दोहा –
क्यूं मुझको खैंची फिरै, दे धड़ से शीश उड़ाय ।
यो एहसान भूलूं नहीं, सुन ले चित लगाय ॥
लाया केश पकड़कै नृप लिया खड़ग हू को तान ॥ टेक ।
चौताल –
सूंत लई तलवार भूप नै कोप किया मन माहीं
पतिव्रता सत उसी बख्त प्रगटा छन माहीं
लगे बोलने स्याल विकराल हुया अंधेरा दिन माहीं
पृथ्वी कम्पी मचा शोर इन्द्रासन माहीं
चोपैया -
जितने कांशी के वासी
सबको छा गई उदासी
कम्पे शंकर कैलाशी
श्रीनारायण अविनाशी
उठत -
रूप पलटकै चला, कालजा हिला, पता ना मिला
भगत को हो रहा दुःख महान 1॥
चौताल -
जल्दी से काशीपुरी चले थे भगवद बन ब्रह्मचारी
गए सती भवन के मांह्य जहां जुड़ रही शोभा भारी
राणी पै तेगा तान क्रोध कर रहा था छत्रधारी
झट पकड़ लई तलवार भूप से बोले थे बनवारी
चोपैया -
बस कही मान ले मेरी
क्यूं छाई अक्ल अंधेरी
हूणी नै दई है घेरी
बेगुना त्रिया ये तेरी
उठत -
दे दर्शन कहैं करतार, खड़ग दे डार, तूं इसको मत नहीं मार,
प्रेम से कहन लगे भगवान 2॥
चौताला -
जद राजा कहने लगा भेद मैं जाणू हूं सब सारा
तूं कपटी ब्राह्मण ध्यान डिगावै है म्हारा
मुजको ना तेरा एतबार कहीं तुम हो ना कोई छलगारा
जो दीनदयालु आप चतुर्भुज रूप प्रभु ना धारा
चोपैया -
मेरै यकीन जब आवै
साहुकार सुत कुं जिवावै
जद डाकण छुट पावै
ना सुत और किसी का खावै
उठत -
देख राणी का हाल, प्रभुदयाल, रूप बना तत्काल
धर लीन्ही अदभुत शान 3॥
चौताल -
सुनकै भगत की विनय प्रभुजी रूप चतुर्भुज धारा
गल सजी बैजंती माल बंशी का राग मधुर भी प्यारा
कटी-कछनी पीताम्बर वसन कर्ण कुंडल का उजियारा
गदा पद्म शंख और धनुष सुदर्शनचक्र तेज अति भारा
चौपैया -
ऋषि मुनीजी लख हर्षाया
जयति जय शब्द सुनाया
इन्द्र बाजा बजवाया
चहुं और पुष्प बर्षाया
उठत -
कांशी के नरनार, करैं जैकार, प्रेम चित धार
महोर सिंह करता छंद बखान 4॥