्या दाम लगैं थे तेरे
कही बे दाम ल्याया कर 1॥

चल अब तुझको खुराक तुलाऊं
मांगै सोई सामान दिलाऊं
भूखे से ना काम कराऊं
अब तक तो था बिन बेरे
अब नित लेकै जाया कर 2॥

इतनी कह कालू उठ ध्याया
हरिया कूं भी संग में ल्याया
बनिया से सीधा तुलवाया
तुलवाकर कालू टेरै
इतनाई रोज ठाया कर 3॥

हरिया ले सामान पधारा
गंगा घाट पै पहूंचा प्यारा
महोर सिंह ना होय गुजारा
और नाम मत फेरै
एक राम नाम गाया कर 4॥

दोहा –

गंगाजी के घाट पर, भोजन करया तैयार ।
पहूंचे विश्वामित्र जी, नृप कूं जाचनहार ॥


भोजन जीमै बिन जाचक दातार ॥ टेक ।

विष्णुभक्त मैं कहलाता हूं
अब तीर्थ करने जाता हूं
गोता लाय अभी आता हूं
डट थोड़ी सी वार 1॥

सुनकर वचन नृप सुख पाया
मौके पै अभ्यागत आया
हाथ जोड़ कहै जल्दी न्हाया
भोजन है तैयार 2॥

गया मुनि कर आँख मिंचाई
नृप नै पत्रावली लगाई
पहर बीत गए चार 3॥

सतवादी नै सत नहीं हारा
भोजन ठाय गंगा में डारा
महोर सिंह नै लिया सहारा
करियो खेवा पार 4॥

दोहा –
सभ तरह अजमा लिया, मुनि हुया लाचार ।
सत देखण कै कारणै, सर्प रूप लिया धार ॥


रम गया बाग में जाय कर
मुनि धरकै रूप विषियर का ॥ टेक ।

डसने की कर चाला मन में
विष धारण कर लीना तन में
बनकर अहि घुसा पुष्पन में
बैठा रूप छिपाय कर
दुश्मन रोहतास कंवर का 1॥

पुष्पवर्ण पुष्पौं सी काया
पुष्पन के ही बीच समाया
पहूंचा कंवर हूणी का खंदाया
उसी जगह पर आय कर
जहां कीड़ा बसै है जहर का 2॥

प्रथम फूल रोतास उतारा
फन को तान फणी फुंकारा
कस कै डंक रोहित कै मारा
पड़ा तिंवाला खाय कर
हुया नीला अंग बज्जर का 3॥

उठै कंवर पर उठा नहीं जाता
चढ़ गया जहर घुमेरी खाता
पड़ा धरण में चक्कर आता
महोर सिंह कहै गाय कर
रहै ध्यान प्रभु के घर का 4॥

दोहा –
कुछ तो गाफिल हो रहा, कुछ कुछ रहा होश ।
मन में धोखा धर रहा, बोला करकै रोष ॥


तैं दुख में दुख दे दीन्हा आज बड़ी बुरी करी करतार ॥ टेक ।

सुनकै मेरा मरण विधाता
पिता मेरा करैगा अपघाता
सुनते ही प्राण तजैगी माता
भीतों कै सिर मार 1॥

जिसने हम कूं मोल लिया जी
उसका काम कुछ ना किया जी
बदलै म्हारै तोल दिया जी
बीस कनक का भार 2॥

सुनकै मरण पिता महतारी
जो कहीं हो जांगे सतहारी
क्या थी ये कर्मौ की लाचारी
पड़ा नरक मझधार 3॥

रोय रोय रोहतास पुकारै
पड़ा पड़ा चहूँ ओर निहारै
महोर सिंह कथ छंद उचारै
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
विप्ररूप धरकै चला, मदनावत कै पास ।
आज नाग नै डस लिया, तेरा पुत्र रोहतास ॥


जा राणी बागों में पुत्र तेरा पड़ा हुया बेहाल
आज बाग में डसा नाग नै रानी तेरा लाल ॥ टेक ।

चला गया ना चालै घर को
पड़ा बाग में मारै सिर को
नागरूप बैरी कंवर को
खा गया दुश्मन काल 1॥

आणि जानी क्या नैन भरै तो
बचै नहीं सिर फोड़ मरै तो
पुत्र अपने से दो बात करै तो
जल्दी बाग में चाल 2॥

जो कुछ तेरा होगा लेना
बच जागा कुछ बेरा है ना
बूटी जड़ी घोटकर देना
बेहोश पड़ा सम्हाल 3॥

काया पड़ी बाग में सूनी
जीव उठा लें देख बिहूनी
महोर सिंह हूनी अनहूनी
हूणी की हो ना टाल 4॥

दोहा –
पुत्र मरण रानी सुन, करती हा हाकार ।
हाय प्रभु कैसी करी, पड़ी गज़ब की मार ॥

सुनकै पुत्र का मरना राणी कर रही सोच विचार ॥ टेक ।

जो अब कहूं सेठ से जाकै
पड़ै भंग पूजा में आकै
सुनते ही भागै रुदन मचाकै
बैजनाथ साहुकार 1॥

और कहूं तो कहूं मैं किससे
दूजा और दीखै ना इससे
बाग में पुत्र गाफिल हुया विष से
पड़ा हुया मझधार 2॥

दुखिया कूं दुख दारुण दीना
आज गोद का पुत्र हर लीना
बाराबाट घर मेरा कीना
कैसी करी करतार 3॥

जीव आस राणी नै त्यागी
पुत्र पुत्र जब करने लागी
महोर सिंह कहै भागी-भागी
फिरै बाग मंझार 4॥

दोहा –
राणी खोजत बाग में, गई कंवर कै पास ।
त्राहि-त्राहि करने लगी, देख पुत्र की ल्हास ॥


देख कै हाल कंवर का राणी करन लगी अपघात ॥ टेक ।

पड़ा धरण में रूप दीवाना
छाती में धड़क रहे प्राना
चढ़ा जहर हो गया मस्ताना
तन में रही ना खबरात 1॥

मिंचे नैन नीली हुई काया
मुख के बीच बुलबला आया
सुरत पै वो नहीं समाया
काले हो गए दांत 2॥

स्थान भ्रष्ट हुई नाड़ी छूटी
सकल इंद्री हो गई झूठी
दे नहीं काम कोये जड़ी बूटी
झूठा हो गया गात 3॥

जननी हा हाकार पुकारै
शीश धुनै धरती में मारै
महोर सिंह हरी नाम उचारै
सुमरण करै दिन रात 4॥

दोहा –
ल्हास ठाय गोदी धरी, कर रही हा-हाकार ।
सिर पुचकारै कंवर का, बोली बचन उचार ॥


उठ बैठा हो दृग खोल जी
चल मात तेरी यहां आई ॥ टेक ।

विषधर आज बाग में फेटा
मारा डंक खाय लपेटा
माता माता कहकर बेटा
इकबार तो मुख सैं बोल जी
मेरे तन में हो सुखदाई 1॥

दुखिया कै दुख कर्म लिखा था
विपता में आ काशी टिका था
बीच बजार कै खड़ा बिका था
तैं कदे ना टहल बजाई 2॥

कहता माता की टहल करूंगा
पिता की आज्ञा शीश धरूंगा
बिडारूं कैसे पेट भरूंगा
होय गया बेकोल जी
सुत कर गया आँख मिंचाई 3॥

हे पूत किस नींद में सोवै
पड़ा विकल ना सचेत होवै
बख़्त को देख माता रोवै
महोर सिंह खा गई झोल जी
ना तन में रही समाई 4॥

दोहा –
माता का रुदन सुन, खुले कंवर के नैन ।
तन में विष ज्वाला जगी, बोला मुख से बैन ॥


ब्रह्मा भी ना मेट सकै जो फिर गई कलम विधाता की
मैं मरने वाला मेरी मां दो चार सांस रहगे बाकी ॥टेक।

बेरा ना यो कौन जन्म का पाप आगै आग्या मां
बैरी विषयर आज बाग में लड़न का मौका पा ग्या मां
मैं अति खुशी से घूम घूम सुमन तोड़न लाग्या मां
मारा डंक अचानक तै जब जीव मेरा घबरा ग्या मां
मैं इधर उधर नै भागा मां सुरत लगा कै महलां की 1॥

पिता मेरे नै वचन भरा मैं उनको छोड़ चल्या ए मां
बालकपन में मेरा मन भरम नै फोड़ चल्या ए मां
पिता और काशी नगरी से मैं नाता तोड़ चल्या ए मां
अंत समय में आपको भी हाथ जोड़ चल्या ए मां
तजकै खोड़ चल्या ए मां आई सवारी यम दूतां की 2॥

देख देख कै मात तनै मेरा हिया उझलता आवै हो
तेरी नजरां के सामने ये यम दूत मनै ले जावै हो
पिता तै एक बर मिला दे माता यो रोताश मिलना चावै हो
इतना कहै रोतास बाग़ में नैनी नीर बहावै हो
अब जी मेरा घबरावै हो मैं भूल गया सब चालाकी 3॥

सत के ऊपर रहे पिता सत धर्म राखिये माता हो
हो रही बंद जबान मेरी ना मुख से बोल्या जाता हो
काया मेरी कांपण लागी दिल मेरा दहलाता हो
इतनी कहै रोताश कंवर का टूटा जगत से नाता हो
महोर सिंह दर्शाता हो सत धर्म मर्यादा की झांकी 4॥

दोहा –
हंस बटेऊ उड़ चल्या, पड़ी रह गई खोड़ ।
नब्ज कंवर की देखकर, आस दई है छोड़ ॥

ले रही ल्हास गोदी में माता करने लगी विलाप ॥ टेक ।

छाती मूंड कूटै है माथा
सुत ही सुत करण लगी माता
लुट गई मैं तो आज विधाता
पड़ी जो खाकै झांप 1॥

रुदन करै लगी करन बखाना
कौन घड़ी हुया काशी आना
उजड़ा हुया बाग़ जलगाना
मरा नै दुश्मन सांप 2॥

देख-देख पुत्तर की खोड़ ने
माता लग रही शीश फोड़ने
होती खबर तो पुष्प तोड़ने
भी मैं आती आप 3॥

कहां गया आज पुत्र हितकारी
रुदन करै तेरी महतारी
महोर सिंह प्रभु शरण तिहारी
हरो जन का संताप 4॥

दोहा –
माता पुत्र की ल्हास कूं, गोदी कूं रही लाय ।
सबर ना आवै कंवर का, कर रही त्राय-त्राय ॥


  धोखा दे गया जननी कूं आज करी क्या रोतास ॥ टेक ।

पुत्र मेरा प्राणों से प्यारा
आज बाग़ में पैर पसारा
क्या कोई तैं बदला उतारा
बोझ मरी दस मास 1॥

आज पुत्र तैने क्या कीना
जननी को दुख दारुण दीना
देख तुझे पीड़ा भी थी ना
कर दई आज निराश 2॥

मैं भी अब त्यागूंगी प्राना
पुत्र सरे माता मरजाना
मुझको तो अब नहीं ठिकाना
बीच धरती आकाश 3॥

इतनी कहकै कंवर की माता
करने लगी है अपघाता
महोर सिंह नित हरिगुण गाता
जन की मेटो त्रास 4॥

दोहा –
रुदन करै मदनावती, धर दी ल्हास उतार ।
शीश फोड़ लिया मात नै, धरणी सेती मार ॥


बेटा तेरी इस खोड़ का
आज कोई वारस ना ॥ टेक ।

जन्म लिया तब नोबत बाजी
बंटी बधाई हो रहे राजी
करूं विलाप आज मोहताजीं
घर था कई किरोड़ का
हूणी पै कोये बस ना 1॥

मुर्दघाट पर पिता तुम्हारा
हुईं मासूल चुकावन हारा
कहां से लाऊं मासूल उधारा
इस जल जानी खोड़ का
कोई भाई बंधु परसना 2॥

प्रथम हुया घर सेती निकरना
दूजे पिता और पुत्र बिछरना
तीजे पुत्र प्रिये का मरना
दुख हो गया चहूं ओड़ का
मुझ पर ये जहर बरसना 3॥

लकड़ी कफ़न कहां से आवै
शमशानों में कौन पहूंचावै
तज कै कर्म तेरे गुण गावै
महोर सिंह द्विज गौड़ का
चहिये दुखहीन निकसना 4॥

दोहा –
ल्हास ठाय सिर पर धरी, रट रही राम ही राम ।
शमशानों को चल दई, जपत हरि का नाम ॥

बागों से चली मदनावत सिर धर ल्हास कंवर की ॥ टेक ।

राम राम ही राम उचारै
कभी पुत्र ही पुत्र पुकारै
समझ सोच कभी धीरज धारै
छाती कर लई बजर की 1॥

लागै बोझ माता बिलखाती
छुटकै ल्हास धरणी गिर जाती
कूटने लगी मूंड और छाती
रोवै मारी डर की 2॥

सारे अंग पसीना छाया
माथा फूट खून बह आया
वीगस गई है कंवर की काया
देह भरी है जहर की 3॥

दोनों का हुया हाल बेहाला
विगसा अंग खून बह चाला
महोर सिंह हरिनाम की माला
जपता सदा दिनभर की 4॥

दोहा –
ल्हास धर दई जाय कै, गंगाजी के तीर ।
कफ़न उढ़ाया कंवर नै, फाड़ कै आधा चीर ॥

रुदन करै है माता बैठी गंगाजी के तीर ॥ टेक ।

पड़ी ल्हास श्रीगंग किनारै
चढ़ा जहर दुर्गंधी मारै
टपकै खून बह चला सारै
बह कै चला शरीर 1॥

काष्ठ का भार कहां से लाऊं
सूनी ल्हास छोड़ कहां जाऊं
दाग हथेली दे कै बहाऊं
श्री गंगा जी के नीर 2॥

  सुन कै रुदन हरीचंद आया
देख दूर से रुदन मचाया
क्यूं रानी तेरी उघड़ी काया
कित गया आधा चीर 3॥

क्यूं राणी तूं खड़ी रोवै है
गंग किनारै कुण सोवै है
महोर सिंह क्यूं दिन खोवै है
करले भजन में सीर 4॥

दोहा –
अनहूनी होनी नहीं, हूणी की नहीं टाल ।
आज पति वो खप लिया, जो असली अपना लाल ॥

इस काशी बीच बजार कै
भरतार आज मैं लुटगी ॥ टेक ।

निर्भागण नै लाल लखीना
आज भेंट बागों की दीना
बैरण काशी नै डस लीना
रूप सर्प का धार कै
पिया धरती आज उलटगी 1॥

विष चढ़ा अंग वीगस गया सारा
मर पचकै लिया गंग किनारा
मुर्दघाट पै पुत्र तुम्हारा
सोवै पैर पसार कै
पिया डोर हाथ सैं छुटगी 2॥

पाड़ चीर कंवर पै गेरा
आधा अंग न्यूं उघड़ा मेरा
काठ कफ़न बिन सुत पड़ा तेरा
रुदन करूं सिर मार कै
मैं चारों तरफ से घुटगी 3॥

अपनी छुवा कै नेश अंग में
अब मैं ल्हास बहाऊं गंग में
महोर सिंह कहता सत्संग में
हर के नाम उचार कै
दिल की भरमना मिटगी 4॥

दोहा –
पुत्र मरण नृप श्रवणकर, नैन चली जलधार ।
हिया बज्र का कर लिया, बोला बचन उचार ॥


होनी थी सो हो लई राणी अब ला दे मेरा सूल ॥ टेक ।

मत रोवै हिया करले बज्र का
करले सबर रोतास कंवर का
पांच टका दे मेरे कर का
फेर गंग बहा अस्थूल 1॥

पुत्र समझ सत नहीं हारूंगा
नहीं देगी तो कफ़न तारूंगा
कालू का करज सारूंगा
करूं ना हुकम अदूल 2॥

क्या तो कर का दाम चुका तूं
क्या यहां सेती ल्हास उठा तूं
महोर सिंह चाहे जहां गा तूं
राम नाम मत भूल 3॥

दोहा –
मदनावत कहने लगी, सुनो मेरे भरतार । मत भूलो रोतास सुत, है दोनों को इकसार ॥

ला दूंगी पांच टकान के
देने द्यो दाग कंवर को ॥ टेक ।

मैं नारी तूं पति है मेरा
ये रोतास कंवर है तेरा
आ गई मृत्यु छाया अंधेरा
वासी हुये शमशान के
पिया भूले अपने घर को 1॥

राजा कहै राणी झूठा नाता
देखत भूली संसार कहाता
कौन पिता कौन किसकी माता
मोह माया में आन के
छोडूं ना मेरे कर को 2॥

राणी कहै ल्हास गंग में बहा कै
कर लाऊं साहूकार से जाकै
टके द्यूं पांच आपके लाकै
जो बेईतबारी जबान के
तो पहली जाऊं शहर को 3॥

राजा कहै नहीं जाने दूंगा
कर बिन नहीं बहाने दूंगा
यहां से ल्हास नहीं ठाने दूंगा
कहै महोर सिंह अज्ञान के
हड़ो संसारी डर को 4॥

दोहा –

सत को मैं छोडूं नहीं, यही वचन प्रिय नार ।
सत के कारण तज दिया, राजपाट घरबार ॥


  क्यों भूल गई उस दिन को
जद घड़ा मेरा ना ठाया था ॥ टेक ।

वोही पति मैं वोही तूं नारी
देह पलट ना हुई हमारी
दूर खड़ी खड़ी तैने प्यारी
जतन बताया था 1॥

राणी मेरा कर चुका दे
नहीं तो कफ़न तार पकड़ा दे
बाकी चीर को इसे उढ़ा दे
तैने पुत्र जाया था 2॥

उस दिन तैने धर्म ना हारा
हमसे आज नहीं जाय बिसारा
इतनी कहकर कफ़न उतारा
नग्न बनाया था 3॥

बिलखै चीर राणी सिर का तार कै
रुदन करण लगी ऊपर डार कै
महोर सिंह नै सुरत धार कै
हरिगुण गाया था 4॥

दोहा –
चीर तार कै चला गया, राजा कालू कै पास ।
रुदन करै राणी खड़ी, मन में अति उदास ॥


रुदन कर रही रानी
सुत को जल में देऊं दाग ॥ टेक ।

सेठजी देखै बाट हमारी
ल्हास को ठाय गंग में डारी
नैनीं नीर हो रह्या जारी
आवै ना मुख से बानी
लग रही बिरह की आग 1॥

बहकर ल्हास कंवर की जावै
कभी ठावै कभी गोता खावै
चली गई दूर नजर ना आवै
दुखी हो गये प्रानी, राणी के फूटे भाग 2॥

कर स्नान सुत को बहा दिया
मन में सबर कंवर का कर लिया
याद करै कभी उझलाता हिया
हो गई गउ खानी, आज हुया कंवर काग 3॥

खुले केश राणी घबरावै
बिना वस्त्र के लज्जा आवै
महोर सिंह हरि का गुण गावै
तेरी गति ना जानी, शारद शक्ति नाग 4॥

दोहा –
केश खुले हैं शीश के, हो रहा नग्न शरीर ।
कैसे जाऊं शहर में, सूझै ना ततबीर


येक शहर बाहर की देवी राणी उसमें आई जी ॥ टेक ।

दिन में नहीं बडूं शहर में
सो रही देवी के मंदर में
हो रही गाफिल भरी जहर में
निराशा छाई जी 1॥

विश्वामित्र नै फेरी माया
एक सेठ का बालक ठाया
देवी के मंदर में आया
कुबद्ध कमाई जी 2॥

उसका खून काढ़ हत्यारा
राणी का रंगा मुख हस्त सारा
फिर उसकी छाती पै प्यारा
दिया सुवाई जी 3॥

जाय शहर में दई दुहाई
इक डाकण मंदर में आई
एक बालक कूं खा चुकी भाई
महोर सिंह छवि गाई जी 4॥

दोहा –
अपने अपने सुत को, सभने लिया संभाल ।
कोड़ीध्वज इक सेठ था, पाया ना उसका लाल ॥


रोने लगी सेठ की नार मेरा हो सुत डाकण नै खा लीना ॥ टेक ।

चौथेपन में कृपा करी, राजी हो सुत दिया हरी
घर के बाहर आ पापण नै अचानक सैं ठा लीना 1॥

मैं कैसे धीरज धरूं, के विष खाकै कूवे परूं
मूर्छा हो गिरी खाय करणी का फल पा लीना 2॥

मेरे दुख को सेठ मिटा दे, इस डाकण को तूं मरवा दे
उसका लो सिर तार जल्दी बुला भंगी का लीना 3॥

सुन वचन हुकम जल्दी किया, इक हलकारा भिजवा दिया
महोर सिंह साहूकार झट कालू नै बुलवा लीना 4॥

दोहा –
हुकम सेठ का पायकै, हरिया लिया बुलाय ।
हरिया नै कालू को सब, हाल दिया समझाय ॥

आ गई भवन सती के डाकण जाकू मार मार ॥ टेक ।

आज सेठ का बालक ठाया
तरस ना जरा इसको आया
सती के भवन में बड़कै खाया
बड़ी बदकार कार 1॥

लेकै खड़ग अब जल्दी जाओ
पलभर की देरी मत लाओ
इस काशी का दुःख मिटाओ
सिर को तार तार 2॥

  जो या मारी नहीं जावैगी
किसी का बालक और ठावैगी
किये कर्म का फल पावैगी
ले तलवार वार 3॥

जल्लादों का काम हमारा
तुझको बता दिया है सारा
महोर सिंह हरिनाम उचारा
ये है सार सार 4॥

दोहा –
हुक्म पायकै चल दिया, ले नंगी तलवार ।
देखन कूं सब चले संग, कांशी के नरनार ॥


कर में ले नंगी तलवार
अब चला वहां दातार
मन में करता सोच विचार
सती के द्वार गया ॥ टेक ।

आये काशी के नरनारी
जुड़ गई भीड़ भवन में भारी
सारी शोभा रही बिगड़
गया सुख का बाग़ उजड़
चल भवन बीच में बड़
कै वहां दातार गया 1॥

ये मदनावत रानी म्हारी
बेमतलब जायेगी संहारी
म्हारी फूट गई तकदीर
आज यो छूटैगा अब सीर
क्या करूं पड़ी भीर
न्यूं मैं हो लाचार गया 2॥

केश पकड़कर झटका लाया
खुल गये नैन कांप रही काया
घबराया नहीं महिपाल
राणी नै अपना देखा हाल
रोवन लागी पकड़ कै भाल
कर्म मेरा मार गया 3॥

तैने सेठ का बालक मारा
बड़ा भारी जुल्म गुजारा
सारा धर्म दिया खोय
लिया मान को डबोय
महोर सिंह कहै मत रोय
समय बेकार गया 4॥

मुनी मुझको नहीं खबर है पुत्र किसने मारा ॥ टेक ।

अब तुम कैसे भूलगे सुनो वचन दातार
तुम तो मेरे पति हो मैं हूं आपकी नार
सुनो मतलब सारा 1॥

विपता में विपता पड़ी तुम जानत हो भूपाल
मैं किसका पुत्र मारती मेरा ही मर गया लाल
नैन चले जलधारा 2॥

है टेढ़ी नजर भगवान की करी विधाता वाम
लाया पुत्र मारकै यो है किसी दुष्ट का काम
मेरी छाती पै डारा 3॥

मुझे पकड़ लई भरम सैं पिया करते नहीं विचार
महोर सिंह कहै सत के खातिर बेशक शीश उतार
करो धड़ से न्यारा 4॥

दोहा –
हरिचंद कहने लगा, सुनो राणी चित लाय ।
अब निश्चय हो मारनी, छोडूं तो सत जाय ॥


तुझे कैसे छोड़ा जाय
राणी मुर्दा तेरे पास में ॥ टेक ।

यह कर्म किसी नै करे दिया
छाती पै मुर्दा धरे दिया
वो रक्त गया मुख पै लिपटाय
सत साच रहे तलास में 1॥

कालू का हुकम टारूं नहीं
अब मैं सत को हारूं नहीं
धड़ से शीश द्यूं अलग हटाय
नहीं करूं धर्म का नाश मैं 2॥

आ भीड़ भवन में अड़ रही
डाकण की दुहाई पड़ रही
साहूकार रहा बिलखाय
सेठानी भरी त्रास में 3॥

तूं बाहर चलकर देखिये
लिख्या कर्म में लेख ये
महोर सिंह कहै दर्शाय
बसै ग्राम साल्हावास में 4॥

दोहा –
राजा मन में सोच कै, करन लगा विचार ।
राणी की चोटी पकड़, लाया भवन से बाहार ॥


सती को मंदर से लाया खैंच कै बाहार ॥ टेक ।

लाकै सभी नै दिखलाई
देखो डाकण ये है भाई
मुझको तो ये सूती पाई
बालक छाती पै डार 1॥

यों डाकण बड़ी है खोटी
खा खा मांस हो रही मोटी
कर द्यूं न्यारी न्यारी बोटी
झट हाथ लई तलवार 2॥

जो अब आज्ञा थारी पाऊं
डाकण का मैं शीश उड़ाऊं
कालू का मैं हुकम बजाऊं
उसका मैं ताबेदार 3॥

देख सेठानी सेठ घबराया
विधिना कैसा रास रचाया
महोर सिंह पद कथ कै गाया
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
जद राणी कहने लगी , सुनो राजा दातार ।
मतना मोहे तरसावो, अब झटपट द्यो मार ॥


क्यूं घणी देर तरसावै मुझको मार दे ना ॥ टेक ।

जो ईमान आपकै आया
मैंने पुत्र सेठ का खाया
जिस जगह रोतास बहाया
उस जगह डार दे ना 1॥

क्यूं अब इतनी त्रास दिखावै
घणी बार अब मतना सतावै
हाथ जोड़ राणी समझावै
सिर तार दे ना 3॥

मैं दुखियारी दुःख ही भरती
झेलैना आकाश धरती
मरने सैं मैं कोन्या डरती
काम संवार दे ना 4॥

रुदन करै मदनावत राणी
मिंच गये नैन थकी है बाणी
महोर कहै कथा निशाणी
नाम उचार दे ना 5॥

दोहा –
क्यूं मुझको खैंची फिरै, दे धड़ से शीश उड़ाय ।
यो एहसान भूलूं नहीं, सुन ले चित लगाय ॥


लाया केश पकड़कै नृप लिया खड़ग हू को तान ॥ टेक ।

चौताल –
सूंत लई तलवार भूप नै कोप किया मन माहीं
पतिव्रता सत उसी बख्त प्रगटा छन माहीं
लगे बोलने स्याल विकराल हुया अंधेरा दिन माहीं
पृथ्वी कम्पी मचा शोर इन्द्रासन माहीं

चोपैया -
जितने कांशी के वासी
सबको छा गई उदासी
कम्पे शंकर कैलाशी
श्रीनारायण अविनाशी
उठत -
रूप पलटकै चला, कालजा हिला, पता ना मिला
भगत को हो रहा दुःख महान 1॥


चौताल -
जल्दी से काशीपुरी चले थे भगवद बन ब्रह्मचारी
गए सती भवन के मांह्य जहां जुड़ रही शोभा भारी
राणी पै तेगा तान क्रोध कर रहा था छत्रधारी
झट पकड़ लई तलवार भूप से बोले थे बनवारी
चोपैया -
बस कही मान ले मेरी
क्यूं छाई अक्ल अंधेरी
हूणी नै दई है घेरी
बेगुना त्रिया ये तेरी
उठत -
दे दर्शन कहैं करतार, खड़ग दे डार, तूं इसको मत नहीं मार,
प्रेम से कहन लगे भगवान 2॥


चौताला -
जद राजा कहने लगा भेद मैं जाणू हूं सब सारा
तूं कपटी ब्राह्मण ध्यान डिगावै है म्हारा
मुजको ना तेरा एतबार कहीं तुम हो ना कोई छलगारा
जो दीनदयालु आप चतुर्भुज रूप प्रभु ना धारा
चोपैया -
मेरै यकीन जब आवै
साहुकार सुत कुं जिवावै
जद डाकण छुट पावै
ना सुत और किसी का खावै
उठत -
देख राणी का हाल, प्रभुदयाल, रूप बना तत्काल
धर लीन्ही अदभुत शान 3॥


चौताल -
सुनकै भगत की विनय प्रभुजी रूप चतुर्भुज धारा
गल सजी बैजंती माल बंशी का राग मधुर भी प्यारा
कटी-कछनी पीताम्बर वसन कर्ण कुंडल का उजियारा
गदा पद्म शंख और धनुष सुदर्शनचक्र तेज अति भारा
चौपैया -
ऋषि मुनीजी लख हर्षाया
जयति जय शब्द सुनाया
इन्द्र बाजा बजवाया
चहुं और पुष्प बर्षाया
उठत -
कांशी के नरनार, करैं जैकार, प्रेम चित धार
महोर सिंह करता छंद बखान 4॥

विख्यात जगत में तुमसे कोई ना दानी ॥ टेक ।

सभी तरह से सत अजमाया
ज्ञान ध्यान में पूरा पाया
बेच दई कांशी में काया
कालू घर भर लिया पानी 1॥

मेरा कहना सत्य जान ले
मन चाहा वरदान मांग ले
जो चाहे सो ही वरदान ले
सुन सत की बानी 2॥

कहो पुरी कैलाश पठाऊं
आप कहो बैकुंठ दिवाऊं
कहो तो इन्द्रपुरी पहुंचाऊं
दिवाऊं रजधानी 3॥

इतनी कहकै फेरी माया
हो सजीव दोनों सुत आया
सेठ देख हिरदे कै लाया
ख़ुशी हो गई रानी 4॥

फिर जब कहन लगे अविनाशी
तेरे सत से तिर गई कांशी
महोर सिंह कहते सुखराशी
भजन कथै ज्ञानी 5॥

----- शुभम् मंगलम् भूनाथ -----